श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कृष्ण-सुदामा।)

?अभी अभी # 560 ⇒ कृष्ण-सुदामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब भी आदर्श मित्रता की बात होगी, कृष्ण सुदामा का जिक्र अवश्य होगा।

कलयुग में आप इसे मित्रता की पराकाष्ठा कह सकते हैं। जिस तरह राधा कृष्ण का प्रेम अलौकिक था, उसी तरह यह मित्रता भी अलौकिक ही थी। जब राधा कृष्ण एक ही थे, तो कृष्ण सुदामा दो कैसे हो सकते हैं।

एक जिस्म दो जान एक कहावत बनकर रह गया है, और जिसे आजकल जुमले की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। दोस्ती कितनी भी पक्की हो, नि:स्वार्थ हो, दोनों मित्र एक दूसरे पर जान छिड़कते हों, सुख दुख में काम आते हों, लेकिन उनकी तुलना कृष्ण सुदामा से नहीं की जा सकती।।

A friend in need

is a friend in deed.

कृष्ण सुदामा बचपन के मित्र थे, सादीपनी आश्रम में साथ साथ पढ़े थे। कुछ उनकी ऐसी घटनाएं भी थीं, जहां सुदामा ने कथित रूप से अपने बाल सखा के हिस्से का भाग चोरी से स्वयं खा लिया था, जिसके फलस्वरूप उसे घोर आर्थिक अभाव और कष्ट में पूरा जीवन गुजारना पड़ा और अंत में मित्र कन्हैया ने ही उनका बेड़ा पार लगाया, जब द्वारका नगरी में उनका पुनर्मिलन हुआ।

कृष्ण लीला और अन्य कथाओं में भी सुदामा को अत्यंत दीन हीन, फटे हाल और कृशकाय दर्शाया गया है। बी आर चोपड़ा की महाभारत में भी सुदामा को एक गरीब ब्राह्मण ही बताया गया है। पर प्रश्न उठता है कि सुदामा क्या सिर्फ अपने मित्र कृष्ण के सखा थे। क्या उनकी श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और समर्पण मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम के भाई भरत से कम थी।।

जिन लोगों ने सुदामा चरित्र पढ़ा है, वे जानते हैं सुदामा का चरित्र चित्रण कथाओं में कभी श्रीकृष्ण के एक अनन्य भक्त के रूप में नहीं किया गया। कृष्ण सुदामा में सांसारिक मित्रता का आपस में कोई भाव नहीं था। सुदामा तो शबरी की भांति ही श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। कन्हैया कृष्ण अगर निष्ठुर थे, तो भक्त सुदामा भी कम नहीं थे। जो कृष्ण कभी वापस गोकुल और मथुरा नहीं लौटे, उनसे सुदामा ने कभी आशा ही नहीं की थी, कि वे कभी जीवन में अपने मित्र की सुध लेंगे।

लेकिन मित्र सुदामा को कहां अपनी सुध थी। भक्त विभक्त नहीं होता, अनासक्त होता है। यह भी श्रीकृष्ण की ही लीला थी कि उन्होंने अपने मित्र सुदामा की पत्नी को प्रेरणा दी और उन्हें द्वारका मुट्ठी भर चावल के साथ आने के लिए प्रेरित किया।

उसके आगे तो सब कृष्ण की ही लीला है जिसे हम गलती से मित्रता की पराकाष्ठा मान बैठे हैं।

कृष्ण सुदामा कभी दो थे ही नहीं, एक ही थे। भक्त कभी अपने भगवान से अलग हो ही नहीं सकता।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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