श्री राजेंद्र निगम

? कथा कहानी ?

☆ समाधान… मूळ गुजराती लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर ☆  हिन्दी अनुवाद : श्री राजेंद्र निगम ☆

गीत बजने की आवाज सुनकर वे चौंककर जाग गए। नींद से हल्के से जागकर पलंग के पास रखे मोबाइल को ढूँढा। नहीं, अलार्म तो नहीं बजा और अभी तो एक ही बजा था। बिस्तर पर बैठने के बाद उन्हें समझ में आया कि बाहर के कमरे से टीवी की आवाज आ रहा थी। “विराज रात में इतनी देर तक क्यों टीवी चालू कर के बैठा है ?”

वे खड़े होकर बैठक के कमरे में आए। प्रियांशी उन्हें देखकर सोफे पर से एकदम खड़ी हो गई। “सॉरी पापा, मैं चैनल बदलने के लिए गई, लेकिन मेरी भूल से से आवाज बढ़ गई।”

वे लुछ देर प्रियांशी के सामने और कुछ देर टीवी के सामने देखते रहे। प्रियांशी आगे कुछ कहने जा रही थी की तब ही वे बोले,

 “क्यों बेटा, अब तक जाग रही हो ? क्या हुआ ? सेहत तो ठीक है न ?”

 “अरे नहीं, नहीं। पापा कुछ नहीं हुआ। बस वैसे ही नींद नहीं आ रही थी तो लगा कुछ देर टीवी देख लूँ। सॉरी पापा, मेरे कारण आपकी नींद बिगड़ गई। आप सो जाएँ, मैं भी सोने के लिए जा रही हूँ।” कहते-कहते उसने टीवी बंद किया और तुरंत अपने कमरे में चली गई। बैठक खंड के अँधेरे में वे कुछ देर असमंजस जैसी स्थिति में खड़े रहे। उन्हें कुछ असामान्य जैसा लग रहा था या फिर वह केवल उनका वहम था !

उन्होंने कमरे में आकर अंदर वैसे ही दो-चार चक्कर लगाए। पलंग पर तकिया रखा और उसके सहारे बैठे। “प्रिया किसी बेचैनी में थी या कुछ और था ? ऑफिस में कुछ हुआ होगा ? विराज के साथ कुछ अनबन हो गई होगी ? नहीं… ऑफिस से आई, तब तो बहुत अच्छे मूड में थी। थकी हुई थी, लेकिन फिर भी उसने मेरी प्रिय दाल-ढोकली बनाई। और मुझे आग्रह कर खिलाया। लेकिन हाँ, वे दोनों जब भोजन के लिए बैठे, तब वह कुछ ढीली लग रही थी। तुरंत भोजन किया और बगैर कुछ बोले और बगैर रसोई का काम निपटाए सोने के कमरे में चली गई| लेकिन विराज भी तो सामान्य था। मेरे साथ फुटबॉल मैच देखते वक्त सहज लग रहा था। उसके किसी परिचित का फोन आया, तब वह हँस-हँसकर बात भी कर रहा था। तो फिर क्या हुआ होगा ? प्रियांशी की तबियत खराब हो गई होगी या फिर काम के बोझ के कारण थक जाती होगी ? उनका दिमाग घूमने लगा। जोरजोर से बोलनेवाली और वैसे ही हँसनेवाली प्रियांशी आज शाम के बाद गुमसुम हो गई थी। “अभी टीवी देख रही थी और जैसे ही मैं चला गया. तो कैसी शर्मसार हो गई थी ! मानो कोई गुनाह करते हुए पकड़ ली गई हो ! और मुझे उसकी परेशानी बताते हुए उसे शर्म आ रही हो ? क्या करूँ…अलका को फोन करूँ ? नहीं, नहीं. इतनी गंभीर बात भी नहीं है। और यह भी कहाँ निश्चित है कि प्रिया को कुछ हुआ ही है या वह सिर्फ मेरे मन का वहम है ? अलका की गैर-मौजूदगी के कारण क्या मैं कुछ अधिक चिंतित हो गया हूँ ? कल सवेरे विराज के साथ बात कर लेंगे।”

कोई ऊँची आवाज में बोल रहा था, वे तुरंत जाग गए। ओह, यह तो विराज की आवाज है। वे उठकर लगभग दौड़ते हुए बाहर आए। विराज टाई पहनते हुए गुस्से में बोल रहा था।

“मैं मेरा काम करूँ या तुम्हारे दर्जी के यहाँ धक्के खाऊँ ? इतना ही जरूरी था तो खुद जाकर के ले आती।”

 वे घबरा गए। “वीरू बेटा, क्या हुआ है ? क्यों इतने गुस्से में हो ? प्रिया कहाँ है ?”

प्रियांशी रसोई से दोनों की टिफिन बैग लेकर बाहर आई। उसकी आँखें सुर्ख लाल हो रही थीं। चेहरा बिल्कुल उतर गया था। वे स्थिति को समझने की कोशिश करते रहे। विराज उनकी मौजूदगी को नजरअंदाज कर जूते-मौजे पहनने लगा। प्रियांशी टिफिन बैग को डाइनिंग टेबल पर रखकर रसोई में चली गई। वे रसोई के दरवाजे पर खड़े रहकर दोनों के सामने देखते रहे।

“प्रिया बेटा, क्या हुआ ? क्यों झगड़े तुम दोनों ? और ओ भाई, यह सवेरे-सवेरे क्यों चीख रहे हो ? ऐसा अच्छा नहीं लगता है। कारण बताओ, तो मालूम पड़े। प्रिया तुम्हें रोना नहीं चाहिए, बेटा| यहाँ बाहर आकर बैठो। वीरू, तुम भी बैठो।”

“पापा मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है। और मेरे पास इन सब नाटकों के लिए वक्त नहीं है ! मैं निकल रहा हूँ।”

“विराज, मैं शांति से बात कर रहा हूँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि तुम मेरे साथ चाहे जिस भाषा में बात कर सकते हो। चुपचाप जूते निकालकर यहाँ आ कर बैठो। नहीं जाना ऑफिस। प्रिया, तुम भी काम छोड़कर बाहर आओ।”

प्रियांशी बाहर आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई। जो हुआ है, उसका संकोच उसके चेहरे पर देखा जा सकता था। “अब शांति से बोलो, वीरू, क्या हुआ ? क्यों इतना गुस्सा कर रहे हो प्रिया पर ?”

विराज लंबी साँस खींचकर गुस्से में प्रिया की ओर देखते हुए टाई को ढीला करने लगा। प्रियांशी की आँखें फिर बहने लगी।

“बेटा प्रिया, इसके सामने मत देखो। बोलो, क्या हुआ ? तुम कुछ बोलोगी तो मुझे मालूम होगा न ! मम्मी को फोन करूँ ?”

“नहीं पापा, मम्मी को परेशान मत करो। कोई बड़ी बात नहीं है, यह तो इनकी आदत है छोटी-छोटी बात को बड़ा रूप देने की।”

“वाह, मैं उसको बड़ा रूप दे देता हूँ ? मैं ? कल रात से तुम मुँह फुलाए घूम रही हो, मानो मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो, इसलिए मेरी ओर देखती भी नहीं। पापा, सच तो यह है कि मम्मी ने बहू को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है। और इसीलिए मुझ पर हुक्म चलाती है। देखो प्रिया, एक बात सुन लो, मेरे सामने फिजूल मगजमारी मत करो। तुम कमाती हो तो इसका रोब मुझ पर मत झाड़ो।” विराज का गुस्सा फिर बरसने लगा।

वे कुछ देर विराज के सामने देखते। यह घटना उनके स्वयं के घर में घट रही थी और इस परिवेश में वे स्वयं एक अनजान व्यक्ति की तरह मौजूद थे। इस घर में ऐसी भी घटनाएँ होती हैं ? पहले भी हुई होंगी ?

उन्हें घबराहट होने लगी। विराज को कुछ कहने के लिए गए, उसके पहले ही प्रियांशी बोल पड़ी, “सॉरी, विराज, तुम्हें अपना समझ कर मैंने अपना काम बताया था। तुम्हें यदि इसमें मेरा रोब दिखाई देता है, तो अब नहीं कहूँगी और कभी भी तुमसे मदद नहीं माँगूंगी।”

वह सिसकियाँ भरने लगी, “पापा, आज शाम को मेरे ऑफिस में ब्रांड सक्सेस का एक कार्यक्रम रखा है। मैं उस प्रोजेक्ट की लीडर हूँ और इसलिए आज मुझे वह अवार्ड मिलना है। फंक्शन में पहनने के लिए मैं नई साड़ी लाई थी और उसका ब्लाउज उस दरजी को सीने के लिए दिया था. जिसकी दूकान विराज की ऑफिस के पास के ही कांप्लेक्स में है। कल रात वह दर्जी शहर छोड़कर कहीं बाहर जाने वाला था, इसलिए मैंने विराज को विशेष रूप से याद करके मेरा ब्लाउज लाने के लिए कहा था और वे भूल गए। मुझे दुख हुआ, इसलिए मैंने कुछ नाराजगी बताई और उसमें ये उबल पड़े।”

“अरे यार, मैं कहाँ फुर्सत में हूँ। सत्तर प्रकार के तनाव हैं। काम में भूल गया, क्या करूँ, फाँसी पर लटक जाऊँ ?”

 “हाँ, बस आपको ऐसा उल्टा बोलना आता है। मेरी वस्तु लाना भूल गए, उसका कोई अफसोस नहीं।” दोनों के एक दूसरे के आमने-सामने आक्षेप लगाते हुए देखकर उन्हें हँसी आ गई, ये दोनों कैसी तुच्छ बात पर झगड़ रहे हैं ?

वे प्रियांशी को समझाने लगे कि बेटा दूसरी साड़ी पहन लेना। तब ही विराज बोल पड़े, “कपड़ों के इतने ढेर इकट्ठे कर लिए हैं, उसमें से कुछ भी पहन लो न यार, उस नई साड़ी पर क्या कुछ छाप लगाई है ?”

“बस, देखा न, पापा ? सलाह दे दी कि अन्य कुछ पहन लो। मुझे आपकी सलाह की कोई जरूरत नहीं है, विराज। मैं निपट लूँगी।”

“मुझे मालूम है कि तुम्हें मेरी सलाह की कोई जरूरत नहीं है। मेरा दिन बिगड़ दिया, यार ! तुम्हें तो आदत हो गई है, बात-बात पर कलह करने की।” विराज गुस्से में पुनः बूट पहनकर उनकी ओर नजर डाले बगैर निकल गया।

प्रियांशी आँसू पोंछते-पोंछते उसके कमरे में चली गई। बैठक-खंड शांत हो गया। मानो कुछ हुआ ही नहीं ! ऐसी ही शांति तो रहती है इस घर में, हमेशा। “वीरू-प्रिया क्या पहली बार ऐसे झगड़े होंगे ? दोनों की बात से लगता है कि पहले भी झगड़े होंगे, तो मुझे यह क्यों मालूम नहीं है ? अलका ने भी मुझे नहीं कहा ?”

वे अभी सोच ही रहे थे कि तब ही प्रियांशी तैयार होकर बाहर आई। “पापा, भोजन तैयार है। आप भोजन करने के बाद ही ऑफिस जाने के लिए निकलना। मैं आज शाम पाँच बजे आ जाऊँगी। आपकी और विराज की रसोई बनाकर, करीब सात बजे मैं निकल जाऊँगी। मैं तो अपना भोजन वहीं ले लूँगी।”

प्रियांशी उसका पर्स लेकर बाहर निकली। सेंडल पहन कर वापिस आई और दरवाजे के पास खड़ी रही। “पापा, आप चिंता नहीं करें। छोटी बात है। मैं रात में विराज के साथ बात कर लूँगी। और प्लीज, मम्मी से कुछ नहीं कहना, वे अनावश्यक चिंता करेंगी। चिंता में उनका बीपी बढ़ जाता है।”

“प्रिया बेटा, तुम दोनों ऊँचे ओहदे पर नौकरी करते हो, इतने परिपक्व हो। फिर भी इस प्रकार छोटे बच्चों की तरह झगड़ते हो, क्या यह अच्छा लगता है ? अलका ने तो मुझे कभी कहा नहीं कि तुम दोनों ऐसी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने लगते हो। विराज इतना गुस्सा करता है, यह भी मुझे पहली बार मालूम हुआ।”

“आपको परेशानी न हो, शायद इसलिए मम्मी ने नहीं कहा होगा। लेकिन विराज का तो यह हमेशा का है। वह अपने काम को ही अहमियत देता है और दूसरे लोगों को तो वह गिनता ही नहीं। बात मात्र मेरे ब्लाउज भूलने की नहीं थी, पापा। उन्हें सौंपा गया घर का कोई भी काम वे नहीं करते हैं। भूल गया, कह कर हाथ झटक देते हैं। मम्मी की बात को भी इसी प्रकार उड़ा देते हैं। क्या घर की इस प्रकार उनकी कोई जवाबदारी नहीं है ?”

एक ही साँस में बोलकर प्रियांशी कुछ रुकी। “इस समय जो हुआ, उसके लिए सॉरी। मम्मी की गैर-मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” धीमे से दरवाजा अटका कर वह चली गई।

“मम्मी की गैर मौजूदगी में आपको यह तनाव झेलना पड़ा।” यह वाक्य उन्हें काँटे की तरह चुभ गया।

“इस घर से संबंधित मामलों की सभी चिंताएँ मात्र अलका ही दूर कर सकती है ? वह अकेली ही इसे मैनेज करती है ? विराज इसी प्रकार का ख़राब व्यवहार करता है, उसके संबंध में मुझे कभी कहा ही नहीं ? उसका बीपी बढ़ जाता है ? डॉक्टर को बताती होगी ? दवा लेती होगी? प्रिया ने कहा की विराज सिर्फ अपने काम को ही प्राथमिकता देता है, वह मात्र विराज के लिए ही था या मेरे लिए भी था ? वह दर्जी के वहाँ जाना भूल गया, इसलिए वह झगड़ा करे, इतनी नादान तो प्रिया नहीं है। विराज द्वारा वह मुझे कुछ बताना चाहती होगी ? या अन्य कोई बड़ी बात होगी ?”

उन्हें कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। अलका को फोन करने की तीव्र इच्छा हुई। लेकिन फोन में कहना क्या ? “उसकी बहन की सेहत के बारे में कुछ जानकारी ले लूँ और कुछ इधर-उधर की बातें कर, प्रिया-वीरू के झगड़े के बारे में कहूँ ? नहीं, नहीं वे दोनों तो शाम तक इसका समाधान कर लेंगे और वह फिर अनावश्यक चिंता में अपना बीपी बढ़ा लेगी। वह दवाई ले गई होगी ? वह क्यों मुझे कुछ कहती नहीं है ?” भोजन करने की इच्छा ही नहीं रही। वे तुरंत कपड़े बदलकर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुए। दरवाजा लॉक करने के पहले घर में एक नजर घुमाई। यह घर अलका के कितने समाधान और कितनी पीड़ाओं को संग्रहित किए हुए है ?

 कार चलाते समय इन्हें विचारों में दिमाग घूमता रहा। वे याद करने लगे, अंत में अलका ने कब उनसे मदद माँगी थी ? या कोई जरूरी काम उन्हें सौंपा था ? अरे ऑफिस से लौटते समय घर का कोई सामान ले आने के लिए कहा हो, ऐसा भी कभी नहीं हुआ। घर या बच्चों से संबंधित कोई जवाबदारी अलका ने मुझे सौंपी ही नहीं ? या मैंने कभी ली ही नहीं ? उसे जब मेरी जरुर पड़ी होगी, तब उसने क्या किया होगा ? अन्य किसी की मदद माँगी होगी या उस काम को ही छोड़ दिया होगा ? विराज-विराली की स्कूल, कॉलेज, दोनों की शादियाँ, ओह! कितने कार्यक्रम और घटनाएँ हैं, जिनमें अलका को मेरी जरूरत पड़ी होगी ! लेकिन मैं तो कहीं था ही नहीं ! लेकिन उसने कभी कोई शिकायत भी नहीं की ?” उनकी छाती सिकुड़ रही थी| अलका वापस आए, तब यह सब कहना था, कई प्रश्न पूछने थे।

दिमाग पर जब बहुत जोर दिया कि कभी तो ऐसा हुआ होगा कि जब अलका ने उनसे मदद माँगी होगी। याद ही नहीं आ रहा था। मानस-पटल पर वर्षों पहले की एक रात उभर आई, जब अलका ने आँख में आँसुओं के साथ, पस्त आवाज में कहा था,

 “सुनो, वीरू-विली की सँभाल, घर के काम, इनमें मैं बहुत थक जाती हूँ। अम्माजी बिल्कुल मदद नहीं करती हैं और मदद नहीं भी करें, तब भी मुझे कुछ आपत्ति नहीं, लेकिन काम करते समय यदि जरा भी देर हो जाए, तो वह पूरा घर सिर पर उठा लेती हैं जोर-जोर से चाहे जो बोलने लगती हैं। उनके गुस्से से तो बच्चे भी डर जाते हैं। आप अम्माजी को कुछ समझाएँगे ?”

वे गुस्से से लाल हो गए थे, “अरे यार, मैं धंधे में ध्यान दूँ या घर में बैठकर औरतों की कलह को निपटाता रहूँ ? ऐसे छोटे-छोटे मामलों में मुझे हैरान मत करो। तुम अनपढ़ तो हो नहीं कि ऐसी मामूली-सी बातों में तुम्हें मेरी जरूरत पड़े। कुछ समझदार बनो, अपनी स्वयं की समस्याओं के लिए खुद समाधान ढूँढना सीखो। मेरे पास क्या कोई कम समस्याएँ हैं, जो तुम्हारे आगे-पीछे फिरता रहूँ ?” तब उन्हें अलका ने जो जवाब दिया था, उसने इस समय हथौड़ी की तरह दिमाग पर वार किया,

“मेरी भूल हो गई, जो मैंने आपसे मदद माँगी। अब मैं कभी आपको परेशान नहीं करूँगी| मेरी परेशानियों का समाधान मैं स्वयं ही ढूँढ लूँगी।”

उन्होंने विराज को फोन लगाया, “प्रिया की पार्टी शाम सात बजे है। पाँच बजे के पहले उसके मनपसंद रंग के रेडिमेड ब्लाउज के साथ डिजाइनर साड़ी ले कर घर पहुँच जाना।”

मूळ गुजराती कथा – समाधान  

मूळ लेखिका : डॉ. रुश्वी टेलर

संपर्क –  झाड़ेश्वर, भरूच (गुजरात)

मो. 9979880080

हिंदी अनुवाद : श्री राजेन्द्र निगम

संपर्क – 10-11, श्री नारायण पैलेस सोसायटी, झायडस हॉस्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद- 380059.

मो. 9374978556

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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