डॉ निशा अग्रवाल
☆ कविता ☆ “दिनकर का दीप” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (23 सितम्बर 1908- 24 अप्रैल 1974)
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जागा जब भारत का सोया स्वाभिमान,
दिनकर की लेखनी बनी प्रचंड तूफ़ान।
शब्दों में धधकती अग्नि भावों में शंखनाद,
रच डाली दिनकर ने जब क्रांति की पुकार।
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अन्याय जहाँ भी सीना ताने खड़ा,
उनकी वाणी बन वज्र वहाँ जा पड़ा।
कवि नहीं केवल, युग का प्रहरी बड़ा,
जग को सिखला गया झुकना नहीं पड़ा।
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रश्मियों में तेज, विचारों में थे प्राण,
हर छंद बना जैसे रण का बिगुल-गान।
वीरों की धड़कन, जन-मन की आस,
उनकी कविता में बसता है इतिहास।
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कभी करुणा की गंगा बहती रही,
कभी क्रांति की ज्वाला दहकती रही।
संतुलन ऐसा, न कोमलता कम,
न ओज में उनके कोई कमी रही।
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मिट्टी का मान, श्रम का अभिमान,
उनके शब्दों में गूंजा हिन्दुस्तान।
संघर्ष सिखाया, साहस का सार,
जीवन को बनाया कर्म का त्यौहार।
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दिनकर का दर्शन अमर आलोक,
अंधकार में जैसे दीप का प्रकाश।
जो सत्य के पथ पर डटकर चले,
वही इतिहास के पन्नों में बन जाते खास।
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© डॉ निशा अग्रवाल
शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका
जयपुर, राजस्थान
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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