श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रोबोट चौराहा…“।)
अभी अभी # १०९७ ⇒ आलेख – रोबोट चौराहा
श्री प्रदीप शर्मा
मालिक ने बनाया इंसां को, इंसान रोबोट बना बैठा! एक तरफ हमारी गृहिणियों पर काम का इतना बोझ है कि समझ में नहीं आता, वे इंसान हैं या मशीन ? वहीं दूसरी ओर इंसान ने मशीन पर भी इतनी ज़िम्मेदारी डाल दी है कि सड़क का ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए एक रोबोट को सड़क पर उतार दिया।
1957 की फ़िल्म नया दौर याद कीजिये! दिलीपकुमार और साथी हाथ। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। वहाँ सिर्फ आदमी था, मशीन नहीं थी। फ़िल्म उपकार तक देश में हल चलते रहे, रहट की आवाज़ में मनोजकुमार जवान भी बना और किसान भी। और फिल्में सोना उगलती रही।।
फिर सन् 1971 में प्रमोद चक्रवर्ती ने धर्मेंद्र और हेमा को लेकर एक फ़िल्म बनाई नया ज़माना। मजदूरों के शोषण और मशीनीकरण ने कम्युनिस्टों की कमर तोड़ दी। साहिर कहते रहे, दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं और मजदूरों की बस्ती पर बुलडोज़र चल ही गया। आज के सांसद, सनी की सांसद माता हेमा, और धरम पाजी की इस फ़िल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिये।
पुराने जमाने में गणित के सारे सवाल कुछ इस तरह के होते थे। चार मज़दूर एक गड्ढे को तीन रोज में खोदते हैं, तो एक मज़दूर कितने दिन में खोदेगा। इसे कहते हैं, खोद खोदकर सवाल पूछना। एक जेसीबी आ गई, और सारी खुदाई निकल गई।।
मुझे याद है, हमारे शहर में जेलरोड पर पहली बार ट्रैफिक वाली तीन बत्ती, यानी रोटरी लगी थी। चौराहे पर दर्शकों का ट्रैफिक जाम लग गया था। हरी, पीली, लाल बत्ती, ठहरिए, देखिये और चलिये! STOP, LOOK, PROCEED.
बाद में जब आदत पड़ गई, तीनों बत्तियों को बत्ती देकर निकलने लग गए। जिसका काम उसी को साधे। ट्रैफिक के सिपाही के चालान से ही ट्रैफिक कंट्रोल होता है, ट्रैफिक सिग्नल से नहीं।।
रोबोट और इंसान की अक्सर तुलना होती है। इंदौर के हाइकोर्ट तिराहे पर एक अकेला ट्रैफिक जवान रंजीत सिंह इतनी फुर्ती और मुस्तैदी से ट्रैफिक कंट्रोल करता था कि लगता था, यह इंसान नहीं रोबोट है। इसे बेस्ट ट्रैफिक कंट्रोल के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
ट्रैफिक तो कंट्रोल हो गया, लेकिन यह सिपाही खुद को कंट्रोल नहीं कर पाया। आजकल इसके सितारे भी गर्दिश में हैं।
वहीं दूसरी ओर शहर के रिंग रोड का एक व्यस्ततम चौराहा एक रोबोट के भरोसे ही छोड़ दिया गया है। इंदौर के इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों द्वारा निर्मित इस रोबोट में रंजीत सिंह जितनी फुर्ती भले ही न हो, लेकिन यह कभी चाय पीने अथवा पान खाने के बहाने अपनी जगह नहीं छोड़ता। गीता के निष्काम कर्मयोगी की तरह, ट्रैफिक की चिंता किये बगैर ट्रैफिक कंट्रोल किया करता है।।
लोग समझ गए हैं, रोबोट कुछ नहीं समझता! उसके पास न सीटी है, न ही कोई डंडा। जहाँ रोबोट खड़ा होता है, वहाँ चालान भी नहीं बनता। जहाँ रोबोट है, वहाँ सीसीटीवी कैमरा भी नहीं।
जो कायदे कानून वाले हैं, वे रोबोट को सम्मान देते हैं, शेष को रोबोट सम्मान देता है।
कभी कभी तो लगता है, यह रोबोट नहीं, किसी महापुरुष की मूर्ति है। लोग इसे देख रूकते नहीं, एक नज़र से निहारते हुए निकल जाते हैं, क्योंकि यह अक्सर निष्क्रिय रहता है। अगर प्रशासन रोबोट की ड्यूटी का समय लिख दे, तो शायद बात बने।।
ऐसे रोबोट के लिए तो बस इतना ही कहा जा सकता है, रोबोट अपना काम कर रहा है, और चौराहे पर जाम लगा है। एक पवित्र स्थल है रोबोट चौराहा! लोग उसे निहारते हुए, सम्मान देते हुए, बेधड़क, निःसंकोच, बेझिझक, बेधड़क, बेशर्मी से आते जाते रहते हैं, और ट्रैफिक के नये नियमों पर छींटाकशी किया करते हैं। वह रोबोट है, मोदी नहीं, कुछ नहीं करता, सब चुपचाप सहता रहता है।
हमें रोबोट नहीं, इंसान चाहिए, डंडा चाहिए, पर सख्ती नहीं, चालान चाहिए पर ज़बरदस्ती नहीं, दुनिया तो सुधरे, पर हम नहीं, क्योंकि हम किसी से कम नहीं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
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