स्व. डॉ गायत्री तिवारी
☆ पुरस्कृत कहानी – कोबरा – स्व. डॉ गायत्री तिवारी ☆ साभार – डॉ. भावना शुक्ल ☆
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मेरी नियुक्ति ग्रामीण क्षेत्र के एक स्कूल में हुई। मन निराशा से भर उठा। विवशता थी, जाना ही पड़ा। कम आबादी वाले तीन गाँव पास-पास थे, जैसे शहर में मुहल्ले होते हैं। जिस गाँव की आबादी कुछ ज्यादा थी, वहाँ स्कूल खोला गया था। मैं जैसे तैसे गाँव पहुँची। स्कूल का पता लगाया। स्कूल क्या था मालगुजार के ढोरों की सार थी। आधी जगह में जानवर बँधते और आधी जगह में पहली दूसरी के बच्चे बैठते। स्कूल नाम की जगह में दस-बारह बच्चे बैठे थे। एक सज्जन एक टूटी कुर्सी पर बैठे कुछ पढ़ा रहे थे। मुझे देखते ही वे हडबड़ा कर उठे, गनीमत थी कि कुर्सी से गिरे नहीं। मैंने अपना परिचय दिया। देखा कि उनके चेहरे का भाव बदल रहा था। लगा कि मुझे देखकर उन्हें जो गलतफहमी हुई थी, वह दूर हो गई है। और वे आश्वस्त हो गये हैं। बोले- “यही स्कूल है, और मैं हूँ हेडमास्टर, ठाकुर रामसिंह। मूँछें गवाही दे रही थीं कि वे ठाकुर हैं। मेरी समझ में नहीं आया कि वे ‘हेडमास्टर’ पर जोर दे रहे हैं या ‘ठाकुर पर’। बाद में समझी कि वे ‘ठाकुर पहले हैं और हेडमास्टर बाद में। बहरहाल आदमी भले थे, भले न होते तो अपने प्रभाव से मुझे किराये का मकान न दिलवाते । उन्होंने तत्परता के साथ गाँव में जगह तलाशी। सिफारिश की। और मुझे रहने का ठिकाना मिला। दूध, अनाज, किराना और साग सब्जी कहाँ से और कैसे मिलेगी, यह बताना भी नहीं भूले। मेरे भले की उन्हें फिक्र थी सो समझाइश दी कि मैं मालगुजार साहब से रामजुहार कर लूँ। वे इतना कह के नहीं रह गये, मुझे मालगुजार की बखरी तक ले भी गये। मालगुजार यानी बड़े ठाकुर। साठ-पैंसठ की उम्र, कानों तक खिंचे गलमुच्छे। देखकर डर सा लगा। लेकिन उनकी बोली की मिठास से मैं अभय हो गई। बोले-“बेटी, कोई तकलीफ हो तो बता देना। हाँ, एक बात समझ लेना, नीच जातों को मुँह मत लगाना।”
मैं ठाकुर साहब की सीख लेकर लौटी और दूसरे दिन से अपने काम में लगने की कोशिश करने लगी। स्कूल बनाम ढोरों की सार में बैठना शुरू हुआ। गोबर की गंध, मक्खी, मच्छर, चीटी और जानवरों की आवाजाही के माहौल से सिर भन्ना उठा। मैनें हेडमास्टर साहब से कहा तो बोले- “बात ठीक है, लेकिन हम क्या कर सकते हैं?” मैनें कहा- “कम से कम मालगुजार साहब से निवेदन तो कर सकते हैं।” शाम के धुँधलके में हम बखरी पहुँचे। आगे मैं, पीछे हेडमास्टर। बखरी की परछी में तख्त पर ठाकुर साहब विराजमान थे। हेडमास्टर उनके सामने दंडवत हो गये। मैंने नमस्ते की। उन्होंने प्रश्नवाचक मुद्रा में मेरी ओर देखा। फिर स्वर में भलमनसाहत उड़ेलते हुए कहा-” आइये, बैठिये।” मैंनें इधर उधर देखा। बैठने को कुछ नहीं था। मैनें कहा- “बस ठीक है। मैं तो यह अर्ज करने आई थी कि यदि आप जानवरों को दूसरी जगह बाँधने का इंतजाम कर, पूरी दहलान स्कूल के लिये दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।” बड़े ठाकुर कुछ क्षण चुप रहे फिर कारिन्दे को बुलाकर पूछा- “क्यों रे, बखरी के पीछे के दो कमरों में क्या रखा है?” “अंगड़-खंगड़ भरा है, सरकार।” हूँ। वा को खाली कराके स्कूल वालों को दे दो। फिर मेरी ओर देखकर कहा- “बोलो अब तो खुश हो न?” मैंने कृतज्ञता व्यक्त की और विदा लेकर लौट पड़ी। आगे मैं पीछे हेडमास्टर। लेकिन उनका स्वर बदला हुआ था। लग रहा था कि मैं हेडमास्टर हूँ और वे मेरे मातहत। नयी जगह ठीक ठाक थी। खिड़की दरवाजे थे। दो कक्षाओं के लिये काफी जगह थी। मालगुजार के हुक्म से एक सफाई वाली बाई रोज स्कूल के बाहर साफ-सफाई कर जाती। कमरों में झाडू लगाने का काम परम्परागत रूप से बच्चे ही करते। सफाई वाली बाई के साथ एक लड़का भी आता था जो सफाई में हाथ बटाता और फिर कक्षा के दरवाजे से टुकुर-टुकुर भीतर की ओर ताका करता। एक दिन ध्यान गया कि बाईं तो चली गई हैं लेकिन लड़का नहीं गया। वह दरवाजे पर ही जमा है।
मैंनें उसे बुलाया। वह मेरी ओर भौंचक सा देखता रहा। मैंने कहा- “इधर आओ।” उत्तर मिला- “हम नई आय सकत। मैं कुछ पूछती इसके पहले ही क्लास के बच्चे चिल्ला पड़े वो हमें छू नई सकत। मैं दूसरे ही क्षण आसमान से जमीन पर आ गई। सोचा-“अरे ये शहर नहीं गाँव है, जहाँ अभी भी छुआछूत जारी है।” मैं अपनी जगह से उठकर दरवाजे पर आई और पूछा- बेटा, तुमाओ नाम का है? “कोबरा।” कोबरा। यह कैसा नाम है, मैं सोचती रह गई। फिर पूछा- “तुम पढोगे?” “पढ़ने तो है मनो…… मोय गिनती सोइ आत है।” “कहाँ सीखी?” “इतइ, आप औरन पढ़ात हो, सुन खें याद हो गई।” मुझे लगा कि लड़का प्रतिभाशाली है। उसकी मां से बात की। उसने बताया- हेडमास्टर साब से कही हती। बे कहन लगे का करहौ पढ़ा कें। बॉमनों ठाकुरों के लड़कों के साथ जो कैसे बैठ है ? “कोबरा नाम का इतिहास भी पता चला कि जिस दिन लड़का पैदा हुआ था, बाप को साँप ने डस लिया था। जिज्ञासा हुई कि फिर क्या हुआ? “का होतो। सालभर बाद मोहे दूसरे घर बैठने पड़ो। ए को दूसरो बाप सोइ ढंग को नईया, खूबई नसाखेरी करत है।” मैं समझ गई कि स्थिति विकट है। मैं फिर बड़े ठाकुर के दरवाजे पहुंची। लडके के बारे में उन्हें बताया। वे विद्रूप स्वरों में बोले- हम आपको मना नहीं करते। आप उसका नाम लिख लें लेकिन उसे दरवाजे के बाहर रखें, हमारे लड़कों के साथ न बैठायें। मैंने कहा- “मनुष्यता के नाते……..” वाक्य पूरा होने से पहले ही बडे ठाकुर गरजे काहे की मनुष्यता अरे ये सब साँप हैं, कोबरा हैं, कोबरा। मैं चाहती तो बहस कर सकती थी लेकिन बहस से बात और बिगड़ती। मैं चली आई। मैंने कोबरा का नाम दर्ज किया। कोबरा का नाम विवेक मानव रख दिया।
मैं कई साल गाँव में रही। स्कूल मिडिल तक हो गया। दुक्खम-सुक्खम विवेक पढ़ता बढ़ता गया। उसकी पढ़ाई का कुल खर्चा मैं ही उठाती रही।
आठवीं के बाद दिक्कत आई। विवेक पढना चाहता था। मैंने उसे नागपुर भिजवा दिया। एक परिचित उसे छात्रवृत्ति देने लगे। इधर मैं दिल्ली चली गई।
फिर बैंगलोर । विवेक ने मेट्रिक किया, तब तक उसके पत्र आते रहे। फिर व्यवधान पड़ गया ।
वर्षो बाद की बात है । मुझे आकस्मिक रूप से जबलपुर से भोपाल जाना था। स्टेशन पहुँचकर टिकिट तो ले ली किन्तु रिजर्वेशन न होने से चिंतित थी ।
सोचती विचारती प्लेटफार्म के बुकस्टाल के पास खड़ी हो गई ।
कुछ तभी एक सुदर्शन व्यक्ति सामने आकर खड़ा हो गया। उसने एक क्षण मेरे चेहरे को देखा और दूसरे ही क्षण पाँव छूने झुक गया।
मैं अचंभित थी। सोचा-पता नहीं कौन है? शायद किसी रिश्तेदार का पुत्र हो, शायद मेरा कोई पुराना विद्यार्थी हो ।
ऊहापोह के बीच स्वर झंकृत हुआ- “माताजी, मैं तो आपको पहचान गया। आपने मुझे पढ़ाया है। आज जो भी हूँ आपकी ममता से बना हूँ।
मैंने पहचानने की कोशिश करते हुए कहा- “सूरत काफी बदली हुई लग रही है, नाम भी याद नहीं आ रहा?”
“जी, मैं विवेक मानव हूँ विवेक मानव, नाम ने अतीत के दृश्य स्मृति पटल पर उकेर दिये ।
आप कहाँ जा रही हैं?”
‘जाना तो भोपाल है लेकिन रिजर्वेशन नहीं है । “
विवेक तत्परता से बोला- ” कोई बात नहीं। आप ‘एस फोर’ में जाकर बैठिये। मैं अभी आया । “
मैं डिब्बे में बैठ गई। थोड़ी देर बाद दरवाजे के सिरे पर कालाकोट दिखाई दिया। और विवेक का अभी पता नहीं था ।
टिकिट चेकर जब लगभग पास आया तब मैं किंचित आश्चर्य और प्रसन्नता से भर उठी। अरे, यह तो ‘विवेक’ है।
चेकिंग पूरी कर विवेक मेरे पास आया । और टिकिट चेकर की सीट के पास, एक बर्थ मेरे नाम एलाट कर दी।
ट्रेन में जितनी बातचीत संभव थी, हमने की। सुबह ट्रेन भोपाल पहुँची। मैंने बैग सम्हाँला ही था कि विवेक बोल उठा-लाइये मुझे दीजिये। पहले आपको मेरे साथ चलना है, मेरे घर। दो घंटे बितालें फिर आप जहां कहेंगी पहुँचा दूँगा। विवेक के प्रेमाग्रह ने मुझे विवश कर दिया। विवेक ने आटो किया। हम लगभग चालीस मिनट में घर पहुँचे। घर के दरवाजे पर ताला बंद था। विवेक ने पर्स से चाबी निकालकर दरवाजा खोला। छोटा सा घर था। साफ सुथरा। सजा संवरा। मैंने पूछा-“बहू और बच्चे?” “तीनों जन अपने अपने स्कूल गये होंगे। आपकी बहू भी टीचर है।” मैं सोफे पर बैठी थी। विवेक चाय लेकर आ गया। फिर कहा- “बाथरूम सामने है, आप नहाकर आराम करें, तब तक सब लोग आ जायेंगे।” मैंने स्नान पूजन किया और लेट गई। सफर में थकान के कारण झपकी लग गई। अकस्मात लगा कि कोई कुछ कह रहा है। विवेक मुझे जगा रहा था। “उठिये, भोजन तैयार है।” तभी गुड़िया-सी बहू ने पाँव छुए। नाती और नातिन भी आ गये। बड़े प्यारे बच्चे थे। भोजन करते-करते विवेक ने अपनी पत्नी और बच्चों से कहा- “मैं हमेशा इन्हीं माताजी की चर्चा किया करता था। ये मेरी गुरू भी हैं और माता भी। इनकी कृपा न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता।” पढ़े लिखे, नौकरी में लगे, घर परिवार वाले विवेक को देखकर हदय प्रसन्न हो रहा था। मैं सोच रही थी कि ‘मानव’ को ‘कोबरा’ नहीं ‘विवेक’ बनना चाहिये। नहीं, नहीं, शायद भेद मूलक व्यवस्था को समाप्त करने के लिये ‘मानव’ को ‘कोबरा’ भी बनना चाहिये।
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स्व. डॉ. गायत्री तिवारी
साभार – डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक… प्राची
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






मां बेहतरीन पुरस्कृत और पसंदीदा कहानी है मन को शत-शत नमन
मनुष्यता के स्वरूप को दर्शाती कथा। बहुत सुंदर।
एक प्रेरणादायक कहानी जो सत्य के बेहद करीब है