श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “उसका आदमी…☆ श्री आशिष मुळे ☆

गाली उसे देते हो,

मगर भिड़ते अँधेरे से हो,

इतना साहस कैसे लाते हो—

क्या तुम आदमी उसके हो?

 *

दुकानें उसकी आबाद हैं,

मगर तुम दिवालिया हो,

हँसते फिर भी रहते हो—

लगता है उसी के आदमी हो।

 *

कटघरे में नैतिकता के

खड़े जैसे गुनहगार हो,

सदियों से जलते आए हो,

फिर भी आज ज़िंदा हो।

 *

पत्थर तुमने ठुकराए हैं,

पर इंसान बचाते हो,

नाम उसका लेते नहीं—

काम उसी का करते हो।

 *

ज़रूर, तुम आदमी उसके हो,

हाँ, तुम आदमी उसके हो…

© श्री आशिष मुळे

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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