डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’
(पूर्णिका’ के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)
☆ आत्मकथ्य – विचार (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
विचार मंथन करने से मैं अनुभव करता हूँ कि सृष्टि में कोई भी व्यक्ति किसी भी गुण- ज्ञान या विषय में पूर्णा-पूर्ण नहीं हुआ है और यदि ऐसा हुआ है तो वह देव तुल्य हो गया है या हो जाता है। तब आपका ‘प्रेम’ मानता है कि इस विचार में जो भी मैंने पूर्णिका (ग़ज़ल) गीत और काव्य रचे (लिखे) है, वो सभी नियम-धरम का पालन कर लिखे गये हों अर्थात इन रचनाओं पूर्णिका उर्दू में कामिल, गीत लेखन के नियम-धरम का पालन हुआ हो कहना उचित प्रतीत नहीं होता। यह मैं स्वतः स्वीकार करता हूँ कि काव्य लेखन के नियम-धरम में चूक हुई होगी, किन्तु इस पुस्तक “विचार” में समाहित ‘ग़ज़ल’ जिसे मैं हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहता हूँ इसे ही उर्दू में ‘कामिल’ कहा जा सकता है। और तब मैं कह सकता हूँ कि इस पुस्तक में प्रकाशित पूर्णिका (कामिल), गीत और कवितायें पूर्णरूपेण सशक्त रचनाएं हैं और ये सीधे-सरल शब्दों में विचार से ओतप्रोत हैं ।
विचार आप तक पहुँचाना चाहता हूँ कि आखिर मैंने ग़ज़ल को ‘पूर्णिका’ नाम क्यों दिया है। तब मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने ग़ज़ल को जो पूर्णिका कहा है वह पूर्णरूपेण सत्य-सही, उचित एवं न्यायसंगत है। वह इसलिये कि पहले ग़ज़ल स्त्री-पुरुष, प्रेमी-प्रेमिका के हाव-भाव, भाव-भंगिमा, अंग-प्रतंग, चाल-चलन, सुन्दरता, त्याग-तपस्या पर कही जाती थी। जैसे कि अरेबिक, इंगलिश डिक्शनरी के अनुसार ग़ज़ल का मूल अर्थ ‘प्रेमोपासना’ करना अथवा ‘नारी से प्रेम करना’ है। फारसी शब्दकोश के अनुसार ‘वह बात जो औरतों के या उनकी तारीफ़ के सम्बन्ध में कही जाय।’ उर्दू शब्दकोश के अनुसार ‘मासूक की महबूब से या सम्बन्धित बात करना।’ अब ग़ज़ल जिसे मैंने ‘पूर्णिका’ कहा है (उर्दू वाले “कामिल” कह सकते हैं) या कहता हूँ स्त्री-पुरुष के संबंध में ही नहीं बल्कि गरीबी, अमीरी, सुख-दुख, जन्म-मरण अथवा यों कहूँ कि अब ये समस्त विषयों पर कही रची, लिखी जा रही है । तब इसे ‘ग़ज़ल’ कहना इसके साथ अन्याय प्रतीत होता है।
इसलिये ‘प्रेम’ का विचार है कि अब ग़ज़ल को ‘कामिल’ उर्दू में, हिन्दी में ‘पूर्णिका’ कहना चाहिये अतएव मैं दृढता से ‘’विचार’ व्यक्त करता हूँ कि मैं ‘ग़ज़ल’ कोपूर्णिका कहता हूँ उर्दू वालों को ‘कामिल’ कहना चाहिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप भी मेरे इस ‘विचार’ से सहमत होंगे।
विचार करने के पश्चात् ‘प्रेम’ समझता है कि शायद इस पुस्तक‘विचार’ में सम्मिलित गीत, पूर्णिका या काव्य रचने में, नियम-धरम का पालन करने में सफल न हुआ हो फिर भी ‘प्रेम’ को पूर्ण विश्वास है कि वह इन रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त अधिकांश विषयों पर सहज, सरल रूप से अपने विचार से अवगत कराने में सफल है। विचार अभिव्यक्ति के उपरान्त ‘प्रेम’ प्रेम के साथ आग्रह करता है कि ‘विचार’ में संग्रहीत रचनाओं को पाठकगण अवश्य पढ़ें और आनंद उठायें। अपने व्यस्त समय के कुछ समय निकालकर इसके कलेवर में भी झाँकें साथ ही रचनाओं के गुण-दोषों के संबंध में शीघ्र ही मुझे अवगत करायें। आप के सुझावों और प्रतिक्रियाओं की मुझे उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी।
एक पूर्णिका
आँख वालों को वो ही रास्ता दिखाता है
बिना जो आँख के दुनिया को नजर आता है
*
नया कुछ करके दिखाने की बात आये तो
बिना कमान के ही तीर वो चलाता है
*
मौत भी गोद में न उसको सुला पाती है
जो शख्स लौट के मरघट से घर को आता है
*
आज जब शुद्ध तेल, घी नहीं मयस्सर है
शहीद के बुत पे वो अपना लहू जलाता है
*
खुद एक रोटी ही पाता है दाल थोड़ी सी
न जाने किसको खिला के वो खिलखिलाता है
*
जो आदमखोर है दहशत है जिससे दुनिया को
पकड़ के कान वो उस शेर को बिठाता है
*
‘प्रेम‘ ने रंग ही बदरंग कर दिया उसका
जो अपने रूप से दुनिया का मुँह चिढ़ाता है।
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© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’
पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट
संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004
मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







