डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ माँ का हिसाब ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मम्मी! ये आइसक्रीम के खाली डिब्बे कब फेंकोगी?” बेटी ने पूछा।
“अरे, इनमें चटनी और मसाले रखती हूँ।”
“और ये पुरानी साड़ियाँ?”
“इनसे रजाइयाँ बनवा लूँगी।”
बेटी हँसी, “मम्मी, आप तो बेकार चीज़ों को भी काम का बना देती हो!”
माँ मुस्कुराईं, “बेटा, घर ऐसे ही चलता है।”
तभी पापा बोले, “लेकिन अपने लिए कुछ खरीदना हो तो तुम्हारी मम्मी को सब महँगा लगता है!”
बेटी ने पूछा, “माँ, पिछली बार अपने लिए नई साड़ी कब खरीदी थी?”
“अरे, मेरे पास बहुत हैं!”
“और पापा की नई शर्ट?”
“वो तो ज़रूरी थी। ऑफिस जाते हैं।”
“और आपकी साड़ी ज़रूरी नहीं?”
माँ चुप हो गईं।
“माँ, आप सबकी ज़रूरतें याद रखती हो, अपनी क्यों भूल जाती हो?”
“मेरी खुशी तो तुम सबमें है बेटा।”
“लेकिन माँ, आपकी अपनी खुशी भी तो होगी?”
माँ ने बात बदल दी, “अच्छा छोड़, चाय बनाऊँ?”
बेटी ने धीरे से पूछा, “माँ, आपको कौन-सा रंग पसंद है?”
“पता नहीं बेटा… अब तो जो तुम लोग ले आते हो, वही अच्छा लगने लगता है।”
बेटी ने माँ की ओर देखा।
“माँ, आप सबकी पसंद बनते-बनते अपनी पसंद कहाँ छोड़ आईं?”
माँ चुप रहीं। शायद इस सवाल का जवाब उनकी अलमारी में नहीं, बीते हुए वर्षों में कहीं रखा था।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






