श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आनंद मठ।)

?अभी अभी # 606 ⇒ आनंद मठ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर आपसे पूछा जाए, आप सुखसागर में रहना पसंद करोगे अथवा आनंद मठ में, तो आपका क्या जवाब होगा। जाहिर है, सुखसागर में तो मोती ही मोती होंगे, और आनंद मठ में हो सकता हो, परमानंद हो, लेकिन वह एक मठ है, तो वहां का कुछ अनुशासन भी होगा, कानून कायदे भी होंगे। हमें स्वर्ग तो चाहिए, लेकिन अनुशासन नहीं। इसलिए किसी मठ से सुखसागर ही भला।

इसी तरह स्वर्ग और नर्क के ऑप्शन में सभी प्रविष्टियां स्वर्ग की ही पाईं जाती हैं, नर्क में तो लोगों को जबरदस्ती धकेला जाता है। रोजी रोटी के लिए कुछ कमाना और स्वर्ग के लिए पुण्य कमाना दोनों अलग अलग विषय हैं। सोचो साथ क्या जाएगा जो कहता है, वह क्या नेकी करके दरिया में बहा देता है। क्या करें, मरते दम तक नेकी नहीं छूटती।।

लेकिन हम चाहे किसी आनंद मठ में रहें अथवा सुखसागर में, ताजी हवा की तरह, दुख का झोंका भी जीवन में कभी कभी आता ही है। दुख अपना भी हो सकता है और पराए का भी। बिना बुलाया मेहमान होता है यह दुख, जो न समय देखता है न दिन रात। कोई आने की खबर, चिट्ठी पत्री नहीं, फोन, एसएमएस नहीं।

जब जीवन में सुख आता है तो हम उसका खुशी खुशी स्वागत करते हैं, हार फूल और बैंड बाजा बारात तक बात चली जाती है, लेकिन जहां अचानक गम की बदली छाई, हमें नानी याद आई। एकदम गले में सहगल उतर आते हैं, हाय हाय ये जालिम जमाना।।

लोगों ने उस दीनदयाल के दरबार में कितनी अर्जियां लगाई, दुख हरो द्वारकानाथ, कितनी आरतियां गाई, ओम जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे। प्रार्थना और प्रसाद से थोड़ा दुख जरूर कम हो जाता है लेकिन पूरी तरह जाने का नाम फिर भी नहीं लेता।

सुख पर दुख का शासन है अथवा दुख पर सुख का, यह जानना इतना आसान भी नहीं। लेकिन जहां भी सुखसागर अथवा आनंद मठ होगा, वहां दुख दर्द, करुणा, दया, और ममता का अनुशासन भी होगा। मीठे के साथ थोड़ा नमकीन भी। फूल के साथ कांटे भी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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