श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं?…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८७ ☆
☆ तपते शहर में ठहरी हुई छाँव: क्यों कुछ रास्ते धूप में भी ठंडे रहते हैं? ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
तपन जब अपने चरम पर होती है, तब मन किसी तर्क से नहीं, केवल अनुभव से चलता है। धूप में दो कदम चलते ही भीतर एक ही पुकार उठती है — “काश कहीं कोई पेड़ मिल जाए… बस एक पल की छाँव मिल जाए।” यह चाह केवल शरीर की थकान नहीं होती, यह आत्मा की प्यास भी होती है।
कभी आपने ध्यान दिया है—कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ पेड़ों की हरियाली सिर पर छतरी-सी तनी रहती है। उन्हीं रास्तों से गुजरते हुए, चाहे आप खुले में हों या गाड़ी के भीतर, गर्मी का तीखापन जैसे कहीं खो जाता है। हवा वही होती है, सूरज वही होता है, पर एहसास बदल जाता है। वहाँ धूप जलाती नहीं, बस छूकर निकल जाती है।
और दूसरी ओर, वे रास्ते जहाँ पेड़ नहीं हैं—जहाँ केवल कंक्रीट है, तपती ज़मीन है, और बिन छाँव का विस्तार है। वहाँ आप गाड़ी के भीतर बैठकर एसी चला लें, फिर भी भीतर कहीं न कहीं गर्मी का एक अदृश्य बोझ बना रहता है। जैसे वातावरण ही तपकर भीतर उतर रहा हो।
यह अंतर केवल तापमान का नहीं, यह प्रकृति के स्पर्श का अंतर है।
पेड़ केवल छाया नहीं देते, वे वातावरण को संतुलित करते हैं। उनकी पत्तियाँ हवा को ठहराती हैं, उसे शीतल बनाती हैं, और उनकी जड़ें धरती में जल को थामे रखती हैं। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं, वहाँ धरती की नमी जीवित रहती है, वहाँ जीवन की साँसें गहरी होती हैं।
हरियाली दरअसल प्रकृति का वह मौन संगीत है, जो बिना शब्दों के हमें सुकून देता है। जब हम पेड़ों के बीच से गुजरते हैं, तो केवल शरीर नहीं, मन भी ठंडा होता है। जैसे कोई अदृश्य हाथ हमारे माथे को सहला रहा हो और कह रहा हो—“ठहरो, सब ठीक है।”
शायद इसी कारण, जब जीवन की भागदौड़ और गर्मी दोनों हमें थका देती हैं, तब हम अनायास ही हरियाली की ओर खिंचते हैं। क्योंकि पेड़ों की छाँव में केवल विश्राम नहीं, एक गहरा अपनापन मिलता है—एक ऐसा अपनापन, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ देता है।
तो इस तपते समय में, जब हर कोई सुकून की तलाश में है, क्यों न हम खुद भी उस सुकून का कारण बनें?
एक पेड़ लगाएँ, एक पौधे को बढ़ने दें, ताकि आने वाले समय में जब कोई राहगीर उस रास्ते से गुजरे, तो उसे भी वही शीतलता मिले, वही राहत मिले—जो हम आज तलाश रहे हैं।
क्योंकि पेड़ केवल आज का सहारा नहीं होते,
वे आने वाले कल की साँस होते हैं…
धूप तप रही तपन से, पेड़ों की नहि छाँव।
हरियाली उपचार है, चलो बसाएँ गाँव।।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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