श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा
8.गढ़चिरौली यात्रा
गढ़चिरौली
सुबह उठकर गढ़चिरौली ज़िले की अहेरी तहसील में स्थित सघन सागौन वन की सैर को निकल गए। गढ़चिरौली जिले का गठन 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर से गढ़चिरौली और सिरोंचा तहसीलों को अलग करके किया गया था। गढ़चिरौली जिला महाराष्ट्र के उत्तरी-पूर्वी कोने में स्थित है। यह पश्चिम में चंद्रपुर, उत्तर में गोंदिया, पूर्व में छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर और जगदलपुर ज़िले और दक्षिण पश्चिम में तेलंगाना राज्य के करीमनगर और आदिलाबाद जिलों से घिरा है। गढ़चिरौली आदिवासी ज़िला है। मुख्य निवासी गोंड और माडिया समुदाय के लोग है। एक खास बात यहाँ 1972 से बंगाली समुदाय के शरणार्थी विस्थापित किए गए हैं।
मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास बहुत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। यहां अनेक गोंड राजाओं ने शासन किया है। सर्वाधिक समय तक राजा यादवराय के 62 वंशजों (यादवराय से लेकर सुमेदशाह तक) ने शासन किया। इस वंश में महान प्रतापी राजा संग्राम शाह (48वें) हुए। इन्होने युद्ध करके अनेक राजाओं को हराया और 52 गढ़ स्थापित किये। गोंडों के 36 राज्य उत्तर में रायगढ़ से दक्षिण में गढ़चिरोली तक और 16 राज्य गढ़ मंडला से मकड़ाई रियासत तक, इस प्रकार कुल 52 राज्यों का समूह गोंडवाना साम्राज्य कहलाता था। महाराजा संग्राम शाह का विशाल साम्राज्य जिन 52 गढ़ों तक फैला था, जिनकी सीमा पश्चिम में गिन्नौर गढ़ भोपाल, पूरब में लाफागढ़ बिलासपुर, उत्तर में सिंगोरगढ़, दमोह और दक्षिण में टीपागढ़ (गढ़चिरोली) महाराष्ट्र तक फैला था। इस तरह राजा संग्राम सिंह ने 52 गढ स्थापित करके दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से 1480 ई० में महाराजा और शाह की उपाधि धारण की थी।
प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर राष्ट्रकूट, चालुक्य, देवगिरि के यादव और बाद में गढ़चिरौली के गोंडों का शासन था। 13 वीं शताब्दी में खांडक बल्लाल शाह ने चंद्रपुर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया। चंद्रपुर बाद में मराठा शासन में आया। 1853 में, बरार जिसमें चंद्रपुर (जिसे चंदा कहा जाता था) का हिस्सा भी था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। 1854 में चंद्रपुर सेंट्रल प्रांत एंड बेरार का एक स्वतंत्र जिला बन गया।
लॉर्ड कर्ज़न की राज्य पुनर्गठन योजना के अंतर्गत 1905 में अंग्रेजों ने चंद्रपुर और ब्रम्हपुरी से एक-एक जमींदारी संपत्ति का हस्तांतरण करके गढ़चिरौली तहसील बनाई। यह 1956 तक सेंट्रल प्रांत का हिस्सा था, जब राज्यों के पुनर्गठन के साथ, चंद्रपुर को बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1960 में, जब महाराष्ट्र बनाया गया, चंद्रपुर नए राज्य का एक जिला बन गया। 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर का विभाजन हुआ, जिसमें गढ़चिरौली तहसील एक स्वतंत्र जिला बन गया। गढ़चिरौली में नक्सलवाद की जड़ें जमी हैं। छापामार लड़ाके पहाड़ियों और घने जंगलों में रहते हैं और इसे रेड कॉरिडोर के हिस्से के रूप में नामित किया गया है।
गढ़चिरौली से तेलंगाना राज्य की सीमा पर दक्षिण दिशा में अल्लापल्ली नाम का वन आच्छादित गाँव है। अल्लापल्ली आमतौर पर गोंडवाना गांव है, लेकिन अब, कई लोग शिक्षा, व्यवसाय और जीविका कमाने के उद्देश्य से वहां आ बसे हैं। अल्लापल्ली के जंगल विश्व प्रसिद्ध सागौन की लकड़ी के ख़ज़ाने हैं। अल्लापल्ली से परमिली- भामरागढ़ रोड पर 07 किलोमीटर दूर 100 साल पहले वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत मूल जंगल के रूप में संरक्षित ‘ग्लोरी ऑफ अल्लापल्ली’ वन पारिस्थितिकी के एक जीवित संग्रहालय के रूप में प्रसिद्ध है। जहाँ पर 500 वर्ष पुराने सागौन के 120 फ़ुट ऊँचे पेड़ मौजूद हैं। जिसे सागौन कहा जाता है वह साग का पेड़ है, एक जगह पर बहुत अधिक संख्या में साग के पेड़ होने से उसे सागवन पुकारा जाने लगा, वही सागवन कालांतर में सागौन हो गया।
पहले अल्लापल्ली हैदराबाद के निज़ाम के नियंत्रण में था। बाज़ीराव ने मराठवाड़ा को जीतकर नियंत्रण में लिया तब इस इलाक़े को नागपुर के राघोजी भोसले के अधीन रख दिया। इसलिए अल्लापल्ली तहसील की जनसंख्या मुख्यतः तेलुगु भाषी है लेकिन गावों में गोड़ों की बसावट है। वर्तमान में अल्लापल्ली महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले की तहसील ऐटापल्ली का एक ब्लॉक है।
रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे ने बताया कि जिस गेस्ट हाऊस में हम रुके हैं वह अंग्रेजों द्वारा 1910 में बनाया गया था। अल्लापल्ली से 130 किलोमीटर दक्षिण दिशा में हत्थी केम्प बनाया गया है। लकड़ी उठाने और ढ़ोने के लिए कुछ हाथी आसाम के काज़ीरंगा पार्क से लाए गए थे। मशीनीकरण से बेरोज़गार हाथियों को सेवानिवृत्त करके एक पहाड़ी इलाक़े में रखा गया है। जहाँ उन्हें सप्ताह में दो बार चावल गुड घी और केलों का भोजन कराने हेतु एक तालाब के बीच बने हत्थी केम्प में लाया जाता है। उनके पैरों में लोहे की मोटी ज़ंजीर बांधी है जिनके घिसटने से भूमि पर बनने वाले निशानों से वनरक्षक उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और भोजन के दिन उन्हें हाँका लगाकर हत्थी केम्प लाते हैं।
सबसे वयोवृद्ध हथिनी का नाम रूपा है, उसकी उम्र अस्सी साल बतायी जाती है। अल्लापल्ली की पुरानी हथिनी बसंती वहाँ के सबसे पुराने हाथी महालिंगा के संसर्ग से बच्चा नहीं दे रही थी इसलिए एक अन्य जवान हथिनी रूपा को हाथियों की संख्या बढ़ाने हेतु नागझिरा से अल्लापल्ली लाया गया। रूपा के पहुँचने से बसंती के कान खड़े हो गए। उसने महालिंगा पर कड़ी नज़र रखना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ़ बसंती रूपा को चिंघाड़ कर चुनौतीपूर्ण धमकी देने लगी। एक दिन महलिंगा नज़र बचाकर रूपा के नज़दीक पहुँच सूँड़ से प्रेम का इज़हार करने लगा तो बसंती क्रोध से उफनते हुए रूपा पर टूट पड़ी और उसे धमकाकर घने जंगल में पहुँचा कर दम लिया। इस घटना के बाद वन अधिकारियों ने रूपा को तालाब की दूसरी तरफ़ आधे किलोमीटर लम्बी ज़ंजीरों से बांधकर वहीं उसके भोजन का इंतज़ाम कर दिया ताकि बसंती के दाम्पत्य जीवन में व्यवधान उत्पन्न न हो।
रूपा को अल्लापल्ली जंगल में बच्चे पैदा करके हाथियों की वंशवृद्धि का उद्देश्य पूरा न होते देख वन अधिकारियों ने केरल और आसाम से पशु विशेषज्ञ बुलाकर बसंती को एक साल तक कुछ इंजेक्शन दिए तो वह गर्भवती हुई और उसने बीस महीनों के बाद एक बच्चा जना, जिसका नाम प्रसिद्ध फ़िल्मी खलनायक अजीत के नाम पर रखा गया। बदली हुई परिस्थितियों में यह विचार करके कि शायद माँ बनने के बाद बसंती अब महालिंगा से रूपा को गर्भवती होने देगी। रूपा को उसके नज़दीक लाने की कोशिश की लेकिन बसंती ने अपनी मातृ सत्तात्मक पकड़ ज़रा सी भी ढ़ीली नहीं की। रूपा फिर एक बार मायूस हुई।
कुछ सालों बाद अजीत जवान हो गया। रूपा की निगाह अजीत पर पड़ी। उसे भरोसा था कि बसंती अपने बच्चे अजीत के समागम से प्रजनन नहीं करेगी तो अजीत अंततोगत्वा उससे संसर्ग करेगा क्योंकि इलाक़े में उसके अलावा कोई और मादा नहीं है। बसंती को रूपा के इरादे भाँपते देर न लगी। अजीत भी अकसर भागकर रूपा के आसपास मँडराने लगा। जब अजीत उठाव पर आया तो बसंती ने उसके संसर्ग से एक और बच्चा दिया जिसका नाम एक अन्य फ़िल्मी विलेन रंजीत के नाम पर रखा गया। रूपा फिर एकबार मायूस हुई। बसंती का पुराना साथी महालिंगा उम्रदराज़ होकर मरा तब रूपा बसंती के परिवार को शान्तवना जताने आई परंतु बसंती ने उसे आते देख मुँह फेर लिया। अब रूपा ने हालात से समझौता करके जीना शुरू कर दिया है वह अकेली रहती है। हत्थी केम्प पहले आकर और भोजन करके चली जाती है। उसके जाने के बाद बसंती अपने परिवार को लेकर भोजन कराने आती है। मनुष्यों की तरह पशुओं में भी सौंतिया डाह के संघर्ष होते हैं।
हत्थी केम्प से लौटते समय मस्तिष्क में विचार आया कि पुरानी बाइबिल में लिखी, अब्राहम, साराह और हागार की कहानी के पात्र महालिंगा, बसंती और रूपा के रूप में साक्षात देखकर वापस लौट रहे हैं। अब्राहम पत्नी साराह और सेविका हागार के साथ दजला-फ़रात के मैदान में बसे कन्नान में रहते थे। साराह को बच्चे नहीं हो रहे थे इसलिए उसने अब्राहम से परिवार बढ़ाने के लिए सेविका हागार से बच्चा पैदा करने को कहा। अब्राहम और हागार से इस्माइल का जन्म हुआ। उसके बाद अब्राहम और साराह का भी एक बच्चा इशाक नाम का हुआ। सुंदर सेविका हागार का बच्चा बड़ा होने से साराह में सौंतिया डाह विकसित हुआ तो वह हागार और इस्माइल पर अत्याचार करने लगी। हागार पीड़ित होकर इस्माइल को लेकर अरब देश में मक्का पहुँची जहाँ इस्माइल के वंश में मुहम्मद का जन्म हुआ था जिन्होंने इस्लाम धर्म चलाया।
हत्थी केम्प से वापस अल्लापल्ली जंगल विभाग के गेस्ट हाऊस में रेंज आफ़िसर दोपहर का भोजन बनवाकर इंतज़ार कर रहे थे। भोजन करने के दौरान पता चला की टेक्सी ड्राईवर दारू से टुन्न होकर बकवास कर रहा है। फ़ारेस्ट गार्ड ने हमारे कहने पर उससे गाड़ी की चाबी छुड़ाकर हमें दे दी। रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे से एक ड्राईवर का इंतज़ाम करवा कर हम भामरागढ़ की अगली यात्रा पर निकले।
अल्लापल्ली से 60 किलोमीटर की दूरी पर सिरोंजा डिविज़न का भामरागढ़ ब्लाक स्थित है। अल्लापल्ली से सात किलोमीटर पर वन विभाग का एक सौ वर्ष से प्राकृतिक अवस्था में आरक्षित वन है जिसमें किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं की गई है। उसे “अल्लापल्ली का गौरव” वन नाम दिया है। उसमें पाँच सौ से अधिक वर्ष के पेड़ पाँच मीटर घेरे के हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वह असंख्य जड़ीबूटियों का ख़ज़ाना है। भामरागढ़ के अंतर्गत कमलापुर रेंज है जो कि नक्सलवादियों का मायका माना जाता है। वहाँ महाराष्ट्र से पलकोटा और वेडिया नदियाँ छत्तीसगढ़ से आकर इंद्रावती नदी में मिलती हैं। त्रिवेणी संगम पवित्र स्थान माना जाता है। उन तीनों नदियों का जल इकट्ठा होकर इंद्रावती नदी के रूप में सिवनी ज़िले से निकली पेंच नदी वैनगंगा में मिलकर आगे वर्धा नदी से मिलकर प्राणहिता नदी कहलाने लगती है जो आगे तेलंगाना के कालेश्वरम में गोदावरी से मिलती है। इस स्थान को “दक्षिण त्रिवेणी संगम” भी माना जाता है, क्योंकि यहाँ गोदावरी अपनी सहायक नदी प्रणाहिता से मिलती है, तीसरी नदी, हमेशा की तरह अदृश्य नदी सरस्वती है। हालाँकि सरस्वती हजारों साल पहले सूख गई थी, लेकिन यह यहाँ और कभी-कभी अदृश्य नदी के रूप में, कभी इलाहाबाद में, कभी श्रीशैलम, कालेश्वरम में, पॉप-अप होती रहती है, यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि ये आस्था मान्यता कैसे विकसित हुई। जैसे ही आप गोदावरी के तट पर खड़े होते हैं, नदी आपके सामने जहाँ तक आप देख सकते हैं वहाँ तक फैल जाती है और दूसरे किनारे पर महाराष्ट्र का सिरोंचा जिला स्थित है! गोदावरी आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है।
नक्सलियों के मायके अर्थात कमलापुर पहुँचते-पहुँचते शाम के छः बज चुके थे। फ़ारेस्ट गार्ड तुषार गौंड़ और वाहन चालक हमारे साथ थे। सबसे पहले बाबा आमटे के आश्रम हेमलकसा गए। उसके बाद त्रिवेणी संगम दर्शन किए। वहाँ तीन-चार युवक आ गए। संभवतः वे नक्सलियों के ख़बरी होंगे। उन्हें हमारे सुबह से उस इलाक़े में घूमने की जानकारी हो गई थी इसलिए वे टोह लेने आए थे। बातों-बातों में एक युवा जिसके चेहरे से बौद्धिकता झलक रही थी, उसने अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा था। अतः उससे घनिष्ठ बातें होने लगीं। उसने बताया कि 1984 में इस कमालपुर रेंज से सैंकड़ों की संख्या में युवा लड़के-लड़कियाँ नक्सली बने थे इसलिए इसे नक्सलियों का मायका कहा जाता है और वे इस इलाक़े में वारदात नहीं करते अपितु इंद्रावती नदी के उस पार छत्तीसगढ़ का भोपालपत्तनम रेंज लगता है वहाँ कोंटा से बचेली तक के इलाक़े में क्रियाशील होते हैं। उसने बताया कि आंदोलन के बड़े नेताओं ने हैदराबाद, नागपुर और मुंबई में बड़े कारोबार स्थापित कर लिए हैं और छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व तेलंगाना की सरकारों ने प्रतिभावान आदिवासियों को वन विभाग, पुलिस व अन्य सरकारी विभागों में ऊँचे पदों पर नियुक्त करके नक्सलियों के बीच नेतृत्व का संकट पैदा कर दिया है।
गढ़चिरोली में पता चला कि ब्रह्मपुरी, भंडारा, गोंदिया, बालाघाट होते हुए दो रास्ते, एक लालबर्रा-बरघाट और दूसरा वारासिवनी-कटंगी से सिवनी पहुँचते हैं जहाँ से पेंच अभयारण्य पहुँचा जा सकता है।
हम हेमलकसा आश्रम पहुँचे। वहाँ एक प्रेरक कहानी हाथ लगी। एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में 26 दिसंबर 1914 को हिंगनघाट, वर्धा में देवीदास के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। उसका नाम मुरलीधर रखा गया। देवीदास ब्रिटिश भारत के जिला प्रशासन और राजस्व विभाग में अधिकारी थे। मुरलीधर को अंग्रेज़ी तौर तरीक़ों की तर्ज़ पर बचपन में बाबा करके पुकारा जाता था। वह आठ बच्चों में सबसे बड़ा था। उसका बचपन एक अच्छी हैसियत के ब्रिटिश नौकरशाह के सबसे बड़े बेटे के रूप में शिकार खेलों से भरा रोमांचक घटनाओं के बीच बीता था। वह चौदह वर्ष की उम्र में बंदूक लेकर भालू और हिरण का शिकार करता था। जब वह गाड़ी चलाने योग्य हुआ तो पिता ने उसे पैंथर की खाल से बनी कुशन की गद्दियों वाली स्पोर्ट्स कार भेंट की थी। यद्यपि वह एक धनी परिवार में पैदा हुआ था, लेकिन हमेशा भारतीय समाज में व्याप्त असमानता के बारे में सोचता रहता था। वह अपने पिता की नाराज़गी के बावजूद नौकरों के बच्चों के साथ नियमित रूप से खेलता था। दीवाली के दिन जब पूर शहर जगमगा रहा था दोस्तों के साथ बाज़ार में मटरगश्ती करते हुए उसका एक अंधे भिखारी से सामना हुआ। उसने मौज में आकर अपनी सिक्कों से भरी जेब को भीख के कटोरे में खाली कर दी। भिखारी को कटोरे का भार और बहुत सारे सिक्कों की खनक से महसूस हुआ कि उसे मूर्ख बनाया जा रहा है, वह बोला “मै एक मजबूर भिखारी हूं, मेरे कटोरे में पत्थर मत डालो, बाबा”, लड़के ने जवाब दिया “ये चोखे सिक्के हैं, पत्थर नहीं। आप चाहें तो कुछ ख़रीद कर इन्हें परख लें।”
इस घटना ने लड़के के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा कि इस तरह के दुःखी इंसान उसकी ज़िंदगी के बिलकुल करीब मौजूद हैं, जिनकी जिंदगियों में आशा और विश्वास सिरे से नदारत हो चुके हैं। उसे अपने पिता की विलासिता से भरी दुनिया में ग़रीबों के प्रति मौजूद उपेक्षापूर्ण निर्दयता से चिड़ होती थी, कि लोग इतने बेरहम कैसे हो सकते हैं कि आसपास बजबजाती ग़रीबी और भुखमरी से अनजान बने रहकर गुलछर्रे उड़ाते रहें।
मुरलीधर एक डॉक्टर बनने की इच्छा रखता था, लेकिन उसके पिता ने उसे वकील बनने के लिए मजबूर किया। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा वकील बनकर परिवार की मिल्कियत को संभाले। लड़के ने धनाढ्य वातावरण के जीवन को बहुत अच्छी तरह से अपना लिया। अपने दिन घुड़सवारी, शिकार, क्लब में तास के पत्तों और टेनिस खेलने में बिताता था। वह अमीरों का एक समृद्ध जीवन जी रहा था जो मानते हैं कि पैतृक विशेषाधिकार केवल भाग्यशाली को जीने का मौका देते हैं और उनका ग़रीबों के भाग्य के प्रति कोई दायित्व नहीं है। इस विलासिता पूर्ण जीवन के बीच वह बेचैन रहता था। एक दिन उसे लगा जैसे उसे दुनिया में एक बड़ा उद्देश्य पूरा करना है।
मुरलीधर कानून में प्रशिक्षित होकर वर्धा में वकालत शुरू करके एक सफल वकील बन गया। वह महात्मा गांधी और बिनोवा भावे से प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के कारण अंग्रेजों द्वारा कैद किया गया। उन्होंने भारतीय नेताओं के लिए एक बचाव वकील के रूप में काम करना शुरू किया। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सेवाग्राम आश्रम में कुछ समय बिताया और गांधीवाद के अनुयायी बन गए। उन्होंने चरखे से बनाई खादी पहनकर गांधीवाद का अभ्यास व प्रचार किया। जब गांधी को पता चला कि उस लड़के ने एक एक ब्रिटिश अफ़सर के अत्याचार व उत्पीड़न से एक भारतीय लड़की को बचाया है, तब गांधी जी ने उसे “सत्य का निडर साधक” नाम दिया था।
उन दिनों कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को एक सामाजिक कलंक माना जाता था और ऐसे रोगी समाज की मुख्य धारा से कटकर उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त होते थे। मुरलीधर ने कोढ़ जैसे संक्रामक छुआछूत रोग को दूर करने का प्रयास किया। यहां तक कि उन्होंने एक कोढ़ी को साथ रहने की अनुमति दी, यह साबित करने के उद्देश्य से एक प्रयोग के हिस्से के रूप में उन्हें इंजेक्शन लेने पड़े थे। तुलसीराम नाम के कुष्ठ पीड़ित व्यक्ति के साथ मुलाक़ात ने उनकी आत्म-छवि को चकनाचूर कर दिया। कुष्ठ रोग के अंतिम चरण में वह एक मांस के टुकड़ों के साथ उंगलियों या पैर की उंगलियों के बिना कीड़े और घावों के साथ वास्तव में एक जीवित लाश है। वह संक्रमण से घबरा गया। उसने खुद को निडर बनाने के बारे में सोचा। अगले 6 महीनों के लिए वह इस संकट की बेदर्द पीड़ा में रहा। उसने सोचा “जहाँ भय है वहाँ प्रेम नहीं है, और जहाँ प्रेम नहीं वहाँ कोई भगवान नहीं है।” भय और घृणा से घिरे कोढ़ियों की इस समस्या पर काबू पाने का केवल एक ही तरीका लग रहा था। उसे कुष्ठ पीड़ित लोगों के साथ रहना और काम करना होगा। उसने निश्चय किया।
“मुझे किसी भी चीज़ से कभी डर नहीं लगा जब मैंने एक भारतीय महिला का सम्मान बचाने के लिए ब्रिटिश ठोकरों से लड़ाई लड़ी, गांधी जी ने मुझे ‘अभय साधक’ कहा, जो सत्य का निर्भीक साधक था। जब वरोरा के सफाईकर्मियों ने मुझे नाले की सफाई के लिए चुनौती दी, तो मैंने ऐसा किया, लेकिन जब मैंने तुलसीराम की जीवित लाश देखी मैं डर गया। मुझे इस डर पर क़ाबू पाकर इसे कुष्ठ पीड़ितों के प्रति प्रेम में बदलना होगा।”
मुरलीधर ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने का निर्णय इस कारण लिया कि उन्हें एक ऐसे समाज का हिस्सा बनने में घृणा महसूस होती थी जो ऐसे दलित मनुष्यों की दुर्दशा के प्रति बहुत ही उदासीन था। उन्होंने इस उदासीनता को ‘मानसिक कुष्ठ’ के रूप में माना, जो कि सबसे भयावह बीमारी है जो किसी के अंगों को नहीं खो रही है, लेकिन अन्य मनुष्यों के लिए दया और करुणा महसूस करने के लिए प्रेम की ताकत खो रही है। उन्होंने लिखा:-
मैंने भगवान से अपनी आत्मा मांगी,
लेकिन मेरी आत्मा नदारत थी।
मैंने अपने में भगवान की तलाश की,
लेकिन मेरे भीतर भगवान भी नदारत था।
तब मैंने सेवा हेतु भाई-बहनों की मांग की।
मुझे उनमें आत्मा, भगवान और जीवन लक्ष्य मिल गया।
उन्होंने 1949 में 4 रुपये, 6 कुष्ठ रोगियों और एक लंगड़ी गाय के साथ वरोरा में महाराष्ट्र में अपना काम फैलाया है। कई संगठनों ने बाबा के कार्यों से प्रेरणा ली है और देश भर में और यहां तक कि पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं। दुनिया भर में मुरलीधर ने जो प्रभाव डाला, वह अचूक है और उनकी आत्मा एक दुर्लभ रत्न है जिसे दुनिया भाग्यशाली मानती थी।
मुरलीधर जानते थे कि बीमारी का इलाज करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि लोगों को इन सामाजिक प्रकोपों से निजात दिलाकर आत्मनिर्भर, उत्पादक समाज का निर्माण करना महत्वपूर्ण है। कृषि से शुरू होकर वस्त्र उद्योग से लेकर लकड़ी के काम तक विभिन्न लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों तक विस्तार एवं महारोगी सेवा समिति, वरोरा उत्पादक क्षेत्र में उनके सपनों का साकार स्वरुप था।
मुरलीधर ने महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों, विकलांगों और समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के इलाज और पुनर्वास के लिए तीन आश्रमों की स्थापना की। महारोगी सेवा समिति, वरोरा (कुष्ठ सेवा समाज) कुष्ठ रोगियों के इलाज और मानसिक कुष्ठ रोग से पीड़ित समाज के उद्धार के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिसे बाबा ने ‘आनंदवन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘फ़ारेस्ट ऑफ ब्लिस’। उन्होंने और उनकी पत्नी साधना ने 15 अगस्त 1949 को एक पेड़ के नीचे आनंदवन में एक कुष्ठ अस्पताल शुरू किया। 1973 में गढ़चिरौली जिले के माडिया गोंड आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए लोक बिरादरी प्रचारक की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन को कई अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया, विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन, वन्यजीव संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन के महत्व पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए अनथक प्रयास किए। भारत सरकार ने 1971 में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया।
उनके दो बेटे, विकास आमटे और प्रकाश आमटे, और पुत्रवधू, मंदाकिनी और भारती, डॉक्टर हैं। इन चारों ने अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है। प्रकाश और उनकी पत्नी मंदाकिनी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के माड़िया गोंड जनजाति के हेमलकसा गाँव में स्कूल और अस्पताल चलाते हैं, साथ ही एक शेर और कुछ तेंदुओं सहित घायल जंगली जानवरों के लिए एक अनाथालय है। उनके दो बेटों, डॉ. दिगंत और अनिकेत ने भी उन्हीं कार्यों को अपना जीवन समर्पित किया। प्रकाश और मंदाकिनी को 2008 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए मैगसेसे पुरस्कार मिला।
बाबा आमटे के बड़े बेटे विकास और उनकी पत्नी भारती आनंदवन में अस्पताल चलाते हैं और कई कल्याणकारी परियोजनाओं के साथ समन्वय करते हैं। आनंदवन में एक विश्वविद्यालय है, एक अनाथालय है, और अंधे और बधिरों के लिए स्कूल हैं। आनंदवन आश्रम आत्मनिर्भर है और इसके 5,000 से अधिक निवासी हैं। कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के लिए “सोमनाथ” और “अशोकवन” आश्रमों की स्थापना की है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





