श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख  धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान।)

☆ अभिव्यक्ति # ११० ☆

☆  आलेख – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 बचपन से धार्मिक ग्रंथो में पढ़ते आए हैं, कि हनुमान जी ने बचपन में ही सूर्य को निगल लिया था, थोड़े बड़े हुए, तो शंका होने लगी, अभी भी बहुत से लोग अंधविश्वास कहते हैं और बहुत से लोग इसे आदिशक्ति कहते हैं. सनातन धर्म के मानने वाले, इस बात को ईश्वर की लीला कहते हैं, आखिर धर्म में ऐसा क्या बताया कि हम इसे नहीं मानते या मानते हैं, तो ईश्वरीय महिमा बताते हैं. धार्मिक कथाओं के दो स्तर होते हैं –

  1. श्रद्धा का स्तर
  2. ज्ञान का स्तर

वास्तव में हनुमान जी चेतना के प्रतीक हैं, और सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं, जब चेतना जागृत होती है तो वह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जब वह ज्ञान प्राप्त करने लगती है या ज्ञान प्राप्त करती है तो हम साधारण भाषा में कहते हैं कि उसने तो पुस्तकों को निगल लिया, घोंट लिया, पुस्तक ज्ञान का भंडार होती हैं, ज्ञान को निगल लिया, और इसी क्रम में आगे चला, यह शब्द कि, हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया, यह सिंबॉलिज्म है और यह बताता है कि हनुमान जी में जब चेतना जागृत हुई तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया और ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया. इसे प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो सारी बात समझ में आ जाती है.

सनातन धर्म की खूबसूरती यही है. वह कथा, प्रतीक और दर्शन को एक साथ लेकर चलता है..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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