श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत. भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “कलमुँही“.)
☆ कथा कहानी ☆ कलमुँही — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
कभी उसकी सास उसे इसी नाम से पुकारती थी , और इस नाम से वह इतनी अधिक परिचित हो गई थी, कि वह अपना सही नाम ” सपना ” भूल चुकी थी . इस कलमुँही नाम पड़ने की भी एक कहानी है. उसे याद आता है कि जिस दिन वह कैलाश के साथ ब्याह कर , अपने गाँव बछवारा से यहाँ आयी थी तो सास लक्ष्मी देवी ने घर के दरवाजे पर पचासों औरतों के साथ उसकी अगवानी बड़े धूम- धाम से परम्परागत धार्मिक विधि से किया था. परिवार में पति कैलाश के अलावा, उसका छोटा भाई लखन और छोटी बहन तारा थी. ससुर छोटेलाल की किराने की एक दूकान थी और उनके पास कुछ खेती भी था. कैलाश स्वयं एक सरकारी आफिस में लिपिक के पद पर काम करते थे. घर में कुछ कमी तो नहीं थी, लेकिन सम्पन्नता भी नहीं थी. परिवार में सब कुछ ठीक था.
लेकिन शायद विधाता को सपना का यह सुखी जीवन रास नहीं आ रहा था. ससुर छोटेलाल को एक दिन खूब जाड़ा देकर तेज बुखार आ गया. सपना ने इण्टर तक की पढ़ाई किया था और उसे यह समझते देर नहीं लगी कि उसके ससुर को मलेरिया हो गया है. शाम को जब कैलाश आफिस से घर आये तो उसने कहा कि बाबूजी को तुरन्त डाक्टर को दिखाईये, बाबूजी को जाड़ा देकर बुखार आया है और यह मलेरिया का ही लक्षण है. कैलाश बोला ठीक है, कल कस्बे के डाक्टर से दिखाते हैं, अभी तो रात हो गया है, और गाँव में किसी के पास कोई मोटर भी नहीं है. सपना बोली बात तो आप सही कह रहे हैं, ठीक है सुबह ही दिखाने ले जाईयेगा. इतने में सास लक्ष्मी देवी किसी के यहाँ से कोई जड़ी-बूटी ले आयीं और बोलीं कि बहु इसका काढ़ा बना कर अभी पिला दो और रात में एक बार और पिला देना. सपना करती भी क्या? कोई विकल्प नहीं था, उसने काढ़ा बना कर छोटेलाल को दिया. काढ़ा पीने के बाद छोटेलाल को कुछ राहत अनुभव हुआ और बुखार भी कुछ कम हुआ. लेकिन सपना जानती थी कि मलेरिया में बुखार घटता- बढ़ता रहता है. उसने कैलाश से कहा भी कल बाबूजी को डाक्टर के पास ले जाईयेगा. कैलाश ने कहा कि हाॅं, कल ले जाऊंगा. दूसरे दिन छोटेलाल का बुखार एकदम उतर गया, तो छोटेलाल ने खुद ही कहा कि मैं किसी डाक्टर के पास नहीं जाऊँगा, मैं अन्दर से ठीक महसूस कर रहा हूँ. कैलाश कहता भी तो क्या कहता!
लेकिन रात होने के साथ फिर ठंडक के साथ छोटेलाल को तेज बुखार चढ़ गया. फिर वही काढ़ा बना कर छोटेलाल को पिलाया गया . बुखार तो उतर गया, लेकिन अन्दर से कमजोरी थी. दूसरे दिन भी छोटेलाल ने डाक्टर के यहाँ जाने से मना कर दिया और लक्ष्मी ने भी कहा कि बैद्य जी की दवा से समय लगता है, लेकिन ठीक हो जाता है. कैलाश और सपना, डाक्टर के चलने के लिए कहते रह गए, लेकिन छोटेलाल और लक्ष्मी तैयार नहीं हुए. खैर कैलाश भी कुछ ज्यादा बोल नहीं पाया और बेचारी सपना! वह तो बहु ही थी, वह क्या बोलती! दो – तीन दिनों के बाद छोटेलाल की तबियत बहुत अधिक बिगड़ गई और कैलाश उन्हें जबरन कस्बे में डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर ने जब पूरी तरह निरिक्षण किया तो बोला ठीक है मैं दवा करता हूँ, बाकी ईश्वर के हाथ में है, क्योंकि आप इन्हें लाने में पहले ही काफी देर कर चुके हैं.
दो दिनों के बाद छोटेलाल की हालत काफी बिगड़ गई और देर रात छोटेलाल को अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी. डाक्टर ने तत्काल आक्सीजन का मास्क लगा कर और जीवन रक्षक दवाईयों को देकर बचाने का प्रयास किया, लेकिन चार घंटों के सतत् संघर्ष करने के उपरांत भी छोटेलाल के प्राण पखेरू इस संसार को छोड़ कर चल दिए. कैलाश के परिवार पर मानो व्रजपात हो गया. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मामूली सा मलेरिया का बुखार किसी के मृत्यु का कारण भी हो सकता है! लेकिन सत्य यही था. किसी प्रकार से गाँव खबर भेजा गया. लक्ष्मी और सपना और दोनों भाई- बहन लखन और तारा रोते हुए अस्पताल पहुंचे. खैर लोगों ने समझाया कि जो होना था, वह तो हो गया! होनी को कौन टाल सकता है! गाँव के अन्य बड़े- बुर्जुगों ने परिवार को धीरज दिलाया और छोटेलाल के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था किया गया. छोटेलाल का अन्तिम संस्कार करने के बाद सब लोग घर वापस आये. किसी के पास कुछ कहने के लिए तो था नहीं.
खैर समय तो रुकता नहीं! धार्मिक विधि से सारे कर्म करने के कुछ दिनों बाद कैलाश अपने आफिस जाने लगे. घर का सारा काम सपना ही करती थी. लक्ष्मी सामान्यतः हमेशा गुमसम ही रहती थी. इसी बीच में गाँव की कुछ बूढ़ी औरतों ने लक्ष्मी को सहानुभूति दिखाने के चक्कर में एक नयी बात छेड़ दिया. वे बोलीं कि लक्ष्मी देखो, अभी कैलाश के शादी के एक वर्ष भी नहीं बीते कि घर के मुखिया का देहांत हो गया. तुम्हारी बहु सपना कलमुँही है. पहले तो लक्ष्मी ने इन बातों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया, लेकिन बार – बार यही बात सुनने पर, उसके मन में भी यह विश्वास हो गया कि वास्तव में बहु सपना कलमुँही है और एक दिन बातों ही बातों में उसके मुँह से निकल ही गया कि तू आते ही मेरे पति को खा गयी. तुम परिवार के लिए कलमुँही हो!
सपना तो यह सुनते ही स्तब्ध हो गई. कुछ बोलते नहीं बना, क्या जबाब दे! रात में उसने यह बात कैलाश को रोते – रोते बतायी. कैलाश ने कहा जाने दो, माँ पर दुख का पहाड़ टूट गया है, इसिलिए उलूल- जूलूल बातें किया करती हैं, ध्यान मत तो उनकी बातों पर. ननद तारा ने भी समझाया कि माँ का बाबूजी के देहांत के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ गया है.
छोटेलाल जी के देहांत के समय ही सपना पांच महीने के गर्भ से थी. छोटेलाल जी के देहांत के उपरांत सपना तो दुखी थी ही, पूरा परिवार भी दुखी था, जिसके कारण सपना ने अपनी अवस्था का ध्यान नहीं रखा कि वह गर्भवती है और उसे अपने गर्भ में पलने वाले शिशु का ध्यान रखना चाहिए. इस बीच उसने एक- दो महीने डाक्टर को भी नहीं दिखाई और दवाईयां खाने में भी उससे काफी लापरवाही हो गयी. एक दिन रात में अचानक सपना को पेट में काफी तेज दर्द हुआ. सपना कैलाश से बोली कि मुझसे दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है, मुझे डाक्टर के पास ले चलो. संयोग से उसी दिन पड़ोस में एक शादी थी और बारात में कईं गाड़ियां आयी थी. पड़ोसी को जब सपना के बारे में पता चला तो उसने कैलाश से कहा कि मैं तुम्हें गाड़ी दे रहा हूँ, मेरे बेटे को गाड़ी चलाने आता है, वह तुम्हें ले जायेगा. कैलाश सपना को लेकर कस्बे के लेडी डॉक्टर ( जिससे वह सपना को हमेशा दिखाता था) के पास ले गया. संयोग से लेडी डॉक्टर अभी क्लिनिक में थी, उसने देखा. देखने के बाद उसने कहा कि काफी सावधानी की जरूरत है, कोई भारी सामान आदि मत उठाईयेगा, किसी चीज की चिंता बिल्कुल मत करिये, किसी प्रकार की भी चिंता आप के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है. कुछ और आवश्यक निर्देश और दवाईयां डाक्टर ने दिया.
इस घटना के एक सप्ताह के बाद सपना को एक दिन फिर दर्द शुरू हुआ. कैलाश सपना को लेकर तुरंत कस्बे के लेडी डॉक्टर के पास गया. तमाम प्रयासों के बावजूद भी डाक्टर शिशु की रक्षा नहीं कर पायी. सपना और कैलाश के उपर दो महीने के भीतर दूसरा व्रजपात हुआ. अभी एक आघात के कष्ट से निकले नहीं थे, कि परिवार पर दूसरा आघात हो गया. खैर होनी को कौन टाल सकता! यही सोचकर परिवार को संतोष करना पड़ा.
लेकिन लक्ष्मी के दिमाग में यही बात रह – रह कर कौंधती थी कि सब सपना का ही दोष है.सपना के मुंह पर तो खुल कर नहीं कहती थी, लेकिन पीठ पीछे गाँव के महिलाओं को वह यह कहने से नहीं चूकती कि सपना ही कलमुँही है और उसी के कारण उसके परिवार में यह सब घटित हो रहा है. कैलाश तो बेचारा नौकरी करने में सुबह से शाम तक व्यस्त रहता था, लेकिन सपना के कानों तक यह बात पहुँच ही जाती थी. लेकिन वह करती क्या!
एक दिन कैलाश को आफिस से आने में कुछ देर हो गया. जब वह घर पहुँचा तो घर में अंधेरा था. सपना का कमरा बन्द था, लेकिन अन्दर से खुला था. कैलाश ने बिजली जला दिया, देखा कि सपना लेटी है आवाज देने पर सपना उठी. कैलाश ने देखा कि सपना की ऑंखें ऑंसूओं से भरी है और चेहरा एकदम दुखी है. कैलाश स्तब्ध हो गया. पूछा क्या हो गया! पहले तो सपना बोली कोई बात नहीं है, लेकिन कैलाश के कहने पर कि जब कोई बात नहीं है, तो रो क्यों रही हो? सपना ने सास द्वारा उसके कलमुँही नाम का बार- बार प्रचारित करने के विषय में बताया. बेचारा कैलाश भी क्या कहता! उसने सपना से ही पूछा कि तुम ही कोई रास्ता बताओ, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है. अब सपना भी क्या कहती! माँ से झगड़ा करने का कोई मतलब नहीं था. कैलाश ने कहा कि मैं ही कुछ करता हूँ.
रविवार के दिन, नास्ते के समय कैलाश ने अपने दोनों भाई- बहन को बुलाया और उन्हें माँ द्वारा सपना को बार- बार कलमुँही कह कर बदनाम व प्रताड़ित करने की बात बतायी. दोनों ने कहा कि भईया आप ही कोई रास्ता निकालो, इसमें हम क्या कह सकते हैं? कैलाश ने कहा ठीक है, फिर उसने माँ को बुलाया और लक्ष्मी से कहा कि माँ मैं बहुत दिनों से यह सुन रहा हूँ कि पिता जी के मृत्यु और सपना के गर्भपात के सम्बन्ध में आप सपना को ही दोषी मानती हो और उसे कलमुँही कहती हुई गाँव भर में घूमती हो. देखो किसी की भी मृत्यु परमात्मा के अधीन है और कौन अपनी संतान का विनाश चाहेगा! सात महिने गर्भ में रख कर, उसे वह खुद ही नष्ट करना चाहेगा! इस प्रकार का लांछन किसी पर लगाना बहुत ही गलत बात ही नहीं बल्कि निंदनीय है. सपना तो तुम्हारी धर्मपुत्रि है. तुम उसे कभी गृहलक्ष्मी कहती थी. मैं समझ सकता हूँ कि बाबूजी के देहांत का तुम्हें काफी सदमा लगा है, लेकिन इसका यह मतलब यह तो नहीं कि इस प्रकार की निंदनीय काम करो! बाबूजी के देहांत का दुख हम सबको है, एक छोटी सी बीमारी उनके लिए काल बन गयी . हमारी पहली संतान नहीं रही, इसका हमें भी दुख है!
पहले तो लक्ष्मी ने साफ इनकार कर दिया कि वह ऐसा कुछ कहती फिरती है, लेकिन सपना द्वारा कई महिलाओं के नाम लेकर कि उन्होंने ही उसे कहा है, लक्ष्मी के पास कोई रास्ता नहीं था. अन्त में कैलाश ने कहा कि माँ यह सब बकवास तुरंत बन्द करो और एक बात ध्यान से सुन लो. अगर मैंने दुबारा ऐसा कुछ सुना तो मैं अपने भाई- बहन को लेकर किराये के मकान में रह लूंगा, लेकिन तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा. तुम रहना अकेले और फिर जो मन में आये गाँव भर में कहते फिरना. दोनों भाई- बहन ने भी कहा अम्मा तुम यह ठीक नहीं कर रही हो.
रात को सपना ने कैलाश से अकेले में कहा कि आपको अम्मा से इतनी कठोर बातें नहीं करनी चाहिए थी. कैलाश भड़क गया, बोला, अब बेकार की ममता मत दिखाओ. तुमने अगर माॅं को पहले ही बेकार की बातें करने का विरोध करती , तो समस्या इतनी आगे नहीं बढ़ती. मैं मानता हूँ कि मेरी भी उतनी ही गलती है. मुझे भी पहले ही माॅं को इस ढंग के व्यवहार करने से रोकना चाहिए था. अब मुझे इस समस्या का स्थायी समाधान करने दो.
दूसरे दिन से कैलाश , अपनी माँ लक्ष्मी से बातें करना लगभग बन्द कर दिया. लक्ष्मी कुछ कहती भी तो हूँ- हाॅं में जबाब देता. जब माँ- बेटे का यह सिलसिला कई दिनों तक चला तो लक्ष्मी समझ गयी कि कैलाश बहुत ही नाराज है. एक दिन उसने अपने छोटे बेटे लखन और बेटी तारा से पूछा कि क्या बात है आजकल कैलाश मुझसे बात ही नहीं करता. दोनों ने कहा अम्मा, भईया तुमसे बहुत नाराज हैं . तुमने भाभी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है और सोचो तुम्हारे इस तरह बोलने से परिवार की कितनी बदनामी होती है. लक्ष्मी क्या कहती!
दो- चार दिनों के बाद एक दिन रात के नौ बजे के आसपास जब कैलाश अपने कमरे में था, लक्ष्मी कमरे में आयी और बोली कि मैं मानती हूँ कि मुझसे गलती हुई, लेकिन मैं भी क्या करती! मेरे उपर ऐसा व्रजपात हुआ कि मेरा दिमाग खराब हो गया था. अब यह गुस्सा थूको, अब मरते दम तक मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी. इतने में सपना कमरे में आ गयी. माँ- बेटे के बीच की बातें उसने भी सुन ली थी. बोली अम्मा , जो हो गया सो गया, ईश्वर हम सबके बीच प्रेम बनाये रखे, परिवार के लिए यही अच्छा है.
© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
19.12.2025
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






