☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ कला, साहित्य और संस्कृति के लिए समर्पित व्यक्तित्व – स्व गिरीश बिल्लौरे मुकुल — विनम्र श्रद्धांजलि ☆ प्रस्तुति –  श्री यशोवर्धन पाठक ☆

प्रति दिन जब सूर्य अस्त होता है तो अगले दिन उसके पुनः सूर्योदय की आशा रहती है कि सूर्य उदय होगा और जग को प्रकाशवान करेगा लेकिन जब कोई सूर्य अस्त हो जाये और पुनः उसके उदय होने की आशा न हो तब इसे अपूर्णीय क्षति ही कहा जाएगा। पिछले दिनों संस्कारधानी के साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत का ऐसा ही सूर्य अस्त हो गया। साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित और सक्रिय आत्मीय भाई श्री गिरीश बिल्लौरे मुकुल जी के स्वर्गवास पर हम सभी ने कुछ ऐसा ही महसूस किया।

भाई श्री गिरीश बिल्लौरे जी ने बाल भवन के एक उच्च स्तरीय अधिकारी के रुप में कुशल और सफल संचालन किया और अपने सेवा काल के दौरान बच्चों को  संस्कार वान बनाने के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अनेक प्रेरक प्रयत्न और प्रभावी प्रयोग किए। उनकी सोच थी कि बच्चों के उत्थान के लिए मानसिक और शारीरिक विकास के साथ बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास भी जरूरी है। यही कारण है कि उन्होंने बाल भवन के सुधार और विकास के लिए जो कोशिशें की उसने उनको बाल विकास  के  क्षेत्र में एक सशक्त अधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

वैसे तो श्री गिरीश बिल्लौरे जी मेरे एक ऐसे आत्मीय  मित्र थे  जिनके बौद्धिक और सारगर्भित लेखन से मैं अत्यधिक प्रभावित  था। ज्वलंत मुद्दों पर उनके लेखन से उनकी गहरी सोच का पता चलता था। वैचारिक दृष्टिकोण पर आधारित उनके लेख उनके चिंतन का परिचायक थे। श्री बिल्लौरे जी ने गद्य हो या पद्य  , दोनों ही में काफी लिखा और अच्छा लिखा। शहर की और बाहर की पत्र पत्रिकाओं में खूब छपे भी। उनके लेखन का एक बड़ा पाठक वर्ग था जो उनके साहित्य को उत्सुकता से पढ़ता था और पसंद भी करता था। उस पाठक वर्ग में रचनाओं का मैं भी एक ऐसा पाठक था जो उत्साह और उत्सुकता से उनके  गद्य और पद्य दोनों ही को काफी ध्यान से पढ़ता और अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत भी कराता। कभी मैं उनकी रचनाओं को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया उन्हें न दे पाऊं तो बराबर उनकी ओर से मुझे उलाहना भी मिलता। वे कहते आत्मीयता के कारण इतना तो अधिकार मेरा है। उनके बौद्धिकता के कारण मैं उन्हें अक्सर विद्वान मित्र कहकर संबोधित करता और गिरीश भाई मुझे आत्मीय मित्र। विद्वान मित्र इसलिए क्योंकि उनके लेखन में मुझे उनका रिसर्च वर्क नज़र आता। उदाहरण के लिए मस्तिष्क में घटनाओं का पुरुत्पाद  विषय नामक लेख में वे लिखते हैं कि इन्द्रियों के माध्यम से हम सूचनाओं को एकत्र करते हैं और वह सूचना हमारे स्मृति कोष में संचित हो जाती है। अर्थात हमारे मस्तिष्क में केवल वही बात जमा होती हैं जिसे हम गंध , ध्वनि, आवाज,स्वाद , दृश्य, भाव के रुप में महसूस करते हैं।

स्पष्टवादिता बिल्लौरे जी की जीवन शैली की विशेषता थी। प्रशासनिक क्षेत्र हो या अन्य क्षेत्र , बिल्लौरे जी बिना लाग लपेट के साफ़ साफ़ कहने के आदी थे। अभिनंदन आयोजनों से दूर रहने वाले बिल्लौरे जी की सोच थी कि किसी भी क्षेत्र में समर्पित भाव से कार्य करने वालों की सम्मान की अपेक्षा नहीं रहनी चाहिए। सम्मान की आशा आगे बढ़ने के प्रयासों पर विराम लगा दिया करती है। भाई श्री गिरीश बिल्लौरे मुकुल जी के साथ मेरी ही नहीं बल्कि उनके न जाने कितने आत्मीय जनों की स्नेहिल यादें जुड़ी हुईं हैं और ये यादें हमारे दिल और दिमाग में सदा उनके अपने आसपास होने का अहसास दिलाती रहेंगी।

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प्रस्तुति –  श्री यशोवर्धन पाठक

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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