हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०५ – कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०५ – कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कलीम साहब के चेहरे पर झुर्रियों की एक ऐसी उलझी हुई लिखावट थी, जिसे वक्त की स्याही से नहीं, बल्कि शहर के सारे कायदे-कानूनों ने मिलकर लिखा था। वह साठ पार के एक ऐसे ढहते हुए मलबे की तरह थे, जिसमें कभी एक आलीशान इमारत रही होगी। उनके हाथ में प्लास्टिक की एक पारदर्शी थैली थी, जिसमें क्वार्टर की दो बोतलें और पानी का एक पाउच ऐसे टकरा रहे थे, जैसे किसी उजाड़ खंडहर में हवा के झोंकों से लोहे की कोई पुरानी जंजीर दीवार से टकरा रही हो।

रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर के सारे ठेके पुलिस की सायरन वाली गाड़ियों के डर से अपनी शटर गिरा चुके थे। कानून की मुस्तैदी का आलम यह था कि जैसे पूरी दुनिया का सारा अपराध बस उसी सवा सौ मिलीलीटर के कांच के टुकड़े में कैद हो। कलीम साहब के घुटने अब उनका साथ छोड़ रहे थे, और प्यास? प्यास गले में ऐसे कांटे की तरह चुभ रही थी, जैसे किसी सूखे कुएं के तल में कोई मछली आखिरी बार तड़प रही हो।

तभी उनके ठीक सामने उस गली का नुक्कड़ आया, जहां इस अंधेरे और तल्ख शहर की इकलौती रोशन मीनार खड़ी थी। संगमरमर की वह मस्जिद, जिसके कंगूरे रात की चांदनी में ऐसे चमक रहे थे मानो खुदा ने खुद आसमान से चांदी का वर्क उतारकर वहां चिपका दिया हो। कलीम साहब के कदम थमे। उनके पैर उस चौखट की तरफ बढ़ने लगे, जहां कभी अमीर और गरीब, पापी और पुण्य आत्मा, सब एक ही कतार में खड़े होकर सजदा करते थे।

वहां चबूतरे पर शहर के सबसे नामी मौलवी साहब बैठे थे। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी इतनी सलीके से संवारी हुई थी कि उसमें कोई एक तिनका भी ढूंढना चाहे तो नाकाम रहे। उनका कुर्ता इतना कड़क कलफदार था कि अगर उसे खड़ा कर दिया जाए, तो वह खुद एक इंसान की तरह गवाही देने लगे।

कलीम साहब ने अपनी कांपती हुई थैली को छाती से सटाया और सीढ़ियों पर कदम रख दिया।

मौलवी साहब की नजरें कलीम साहब की उस थैली पर पड़ीं, और उनकी भौहें ऐसे तिनक गईं जैसे किसी पवित्र किताब पर किसी ने काली स्याही छिड़क दी हो। वह अपनी जगह से ऐसे उछले, मानो तख्ते के नीचे कोई बिच्छू आ गया हो।

“अरे-अरे! ओ कलीम! दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? ये क्या नापाक चीज हाथ में थामे खुदा के घर की तरफ बढ़े चले आ रहे हो? लानत है इस उम्र में इस बेहयाई पर! यह मस्जिद है, खुदा का पाक आशियाना। यह फरिश्तों का ठिकाना है, तुम्हारी इस चुल्लू भर लानत का नहीं।” मौलवी साहब की आवाज में पूरे मजहब का ठेका गूंज रहा था।

कलीम साहब की आंखों में एक अजीब, सर्द सन्नाटा था। उन्होंने थैली को और कसकर भींचा। उनकी आवाज में रोने की खनक नहीं, बल्कि एक टूटे हुए कांच की किरच थी। उन्होंने मौलवी साहब की आंखों में आंखें डालीं और बेहद धीमे, थरथराते होठों से कहा, “साहब, थका हुआ हूँ। जिंदगी ने ऐसा निचोड़ा है कि अब भीतर सिवाय बारूद के कुछ बचा नहीं है। बस दो घूंट हलक से उतारने दे इस मस्जिद के किसी कोने में बैठकर। खुदा तो बड़ा रहमदिल है ना? वह तो घट-घट की जानता है, वह मेरी इस बेबसी को भी समझ लेगा।”

“तौबा-तौबा! बदतमीज, गुस्ताख!” मौलवी साहब ने हवा में हाथ लहराया, जैसे किसी आवारा कुत्ते को दुत्कार रहे हों। “खुदा रहमदिल है, लेकिन गुनाहगारों का मददगार नहीं। इस पाक जगह पर कदम रखने की भी हैसियत नहीं है तेरी इस नापाक हालत में। भाग यहाँ से! यहाँ हर जर्रे में खुदा मौजूद है, तेरी इस गंदगी के लिए यहाँ कोई कोना नहीं है।”

कलीम साहब की पीठ झुक गई। उनकी हालत उस फटे हुए लिफाफे जैसी हो गयी थी, जिसके भीतर का खत कब का खो चुका था। उन्होंने एक गहरी सांस ली। उन्होंने थैली उठााई, मौलवी साहब को देखा और वह मशहूर शेर बुदबुदाया,

“ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर…

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो।”

मौलवी साहब के चेहरे पर कुत्सित मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी उंगली शहर के सबसे अंधेरे, सबसे गंदे कोने की तरफ उठाई, “जा! उस पार जा। जहाँ बदबू है, जहाँ गटर बहता है, जहाँ जिस्म बिकते हैं, वहाँ जा। वहाँ खुदा नहीं रहता। वहाँ जो मर्जी सो कर।”

कलीम साहब बिना कुछ कहे पलट गए। वह हांफ रहे थे, गिर रहे थे, संभल रहे थे। वह उस गटर की तरफ नहीं गए, बल्कि वह शहर के उस सबसे पॉश इलाके की तरफ मुड़ गए, जहां बड़ी-बड़ी कोठियां थीं। एक ऐसी कोठी, जिसके बाहर संगमरमर की नेमप्लेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘कलीम विला’।

यह कलीम साहब का अपना खुद का घर था। वही घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था।

अंदर का नजारा हैरान करने वाला था। कलीम साहब का इकलौता बेटा, जो आजकल की लाइफ स्टाइल और प्रोफेशनल इमेज के लिए जाना जाता था, आज घर में एक बड़ी पार्टी दे रहा था। हॉल में शहर के बड़े रईस और सरकारी अफसर मौजूद थे। धुआं, संगीत और महंगी विदेशी स्कॉच के दौर चल रहे थे।

कलीम साहब जब पिछले दरवाजे से अपने ही घर के बगीचे में दाखिल हुए, तो उन्होंने खिड़की से देखा कि उनका बेटा मौलवी साहब (जो अभी-अभी मस्जिद से वहां पहुंचे थे) को एक बड़ा लिफाफा सौंप रहा था। बेटा कह रहा था, “साहब, यह नया प्रोजेक्ट बिना ‘ऊपर वाले की रहमत’ के मुमकिन नहीं था। यह छोटा सा नजराना आपके चैरिटी ट्रस्ट के लिए। बस दुआ कीजिएगा कि अगली टेंडर भी हमें ही मिले।”

मौलवी साहब, जो अभी दस मिनट पहले मस्जिद की सीढ़ियों पर पाक-नापाक का पाठ पढ़ा रहे थे, अब उसी हाथ से स्कॉच का गिलास पकड़े हुए थे और मुस्कुराकर कह रहे थे, “मियां, खुदा तो बस तुम जैसे कामयाब लोगों के साथ है।”

कलीम साहब अपने ही घर के लॉन में, उसी अंधेरे कोने में बैठ गए जहाँ उन्होंने कभी उम्मीदों का एक पौधा लगाया था। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी सस्ती बोतल का ढक्कन खोला। पहली घूंट जब हलक से उतरी, तो उनकी आँखों से निकले आंसू सीधे शराब में जा गिरे।

अंदर आलीशान झूमर के नीचे ‘मजहब’ और ‘मुनाफा’ एक ही मेज पर बैठकर जश्न मना रहे थे और बाहर अंधेरे में वह बूढ़ा बाप बैठा था जिसने अपनी पूरी जायदाद और वसीयत कुछ दिन पहले ही अपने बेटे के नाम कर दी थी, यह सोचकर कि अब आखिरी दिन सुकून से बीतेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर की ईंटों में उसने अपनी रूह गाड़ दी, वहां अब उसके लिए एक कुर्सी तक नहीं बची थी।

कलीम साहब ने अपनी पूरी ताकत समेटकर एक आखिरी घूंट भरी। उनके होठों पर एक ऐसी मुस्कान उभरी, जिसमें रिश्तों और धर्म का जनाजा उठ रहा था। उन्होंने आसमान की तरफ देखा, जहाँ चाँद बादलों के पीछे छिप रहा था।

उन्होंने बुदबुदाया, “मौलवी साहब… तुमने सच कहा था। मस्जिद में खुदा था, इसलिए वहाँ जगह नहीं मिली। और इस घर में… इस घर में तो अब सिर्फ ‘सौदा’ बचा है, इंसान ही नहीं रहा, तो खुदा कहाँ से होगा? मुझे मेरी वो जगह मिल गई, जहाँ खुदा नहीं है।”

अगले ही पल, कलीम साहब की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई। खाली बोतल उनके हाथ से छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरी और बिखर गई। अंदर कमरे में ठहाकों और नोटों की गिनती की आवाज गूंज रही थी, और बाहर लॉन में, एक बाप की रूह इस ढोंगी दुनिया के मुंह पर अपनी आखिरी खामोश हंसी छोड़कर हमेशा के लिए आजाद हो चुकी थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख / कथा कहानी में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)

☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—

“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”

सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।

भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।

शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,

“बेटी, ये क्या कर रही हो?”

बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—

“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”

शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।

तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—

“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”

उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।

उन्होंने देखा—

धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।

“प्रकृति बदला नहीं लेती,

बस समय आने पर हर कटे हुए वृक्ष का हिसाब

सूखे खेतों और प्यासे होंठों से वसूल करती है।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

आप लोग महान व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ते होंगे , और उनकी आत्मकथा से प्रेरणा भी लेते होंगे. मेरे जीवन में ऐसा कुछ है नहीं. मैं तो मात्र लेन -देन का एक माध्यम हूॅं. मैं जिसकी जेब में रहता हूॅं, वह बहुत खुश रहता है. फिर लोग समझते होंगे कि मैं भी सदा खुश रहता हूॅं, पर यह पूरा सत्य नहीं है, बल्कि अधूरा सत्य है . आइये मैं आपको अपनी आत्मव्यथा बताऊॅं .

भारत सरकार के नोट छापने के प्रेस में मेरा जन्म हुआ. जन्म भी संगीनों के साये में हुआ और ऐसी जगह हुआ जहाॅं  परिंदे भी पर नहीं मार सकते थे. जो भी कर्मचारी अथवा अधिकारी अन्दर आता  था, उसकी पूरी तलाशी ली जाती थी, यहाॅं तक कि उनके  जूते और मोज़े भी उतरवा कर चेक किया जाता था. मैं एकदम कड़क और खूबसूरत था. मुझे मेरे अन्य निन्नानबे भाईयों के साथ मिलाकर एक सौ की गड्डी बनायी गई. मेरी तरह बहुत सारे नोटों की गड्डियों को मिला कर बंडल बनाया गया. हम सारे नोटों को देश के विभिन्न बैंकों में,  एक  लकड़ी के  बक्से में बंद कर के, कड़ी सुरक्षा में पहुंचा दिया गया.  अब यहाॅं से मेरी वास्तविक जीवन यात्रा शुरू होती है.

एक दिन मुझे बैंक के कैशियर को दे दिया गया, और वहाॅं पर बैंक से मुझे एक व्यक्ति,  जिसने बहुत सारे रुपए निकाले थे, उसे अन्य नोटों के साथ ( जिसमें  पांच सौ, सौ, पचास,बीस , दस आदि के नोट भी थे ) मुझे भी दे दिया गया. अब मैं बैंक से, उस व्यक्ति के पर्स में पहुंच चुका था. मैं मुड़ा हुआ,  चुपचाप उसके पर्स में पड़ा हुआ था. बैंक से बाहर आने के बाद उस व्यक्ति ने रामआसरे के पान की दूकान पर पान खाया और उसे मुझे दे दिया. रामआसरे ने भी पान के पांच रुपए काट कर, बाकी पांच रुपए उसे वापस कर दिया और उसने मुझे अपने पैरों के पास में रखे हुए  एक डिब्बे में रख दिया. मैं अन्य नोटों के साथ उसी डिब्बे में पड़ा हुआ था.

शाम को रामआसरे ने डिब्बे से कुछ नोट निकाले, जिसमें मैं भी एक था, और अपने जेब में रख कर, अच्छे कपड़े पहन कर, अपने दोस्त कल्लू के बेटे की शादी में चल दिया. थोड़ी देर बाद, रात हो चुका था और मेरे कानों में  बैंड बाजा की आवाज और लोगों के नाचने की आवाज सुनाई पड़ी और ” आज मेरे यार की शादी है” गाना सुनाई पड़ने लगा. रामआसरे यह गाना सुन कर इतना खुश हुआ कि वह खुद भी नाचने लगा. अचानक नाचते – नाचते उसने जेब में रखे हुए नोटों को अपने हाथ में लेकर लहराने लगा, लहराते हुए नोटों में मैं भी एक था. लहराते- लहराते उसने हाथ के सारे नोटों को  हवा में उछाल दिया. सारे बैंड वाले, बजाना बन्द कर के हमें बटोरने लगे. इस आपाधापी में कितनों के जूतों के नीचे मैं कुचला गया, मुझे याद नहीं. जीवन में पहली बार मुझे बुरी तरह से जूते से कुचला गया. खैर, थोड़ी ही देर में, एक बैंड वाले के हाथ मैं लग गई और उसने मुझे अपनी जेब में जल्दी से रख लिया. दर्द से मैं कराह रही थी, लेकिन वहाॅं मेरी चीखें कौन सुनता! खैर कुछ देर उसकी जेब में पड़े रहने के बाद,मेरा दर्द कुछ कम हुआ .

उस बैंड वाले व्यक्ति ने बारात के बाद घर आकर सारे नोट अपनी पत्नी अर्चना  को दे दिया, और उसने सहेज कर अपने पर्स में हम सबको रख लिया. अब तक आधी रात बीत चुकी  थी . घर के सब लोग सो चुके थे, हम सारे नोट भी पर्स में आराम से पड़े हुए थे. सुबह होते ही अर्चना के बेटे गजेन्द्र ने कहा मम्मी मुझे दस रुपए दे दो, आज मंगलवार है, हनुमानजी को मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा. अर्चना ने पर्स से मुझे निकाल कर गजेन्द्र को दे दिया. गजेन्द्र ने हनुमानजी के मंदिर के पास के चौधरी के दूकान से बतासा खरीद कर, हनुमानजी को चढ़ा दिया. चौधरी ने अभी मुझे अपने गल्ले में रखा ही था कि एक भीखमंगा आ गया और उससे भगवान के नाम पर कुछ मांगने लगा. चौधरी ने मुझे उठा कर उसे दे दिया और बोला कि एक रुपया रख लो और नौ रुपया वापस करो. अब मैं भिखमंगा बटौहा के झोले में पहुंच गया. दिन भर भीख मांगने के बाद शाम को बटौहा ने एक दूकान से कुछ चावल – दाल खरीदा और सब्जी मंडी से कुछ सब्जी. अब मैं सब्जी बेचने वाली लक्षमिनिया के पैरों के नीचे, जिस बोरे  पर वह बैठी थी, उसके भीतर मैं पहुंच गया. भीषण बदबू हो रही थी, ऊपर से लक्षमिनिया मेरे ऊपर बैठी थी, और मैं अन्य नोटों के साथ दबा हुआ था. लक्षमिनिया ने रात में पता नहीं क्या खाया था, वह थोड़ी- थोड़ी देर के बाद बदबूदार हवा  छोड़ती रहती और हम सब नोटों की हालत नारकीय हो रही थी.

इस प्रकार से हमारी यात्रा चलती रही, कहने को तो मेरा एक बहुत ही लम्बा जीवन है, लेकिन मैं अपने जीवन के अन्तिम समय के पहले की कुछ मर्मांतक घटनाओं को कह कर, मैं अपनी कहानी समाप्त कर दूंगा.

एक दिन मुझे एक आदमी ने किशोर आटो चालक को दे दिया. दिन भर किशोर आटो चलाने के बाद रात में मयूरी डांस बार पहुंचा. उसकी वहां पर पसंद की डांस गर्ल थी बिंदिया. बिंदिया बिल्कुल बिंदास थी. उसके लिए दोस्ती अपनी जगह, धंधा अपनी जगह. धंधे में बिंदिया कोई लफड़ा नहीं मांगती थी. खैर उस रात किशोर के साथ उसने काफी समय बिताया, चलते समय किशोर ने उसके हाथ में कुछ नोट रख दिए. बिंदिया ने नोटों को गिना. कुल नोट थे, चार सौ दस! अब बिंदिया क्रोध से चिल्लाने लगी, किशोर को संसार की जितनी भी भद्दी गालियां हो सकती थी, उसने दिया. किशोर ने कहा बिंदिया रानी, आज कमाई कम हुई है, रख लें, रोज़ तो तुम्हारे लायक देता ही हूॅं. बिंदिया भड़क गई, बोली देख, लूंगी तो पूरा लूंगी, नहीं तो यह अपना रुपया रख, मैं ऐसे रुपए पर थूकती हूं. इतना कहकर बिंदिया ने मुझ पर थूक दिया. जिंदगी में पहली बार मुझे यह भी दिन देखना पड़ा. किशोर एकदम भड़क गया, पहले तो उसने हम नोटों को उठाकर अपने रुमाल से पोंछा और अपने जेब में रखा, उसके बाद उसने जो बिंदिया को गाली देना शुरू किया कि पूछो मत. फिर उसने बिंदिया को कहा कि आज तूने दौलत के नशे में लक्ष्मी पर थूका है ( हम नोटों को कुछ लोग लक्ष्मी भी कहते हैं, और प्रणाम करते हैं), जा मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुमको कोढ़ हो जायेगा.

किशोर फिर बार से बाहर आया और सीधे एक देशी दारु की दुकान पर गया. दुकान के सामने एक औरत जिसका  नाम सुरजिया था और उसने चिकने की दूकान जमीन पर लगा रखी थी, जहां वह भूजी हुई मछली, उबले हुए अंडे आदि बेचती थी और लोग दारु पीने के पहले उसकी दूकान से चिकना खाते थे. किशोर ने भी भूजी हुई मछली खरीदी और अन्य नोटों के साथ मुझे  सुरजिया को दे दिया. सुरजिया  ने हमें अपने पैरों के नीचे रखें बोरे में घुसा  दिया. अब मैं उसके पैरों के नीचे, जहाॅं  कच्ची दारु की बदबू आ रही थी, दबा था. लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय वहीं पड़े रहने के. ग्राहक आते, चिकना लेते और फिर भट्टे पर दारू पीने चले जाते. आधी रात के बाद सुरजिया ने अपनी दूकान समेटी और दारु की दूकान पर जा कर एक पौआ दारु पिया और कुछ नोटों के साथ मुझे भी भट्टे वाले को दे दिया. भट्टे वाले ने बिना गिने मुझे अपने गल्ले में रख दिया. चारों ओर कच्ची दारु की बदबू फैली थी और उसी में मैं पड़ा हुआ था.

सुबह हुआ और एक आदमी ने हम सारे नोटों को एक बोरे में रखा और बाजार में जा कर एक बैंक में , वहां के एक कैशियर को दे दिया. कैशियर ने कहा क्या तुम गंदे नोट ले आते हो, मुझे साहब से डांट खाना पड़ता है. उस आदमी ने हंसते हुए कहा साहब हमारे पास तो ऐसे नोट और ऐसे ही लोग आते हैं, मैं साफ नोट कहां से लाऊॅं ! फिर उस आदमी ने अपने दूसरे झोले से एक शैम्पेन की बोतल निकाली और कैशियर को देते हुए बोला साहब यह आप के लिए है. कैशियर ने कहा इसकी क्या जरूरत थी!  उस आदमी ने कहा नहीं साहब जरुरत क्यों नहीं है, आप लोग भी बड़ी मेहनत करते हैं. और इस प्रकार से मैं बैंक में पुनः पहुंच गया. शाम को हेड कैशियर ने कहा कि साफ नोट और गन्दे नोट अलग-अलग कर दो और जो गन्दे नोट हैं,  उन्हें non – issuable नोटों की आलमारी में रख दो, जिससे कि उन्हें  दुबारा ग्राहकों को नहीं दिया जाय.

दूसरे दिन मेरी तरह न जाने कितने गन्दे नोट एक अलग आलमारी में बंद कर दिए गए. कितने समय उस आलमारी में मैं पड़ा रहा, मुझे पता नहीं, लेकिन एक दिन हम सारे गन्दे नोटों को बक्से में बंद कर, भारतीय रिजर्व बैंक भेज दिया गया. वहां भी हम , सालों बक्से में बंद पड़े रहे  और एक दिन हम सबको बाहर निकाल कर, मशीन से छोटे – छोटे टुकड़े कर के, एक बड़े से बिजली के ओवन में, भारतीय रिजर्व बैंक के बड़े साहबों के उपस्थित में , हमें सामूहिक जला दिया गया और इस प्रकार से मेरी जीवन यात्रा समाप्त हो गई.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

14.06.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

ई-मेल – om1955prakashpandey@gmail.com मो – 9619885135

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा”” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(आज पिता दिवस पर एक लघुकथा )

शहर के फुटपाथ से लगे बिजली के खम्भे अपनी पीली रोशनी से सारे शहर को चमकातेथे, किन्तु उन्ही खम्भों के नीचे खड़े भिखारियों की खुली हथेलियों पर अंधेरा ही रहता। उनकी हथेलियाँ तो तभी चमकतीं जब कोई दाता उन पर  छोटे या बड़े  पैसों का सिक्का रख देता। तब, ये हथेलियाँ सिक्कों के अनुपात में 25, 40 या 100 पाॅवर के बल्ब के समान चमक उठती। ऐसी ही एक हथेली का नाम रमदू था। यह नाम उसे कब, किसने और कैसे दिया, कोई नहीं जानता। स्वंय रमदू भी नहीं। बचपन से लेकर आज तक इसी खम्भे के नीचे खड़े होकर भीख माँगते-माँगते उसे साठ वर्ष हो गए।

कुछ महीनों से वह सुबह दस बजे और शाम पाँच बजे एक-एक घण्टे के लिए चौराहे पर चला जाता। इस समय चौराहे पर ट्रैफिक जाम रहता। पाँच-पाँच मिनट तक हरा सिग्नल नहीं होता। कारों की लाइनें लग जाती। रमदू इन्हीं कारों के शीशे में अपनी हथेली फैला देता। उसकी अनुभवी आँखें कार व कार मालिकों को पहचानने लगी थीं। अतः उसकी हथेली प्रायः खुली नहीं आती थी। जब ट्रेफिक कम हो जाता, वह अपने खम्भे के पास आ जाता। यदि वहाँ कोई दूसरा भिखारी खड़ा होता तो वह चीख-चीखकर, गालियाँ देकर उसे भगा देता। अक्सर भिखारी उसे देखते ही उसका खम्मा छोड़ देते।

उस दिन भी रमदू ने रुकी हुई कारों में से एक कार में अपनी हथेली फैला दी। क्षणभर के बाद ही उसे लगा कि आज उसने गलत कार चुनी है। इस कार ने कई बार उसे निराश लौटाया है। सेठ बुलाकीदास बड़े कंजूस और चिड़चिड़े व्यक्ति थे।

रमदू अपनी हथेली खींच ही रहा था कि सेठ बुलाकीदास ने उसं रुकने का संकेत दिया और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया। रमदू ने अपनी लम्बी जिन्दगी में सिर्फ़ सुना भर था कि सौ का नोट कारवालों के पास होता है। आज वह न केवल उसे इतने करीब से देख रहा था, बल्कि उसकी गर्म छुअन भी महसूस कर रहा था। एक अजीब से स्वप्न की तरह कभी सेठ को और कभी नोट को देख रहा था। सेठ ने मुसकुराते हुए कहा- “डरो नहीँ बाबा, रख लो। असली है। जाओ मौज करो। आज मैं पहली बार इस उम्र में बाप बना हूँ। अभी-अभी अस्पताल से खबर आई है कि मेरी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया है। वहीं जा रहा हूँ। बच्चे के लिए दुआ करो बाबा। जाओ मौज करो।”

बुढ़ापे में बाप बनने की कितनी खुशी होती है कि आदमी यह भी भूल जाता है कि वह अपनी खुशी किसके सामने व्यक्त कर रहा है। रमदू ने नोट को अपनी मुट्ठी में कैद कर बन्द मुट्ठी से ही सेठ को हाथ जोड़े। सिग्नल हरा हो गया। रमदू ने सेठ पर दुआ भरी नजर डाल अपना हाथ खींच लिया। कारों के समान रमदू भी सरकते-सरकते सड़क पार की। वह तेजी से अपने खम्भे की ओर बढ़ने लगा। उसका चेहरा मारे खुशी के सेठ बुलाकीदास के चेहरे की तरह चमकने लगा। उसकी मुट्ठी में सौ का नोट है,  उसकी चाल में एक सेठपन आ गया ।

उसने देखा कि उसके खम्भे के नीचे एक मरियल-सा भिखारी खड़ा है। पर आज उसके चेहरे पर गुर्राहट की जगह। मुस्कुराहट खेल रही थी। वह दबे पाँव उस भिखारी के पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और पीछे से उस भिखारी की खुली हथेली पर रख दिया। मरियल-से भिखारी ने चौंककर देखा तो वह काँपने लगा। रमदू मुस्कुरा रहा था। उसे मुस्कुराते देखकर वह भय और आश्चर्य से कभी सिक्के को, तो कभी रमदू को देख रहा था। गाली के बजाय रमदू से सिक्का जो मिला। रमदू ने हँसते हुए कहा- “डरो नहीं, आज दिनभर यहीं डटे रहो। तुम भी मौज करो। अपुन आज इस उम्र में पहली बार बाप बना है।” यह कह वह जेब में रखे सौ के नोट को यूँ थपथपाने लगा, मानो वह सौ का नोट नहीं, एक नन्हा-सा शिशु हो।

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर# ११० – लेखक की बेईमानी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– लेखक की बेईमानी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य – भँवर # ११० — लेखक की बेईमानी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वयोवद्ध सनत से पढ़ना तो छूट ही जाता, लेकिन उन्होंने जारी रखा। बच्चे उनकी रुचि के अनुसार पुस्तकें खरीद लाते थे। चालीस साल पहले की बात थी सनत अपने आंगन में फूल बो रहे थे। तभी एक मोटर खराब हो जाने पर उनके घर के सामने रुकी थी। सनत ने स्वयं मोटर ठीक कर दी थी। उन्होंने एकाकी आदमी को अतिथि स्वरूप चाय पिलायी थी। इस परिवार और घर से प्रभावित आदमी के पूछने पर उन्होंने संघर्षों से भरा अपना जीवन और पारिवारिक अनुराग उसे बताया था। वही लिखा गया था और आज सनत वही पढ़ रहे थे। आदमी से जब बात हुई थी सनत पढ़ने में कमजोर ही थे। उन्होंने कहा था पढ़ना आता नहीं है। आदमी जो एक सुविख्यात लेखक था उनकी अनपढ़ता का लाभ उठा कर उनकी अद्भुत जीवन यात्रा और आदर्श परिवार की कहानी को अपने विशद संस्मरण के नाम से लिखा था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

माँ ने रसोई से आवाज़ दी- “बेटा, चाय बना दूँ?”

रवि ने थके हुए स्वर में कहा- “हाँ माँ… आज बहुत थक गया हूँ।”

कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में चाय का कप थमा दिया।

रवि ने एक घूंट लिया।

फिर मुस्कुराकर बोला-

“माँ, पता है… जब भी जिंदगी उलझती है, मुझे लगता है बस एक कप चाय मिल जाए, सब ठीक हो  जाएगा।”

माँ हँस पड़ीं- “चाय में ऐसा क्या है?”

रवि ने कप को देखते हुए कहा- “चाय में सिर्फ दूध, पानी और पत्ती नहीं होती माँ…

उसमें आपका अपनापन, दोस्तों की बातें, बारिश की यादें और मन को सुकून देने वाला थोड़ा-सा प्यार भी घुला होता है।”

माँ चुप रहीं।

और रवि चाय के घूंट के साथ दिनभर की थकान पीता रहा।

तभी उसे लगा- हम सिर्फ चाय नहीं पीते,

उसके साथ रिश्तों की गर्माहट भी घूंट-घूंट पीते हैं।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कहानी – जो लौटकर नहीं आते।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०१ – कथा कहानी – जो लौटकर नहीं आते ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कमरे की वो सीलन भरी गंध अब भी ठीक वैसी ही थी जैसी अविनाश के जिंदा रहते हुआ करती थी। अलमारी का वह पुराना आधा खुला पल्ला जैसे किसी टूटे हुए जबड़े की तरह चिढ़ा रहा था। मैं उसकी बिखरी हुई दुनिया को समेटने के लिए फर्श पर बैठ गया तो पैरों के नीचे धूल की एक मोटी परत चरमरा उठी। अविनाश के अचानक चले जाने के बाद इस घर में सन्नाटा इतनी जोर से चिल्लाता था कि कान के पर्दे फटने लगते थे। अलमारी के सबसे ऊपरी खाने में हाथ डालते ही उंगलियों से एक पुरानी डायरी टकराई जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसी डायरी के भीतर से एक मोड़ा हुआ कागज का टुकड़ा नीचे गिरा जिस पर लिखा था कि तुम्हें यह तब मिलेगा जब मैं बहुत दूर जा चुका हूँगा। दिल की धड़कन ने एक पल के लिए जैसे हड़ताल कर दी और फेफड़ों में हवा जम गई। उस कागज पर स्याही के कुछ ऐसे धब्बे थे जो आंसुओं के गिरने से फैल गए थे। मुझे लगा कि कोई अदृश्य हाथ मेरी गर्दन दबा रहा है और कमरे की खिड़की से आती धूप भी बर्फीली सुई की तरह चुभने लगी। मौत का यह कैसा क्रूर मजाक था कि जो इंसान जिंदगी भर अपनी हर बात को छुपाने का हुनर रखता था वह जाते-जाते एक ऐसा सुराग छोड़ गया जो मुझे जलती हुई भट्टी की तरफ खींच रहा था।

मैंने उस कागज को खोला तो अविनाश की वही कटी-फटी लिखावट सामने थी जो हमेशा किसी रहस्यमयी लिपि जैसी लगती थी। उसने लिखा था कि राहुल मुझे पता है कि तुम मुझे एक पत्थर दिल इंसान समझते रहे क्योंकि मैंने कभी तुम्हारी उम्मीदों का जवाब नहीं दिया। पर सच तो यह है कि मैं तुम्हें उस दलदल से बचाना चाहता था जिसका सिरा सीधे इस अलमारी के पीछे छिपे लॉकर से जुड़ता है। तभी बाहर लॉबी में किसी के जूतों की आहट हुई और मेरा पूरा बदन पसीने से तर हो गया। मैंने घबराकर पीछे मुड़कर देखा पर वहां केवल सन्नाटा अपनी लंबी उंगलियां फैलाए खड़ा था। तभी मां ने रसोई से आवाज दी “राहुल वहां क्या कर रहे हो इतनी देर से क्या तुम्हें कुछ मिला वहां।” मैंने अपनी कांपती आवाज को संभालते हुए कहा “नहीं मां यहां तो बस पुरानी रद्दी और धूल के सिवा कुछ भी नहीं है।” मां ने एक लंबी ठंडी सांस ली और बोली “उसकी चीजें जितनी जल्दी इस घर से बाहर चली जाएं उतना ही अच्छा है क्योंकि उसकी यादें अब इस घर को खाने लगी हैं।” मां की इस बात में छुपा हुआ दर्द और नफरत का वह अजीब मिश्रण मुझे झकझोर गया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर अविनाश ने ऐसा क्या गुनाह किया था जो मां भी उसे माफ नहीं कर पा रही थी।

मैं वापस उस अलमारी के सामने घुटनों के बल बैठ गया और उस भारी लकड़ी के ढांचे को पूरी ताकत से एक तरफ खिसकाया। दीवार के उस हिस्से पर सचमुच एक छोटा सा लोहे का दरवाजा था जो बरसों से बंद रहने के कारण जंग खा चुका था। चाबी कहां होगी यह सोचते ही मुझे अविनाश के गले का वह काला धागा याद आया जिसे वह सोते समय भी कभी अपने जिस्म से अलग नहीं करता था। वह धागा अब मेरे पास उसकी आखिरी निशानी के रूप में मेरे हाथ में बंधा हुआ था जिसमें एक छोटी सी पीतल की चाबी लटक रही थी। जब मैंने उस चाबी को ताले में घुमाया तो एक तीखी चरचराहट के साथ वह छोटा दरवाजा खुल गया और उसके अंदर एक मखमली डिब्बा रखा हुआ था। डिब्बे को खोलते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उसके अंदर किसी की मेडिकल रिपोर्ट और कुछ कानूनी कागजात थे। तभी अचानक खिड़की का पल्ला जोर से टकराया और मुझे लगा जैसे अविनाश मेरे ठीक पीछे खड़ा होकर मेरे कान में फुसफुसा रहा हो। उस बंद कमरे में हवा का एक ऐसा झोंका आया जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए और मुझे अपनी ही परछाई से डर लगने लगा।

कागजों को पढ़ते हुए मेरी आंखों से आंसू बहकर उस रिपोर्ट पर गिरने लगे जिससे वहां लिखे शब्द धुंधले होने लगे। उस रिपोर्ट के मुताबिक अविनाश को ब्लड कैंसर था और वह अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़ा था पर उसने यह बात पूरी दुनिया से छुपा कर रखी थी। चिट्ठी का अगला हिस्सा मेरे हाथ में था जिसमें लिखा था कि राहुल अगर मैं तुम्हें बताता कि मैं मरने वाला हूँ तो तुम अपनी पढ़ाई छोड़कर मेरे इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खाते। मैं तुम्हारी आंखों में अपने लिए तरस की वह भीख नहीं देखना चाहता था जो अक्सर बीमार लोगों को मिलती है। मैंने जानबूझकर तुमसे लड़ाई की ताकि तुम मुझसे नफरत करने लगो और मेरे जाने के बाद तुम्हें ज्यादा दुख न हो। यह पढ़कर मेरा सीना फट गया और मैं पागलों की तरह उस खाली कमरे में रोने लगा जहां अब कोई सुनने वाला नहीं था। मैंने हवा में हाथ मारते हुए कहा “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया अविनाश क्या मैं इतना पराया था कि तुमने मुझे अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सच से भी दूर रखा।” कमरे का सन्नाटा मेरे इन सवालों को निगल गया और दीवारों पर टंगी उसकी हंसती हुई तस्वीर मुझे और ज्यादा रुलाने लगी।

तभी उस चिट्ठी के आखिरी पन्ने पर मेरी नजर पड़ी जहां कुछ ऐसा लिखा था जिसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही खिसका दी। वहां लिखा था कि राहुल तुम्हें लगता होगा कि बीमारी ही मेरी मौत की वजह बनी पर सच यह है कि मुझे बचाने के लिए डॉक्टर ने जिस डोनर का इंतजाम किया था वह कोई और नहीं बल्कि तुम्हारे असली माता-पिता का सुराग था। इस घर में जिसे तुम अपनी मां समझते हो वह दरअसल मेरी सगी मां हैं पर तुम इस परिवार का हिस्सा कभी थे ही नहीं। मैंने तुम्हें गोद लिया था जब तुम्हारे माता-पिता एक हादसे में मारे गए थे और मैंने यह बात हमेशा छुपाए रखी ताकि तुम्हें कभी अनाथ होने का अहसास न हो। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा और सिर चकराने लगा क्योंकि जिस पहचान को मैं अपनी जिंदगी मान रहा था वह एक पल में ताश के पत्तों की तरह ढह गई थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अविनाश की मौत पर रोऊँ या अपनी इस नई और खोखली हकीकत पर जो मेरे सामने नंगी खड़ी थी।

तभी कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और मां अंदर आईं जिनके हाथ में पानी का एक गिलास था। उन्होंने फर्श पर बिखरे कागजों और मेरी रोती हुई आंखों को देखा तो उनके हाथ से वह गिलास छूटकर गिर गया और पानी फर्श पर फैल गया। मां ने कांपते हुए होठों से कहा “तो आखिरकार तुम्हें पता चल ही गया जो अविनाश अपनी आखिरी सांस तक छुपाना चाहता था।” मैंने उस आखिरी कागज को मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा “मां क्या यह सच है कि मैं आपका बेटा नहीं हूँ और अविनाश ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।” मां ने घुटनों के बल बैठकर मुझे गले से लगा लिया और रोते हुए बोलीं “अविनाश तुमसे बहुत प्यार करता था राहुल उसने अपनी बीमारी के सारे पैसे तुम्हारी विदेश की पढ़ाई के लिए जमा कर दिए और खुद बिना इलाज के मर गया ताकि तुम एक शानदार जिंदगी जी सको।” उस अधूरी चिट्ठी का अंत अविनाश की मौत से नहीं बल्कि मेरी उस पहचान की मौत से हुआ था जिसे मैं सच समझता रहा और अब उस सूने कमरे में केवल दो लाचार इंसान थे जो एक ऐसे शख्स के लिए रो रहे थे जो नफरत का मुखौटा पहनकर दुनिया का सबसे बड़ा प्यार दे गया था।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ – बाल मजदूर (कलूवा) ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔

मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।

ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”

“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”

“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”

कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।

आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस  गई थी।”

“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”

ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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