डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ जीत की असली कीमत ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
आश्रम में एक दिन गुरुजी ने देखा, उनका प्रिय शिष्य नीरज उदास बैठा था।
“क्या बात है बेटा, आज इतने चुप क्यों हो?”
“गुरुजी, बहुत मेहनत करता हूँ, फिर भी संतुष्ट नहीं हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझसे आगे निकलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।”
गुरुजी उसे बगीचे में ले गए।
“देखो बेटा, यह आम का पेड़ कितनी धीरे बढ़ता है, फिर भी मीठे फल देता है।”
“लेकिन गुरुजी, दुनिया तो तेज़ चलने वालों की है!”
“अच्छा, बताओ… आख़िरी बार माँ के साथ बैठकर कब खाना खाया था?”
“याद नहीं।”
“दोस्तों से कब मिले?”
“समय ही नहीं मिला।”
“और खुलकर हँसे कब थे?”
नीरज निरुत्तर था।
गुरुजी ने पूछा, “जिस सफलता के लिए जी रहे हो, उसी के कारण जीना भूल रहे हो?”
“तो क्या मेहनत करना छोड़ दूँ?”
“नहीं बेटा, मेहनत ज़रूर करो, लेकिन अपनी सेहत और सुकून को उसकी कीमत मत बनाओ।”
“लेकिन पीछे रह गया तो?”
गुरुजी मुस्कुराए।
“बेटा, जीवन की दौड़ में सबसे आगे निकलकर भी क्या पाओगे, अगर अंत में तुम्हारे साथ चलने वाला कोई न हो?”
नीरज की आँखें नम हो गईं।
“गुरुजी, अब समझ आया… मैं सफलता कमाने निकला था, मगर ज़िंदगी ही खर्च करता जा रहा था।”
गुरुजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, कमाई दोबारा हो सकती है, लेकिन बीता समय, खोई सेहत और छूटे रिश्ते हमेशा वापस नहीं आते।”
नीरज ने जेब से फ़ोन निकाला।
स्क्रीन पर माँ की पाँच मिस्ड कॉल थीं।
उसने काँपती उँगलियों से नंबर मिलाया-
“माँ… आज खाना आपके साथ खाऊँगा।”
उधर कुछ पल ख़ामोशी रही।
फिर माँ की आवाज़ आई-
“बेटा, आज अचानक छुट्टी मिल गई क्या?”
☆
© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈