श्री प्रेम नारायण शुक्ला
☆ जीवन-यात्रा – डॉ. सुमित्र विशेष – पुण्य स्मरण ☆ श्री प्रेम नारायण शुक्ला ☆
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मेरे पितृतुल्य ससुर जी से मुझे अपार स्नेह और दुलार मिला। मेरे अपने पिता का अवसान बहुत जल्दी हो गया था, इसलिए उनका सान्निध्य अधिक समय तक नहीं मिल सका। ऐसे में जब जीवन ने मुझे पिता समान ससुर जी का साथ दिया, तो लगा जैसे ईश्वर ने उस रिक्तता को भर दिया हो। उन्हें पाकर मेरा जीवन सचमुच धन्य हो गया।
उनके पास बैठना, उनसे बातें करना, साहित्य के विषय में उन्हें सुनना मेरे लिए अत्यंत आनंददायक होता था। यद्यपि मुझमें साहित्यिक संस्कार नहीं हैं, फिर भी उनकी कविताएँ सुनना, उनके विचारों को जानना मन को समृद्ध कर देता था। जब भी जबलपुर जाना होता, ऐसा लगता मानो पिता का स्नेह फिर से प्राप्त हो रहा हो।
मम्मी के जाने के बाद पापा ने ही माँ और पिता-दोनों का दुलार दिया। जबलपुर के साहित्यिक आयोजनों में उनके साथ जाना, बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिलना, उनके साथ कार्यक्रमों में उपस्थित होना-ये सभी अनुभव मेरे लिए गर्व और सौभाग्य के क्षण थे।
आज पापा नहीं हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जीवन का एक बड़ा सहारा चला गया हो। उनकी कमी हर पल महसूस होती है। अब उनके स्मरण और उनकी यादों को सहेजकर रखना ही हमारे लिए आत्मिक श्रद्धांजलि है। 🙏
© श्री प्रेम नारायण शुक्ला
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भावपूर्ण अभिव्यक्ति