श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुस्कुराओ कि।)

☆ अभिव्यक्ति # ११३ ☆

☆ मुस्कुराओ कि☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मुस्कुराओ कि जिंदगी लौटे,

रेत की तह पर नमी लौटे,

लबों पर जम गए हैं सन्नाटे,

कुछ किया जाए कि हंसी लौटे,

हमारी जिंदगी में इतनी कटुता कहां से आ गई, बचपन में तो नहीं थी, किसी के बारे में कभी नहीं सोचा कि उन्नति ना करें, कभी नहीं सोचा कि सुखी ना हो, हमारी संस्कृति में भी, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… की बात की है. पर अब क्या हो गया अगर हम त्यौहार भी मनाते हैं तो कटुता से भरे रहते हैं. हम क्यों नहीं उसके घर जाकर उनकी खुशियों में शरीक होते हैं, क्यों नहीं, हम, खुशी को साझा करते हैं, दर्द भी साझा करें, खुशी भी साझा करें.

लेकिन क्या हो गया हम अपने आप में ही सिमट गए, दूसरे की खुशियां हम नहीं बांट सकते, हम दूसरों की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, हम अपने परिवार की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, अकेलापन आप चाहते नहीं हो, तो आप चाहते क्या हो, प्रकृति आपके हिसाब से नहीं चलती, प्रकृति अपनी गति से गतिमान होती है, आपको ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है.

प्रकृति के साथ, बारिश में भीगना छोड़ दिया, छत पर सुबह की धूप लेनी छोड़ दी, जब आप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं, तब आप खुश होना सीख जाते हैं, खुशियां बांटनी चाहिए, दूसरों के गम में शरीक होना चाहिए, और जब आप खुशियां बांटना शुरू कर देते हैं दूसरों के गमों में शरीक होना शुरू कर देते हैं यकीन मानिए आपको भी कहीं ना कहीं अपार खुशी मिलती है.

कोशिश करके देखिए, जीवन जीने का रवैया बदल जाएगा, हंसिए, हंसाईये दूसरों की हंसी का कारण बनिए ऐसा कोई कार्य न करें, जो आप अपने लिए नहीं चाहते, मुस्कराये और दूसरों की मुस्कराहट का कारण बनिए, बस खुशियों से भरा जीवन जीना सीख लीजिए.

एक पुराने गाने की पंक्तियां याद आ गई,

आईये बहार को हम बांट लें,

जिंदगी के प्यार को हम बांट लें,

मिलकर रोयें, मिलकर मुस्कुराए हम,

आंसुओं की धार को हम बांट लें.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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