श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४० ☆

☆ आलेख ☆ ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बेटी की विदाई कितनी कारूणिक होती है, इसको शब्दों में तो बयां किया ही नही जा सकता है। मैंने अपनी कई बड़ी रचनाओं में इस भाव को सजाने और समझने की कोशिश की है। लेकिन बेटी के बिछुडन – वियोग भाव की गहराई इतनी है कि मै इसमे अपने शब्दों की रस्सी डालता जाता हूँ, डालता जाता हूँ, वह छोटी ही पड़ती जाती है।

बेटी के विदाई की बेला, बाबुल से बिछड़ने की, भाई से लिपटकर रोने की, चाचा ताई को याद करने की, सहेलियों के साथ मुस्कुराने की, गांव परिवार के लोगों के बीच हंसी की ठिठोली करने की, आदि आदि जीवंत दृश्यो के यादों को शब्दों में बांधने के लिए लेखक के पास शब्द कम पड़ जाते हैं।

बेटी अनेकानेक स्नेहिल रिश्तो को त्याग कर जब एक नए घर की ओर प्रस्थान करती है, एक नए आशियाने की ओर कदम बढ़ाती है तो उस वक्त उसके और उसके परिजनों के दिल की पीड़ा, उस माहौल में उठने वाले रुदन की ध्वनि कलेजे को फाड़ कर रख देती है।

बाबुल घर से निकलकर, पिया घर में पहुंचने तक, पुराने रिश्तों से निकल कर नए रिश्तों तक पहुंचने की कठिन यात्रा पर बेटी के कदम जब निकल पड़ते हैं तो इस वृत्तांत को लिखते लिखते लेखक कलम भी स्वयं रो पड़ती है है।

लेकिन मां-बाप की जीविषिका सिर्फ इस बात पर निर्भर होती है कि मेरी प्राणों से प्रिय सिया कहीं अन्यत्र नही जा रही है है बल्कि वह किसी अवधपति दशरथ नंदन राम की प्राण प्रिया और उनके कुल की लक्ष्मी बनने जा रही है तब जाकर ये आंसू कहीं थमते हैं।

विदाई की बेला पर न सिर्फ परिजन, पुरजन एवं परिवारजन आँखे नम हो उठती है, बल्कि बाबुल के घर के सामने खड़े नीम के पत्ते, घर के पीछे की क्यारी में खिले फूल, घर की चौखट, कुंवें की जगत, खूंटे से बधी गाय और बछीया, सदैव दरवाजे पर रहकर दुम हिलाने वाला कुत्ते आदि जैसे बेजुबान जीवों एवं ये तथाकथित निर्जीव कही जाने वाली चीजो को भी लेखक ने विदाई के इस वियोग पल में आंसू बहाते देखता है।

बेटी को विदा कराकर ससुराल की ओर डोली को ले जाने कहारों के बढ़ते कदमों के पद चाप को पीछे से देखकर और या फूलों से सजी हुई कार घूमते चक्को को धीरे-धीरे आंखों से ओझल होने के साथ फिर ही, एक दिन पूर्व शहनाई की धुन से गुजते घर में गजब का सन्नाटा पसर जाता है। मानो सबकुछ ठहर गया हो। यहाँ सबके जुबा से एक ही स्वर निकलता है कि वह चली गई, वह हम सब को छोड़ कर चली गई, अपने प्रीतम के घर गई। फिर मन में एक भाव आता है, मेरी बेटी..तुम जहां भी रहना, सदैव खुश रहना। जिस रूप में रहना, सदा खुश रहना। जब तुम्हें अपने इस घर की याद आए, बिना पूछे चली आना, क्योंकि यह घर तुम्हारा ही घर है और इस घर के दरवाजे सदैव तुम्हारे लिए खुले रहेंगे।

हां मेरी बेटी तुम्हें किसी बुलावे की जरूरत नहीं, तुम तब भी परिवार की एक अंग थी, आगे भी बनी रहोगी। तुम्हारा मायका तुम्हारा वही अपना पुराना किला है, जिसकी तुम जागीर रही हो। जिसमें चलकर तुम्हारे नन्हे पाँव बड़े हुए। बेटी तुम अपरोक्ष रूप से आज भी इस महल की मालकिन हो। बस तुम एक पुराने महल से अपने नये महल में ही गयी हो, सिर्फ इतना ही अंतर है। हाँ एक बात ध्यान रखना, अपने नए महल में जाकर हम सभी को कभी भी मत भूलना। यहाँ बैठा पूरा परिवार हर वक्त बस इस बात की चर्चा करता है कि तुम जहाँ भी रहो खुश रहना।

बेटी अपने बाबुल के घर से बेटी के रूप में तो विदा हो जाती है, और जब उसके कदम किसी नये घर में पड़ते हैं, तो वह उस घर की बहू बन जाती है। बस यह उसका एक नाम का परिवर्तन हुआ। जहां वह बेटी अपने अधिकारों के साथ अपने बाबा के घर में रह रही थी, वहीं वह बहु के अधिकारों के साथ श्वसुर या पति के घर रहने चली जाती है।

यहाँ उसे बहू के अधिकारों के साथ प्रीतम का घर मिलता है, जहां उसके मां-बाप के रूप में उसके सास श्वसुर मिलते हैं, रिश्ते का नाम बदलता है, कुछ थोड़े बहुत फर्ज के अलावा अन्य कुछ भी नही बदलता है।

पिता के घर से विदाकर बहु के रूप में आयी उस बेटी की एक चाहत होती है कि उसका पिता के घर में मिला प्यार, सम्मान और अधिकार तो किसी भी हालत में नहीं बदलना चाहिए, जो उसे एक बेटी के रूप में मिला हुआ होता है। ऐसा ही प्यार, सम्मान एवं अधिकार उसे बहू के रूप में पति के घर में मिलना चाहिए। वहीं उस बेटी के भी मन में ऐसा ही प्यार बना रहना चाहिए कि उसे इस नये घर में सास ससुर के रूप में माता पिता मिले हैं। उनके मान, सम्मान और स्वाभिमान का आदर उसी प्रकार हो जैसा माँ -बाप के प्रति था।

उसके भीतर इस बात गौरव होना चाहिए कि वह इस नये घर की कुलबधु होकर आयी है। पुत्र को तो केवल एक कुल की मर्यादा होने का गौरव प्राप्त होता है, वहीं कन्या दो कुलों की मर्यादा होती है। उसके ऊपर दो कुलों की मर्यादा को निभाने का दायित्व होता है।

यह तो जीवन का एक चक्र है जो कि अपनी धुरी पर घूमता है और पूरा घूम कर वहीं पहुंच जाता है, जहां से वह चला होता है।

बेटी ही बहू होती है और बहू ही बेटी होती है। बस बेटी से बहू के रूप में नाम परिवर्तन की यात्रा में एक मार्मिक पल आता है, जिसे हम विदाई की वेला कहते हैं। बेटी जो आज एक घर की बेटी के रूप में एक परिवार सदस्य होती है, बहु के रूप में दूसरे घर की सदस्य बनती है और फिर व्यस्कता की ओर बढ़ते हुए, उस घर की मालिकिन बन जाती है। फिर वह एक बेटी की माँ बनती है और पुनः उस अपनी जायी बेटी को बेटी के रूप में विदा करती है, जो किसी दूसरे कुल की बहु बनने जा रही होती है। यही वह सामाजिक क्रम है जो लगातार अनवरत चलता रहता है।

बस आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था के भीतर का आदर, प्रेम, सम्मान, मर्यादा, अधिकार, आदि नीति नियमों में कहीं भी घृणा द्वेष, लोभ असम्मान एवं अनीति का समावेश न हो। जब कभी ऐसा होता है तभी वहां सामाजिक व्यवस्था विद्रूप रूप में दिखाई देने लगती है। नहीं तो हमारी सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था को भारतीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। यही हमारी भारतीयता है, यही हमारे भारत की सांस्कृतिक व्यवस्था है। यही हमारे बहुरंगी फूलों से सजे गमले सदृश्य भारत की खुशबू है। भारतीय संस्कृति का एक संकल्प है कि उसे किसी भी भाषा, क्षेत्र, समुदाय, संप्रदाय मैं नहीं बदलना है और न ही यह बदलती है। हमारी भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का गान करती है और हमारे भारत को महान बनाती है

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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