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श्रीमती समीक्षा तैलंग 

 

( कोरोना वायरस की महामारी की त्रासदी  से जूझते विश्व में मानवीय संवेदनाएं जीवित हैं जो हमें जाति, धर्म , भेद भाव से परे जोड़ती है और यह रिश्ता है मानवता का । पढ़िए श्रीमती समीक्षा तैलंग जी की एक सच्ची संवेदनशील कहानी  “समय है एक होकर लड़ने का ……… “।  )

☆ समय है एक होकर लड़ने का ………   ☆

[आज कोई व्यंग्य नहीं है मेरे पास। लेकिन एक हकीकत है, सच्ची कहानी है। पोस्ट कर रही हूं। आग्रह है कि जरूर पढिये। मैं और मेरी मावशी (काम वाली बाई) के बीच हुई बातचीत, एक कहानी के रूप में।  कृपया अवश्य पढिए एक मेड की सच्चाई उसकी जुबानी – समीक्षा तैलंग ]

 

आज सुबह मेरी मावशी (मेड) का फोन आया। मैं भी सोच ही रही थी कि पहल उसी ने कर दी।

जानते हो क्यों… हालचाल लेने, हम सब के…।

वो अब अमरावती में स्थित किसी गांव में है। जो उसका अपना है।

बहुत अच्छा लगता है जब कोई दूसरा आपके लिए फिक्रमंद होता है।

मुझसे इतनी आत्मीयता से पूछा- “कैसे हो ताई आप सब?”

फिर हिदायत के साथ- “बिल्कुल भी बाहर मत निकलना।

थोड़ा बहुत बनाकर, कम बर्तन में ही एकाध महीना काम चला लेना। बच्चों को भी बोल देना थोड़ा थोड़ा काम करवाए आपके साथ।

अब तो दीदी की परीक्षाएं भी आगे बढ़ गई हैं। वो भी थोड़ा आपका हाथ बंटा सकती है।

सब कुछ ऑनलाइन मंगवाना…।”

फिर बोली, “कहीं पर भी मत जाना ताई। भाऊ से भी कहना, संभलकर रहे। वो बड़े साहब हैं। उनको तो ऑफिस जाना पड़ेगा।”

बोली- “ताई कल मोदीजी का भाषण सुना था।”

मैंने कहा, “हां पूरा सुना था।”

बोली- “कितना अच्छा बोले न वो…।

हम लोगों को अपने अपने घर तो भेज दिया क्योंकि शायद कुछ बहुत बड़ा होने वाला है इसलिए। लेकिन वो हम रोजंदारों की कितनी फिकर करते हैं न…।

आपको मालूम है…, वो जब कल बोले न… उसके पहले ही हम लोगों के लिए अनाज दिया जा रहा है, वो भी मुफ्त में।

वो लोग, हम सबसे यही कह रहे हैं, कि बस घर के अंदर रहो। कहीं मत निकलो। हम तुम सबको घर बैठे खिलाएंगे, जब तक ये कोरोना नहीं चला जाता…।

उसकी ये बात मेरे मन को छू गई…।”

शायद यही भावनात्मक डोर है जिसकी वजह से क्या गरीब, क्या अमीर सब अपने प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

फिर उसने एक और बात बताई…। “ताज्जुब भी हुआ और लगा कि हमारे गांवों के लोग कितने जागरूक हो चुके हैं।”

बोली- “ताई! हम सब 70 लोग पुणे से बस से अपने गांव पहुंचे। बस स्टैंड पर ही गांव वालों ने हमें रोक दिया।

उन्होंने कहा, जो भी पुणे से आए हैं, सबसे पहले अस्पताल चलो। टेस्ट करने के बाद ही घर आने देंगे।“

बोली- “हम सबको तो पता था कि हमें कुछ नहीं है। फिर भी उनकी तसल्ली के लिए हम सब लोगों ने टेस्ट कराए। और फिर घर गए।

सामान दो दिन तक बाहर धूप में रखा रहा। और अब हम लोग भी घर के अंदर काम नहीं कर रहे।

बस धूप में रहने के लिए, खेतों में काम कर रहे हैं। रात में ही घर को जा रहे। पंद्रह दिन ऐसे ही करेंगे।”

मैंने कहा- “अच्छा कर रहे हो। तुम सब जानते हो अच्छा, बुरा…। अपने घर में सबकी देखभाल करो अच्छे से…। फिर जब सब ठीक हो जाए तभी आना लौटकर।”

बोली- “हां ताई, ऐसा ही करेंगे हम लोग। आप भी सब लोग ठीक से रहो वहां। बहुत चिंता लगी है हम लोगों को।

बीच बीच में फोन करके अपने हालचाल देते रहना और बाहर बिल्कुल मत निकलना क्योंकि वहां ज्यादा फैला हुआ है।”

मैंने कहा- “करूंगी फोन तुम्हें…।” और फिर फोन कट कर दिया।

बस एक ही खयाल आता रहा, यही अपनापन होता है। जो हम सब एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ते चले जाते हैं। अनगिनत लोगों से, कभी भी… कहीं भी…। अपने ही क्या, पराए भी अपने होते चले जाते हैं…।

 

©समीक्षा तैलंग,  पुणे

 

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अलका अग्रवाल

तीव्र कटाक्ष।