डॉ. मीना श्रीवास्तव
☆ कथा-कहानी ☆
☆ मेहनत की रोटी – भाग – १ — मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील ☆ हिन्दी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव ☆
श्री सचिन वसंत पाटील
पिछले दो-तीन वर्षों की तरह इस साल भी अंगूर के बाग ने धोखा दिया। ऐन मौके पर उसपर डाउनी रोग (एक फफूंद जनित गंभीर बीमारी) की बुरी नजर पड़ी और उस कारण बाग का आधा हिस्सा पूरी तरह बर्बाद हो गया। सोचा था, किसी भी हालत में प्रकार कम से कम लग लागत का ही खर्चा वसूल होगा, पर वह भी होने से रहा। तीन हज़ार बक्से अंगूर बनने की आशा थी, लेकिन घटकर आधे से भी कम हाथ में आये, बस हज़ार बारह सौ! फसल कटाई के मौसम में घनघोर बारिश ने घेर लिया। वहीं बेमौसम बरसाती बादलों का जमावड़ा किसी बिन बुलाए मेहमान की भांति आ टपका। फिर फसल की कीमतें गिर गईं। सारा कारोबार मुसीबतों के कीचड़ में धंस गया। बस इसमें व्यापारियों की चांदी हो गई, और क्या कहें!
संपन्न पाटील घराने में पले बड़े विनायक ने चार साल पहले अंगूर का बाग लगाया था। पहला वर्ष तो बाग के सयानी होने में बीत गया। दूसरे साल कुछ खास ज्यादा विकास नहीं हो पाया। सोचा बेलें तो अभी छोटी ही हैं, उनकी जड़ें अभी जमीन में ठीक से जमी नहीं होंगी। तीसरे साल बेमौसम बरसात के चलते छंटाई पर कुठाराघात हो गया। मौसम का मिजाज गर्म हो गया। तिसपर किसी बीमारी ने वायरस के रूप में बेलों को जकड लिया। देखते ही देखते सारा बाग-बगीचा हाथ से निकल गया। ऊपर रोग के लिए इस्तेमाल की गई दवाइयों के पचास हज़ार रुपये का खर्चा सर पर सवार हो गया। विडम्बना यह है कि बगीचा लगाने के लिए उठाया बैंक का कर्ज वैसे का वैसा बना हुआ है……
लेकिन अब बैंकवालों ने भी तकाजा लगा रखा है। वे भी कब तक चुप रहेंगे? यह चौथा वर्ष है, बैंक का कर्ज गले तक पहुँच गया है। उम्मीद थी कि इस वर्ष कुछ तो हाथ में आएगा। लेकिन यह डाउनी रोग कराल काल का रूप लेकर आ धमका! आशा की किरणें निराशा के गहन अंधकार में लुप्त हो गईं। मेरी सारी उम्मीदों पर पर पानी फेर गईं। अग्नि चक्र के फेरे में जल रहा हूँ, हर साल यहीं विपदा झेलते हुए। बारम्बार उसी अग्निदाह का सामना करता हूँ, न तो मरता हूँ, न ही इस दुष्ट चक्र से छुटकारा पा रहा हूँ। बस झुलसना है। मेरा छोड़ दूँ, पर इस तपन में बिना कारण घरवाले झुलस रहे हैं। मेरे उन नन्हे नन्हे मासूम बच्चों क्या दोष है? क्या एक गरीब किसान के परिवार में पैदा होना उनकी गलती है?
अब तो बाग को निकाल बाहर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं नजर आ रहा है। लेकिन इस बाग को हटाकर क्या करूँगा? बैंक का ढाई-तीन लाख का कर्ज बाकी है, वे उसे ऐसे ही थोड़े न छोड़ेंगे! दूसरी फसल उगाऊं भी तो इतनी आमदनी आएगी नहीं, जो कर्ज से मुक्ति दिलाएगी| कर्ज तो चुकाना दूर रहा, पहले नयी फसल बोने के लिए मेरे पास पैसा कहाँ से आएगा? तिसपर पापी पेट का रोजमर्रा का सवाल भी तो है। काश ईश्वर ने हम गरीबों को यह पेट ही नहीं दिया होता, तो कितना ही अच्छा होता। इस पेट के कुँए में जितना भी डालो, दुष्ट की भूख ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती। हर सुबह भूख की बेचैनी के साथ ही उगती है। यह क्षुधा-शांति कैसे की जाय? और फिर इस पहाड़ जैसे चढ़े कर्ज का क्या? इस भीषण अग्निचक्र से छुटकारा पाने का कोई रास्ता ढूंढना होगा, कोई उपाय ढूंढना ही होगा…
देखा जाए तो करीबन चार साल पहले विनायक की आर्थिक स्थिति ठीक ठाक थी। दो ढाई एकड़ सिंचित जमीन। हर वर्ष कारखाने तक जाती हुई एक-डेढ़ एकड़ गन्ने की उम्दा फसल और दो दुधारू जनावर। घरखर्चे के बाद भी हाथ में पर्याप्त धन बचता था। जिंदगी टकाटक चल रही थी। लेकिन न जाने उसके दिमाग में कहाँ से सनक पैदा हुई और उसने अंगूर का बाग लगाने का फैसला किया। उसने तासगांव मणेराजुरी का चक्कर लगाया और वहाँ एक अंगूर के बाग का मुआयना करके आया। वहाँ उगे अंगूरों की गुणवत्ता तो निर्यात करने योग्य थी और आने वाली आय भरपूर थी। उसके आंकड़े सुनते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सोचा बस एक साल ऐसी फसल पैदा हो, तो सारी विपदा मिट जावेगी। और पांच दस साल की आय में अगली पीढ़ी घर बैठे खा पी लेगी। इसी आस के रंगीन सपने को बुनने हुए उसने अंगूर की बाग़ लगाने का फैसला किया। घर की दुधारू गायें बेच दीं, और तो और बैंक से कर्ज लिया, यहाँ-वहाँ से थोड़े बहुत पैसे उधार लिए और विनायक अंगूर के बगीचे का मालिक बन बैठा!
पहले दो वर्षों तक, उसे कर्ज का मामला मामूली लगा। उसे उम्मीद थी कि अगर अंगूर की फसल एकाध साल भी अच्छे से पक गई, तो पूरा ऋण चुकता हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे, राई के पहाड़ की तरह, ब्याज दर बढ़ती गई और अब महीने दर महीने चक्रवृद्धि ब्याज को अपने अंदर समाहित करता कर्ज का आंकड़ा एक पहाड़ की भांति उसकी छाती पर जम कर बैठ गया। कर्ज़ जम कर बढ़ता रहा, परन्तु बाग-बगीचे का ताल-मेल बिलकुल भी नहीं जम रहा था। तीन साल बीत गए, पर एक भी फसल हाथ नहीं लगी। वह हाथ पर हाथ धरे ख़ामोशी से घर पर बैठा रहता| उसकी पत्नी उसे धीरज देते हुए समझाने की कोशिश करती रहती थी।
“कुछ न कुछ तो होगा, आप चिंता मत कीजिये।”
“चिंता न करूँ तो क्या करूँ? सब के बाग़ बगीचे देखो कैसे फल -फूल रहे हैं! हमारे ही गले में यह भारीभरकम पत्थर क्यों लटका है भला बताओ?”
“होता है ऐसा कभी कभी … हमारे ही भाग फूटे हैं तो हालात कैसे सुधरेंगे?”
इस प्रकार पति-पत्नी में बातचीत होती रहती थी।
लेकिन इस साल घर का पूरा सफाया हो गया। उसने बची खुची पाई पाई बगीचे में छिड़कने वाली कीटनाशक दवाइयों पर खर्च कर दी। लगा था कि ऐसा करने से कम से कम इस साल तो बगीचा अच्छा उगेगा और वह बैंक के कर्ज से मुक्त हो जाएगा। लेकिन इस साल भी अंगूर के बाग ने पूरी तरह धोखा दिया। बैंक वाले उसकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने ज़ब्ती का नोटिस जारी कर दिया। इसके पहले भी दो-तीन बार उनको समझा बुझाकर उसने गाड़ी वापस भिजवा दी थी। लेकिन अब उसके सामने अंतिम विकल्प बचा था। विनायक ने बहुत सोचविचार कर चचेरे चचा को १२ वर्ष के लिए पट्टेदारी के नियमानुसार खेती करने के लिए देने का फैसला किया। अग्रिम भुगतान मिलने पर खेत में उगाए अनाज पर उसका कोई हक़ नहीं होगा, ऐसा समझौता हुआ। चचा से मिले पैसों से उसने बैंक का सारा कर्ज चुका दिया। तब कहीं जाकर कर्जे से मुक्ति मिली।
अस्थायी रूप से कर्ज़ का भुगतान तो हो गया था। लेकिन वक्त बेवक्त के लिए संजोयी जमा-पूंजी खत्म होती जा रही थी। मल्कियत की जमीन और जनावर अब नहीं रहे सो, एक पाई तक की आमदनी की गुंजाईश कहाँ थी? बारह साल बीत गए थे, जमीन से किसी भी प्रकार अब नाता टूट चूका था। दुधारू जानवरों को बेच अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी। अब आगे चलकर क्या किया जाए, यह एक ही प्रश्न विनायक के समक्ष राक्षस का रूप धारण किये मुंह फाड़ कर खड़ा था।
अगर दिहाड़ी (दैनिक) मजदूरी पर कुदाल-फावड़ा लेकर काम करूँ तो वह मुझे मुझसे बाप-जनम में असंभव है, और तिसपर लोग क्या कहेंगे? कल का अंगूरबाग का मालिक आज किसी और का गुलाम! विनायक के दिमाग में यह बात बैठ ही नहीं सकती थी। वह ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जिस के कारण कोई उसपर उंगली उठाता और भरे चौराहे पर वह उपहास का विषय बनता। वह पहले से ही घोर निराशा की गर्त में डूबा हुआ था। और अब उसके मन को एक प्रश्न ही कुरेदता जा रहा था कि, अब आगे क्या करे। धीरे-धीरे घर में खाने-पीने की सारी चीजों का संचय खत्म होने लगा। बेचारी पत्नी किसी तरह कमसे कम खर्चे में गुजारा कर रही थी। लेकिन अगर एक पैसे की भी आमदनी न हो तो यह कंजूसी कितने दिनों तक गृहस्थी का बोझ उठा पायेगी? अगर किसी पानी की टंकी में हमने पानी इकठ्ठा कर रखा है, और उसमें बिना एक भी बून्द पानी जोड़े, उस संचयित पानी को पंप से रोज ही निकालते चले गए, तो वह एक न एक दिन खाली होकर रहेगी।
किसी ज़माने में स्नातक की शिक्षा पूरी कर चुके विनायक ने सोचा, “अगर खेती नहीं चलती, तो चलो नौकरी में किस्मत आजमाकर देखूं। यानि, नौकरी बाग-बगीचे जैसी बिना भरोसे की नहीं। बारिश हुई, नहीं हुई, फसल को कीड़ा लगा, दाम गिरे बाजार में… ऐसी कोई तनावगस्त परिस्थिति उभरेगी नहीं। पहली तारीख हुई नहीं कि मैं मालिक से कहूंगा, “भैया, मेरी तनखा दे दो!” और काम हो जावेगा। भले ही आय थोड़ी कम होगी, परन्तु यह लेन १०० प्रतिशत गारंटीशुदा रहेगा। इसी सोचविचार के साथ विनायक ने नौकरी करने का फैसला किया।
फिर शुरू हुआ शहर के चक्कर काटने का सिलसिला। कहीं न कहीं से पुरानी पहचान के जरिये सिफारिश की वह भरसक कोशिश करता रहता। उसने कार्यालयों, ऋण संस्थानों, स्कूलों, आदि में क्लर्क (लिपिक) या चपरासी तक की नौकरी पाने के अथक प्रयास जारी रखे। परन्तु यहाँ भी उसका दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। हर जगह मानों पहले से ही तय की गई अस्वीकृति और अनावश्यक तथा अप्रिय अपमानजनक व्यवहार उसके झोले में अनायास ही गिरता।
क्रमशः…
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मूल मराठी कहानीकार – श्री सचिन वसंत पाटील
संपर्क – विजय भारत चौक, मु. पो. कर्नाळ, ता. मिरज, जि. सांगली. मोबा. ८२७५३७७०४९.
हिंदी भावानुवाद – डॉ. मीना श्रीवास्तव
संपर्क – ठाणे (पश्चिम), (महाराष्ट्र) भ्रमणध्वनि-९९२०१ ६७२११ ई मेल- drmeenashrivastava21@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





