हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव।)

☆ कथा-कहानी – लघुकथा – छोटी-छोटी खुशियों का उत्सव… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

नौकरी और विवाह—दोनों सपने पूरे हो चुके थे। अब अमेरिका में नए जीवन की शुरुआत थी। सबसे पहले शिक्षा ऋण चुकाया गया। फिर तय हुआ कि एक-तिहाई वेतन भविष्य के घर के लिए, एक-तिहाई कभी पूरे अमेरिका घूमने के सपने के लिए और बाकी रोज़मर्रा के जीवन के लिए रहेगा। हिसाब-किताब ने फिलहाल उन्हें स्टूडियो अपार्टमेंट में ही रहने को विवश किया।

समय अपनी रफ़्तार से बीतता रहा। एक दिन अचानक थोड़े बड़े घर की तलाश शुरू हुई। अब तक नवदंपती भी जीवन के व्यावहारिक गणित में कुछ अनुभवी हो चुके थे। उन्होंने दो शयनकक्ष वाला एक अपार्टमेंट पसंद किया। घर इतना बड़ा था कि स्टूडियो अपार्टमेंट का सारा फर्नीचर उसके एक कोने में ही सिमट गया।

अब तक अमेरिकी उपभोक्तावादी संस्कृति की हवा उन्हें भी कुछ-कुछ लग चुकी थी। एक टीवी पहले से था, फिर भी दूसरा टीवी उन्हें पसंद आ गया।

अमेरिका में कोई चीज़ पसंद आ जाए, तो उसके घर पहुँचने में देर नहीं लगती। टीवी महाशय घर पधार गए। युवक टूल बॉक्स लेकर जुट गया। युवती कभी दीवार नापती, कभी पीछे हटकर देखती कि टीवी किस जगह सबसे अच्छा लगेगा। दो घंटे की मशक्कत के बाद नया टीवी दीवार पर अपनी जगह पा चुका था।

युवक के मुँह से अनायास निकला, “यार, सेलिब्रेशन तो बनता है!”

दोनों हँस पड़े। फिर अचानक चुप हो गए।

उस शहर में अधिकांश पड़ोसी एक-दूसरे के नाम तक नहीं जानते थे। भारतीय मित्र शहर के दूसरे छोर पर रहते थे और रिश्तेदार दूसरे राज्यों में।

“चलो, हलवा बनाते हैं,” युवती ने कहा।

थोड़ी ही देर में घी और सूजी की महक पूरे घर में फैल गई। छोटा-सा अपार्टमेंट जैसे पल भर में भारतीय रसोई में बदल गया।

हलवा तैयार हुआ। दोनों ने कपड़े बदले। तभी युवती की आँखों में चमक उभरी।

युवक ने कहा “रेडी… वन… टू… थ्री…”

युवती ने बड़े जतन से नए टीवी का पारदर्शी प्लास्टिक आवरण हटाया। दीवार पर टँगी चमचमाती स्क्रीन के साथ दोनों के चेहरे भी खिल उठे।

कुछ क्षण तक मुस्कान बनी रही। फिर अचानक मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन से माँ की आवाज़ आई—

“बेटा… काश, हम भी इस खुशी में तुम्हारे साथ होते…”

 ©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पथ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पथ… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

न दुर्गम था, न सुगम। न जटिल था, न सरल। पथ वैसा ही था, जैसा होना चाहिए। कहीं प्रशस्त, कहीं संकीर्ण। कहीं समतल, कहीं उबड़खाबड़। कहीं पुष्पित, कहीं कंटकाकीर्ण। सभी चलते रहे।

एक सहयात्री ने कहा, “वाह! पुष्प ही पुष्प भरे हैं पथ पर..” और उसने ढेर सारे पुष्प आँचल में भर लिए। एक को पूरे मार्ग में टेढ़े-मेढ़े से लेकर सुघड़-सुंदर छोटे-छोटे पत्थर दृष्टिगोचर हुए। उसने पत्थर बटोर लिए। एक वनस्पतिशास्त्री को भाँति-भाँति की वनस्पतियाँ दिखीं, उसने उनके पत्ते चुन लिए। हरेक की अपनी आँख थी और थी अपनी दृष्टि। उसे चप्पे-चप्पे पर कविता और कहानियाँ मिलीं, उसने सहेज लीं।

” इन्होंने अनगिन कविताएँ और कहानियाँ रची हैं..”,   किसीने उनका परिचय देते हुए कहा।

वह सोच में पड़ गया कि चलना और रचना समानार्थी कैसे हुए?

 

?

© संजय भारद्वाज   

( श्रीविजयादशमी 2019, अपराह्न 3.57 बजे।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६६ ☆ लघुकथा – माँ आज भी गाती है ! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘माँ आज भी गाती है !‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६६ ☆

☆ लघुकथा – माँ आज भी गाती है ! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

माँ बहुत अच्छा गाती है, अपने समय की रेडियो कलाकार भी रही है। पुरानी फिल्मों के गाने तो उसे बहुत पसंद हैं। भावुक होने के कारण हर गाने को इतना दिल से गाती कि कई बार गाते-गाते गला भर आता और आवाज भर्राने लगती। तब आँसुओं और लाल हुई नाक को धोती के पल्लू से पोंछकर हँसती हुई कहती- अब नहीं गाया जाएगा बेटा! दिल को छू जाते हैं गाने के कुछ बोल!

‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा, तुझे दीप कहूँ या तारा’, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ए मेरे उजड़े चमन’ जैसे गाने माँ हमेशा गुनगुनाती रहती थी। वह ब्रजप्रदेश की है इसलिए वहाँ के लोकगीत तो बहुत ही मीठे और जोशीले स्वर में गाती है। लंगुरिया, होरी और गाली (गीत) गाते समय उसका चेहरा देखने लायक होता था। माँ गोरी है और सुंदर भी, गाते समय चेहरा लाल हो जाता। लोकगीतों के साथ-साथ थोड़ी हँसी-ठिठोली तो ब्रजप्रदेश की पहचान है, वह भला उसे कैसे छोड़ती? जैसा लोकगीत हो, वैसे भाव उसके चेहरे पर दिखाई देने लगते।

हम अपने समधी को गारी न दैबे,  

हमरे समधी का मुखड़ा छोटा,

मिर्जापुर का जैसा लोटा….

लोटा कहते-कहते तो माँ हँस- हँसकर लोटपोट हो जाती। ढ़ोलक की थाप इस गारी (गीत) में और रस भर देती थी।

उम्र के साथ माँ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी है। कुछ कम दिखाई देने लगा है, थोड़ा भूलने लगी है लेकिन अब भी गाने का उतना ही शौक और आवाज में उतनी ही मिठास। हाँ पहले जैसा जोश अब नहीं दिखता। अक्सर माँ फोन पर मुझसे कहती – ‘बेटा ! संगीत मन को बडी तसल्ली देता है। कभी-कभार अपने को बहलाने के लिए भी गाना चाहिए। जीना तो है ही, तो खुश रहकर क्यों ना जिया जाए। इस जिंदादिल माँ की आवाज में उदासी मुझे फोन पर अब महसूस होने लगी थी

वह अपने दोनों बेटों के पास है। बहुएँ भी आ गयी हैं, अपने-अपने स्वभाव की। पिता जब तक जिंदा थे माँ अपना सुख-दुख उनसे बाँट लेती थी। उनकी मृत्यु के बाद वह बिल्कुल अकेली पड़ गयी। ‘नाम करेगा रौशन जग में मेरा राज-दुलारा’ गा-गाकर जिन बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया, उनकी बुराई करे भी तो कैसे? पर वह यह समझने लगी कि अब बेटों को उसकी जरूरत नहीं रही।

माँ उदास होती है तो छत पर बैठकर पुराने गाने गाती है। एक दिन माँ छत पर अकेली बैठी बड़ी तन्मयता से गा रही थी- ‘भगवान! दो घड़ी जरा इन्सान बन के देख, धरती पर चार दिन मेरा मेहमान बन के देख तुझको नहीं पता कोई कितना…’

‘निराश’ शब्द आँसुओं में डूब गया। गीत के बोल टूटकर बिखर रहे थे, या माँ का दिल, पता नहीं।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

💥 

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अंत नहीं, एक नई शुरुआत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ अंत नहीं, एक नई शुरुआत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

सुबह अलमारी खोलते हुए सुमित ने अपनी पुरानी फाइलें एक तरफ रख दीं।

पत्नी ने पूछा, “आज ऑफिस नहीं जाना?”

सुमित मुस्कुराया, “नहीं। आज से ऑफिस मुझे याद करेगा।”

“और तुम ऑफिस को?”

सुमित कुछ पल चुप रहा।

“शायद उससे ज्यादा उन लोगों को… जिनके साथ रोज़ की चाय भी एक आदत बन गई थी।”

टेबल पर रखा पुराना ऑफिस बैग देखते हुए बेटा बोला, “पापा, अब इसे रख क्यों रहे हो?”

“पता नहीं,” सुमित ने बैग उठाकर कहा, “शायद इसलिए कि हाथ अभी इसे छोड़ना नहीं चाहते।”

पत्नी ने धीरे से कहा, “लेकिन अब आपके पास अपने लिए समय है।”

सुमित ने खिड़की से बाहर देखा।

“अपने लिए समय… यह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।”

“तो अब सोचिए।”

वह हँसा, “पहले दिन क्या करूँ?”

पत्नी ने चाय का कप आगे बढ़ाते हुए कहा, “जो मन करे।”

सुमित ने कप थामा और कुछ देर चुप बैठा रहा।

फिर बोला, “कल सुबह जल्दी उठूँगा।”

“क्यों?”

“पता नहीं… बस मन है।”

पत्नी मुस्कुराई।

अगली सुबह अलार्म बजने से पहले ही सुमित उठ गया। उसने जूते पहने, दरवाज़ा खोला और कुछ कदम बाहर बढ़ा।

सामने वही सड़क थी…

लेकिन आज पहली बार उसे लगा-

शायद रास्ता वही था, बस मंज़िल बदल गई थी।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बालकनी।)

☆ लघुकथा # १३२ – बालकनी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“माँ, सामने वाले अंकल रोज यहाँ क्यों बैठे रहते हैं?”

“शायद किसी का इंतज़ार करते हैं।”

“आपको कैसे पता?”

सुधा मुस्कुराई, “क्योंकि कभी तुम्हारे पापा भी ऐसे ही मेरा इंतज़ार किया करते थे।”

अंशु कुछ कहता, उससे पहले ही नीचे ब्रेक लगने की तेज आवाज गूँजी।

एक बाइक फिसली। युवक उछलकर सड़क पर गिरा। हेलमेट दूर जा छिटका।

“माँ!”

अंशु रेलिंग पकड़कर नीचे झुक गया।

सुधा के हाथ काँपने लगे। आँखों के सामने वही दृश्य कौंध गया—सड़क पर पड़ी कार, टूटे शीशे और अस्पताल से आया वह एक वाक्य—

“मैडम, इन्हें बचाया नहीं जा सका।”

विवेक की मौत को वर्षों बीत चुके थे, मगर उस एक क्षण ने समय को फिर वहीं रोक दिया था।

“माँ, कुछ हुआ तो नहीं?”

सुधा ने बेटे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“नहीं… आज बस एक पुराना हादसा सामने आ गया।”

नीचे लोग घायल युवक को उठाकर अस्पताल ले जाने लगे।

अंशु ने धीरे से पूछा, “पापा भी ऐसे ही गए थे?”

सुधा ने सिर हिलाया।

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर अंशु बोला, “माँ, आप फिर भी यहाँ क्यों आती हैं?”

सुधा ने सामने देखा।

“क्योंकि तुम्हारे पापा ने यहीं से मुझे पहली बार देखा था… और मैंने यहीं से उन्हें।”

अंशु ने माँ का हाथ थाम लिया।

सुधा ने गहरी साँस ली।

एक क्षण ने आज किसी अजनबी को सड़क पर गिराया था और वर्षों पहले उसी तरह के एक क्षण ने उससे उसका अपना संसार छीन लिया था।

वह धीरे से भीतर चली गई।

पीछे रह गई शाम, सड़क और वह जगह—जहाँ एक नजर ने जीवन दिया था और एक हादसे ने उसे छीन लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७९ – परोपकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “परोपकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪴परोपकार 🪴

चमचमाती कार से उतर सीधे चौराहे पर बने स्टेज पर पहुंचे अतिथि महोदय का सभी ने ह्दय से स्वागत अभिनंदन किया। आगे आने पुष्प हार पहनाने की होड़ मची थी। सोशल मीडिया का समय तस्वीरें भी खींची जा रही थी। गाँव में अत्यंत आत्मियता के साथ आयोजन को मनाया जा रहा था।

अतिथि महोदय ने प्रणाम स्वीकार करते, प्रणाम करते अपना भाषण आरंभ किया— जीवन में सेवा का अवसर जब भी आए खोना नही चाहिए। जब कभी मिले उसे जरुर कर लेना चाहिए।परोपकार करते ही रहना चाहिए।

अब मुझे ही देखिए – – – मैनें शहर में एक वृद्धा आश्रम का शुभारंभ किया और सर्व प्रथम मैनें अपनी ही माँ को वृध्दाआश्रम में रहने भेज दिया।

बात सुनते ही खुसुर-पुसुर होने लगी। पंडाल खाली होते देर न लगी। अतिथि महोदय समझ पाते–किसी ने पीछे से आवाज लगाई। ऐसे परोपकार से हम गाँव वाले बिना परोपकार के भी रह सकते हैं।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ अभिव्यक्ति # 16 ☆ स्विच ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को एक स्वरूप देने के प्रयास में इस रचना की रचना कोविड के समय में की गई थी.

आज पुनर्पाठ में एक दुःस्वप्न पर आधारित  और २४ अप्रैल २०२० को प्रकाशित कथा “स्विच ” पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह आश्चर्य और विडम्बना है कि हम एक लम्बी मानवीय त्रासदी को सहन करने के बाद मानवीय संवेदनाओं और त्रासदी को भूल गए हैं । आखिर वह स्विच कौन सा है ? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये और पसंद आये तो मित्रों से शेयर भी कीजियेगा। अच्छा लगेगा।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 16 ☆

☆ कथा कहानी – स्विच ☆ हेमन्त बावनकर ☆

आज के अखबार की हेडलाइन्स ने चौंका दिया… देश के सभी धार्मिक स्थल के भक्त-निवासों को अस्पताल के वार्ड में तब्दील करने का निर्णय…  तालों में बंद ईश्वर की मौन अनुमति… सभी देवी देवताओं और नेताओं की बड़ी-बड़ी मूर्तियों के दानदाताओं द्वारा उतनी ही या उससे अधिक राशि अस्पताल और जनसेवाओं के लिए दान में देने का निर्णय…

बड़ा अजीब माहौल है… कोई मेरी ओर देख ही नहीं रहा… सब अपने आप में मशगूल हैं। मैं सोसायटी गेट से बाहर निकल रहा हूँ… गार्ड रोकना चाह रहा है… किन्तु, मैं अपने में ही मशगूल हूँ… बाहर निकल गया हूँ… सब कुछ शांत… पूरी सड़क सुनसान… सिर्फ दूध और दवा की दुकान खुली है और दारू की बन्द है… मुझे चिंता होने लगी है कि सरकार के आय का बड़ा स्रोत बन्द है तो जनता पर व्यय कैसे होगा ?… शायद दान से… वेतन में कटौती से… महंगाई भत्ते पर रोक से… पर पेंशनरों का तो सहारा ही यही है… कम से कम पेंशनरों को तो बख्श देते… बुढ़ापे में… पेंशनरों की वित्तीय समस्या का निर्णय वो लोग क्यों लेते हैं जो स्वयं का वेतन स्वयं निर्धारित करते हैं… पेंशनरों की समस्या का हल करने की समिति में कोई पेंशनर ही नहीं है… समस्या कटौती की नहीं है… समस्या भविष्य की योजना की है… कहते हैं बीमा करा लो… राष्ट्र का बीमा क्यों नहीं ?… सभी का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं?… राष्ट्र का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं ?… हमारा पेंशन फंड है… राष्ट्र का पेंशन फंड क्यों नहीं?…

मैं दुबारा देखता हूँ… मैंने सही देखा है दारू की दुकान बन्द है…  सड़क के किनारे फिल्मों के पोस्टर गायब हैं… सारे शहर में डॉक्टर, नर्सों, सफाई कर्मियों, पुलिसवालों के मुस्कराते चेहरों वाले पोस्टर लगे हैं। बड़े बड़े नेताओं के पोस्टर लगे हैं… सब में एक कॉमन बात दिखाई दे रही है, सब पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है COVID-19 और सबने मास्क पहन रखा है…

सारी की सारी सड़क साफ हो गई है… कहीं कोई कचरा नहीं… कोई प्लास्टिक बैग / पन्नियाँ नहीं… गैर पालतू जानवर आराम से घूम रहे हैं… जरा भूखे जरूर लग रहे हैं…  किन्तु, काटने नहीं दौड़ रहे… आज तालाब के किनारे वॉकिंग ट्रैक पर कोई वाक नहीं कर रहा… तालाब का पानी शीशे की तरह साफ कैसे हो गया?… कहीं धूल नहीं… हवा में प्रदूषण नहीं… ये क्या तालाब के किनारे मंदिर में बहुत बड़ा ताला लगा है… पुजारी का अता-पता नहीं है… तो पूजा कौन करता है? आगे अस्पताल खुला है… सब मुझे शक की नज़र से देख रहे हैं… जैसे गेट पर मेरी प्रतीक्षा के लिए हाथ में लेजर से बुखार नापने का यंत्र  लिए नर्स खड़ी है और कुछ नर्सिंग स्टाफ… उन्हें लगा मैं अंदर जाऊंगा… उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ता हूँ… तिरछी नजर से देखता हूँ… शायद वे निराश हो गए…

आगे मॉल में एक मल्टीप्लेक्स है… बाहर बहुत बड़ा पोस्टर लगा है… पूरे पोस्टर पर लिखा है COVID-19…  शायद साइंटिफिक फंतासी फिल्म हो… सोचता हूँ देख ही लूँ… मॉल में इक्का दुक्का लोग घूम रहे हैं… दुकानें बन्द हैं… मल्टीप्लेक्स खुले हैं… सीधे सिनेमा हाल के गेट तक पहुँच जाता हूँ… कोई रोकता क्यों नहीं ?… सिनेमा हाल में चला जाता हूँ… शायद फिल्म शुरू हो गई है… अंधेरे में खाली सीट टटोलते हुए एक किनारे की खाली सीट पर बैठ जाता हूँ… फिल्म शुरू हो चुकी है… विदेश का कोई शहर है… अफरा तफरी मची हुई है… शायद कोई महामारी फैल रही है… बीच बीच में कोई वाइरस पूरे स्क्रीन पर उछल कूद मचाते रहता है… लोग एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं… गले लग रहे हैं… फ्लाइट पकड़ कर दूसरे देश जा रहे हैं… खुद भी बीमार हो रहे हैं… औरों को भी बीमार कर रहे हैं… अब तो मौतें भी हो रही हैं…

अचानक स्क्रीन पर आंकड़े आने लग गए…पहले विदेशों के… फिर अपने देश के… आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं… अचानक जाना माना टी वी एंकर स्क्रीन पर आ गया… एक एक कर वक्ता आने लगे… बहस चालू हो गई… अरे! ये फिल्म में टी वी एंकर कैसे घुस गया… यहाँ भी टी आर पी… हाल में रोशनी बढ़ने लगी… सबने मास्क लगा रखा था… दस्ताने पहन रखे थे…

एंकर चीख चीख कर कह रहा था… अपनी सुरक्षा स्वयं करें… सार्वजनिक स्थानों पर मत जाएँ… मास्क पहन कर रहें… घर से बाहर न निकलें… घबरा कर उठ खड़ा होता हूँ… और अपने आपको बीच सड़क पर पाता हूँ…आवाज एंकर की नहीं थी… पुलिसवाले अपनी गाड़ी में माइक पर चीख चीख कर कह रहे थे… लॉक डाउन में घर से बाहर न निकलें… सरकारी नियमों का कड़ाई से पालन करें…अचानक पुलिस मुझे घेर लेती है… मैं बेतहाशा भागने लगता हूँ… तेज…और तेज…इतना तेज कि जिंदगी में नहीं दौड़ा…पुलिस के बूटों की आवाज कम होने लगती है… पलट कर देखता हूँ… कोई भी नहीं… चैन की सांस लेता हूँ जैसे ही पलटता हूँ… ये क्या?… एक इंस्पेक्टर खड़ा है और कुछ पुलिस वाले… पुलिस वाले जैसे ही डंडा उठाते हैं…इंस्पेक्टर रोक देता है… उम्र का लिहाज कर रहा हूँ… दुबारा नहीं छोडूंगा… हाथ जोड़ माफी मांग कर घर लौट आता हूँ…

घर पर कोई नहीं दिखते… बाबूजी बहुत याद आ रहे हैं… सीधे उनके कमरे में जाता हूँ… बाबूजी खिड़की के किनारे अपनी कुर्सी पर बैठकर अपनी डायरी लिख रहे हैं… वे मेरी ओर नाराजगी से देखते हैं… शायद उन्हें मेरा बाहर जाना अच्छा नहीं लगा… उनके कदमों में बैठ कर पाँव पकड़ कर माफी मांगने लगता हूँ…अरे ये क्या? बाबूजी तो हैं ही नहीं… बाबूजी तो वास्तव में हैं ही नहीं… तो वो कौन थे…उठ कर देखता हूँ बाबूजी की डायरी वैसे ही खुली पड़ी है… बाजू में उनका चश्मा… और डायरी में कलम… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… अपनी आदत के अनुसार एक लाइन छोड़ कर सुंदर हस्तलिपि में एक एक पंक्तियाँ… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… उनकी सर्वाधिक प्रिय पुराने फिल्मी गानों की एक-एक पंक्तियाँ… सब पंक्तियों के अंत में आँसुओं की कुछ बूंदें…

गांधीजी के जन्म के 150वें वर्ष पर…

आज है दो अक्तूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान…

नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है… 

नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ… 

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की… 

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा… 

ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी… 

हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के… 

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा… 

डायरी उठाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाता हूँ तो सब कुछ गायब… डायरी… चश्मा… कलम…  सब कुछ… आँखें भर आती हैं… गला रुँध जाता है… रोने की कोशिश करता हूँ… गले से आवाज ही नहीं निकलती… गले से सिसकियाँ निकलने लगती हैं…

सुनिये… सुनिये… श्रीमति जी मुझे हिला कर नींद से उठा रही हैं… पूछ रही हैं… क्या हुआ? इतनी देर से क्यों रो रहे हैं? श्रीमति से लिपट कर रो पड़ता हूँ…

सोच रहा हूँ… आखिर यह स्वप्न है या दुःस्वप्न?  ईश्वर ने इस जटिल मस्तिष्क की रचना भी कितने जतन से की होगी। लोग कहते हैं कि सोचना बंद कर दो। अरे भाई! आपको सारे शरीर में कहीं कोई ऐसा स्विच दिख रहा है क्या कि- ऑफ कर दूँ और सोचना बंद हो जाए? यह तो मस्तिष्क में ही कहीं होगा तो होगा । यदि होगा तो जाते समय अपने आप ऑफ हो जाएगा…

© हेमन्त बावनकर

पुणे 

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆ लघुकथा – बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “बेटे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆

✍ लघुकथा ☆ बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कहानी  – 

सूरज की तपिश ठंडी होती  जा रही थी और प्रकाश लालिमा में बदल कर सुमधुर वातावरण बनाता जा रहा था तभी राम नारायण अपने चिर-परिचित बरगद के नीचे बिछी बैंच पर बैठते जा रहे थे। वे बैठ भी नहीं पाए थे कि आवाज आई, “अरे राम, आ गए?”, उन्होंने एक नजर डाली और ओठों पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हुए बैठ गए। तभी मनजीत सिंह उनके पास आ गए। यह उनके शाम की चौपाल की जगह थी, जहाँ रोज इकट्ठे होते और चर्चा किया करते। मनजीत ने राम नारायण का चेहरा उदास देखा तो पूछा कि सब खैरियत है न, चेहरा लटका क्यों है?

राम नारायण कुछ उत्तर देते कि उससे पहले कई आवाजें आसमान में तैर गईं। दोनों ने देखा चौपाल के अन्य साथी मुश्ताक, जोसेफ, गौतम, जहांगीर, महावीर, फ़ीरोज़ व एरियल हँसते बोलते चले आ रहे हैं। राम नारायण और मनजीत को शांत देखकर वे भी सहम गए और चुपचाप बैठ गए।  एरियल ज्यादा देर शांत न रह सके । वरी सांई कुछ तो बोलो। मनजीत ने चुप्पी तोडी और बोले ,”राम प्रा के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई है।” “बस” एरियल चिहुंके। राम नारायण बोले, “भाई हिंदू धर्म में बेटों का बड़ा महत्व होता है खास कर बड़े बेटे का, क्योंकि वही पिता को मुखाग्नि देता है, पिंडदान करता है और पिता को मोक्ष दिलाता है। इसलिए बेटों का बहुत महत्व है।  बेटों को बुढ़ापे की लाठी माना जाता है। इससे बेटी का महत्व कम नहीं होता, वरन् वह कन्यादान का अवसर प्रदान करके माता पिता का जीवन सफल बनाती है।”

इस पर मुश्ताक बोले, ”  इस्लाम धर्म में बेटा बेटी दोनों को अल्लाह की नेमत माना जाता है। बेटी को रहमत और बेटे को नेअमत बताया गया है। रहमत का मतलब अल्लाह की दया है और नेअमत अल्लाह का इनाम है। बेटों को बुढ़ापे का सहारा तो माना जाता है क्योंकि बेटियाँ पराए घर चली जाती हैं।”  मुश्ताक चुप हुए ही थे कि जोसेफ बोल पडे, ” ब्रदर ईसाई धर्म में बेटा बेटी में कोई आध्यात्मिक अंतर नहीं माना जाता। दोनों  ईश्वर की संतान हैं।”  आगे एरियल बोले, ” यहूदी धर्म में सबसे बड़े बेटे को धार्मिक महत्व ज्यादा मिलता है। उसे पिता की विरासत में अन्य संतान की अपेक्षा दोगुना हिस्सा मिलता है।  धार्मिक कर्तव्यों के लिए बेटों का होना जरूरी माना जाता है। लेकिन अब अंतर आ गया है। बेटियाँ भी धार्मिक कर्तव्यों में हिस्सा लेने लगी हैं।”

“ओ बादशाहो, गुरु ग्रंथ साहिब में स्त्री पुरुष समानता पर बहुत जोर दिया गया है। इसलिए सिख धर्म में बेटा बेटी में कोई भेद नहीं होता।” गुरमीत सिंह ने अपनी सहज बुलंद आवाज में कहा। गौतम ने कहा, “बौद्ध धर्म में आदमी को मोक्ष स्वयं के कर्मों से मिलता है। बेटा बेटी का इससे कोई संबंध नहीं। हां, उन दोनों का अपना अपना महत्व तो होता ही है।” महावीर बोले, “जैन धर्म में भी बेटा बेटी में कोई भेद नहीं है।” सबकी बातें सुनकर फ़ीरोज़ गंभीरता से बोले, “पारसी धर्म में धर्म और पहचान दोनों पिता से चलती हैं। इसलिए पुत्र का महत्व ज्यादा है। उसे वंश चलाने वाला माना जाता है। लेकिन अब बेटियों को बराबर महत्व दिया जाने लगा है।”

चौपाल खत्म होने का समय हो गया। सबने उठते उठते कहा भाइयों समाज में स्त्री विमर्श पर खूब चर्चा होती है पर पुरुष विमर्श पर नहीं होती। वृद्धों पर बेटों के अत्याचार की चर्चा भी खूब होती है परंतु उनके त्याग, तनाव, भावना व श्रम की चर्चा नहीं होती। जब बेटा बेटी बराबर हैं तो हर क्षेत्र में बराबरी रहनी चाहिए। दोनों में किसी भी स्तर पर भेद नहीं देखना चाहिए। और एक दूसरे से हाथ मिला कर सभी अपने अपने घर चल दिए।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – एक फूल और एक नई राह।)

☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

अनंत चतुर्दशी के दिन  शहर की सड़कें गणपति विसर्जन की तैयारियों से गुलजार थीं। कहीं ढोल-नगाड़े बज रहे थे, कहीं श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे—“गणपति बप्पा मोरया!”

सीता मंदिर से पूजा करके लौट रही थी। हाथ में पूजा की थाली थी, लेकिन मन वर्षों से एक अनकही पीड़ा से भरा था। विवाह को कई साल बीत चुके थे। हर दूसरे दिन कोई न कोई पूछ ही देता—“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं?” वह मुस्कुराकर बात टाल देती, मगर हर सवाल उसके भीतर एक खालीपन छोड़ जाता।

आज मंदिर में उसने माँ गौरी के सामने बस इतना कहा था—“माँ, मेरी गोद भरना मेरे हाथ में नहीं है, पर मुझे किसी के काम आने का अवसर जरूर देना।”

वह सड़क पार करने ही वाली थी कि अचानक भीड़ के बीच एक छोटा बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया।

“माँ… माँ…!”

लोग अपनी-अपनी धुन में आगे बढ़ रहे थे। बच्चा घबराकर इधर-उधर देख रहा था।

सीता तुरंत उसके पास पहुँची।

“बेटा, घबराओ मत। तुम्हारी माँ मिल जाएगी। मेरा हाथ पकड़ो।”

बच्चे ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

सीता उसे सड़क किनारे ले आई। पानी पिलाकर प्यार से पूछा, “तुम्हारी माँ कैसी दिखती हैं?”

बच्चा सुबकते हुए बोला, “लाल साड़ी… माथे पर बड़ी बिंदी…”

सीता ने आसपास नजर दौड़ाई। कुछ ही मिनटों बाद एक महिला बदहवास-सी दौड़ती हुई आई।

“मेरा बेटा! मेरा बेटा कहाँ है?”

बच्चा सीता का हाथ छोड़कर माँ की ओर दौड़ पड़ा।

महिला ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

“बहनजी, आपने आज मेरी जान बचा ली। भीड़ में इसका हाथ छूटा तो लगा सब कुछ खत्म हो गया।”

सीता ने मुस्कुराकर कहा, “बच्चा मिल गया, बस यही बड़ी बात है।”

बच्चा माँ की बाँहों से झाँककर बोला, “आंटी, धन्यवाद!”

सीता कुछ क्षण उसे देखती रही। उसके चेहरे पर बरसों बाद सहज मुस्कान आई।

वापस लौटते समय सड़क किनारे फूलों की दुकान दिखाई दी। उसकी नजर लाल गुड़हलों पर पड़ी। उसने दो फूल खरीदे और थाली में रख लिए।

घर पहुँचते ही पति ने पूछा, “आज देर कैसे हो गई?”

सीता ने सारी घटना सुना दी।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली, “आज मुझे एक बात समझ आई।”

“क्या?”

“माँ होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं है। किसी रोते हुए बच्चे का हाथ थामना भी माँ होना है।”

वह रुकी, फिर धीमे स्वर में बोली, “हमारी गोद भरेगी या नहीं, मैं नहीं जानती। लेकिन अगर किसी बच्चे को माँ, घर और अपनापन चाहिए… तो क्या हम उसे अपना नहीं सकते?”

पति ने उसकी ओर देखा और उसका हाथ थाम लिया।

“इस बारे में आज से साथ मिलकर सोचेंगे।”

सीता की आँखें भर आईं। उसकी नजर थाली में रखे दो लाल गुड़हलों पर टिक गई।

सुबह वह एक फूल लेने निकली थी, शाम तक उसके हाथ में दो फूल थे।

एक उसकी बरसों पुरानी इच्छा का प्रतीक था, दूसरा शायद नई राह का संकेत।

बाहर गणपति विसर्जन की जयकार गूँज रही थी—”गणपति बप्पा मोरया!”

सीता ने आँखें बंद कर लीं।

आज उसने कोई मन्नत नहीं माँगी।

बस मुस्कुराकर कहा— “बप्पा, आज समझ गई… माँ बनने के लिए गोद भरना जरूरी नहीं, किसी का हाथ थामना जरूरी है।”

आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे कमी के नहीं, एक नई शुरुआत के आँसू थे।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – छूटता हुआ शहर… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – छूटता हुआ शहर।)

☆ कथा-कहानी – लघुकथा – छूटता हुआ शहर… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆

जब मैंने पीछे पलटकर देखा तो पाया कि रेलगाड़ी धड़धड़ाती हुई सुनार नदी का पुल पार कर रही थी। उसी पुल के उस पार मेरी किशोरावस्था और यौवन की दहलीज छूट रही थी । रेलगाड़ी आगे बढ़ती रही, और पीछे छूटते दृश्यों के साथ हटा, जैतवारा और दमोह भी स्मृतियों में एक-एक कर उतरते चले गए। और फिर अचानक जैतवारा से दमोह तक का सफ़र याद आ गया। बघेली मिश्रित हिन्दी पर सहपाठियों की हँसी, विज्ञान छोड़कर कला संकाय पढ़ने की अधूरी इच्छा, माँ के निर्णय, रसायनशास्त्र की कठिन पढ़ाई, घर की आर्थिक जिम्मेदारियाँ—सबने मिलकर जैसे मुझे समय से पहले बड़ा कर दिया था। आज भी मुझे याद है माँ का वाक्य – “बेटा, विज्ञान पढ़कर कला में कौन जाता है? ज़रा सोचो, आगे का जीवन कैसे बनेगा।” अब वही जीवन मुझे स्टेट बैंक की नौकरी के लिए सागर ले जा रहा था ।  “रेलगाड़ी आगे बढ़ती रही, और पीछे छूटता दमोह धीरे-धीरे स्मृतियों में बदलता गया। मन ने जैसे फुसफुसाकर पूछा—”अब कब तक पीछे पलटकर देखते रहोगे?” मैंने एक बार फिर पीछे देखा। पुल अब दिखाई नहीं दे रहा था। सागर स्टेशन सामने था—जैसे जीवन का नया पड़ाव, जहाँ जिम्मेदारियों की गाड़ी उतरने वाली थी। मैंने खिड़की से सिर भीतर खींच लिया।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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