श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४१ ☆
☆ आलेख ☆ ~ रिश्ते की भावभीनी खुशबू से सराबोर होते थे हमारे तीज, त्यौहार एवं संस्कृतियाँ ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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फेसबुक पर वायरल हो रहे इस वीडियो को देखकर मुझे अतीत की याद आ रही है। एक पिता का अपने पुत्री के के लिए सर पर चूड़ा एवं हाथ में दही का कमंडल लेकर जा रहा है। व वास्तव में यह भाउक कर देने वाली और अतीत को याद करने वाली आज के जमाने में विरले ही देखी जाने वाली तस्वीर है। यूट्यूब से जुड़े लोग इस तस्वीर के अलग मायने निकालते हुए, इसमें संभवत: कहीं कुछ देखते हैं, लेकिन मैं तो समझता हूं कि उन्होंने इस भावुक करने वाली तस्वीर को खींच कर, युवकों के लिए एक नई चीज और हम सबके लिए एक पुरानी याद जरूर ताज की है। एक पिता का पुत्री के प्रति कितना प्रेम हो सकता है और किस स्तर का हो सकता है यह इसमें स्पष्ट रूप से झलकता है। पुत्री के प्रति उसका स्नेह और श्रम साफ साफ देखा जा सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि आज के युग में यह प्रेम कही से भी कमतर है। लेकिन इस चित्र दिख रहा प्रेम, प्रेम की पराकाष्ठा है।
जैसा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अँचल में बेटी के यहां यहाँ तीज और खिचड़ी, भेजने की प्रथा है लेकिन दही और चूड़ा जो कि पूर्वांचल और बिहार में खिचड़ी का खास व्यंजन है इसे पहुचाने का सीधा-साधा अर्थ यह है कि हर पिता का या परिवार का उद्देश्य होता है कि यदि हमारे घर में दूध दही की प्रचुर मात्रा में है और कोई तीज त्यौहार है तो यह घर पर बनाए जाने वाला व्यंजन, अपने प्रियजन के पास तो जरूर पहुंचे।
यहां तक कि इसके अंदर जो प्रेम भाव होता है उसका मूल्य नहीं लगाया जा सकता। उस व्यंजन को ले जाने का खर्च बाजार से खरीद कर देने से कहीं ज्यादा हो जाएगा, लेकिन जो आनंद उसको लेकर पहुंचने में और उसे देने में है वह शायद रुपए पैसा या खरीद कर देने में तो बिल्कुल ही नहीं है।
पूर्व के काल में पिता अपने पुत्री के घर कुछ लेकर ही जाता था, वह कभी खाली हाथ जाता ही नहीं था। उसकी मंशा यह होती थी कि मैं वहां सिर्फ दूंगा ही दूंगा। मैं बेटी के यहाँ से कुछ भी नहीं लाऊंगा। यहां तक कि वह अपने बेटी के घर में भोजन भी नहीं करता था और अक्सर देखा जाता था कि यदि पिता बेटी के घर में एक रात ठहर गया तो बेटी या उसके ससुराल वाले किसी दूसरे के घर से भोजन – पानी मंगा कर भोजन कराते थी
हमारे तीज त्योहारों की मौलिकता कैसी है, जिसमें की एक पिता खाने पीने की चीज लेकर बिना शर्म किये सिर पर बोरी और हाथ में दही का कमंडल लेकर निकल जाता ही जाता है। यह प्राचीन परंपरा यद्यपि समाप्त की ओर बढ़ चली है, या यूँ कहें कि लगभग समाप्त ही हो चुकी है। पिता का बेटी के घर आना जाना बेटी का पिता के घर आना जाना किसी समय या किसी त्योहार पर आधारित नहीं है।
अब मैं आगे का जो दृष्टांत बताने जा रहा हूं इसे ध्यान से पढियेगा ओर समझिएगा। विगत दिनों में अपने गांव बलिया गया था और जब लौटने लगा तो मेरे ससुराल के लोगों ने घर का चुरा तिलवा लिया अच्छा आदि पैक करके हमारे साथ रखवा दिया। यानी मेरे घर इसी खिचड़ी परंपरा के अनुसार कुछ खाने पीने की चीज आ गयीं थी, जोकि पूर्ण रूप से घर की बनी थी, और इसमें गांव की खुशबू साफ-साफ देखी जा रही थी। पिछले 15 जनवरी को मकर संक्रांति यानी खिचड़ी का त्यौहार था। मेरे कार्यालय में भी अवकाश था। मेरी दो बेटियां हैं और दोनों बेटी दामाद लखनऊ में ही रहते हैं।
यद्यपि वायरल हो रहे इस चित्र को मकर संक्रांति के दिन तो मैंने फेसबुक पर नहीं देखा था, लेकिन न जाने क्या हुआ मेरे मन में इस बार आया, कि चलूँ, आज मकर संक्रांति के दिन है, थोड़ा चूड़ा, तिलवा ओर गुड़ दोनों बेटियों के लिए, लिए चलते हैं। इन्हीं विचारों के साथ दो छोटे-छोटे झोलों में यह सामग्रियां रखवाया और कार्य पर रखकर चल दिया। मैंने अपने पहुंचने की सूचना अपने बेटियों को नहीं दी थी। मैं उन्हें सरप्राइज रूप से यह गांव का बना हुआ उपहार देना चाहता था। यह वही प्रेम था जो प्रेम इस वायरस चित्र में उस वृद्ध व्यक्ति के अंदर अपने पुत्री के प्रति प्रदर्शित हो रहा है।
अब आपको सच बताऊँ, जिस समय मैं इस झोले को लेकर जा रहा था। उस झोले में रखें रसद का मूल्य तो कुछ नहीं था, लेकिन मेरा स्नेह अपरंपार था जिसे मैं अपनी कर से लेकर बेटी के घर जा रहा था। लखनऊ के इस पॉस एरिया में रह रही मेरी बेटी जहां ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं के बीच जहां रह रही थी, जहां आधुनिकता के पैमाने पार हो रहे थे। वहां जब मैं पहुंचा तो मेरी बेटी मुझे गले लगा कर, अपना स्नेह लूट रही थी, या मैं उसको स्नेह दे रहा था, मेरे सामने वही दृश्य उपस्थित हो रहा है, जो आज एक आप अपनी बेटी के लिए पैदल चूड़ा दही लेकर जा रहा है। जब मैंने अपनी बेटी को ये थोड़ा स्नेह देकर गले लगाया, तो मैंने महसूस किया कि आखिरकार बाप बेटी के बीच का स्नेह क्या होता है।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





