श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रोंगटे ||।)

?अभी अभी # १०२९ ⇒ आलेख – || रोंगटे || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(GOOSE BUMPS)

हमारा शरीर भी विचित्र है। हमारी त्वचा में असंख्य रोमकूप हैं। जो भक्त होते हैं, उनके रोम रोम में राम व्याप्त होते हैं। हम जब अनजाने में, तनिक से स्पर्श से सिहर उठते हैं, तो ये भी अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें हम रोएँ भी कहते हैं।

हमारे रोमांच में रोम का बड़ा हाथ होता है। Rome was not built in a day.

भारतीय नाट्य शास्त्र में केवल भाव भंगिमा से ही मन में उत्पन्न सभी भावों का सजीव चित्रण किया जाता है। चेहरे पर संचारी भावों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन ही तो नृत्य है। जिनमें श्रृंगार, शांत, भय, रौद्र, वीर और वीभत्स रस भी शामिल है। कहीं नटवर है तो कहीं नटराज। वैसे भी तांडव नृत्य मंच पर ही देखना अच्छा लगता है।।

हम भी अजीब हैं। जब हमें गुस्सा आता है, तो हमारे तेवर देखिए और जब हम खुद डर जाते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानो उन्हें कक्षा में मास्टर जी ने जोर से डांटकर फटकारा हो, ऐ मिस्टर तुम ! खड़े हो जाओ। स्कूल में क्या नींद निकालने के लिए आते हो।

ये रोंगटे भी अजीब हैं। यूँ तो आराम से सोते रहेंगे, लेकिन जरा भी खतरे की घंटी बजी, तो खड़े हो जाते हैं, जैसे अफसर की घंटी से बाहर स्टूल पर ऊंघता चपरासी झट से आया साहब कहता हुआ खड़ा हो जाता है।।

क्या डर के मारे खड़े हुए रोंगटे किसी मास्टर जी के आदेश की प्रतिक्षा करते रहते हैं, कि ठीक है, बैठ जाओ, या खड़े ही रहते हैं। यह भी एक पहेली ही है। पहेली तो वैसे यह भी है कि ये संख्या में कितने हैं और इनकी आपस में एकता देखिए, मुसीबत में, या भय की स्थिति में, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। और जब संकट टल जाता है, तब सभी निश्चिंत होकर एक साथ चैन से बैठ जाते हैं।

आप भी कभी डरे होगे, आपके भी रोंगटे खड़े होते होंगे। कभी इनसे बात कीजिए, इनके हालचाल पूछिए। आप कैसे हैं मिस्टर रोंगटे ! इनकी संख्या कितनी है और ये शरीर में कहाँ कहाँ विराजमान हैं, इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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