श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “सबहिं नचावत राम गोसाईं“.)
☆ कथा कहानी ☆ सबहिं नचावत राम गोसाईं— ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
अरे बिलुआ देख उस टेबल पर चाय का चार जूठा गिलास अभी तक पड़ा हुआ हैं, उन्हें धोने के लिए दे दे और देख टेबल पर ठीक से पोछा मार देना कि मक्खी न लगे . दयाराम ने अपने नौकर बिलुआ को कहा. एक कालेज के सामने दयाराम की एक छोटी सी चाय की दूकान या उसे रेस्टोरेंट भी कह लो, थी. बिलुआ उस रेस्टोरेंट का अकेला वेटर था. उस रेस्टोरेंट में कुछ टेबल, कुर्सी थे, शीशे के जार में कुछ बिस्किट व नमकीन रखे रहते थे, पकौड़ी, समोसा और टिकिया दयाराम खुद ही बनाता था. रेस्टोरेंट के पीछे ही एक टिनशेड में दयाराम का छोटा सा परिवार भी रहता था. कालेज के लड़के/ लड़कियां अक्सर इस दूकान पर खाली समय में बैठे रहते. दयाराम की अच्छी बिक्री हो जाया करती थी.
एक दिन की बात एक लड़का चाय पीने के बाद अपना बैग तो अपने साथ ले गया लेकिन हिन्दी की एक पुस्तक वहीं टेबल पर भूल गया . थोड़ी देर बाद वह अपनी पुस्तक लेने लौटा तो देखा कि बिलुआ उस पुस्तक को बड़े ध्यान से पढ़ रहा था. बिलुआ पढ़ने में इतना व्यस्त था कि वह लड़का आ कर उसके बगल में खड़ा हो गया लेकिन बिलुआ को पता ही नहीं लगा और वह किताब पढ़ता ही रहा. थोड़ी देर बाद उस लड़के ने बिलुआ से पूछा तुम कहाँ तक पढ़े हो? चौंक कर बिलुआ ने सामने देखा और खड़ा हो गया. लड़का सामने की कुर्सी पर बैठ गया और फिर वही प्रश्न दुहराया कि बिलुआ तुम कहाँ तक पढ़े हो? बिलुआ ने कहा साहब क्या करेंगे जान कर. लड़के ने कहा कुछ करना नहीं है फिर भी बताओ. बिलुआ ने कहा कक्षा सात तक हम पढ़े हैं. फिर आगे क्यों नहीं पढ़े? लड़के ने पूछा . पैसा नहीं था साहब और घर में एक दिन बाबू जी से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और, फिर बाबू जी ने बहुत मारा और घर से निकाल दिया . तो हम भाग कर यहाँ चले आयें, पेट पालने के लिए कोई नौकरी खोजने लगे. एक दिन मुझे यहाँ पर नौकरी मिल गया. यहाँ पर दोनों समय खाना मिल जाता है, और यहीं रहने का ठिकाना भी मिल गया, फिर मुझे और क्या चाहिए ! यहीं रह गए. पढ़ने की इच्छा है क्या? उस लड़के ने आगे पूछा. साहब इच्छा से क्या होता है! अब तो यही काम करते हुए जिन्दगी ऐसे ही काटनी है! बिलुआ ने कहा .
लड़का, जिसका नाम अखिल था और वह कक्षा ग्यारह में पढ़ता था, और वह उसी कालेज के प्रधानाचार्य का बेटा था. घर लौटने पर अखिल ने अपनी माँ से बिलुआ के बारे में बताया और माँ से पूछा कि मम्मी बिलुआ क्या आगे पढ़ सकता है? माँ ने कहा कि उसके पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वह स्कूल में पढ़ेगा तो चाय की दुकान पर नौकरी वह नहीं कर पायेगा, तो उसे पैसा कौन देगा? हमेशा तो कोई सहायता करेगा नहीं. अखिल ने कहा कि बात तो सही है . फिर अखिल की माँ ने आगे कहा कि बहुत हो सकता है तो हम उसे किताब व कापी दिला सकते हैं. दूसरी बात, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह यह कि उसकी स्वयं की पढ़ने की इच्छा है कि नहीं! जबरदस्ती किसी की सहायता करना नहीं. अखिल को माॅं की बात समझ में आ गयी और वह आगे कुछ नहीं बोला.
लगभग एक सप्ताह के बाद अखिल दयाराम की चाय के दूकान पर अपने दोस्तों के साथ पहुँचा. बिलुआ ने सामने पानी का गिलास रखा और पूछा कि साहब क्या खायेंगे? अखिल ने कहा कि पहले चार चाय ले आओ. जब बिलुआ चाय रख कर चला गया तो चाय पीने के बाद अखिल ने बिलुआ को बुलाया और पूछा कि बिलुआ एक बात बताओ कि क्या तुम पढ़ना चाहते हो . बिलुआ बोला साहब मैं पढ़ना तो चाहता हूँ, लेकिन कापी किताब के पैसे कहाँ हैं, दूसरे मैं यह नौकरी तो किसी हालत में नहीं छोड़ सकता. अखिल ने कहा कि तुम्हें नौकरी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है, मैं तुम्हें कक्षा आठ की पुरानी पुस्तकें दे दूंगा और कापी भी दे दूंगा और तुम्हें जब समय मिले, तुम पढ़ो. जब परीक्षा का समय आयेगा, तब तुम्हें मैं बताऊंगा कि आगे क्या करना है . मैं हर शनिवार को, शाम को दोस्तों के साथ यहाँ आऊंगा और तुम्हें जो समझ में न आये , तुम हम लोगों से पूछ लेना.
दूसरे दिन अखिल ने कक्षा आठ के कुछ विषयों के पुरानी किताबें और कुछ कापी बिलुआ को दिया. सामान्यतः दयाराम की दुकान शाम छ बजे के बाद बंद हो जाया करती थी, क्योंकि शाम पांच बजे के बाद कोई लड़का तो आता नहीं था. उस दिन से बिलुआ का स्वाध्याय शुरू हो गया. दयाराम रोज देखता कि बिलुआ कुछ पढ़ रहा है, लेकिन इस पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया. इधर अखिल ने अपने पिता से कह कर बिलुआ का नाम पास के ही जूनियर हाई स्कूल में कक्षा आठ में लिखवा दिया और बिलुआ से आवेदन दिलवा कर उसका फीस भी माफ़ करवा दिया. बीच – बीच में अखिल और उसके दोस्त आ कर बिलुआ को कुछ पढ़ा देते अथवा जो उसको पूछना होता, बिलुआ पूछता. यह पढ़ने- पढ़ाने का क्रम अबाध गति से चलता रहा. दयाराम समझ रहा था कि बिलुआ पढ़ रहा है, लेकिन वह सोचता कि पढ़ कर यह बेचारा क्या करेगा और इस प्रकार से कितने दिन पढ़ेगा! उसका सोचना भी अपनी जगह सही था. लेकिन भविष्य कौन जानता? यह सोच कर दयाराम चुप रहता. दयाराम की पत्नी रामदेई भी बिलुआ के पढ़ाई को रोज बड़े ध्यान से देखती थी. रामदेई को कोई संतान नहीं था, इसका उसे दुख रहता था. बहुत पूजा पाठ भी करवाई, सामर्थ्य भर डाक्टर से इलाज भी किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. एक दिन बैठे- बैठे उसके मन में विचार आया कि जब विधाता ने भाग्य में कोई संतान नहीं लिखा है तो क्यों न बिलुआ को ही संतान मान लें!
एक दिन रात में जब चाय की दुकान बंद करके दयाराम घर में आराम कर रहा था, रामदेई ने बिलुआ को संतान मानने की बात छेड़ी. दयाराम एकदम भड़क गया, बोला बिलुआ को बैठाकर खिलाऊं- पिलाऊं , फिर किसी और दूकानदार ने अधिक पैसा दिया और वह भाग गया तो! फिर जब बिलुआ को अपना संतान मान लेंगे तो दूसरा नौकर रखना पड़ेगा, तो क्या होगा! लगता था रामदेई इन सारे प्रश्नों के लिए पहले से तैयार थी . बोली देखो मैं ऐसा कुछ नहीं कह रही, लेकिन बिलुआ को पढ़ते देख मेरे मन में यह बात आयी कि आज मेरी कोई संतान होती तो क्या वह ऐसे पढ़ती! तो मैंने सोचा कि चलो बिलुआ मेरा कोई नहीं लगता, लेकिन उसे देख कर लगता है कि उसमें पढ़ने की बड़ी इच्छा है. तो क्यों न हम उसे थोड़ी पढ़ने की सुविधा दें. कल वह अगर छोड़ कर कहीं चला भी जायेगा तो कौन सा हमारा भाग्य ले जायेगा! दयाराम बोला देख रामदेई मेरे पास बहुत ज्यादा अक्ल है नहीं, इसलिए तूं सीधे – सीधे बात कर कि तुम्हारे मन में क्या है? घुमा फिरा कर बात करने की न तो मेरी आदत है और न ही मैं सुनना चाहता हूँ, सीधे अपने मन की बात कह दे.
रामदेई ने कहा कि देख मैं सीधे- सीधे बात कर रहीं हूँ. दूसरों के दिये गये पुराने किताबों और कापियों से कोई लड़का कितने दिन तक पढ़ाई करेगा, तूं ही बोल. तो उसे तूं नई किताब और कापियाँ दिला दे. बाकी वह जाने और उसका भाग्य! शायद इसी बहाने हमें कुछ पुण्य मिल जाये! दयाराम कुछ देर सोचा, फिर बोला चलो तुम्हारे कहने से इतना कर देंगे, बाकी बिलुआ का भाग्य! दूसरे दिन दयाराम बिलुआ को लेकर एक किताब की दुकान पर गया और बोला बिलुआ तुम्हें जो किताब कापी खरीदना हो ले लो. दुकानदार दयाराम और बिलुआ दोनों को पहचानता था. अचानक दयाराम का यह रुप देखकर और बिलुआ पढ़ भी सकता है, यह देखकर वह चौंक गया. खैर उसे तो किताब बेचने से मतलब था. बिलुआ ने कुछ किताबें और कापियाँ लिया. लेकिन बिलुआ मन ही मन अपने मालिक के व्यवहार में आये इस परिवर्तन को समझ नहीं पाया. दिन बीतता गया, बिलुआ का स्वाध्याय चलता रहा, अखिल और उसके दोस्तों का सहयोग बिलुआ को यथावत मिलता रहा. कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा में दयाराम ने बिलुआ को कुछ समय के लिए काम नहीं करने के लिए कह दिया. वार्षिक परीक्षा फल निकला और बिलुआ ने अच्छे नम्बर से कक्षा आठ की परिक्षा पास किया . अखिल और उसके दोस्त , और दयाराम और उसकी पत्नी रामदेई बहुत खुश हुए. बिलुआ को परिक्षा पास करने पर एक नये उत्साह का अनुभव हुआ. खैर अखिल ने उसका कक्षा नौ में प्रवेश दिला दिया और कुछ पुस्तकों और कापियों की व्यवस्था भी कर दिया और जो कुछ बाकी रह गया था, उसकी पूर्ति दयाराम ने कर दिया. बीच – बीच में दयाराम बिलुआ को स्कूल भी जाने देता कि जाओ कुछ कक्षा में भी पढ़ लो.
बिलुआ का पढ़ने का यह सिलसिला चलता रहा और दयाराम के दुकान पर उसका नौकर का काम भी यथावत चलता रहा, क्योंकि बिलुआ के लिए उसके अलावा तो कोई सहारा भी नहीं था. इधर उसको रामदेई का स्नेह भी कुछ अधिक ही मिलने लगा. बीच- बीच में कक्षा में बैठने से कक्षा के छात्र भी इसे पहचानने लगें और इसकी पढ़ने की लगन देख कर, उनमें बिलुआ के प्रति सम्मान का भाव भी उत्पन्न हो गया. कक्षा नौ भी बिलुआ ने अच्छे अंकों के साथ पास किया. जब कक्षा दस में बिलुआ ने प्रवेश लिया तो दयाराम ने कहा कि अगर चाहो तो कोई टियूशन कर लो . बिलुआ ने कहा नहीं काका मुझे टियूशन नहीं करना है, आप लोग मेरे लिए जितना कर रहे हैं, मेरे लिए वह ही बहुत अधिक है. यह तो अखिल भईया के कारण मैं पढ़ने लगा. हाईस्कूल की परिक्षा के समय दयाराम ने बिलुआ को कहा कि तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, मैं अकेले सम्भाल लूंगा. रामदेई ने भी कहा कि बिलुआ तुम दुकान की चिंता मत करो, मैं कुछ दिन दुकान देख लूंगी.
हाईस्कूल की परिक्षा में बिलुआ को अपने स्कूल में चौथा स्थान मिला. जब यह खबर स्कूल में फैली तब स्कूल के प्रबंधन ने बिलुआ को यह जानने के लिए बुलाया कि कौन लड़का है. जब स्कूल के प्रबंधन को बिलुआ के बारे में पूर्ण जानकारी मिली कि उसने किस अवस्था में पढ़ाई की है तो वे आश्चर्यचकित हो गये. प्रबंधन ने बिलुआ के इण्टर के पढ़ाई के लिए फीस माफ कर दिया और पांच सौ रुपये का मासिक स्कालरशिप भी दे दिया. इधर दयाराम बिलुआ के हाईस्कूल के परिणाम से इतना खुश हुआ कि उसने बिलुआ को कह दिया कि वह अपना पूरा ध्यान और समय आगे की पढ़ाई में लगाये और दयाराम ने दुकान के लिए एक अतिरिक्त नौकर रख लिया. लेकिन बिलुआ पढ़ाई के साथ- साथ पूरा समय निकाल कर दुकान पर पहले की तरह नौकर का काम भी करता रहा. दयाराम और रामदेई के कहने के बावजूद भी उसने नौकर का काम नहीं छोड़ा. लेकिन अब पहले की तुलना में बिलुआ स्कूल में पढ़ने में समय अधिक बिताता था. अध्यापक और साथ के छात्र उसके प्रति आदर का भाव रखते थे और वे उसका हर तरह से सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे. इण्टर की परिक्षा में बिलुआ ने जिला में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर पहला स्थान प्राप्त किया. इसके बाद फिर बिलुआ को कई संस्थानों से सहयोग व वजीफा मिलना शुरू हो गया और सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में बिलुआ का प्रवेश भी हो गया. दयाराम और रामदेई ने एक दिन बिलुआ से कहा कि आज से तुम हमारे बेटे की तरह हो और अब तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, बल्कि हमारे घर में एक सदस्य के रूप में रहोगे. बिलुआ यह सुनकर बहुत ही भावुक हो गया और बोला काका आप लोगों के अलावा मेरा इस दुनिया में है कौन ! एक अखिल भईया हैं और दूसरे आप लोग.
इस बीच अखिल ने भी एम टेक करके एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी कर लिया था, लेकिन बीच – बीच में वह बिलुआ से बात भी करता रहता था . बिलुआ ने भी समय पर बी टेक और एम टेक किया और आजकल बिलुआ रेलवे में इंजीनियर हो गया है.
© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
31.01.2026
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





