श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरी जान।)

?अभी अभी # 636 ⇒  मेरी जान… ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जी हां, मैं मेरी जान की ही बात कर रहा हूं। कभी मैं और मेरी मां, एक जिस्म दो जान थे, फिर एक समय ऐसा आया, जब मेरा भी जिस्म इस जहान में आया। दो जिस्म, एक जान, यानी एक नन्हीं सी जान, जिसे मेरी मां हमेशा अपने सीने से लगाकर रखती थी।

धीरे धीरे मैं बड़ा होने लगा, अपने आपको, और इस दुनिया को जानने लगा। जब मैं छोटा था, तो लोग मुझे जान से ज्यादा चाहते थे, हमेशा अपने गले से लगाए रहते थे। कहते थे, कितना प्यारा बच्चा है।।

खैर, मुझे बड़ा तो होना ही था, पढ़ लिखकर अपने पांव पर खड़ा तो होना ही था। मैं भी जी जान से मन लगाकर पढ़ता, क्योंकि मैं भी जानता था कि पढ़ लिखकर ही आदमी बड़ा बनता है, अगर वह नहीं पढ़ता, तो छोटा ही रह जाता है, अर्थात् जीवन में पिछड़ जाता है।

स्कूल हो, कॉलेज हो, अथवा घर, तब तक पूरे समाज में एक आवश्यक बुराई घर कर गई थी, फिल्म और फिल्मी गाने। घर में भी रेडियो बजता था और घर से बाहर निकलो तो रास्ते में जगह जगह सिनेमाघर, जिन्हें चलचित्र गृह भी कहते थे। अखबार में भी एक कॉलम आता था, आज के छविगृहों में।।

आप फिल्म देखें ना देखें, फिल्म के पोस्टर तो दिखाई दे ही जाते थे और फिल्मी गानों से भला कौन बच सकता था। हम भाई बहन भी गाते रहते थे, इचक दाना, बिचक दाना, दाने ऊपर दाना। और जब आवारा हूं जैसे गाने जबान पर चढ़ जाते, तो पिताजी नाराज भी होते थे, यह क्या सीख रहे हो आजकल ?

कॉलेज का माहौल तो बिल्कुल फिल्मी ही था।

लड़के लड़कियां सज धजकर कॉलेज आते, कोई पढ़ने तो कोई मौज मस्ती मारने। कॉलेज में कुछ के दोस्त बने तो कुछ की गर्ल फ्रेंड भी। लेकिन अपनी जान हमेशा अकेले ही रहे क्योंकि हमें कुड़ियों को दाना डालना नहीं आता था।।

एक नन्हा सा दिल तो खैर हमारी जान में भी था, जो हमेशा धड़कता रहता था। अक्सर फिल्मी गानों में मेरी जान का जिक्र होता रहता था। वो देखो, मुझसे रूठकर मेरी जान जा रही है। कहीं यही जान जिया बन जाती थी। जिया ले गयो रे, मोरा सांवरिया। कहीं अनाड़ी बलमा तो कहीं जुल्मी सांवरिया।

हम भी जानते थे, यह केवल फिल्मों में होता है, असली जिंदगी कुछ अलग ही होती है। खैर, नौकरी लगते ही हमारी शादी भी तय हो गई। हमारी एक जान थी, अब दो हो गई। मैं और मेरी जान। आप अपने होने वाली जान को चाहे जानें अथवा ना जानें, वह तो अब आपकी जान हो ही गई। जान ना जान, मैं तेरी सात जन्मों की मेहमान।।

अब पिछले ५० वर्षों से हम एक दूसरे को जान रहे हैं।

वह मुझे जान से ज्यादा चाहती है, मेरा मुझे नहीं पता। मुझे अपनी जान की चिंता ज्यादा है। मेरी जान और अपनी जान, यानी फिर पहले की तरह हम दो जिस्म एक जान हो गए। लेकिन इस बार जिस्म भले ही अलग हो, जान तो एक ही है। मेरी जान।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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