हिंदी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी के 90 गौरवशाली वर्ष पूर्ण – हार्दिक अभिनन्दन! ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री मदन शर्मा 

🌱 देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी के 90 गौरवशाली वर्ष पूर्ण – हार्दिक अभिनन्दन! 🌷

देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। उनके अनुसार, “यह तारीख सही है या गलत, कोई गारंटी नहीं। किंतु यह बात पक्की है, जिस दिन मैं पैदा हुआ, शहर में हड़ताल हो गई थी।”

हड़तालियों को उनके जन्म लेने या न लेने से कोई सरोकार नहीं था। यह मात्र संयोग था कि उस दिन शहर के एक बड़े नेता का सरे बाज़ार कत्ल हो गया था और आनन फानन सभी दुकानें बंद हो गई थीं। तब देश में अंग्रेज़ी शासन था। मालेर कोटला 119 गांवों वाली छोटी सी रियासत थी जहाँ के नवाब जनाब अहमद अली खान थे।

नवाब के वंश को सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी का वरदान प्राप्त था जिसके फलस्वरूप रियासत में कभी हिन्दू- मुस्लिम दंगे नहीं हुए थे, यहां तक कि 1947 में जब पूरा उत्तर भारत सांप्रदायिकता की आग में जल रहा था, यहां पर धार्मिक एकता की फौलादी दीवार में ज़रा भी जुंबिश तक नहीं आई थी।

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

मदन शर्मा जी के पिताजी इन्हीं नवाब की सरकार में एक अहलकार थे। कालांतर में, उनका स्वास्थ्य बिगड़ा तो नौकरी चली गई। उसके बाद तो मानो परिवार पर दुखों का पर्वत टूट पड़ा। किशोरावस्था में मदन जी, पहले लुधियाना, फिर अपने जीजाजी के पास देहरादून पहुंचे। भाग्य ने उन्हें, 01 अगस्त 1951 को, ऑर्डनेंस फैक्टरी पहुंचाया, जहां वर्षों तक कार्य करने के उपरांत, वे जुलाई 1994 में सेवानिवृत्त हुए।

उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।”

यह मेरा परम सौभाग्य है कि पिछले 30-35 वर्षों से लगभग निरंतर उनसे भेंट करता रहा हूं। गर्मियों में, जब भी मैं देहरादून जाता हूं तो उनसे अवश्य भेंट होती है। हमेशा ही उनका अथाह स्नेह और आशीर्वाद मुझे प्राप्त होता है।

हम लोग शाम को तपोवन की ओर घूमने निकलते रहे हैं और खूब सारी चर्चाएं होती रही हैं। एक-दूसरे के साथ घर पर भी लंबी-लंबी बैठकें और रचनाओं व पुस्तकों का आदान-प्रदान होता रहा है। जब भी उनके घर जाता हूं तो प्रारंभिक चाय-नाश्ते के उपरांत, उनका आग्रह भोजन के लिए अवश्य होता है।

वर्षों पूर्व, उन्होंने मुझे साथ ले जाकर, नगर के अनेकों प्रतिष्ठित साहित्यकारों से मिलवाया, जिनमें रवींद्रनाथ त्यागी, सुभाष पंत और ओमप्रकाश बाल्मीकि शामिल हैं। हम लोग देहरादून के पलटन बाजार भी संग-संग घूमें हैं।

वे बाहर की यात्राएं अधिक नहीं करते हैं। जहां तक मुझे याद है, उन्होंने इंदौर और केदारनाथ की यात्रा की चर्चा ही यदाकदा ही की है।

05 जुलाई 2026 को उनका जन्मदिन था। फ़ोन पर बातें हुईं। वे कुछ अस्वस्थ लगे। पिछले कुछ समय से वे यदाकदा अस्वस्थ रहने लगे हैं। फ़ोन पर ज़्यादा बातें करने की उनकी आदत नहीं है। आमने-सामने बैठकर वो अब भी धारावाहिक गपशप करते हैं। अभी अप्रैल में ही मैं उनके घर पर गया था।

उम्र के 90 गौरवशाली पड़ाव पार करने पर उन्हें एक बार पुनः हार्दिक बधाई और उनके दीर्घायु और स्वस्थ होने के लिए अनंत शुभकामनाएं! 💐🙏

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

इंदौर मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ “शहीद भगत सिंह की कुछ बातें” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ जीवन यात्रा – “शहीद भगत सिंह की कुछ बातें” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

किसी मित्र ने एक काम मेरे जिम्मे लगाया कि शहीद भगत सिंह की जीवनी लिख कर  दूं । बड़ी कोशिश रही कि जल्द से जल्द दे सकूं पर इधर उधर के कामों के बावजूद शहीद भगत सिंह के प्रति मेरी श्रद्धा और उनके पैतृक गांव खटकड़ कलां में बिताये ग्यारह वर्ष मुझे इसकी गंभीरता के बारे में लगातार सचेत करते रहे । बहुत सी कहानियां हैं उनके बारे में । किस्से ऊपर किस्से हैं । इन किस्सों से ही भगत सिंह शहीद ए आज़म हैं ।

मेरी सोच है या मानना है कि शायद शुद्ध जीवनी लिखना कोई मकसद पूरा न कर पाये । यह विचार भी मन में उथल पुथल मचाता रहा लगातार । न जाने कितने लोगों ने कितनी बार शहीद भगत सिंह की जीवनी लिखी होगी और सबने पढ़ी भी होगी ।  मैं नया क्या दे पाऊंगा ? यह एक चुनौती रही ।

सबसे पहले जन्म की बात आती है जीवनी में । क्यों लिखता हूं मैं कि शहीद भगत सिंह का पैतृक गांव है खटकड़ कलां , सीधी सी बात कि यह उनका जन्मस्थान नहीं है । जन्म हुआ उस क्षेत्र में जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है जिसमें 27 सितम्बर, 1907 में जन्म हुआ । और यह बात भी परिवारजनों से मालूम हुई कि वे कभी अपने जीवन में खटकड़ कलां आए ही नहीं । फिर इस गांव की इतनी मान्यता क्यों ? क्योंकि स्वतंत्र भारत में भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धा अर्पित करने के  दो ही केद्र हैं -खटकड़ कलां और हुसैनीवाला । इनके पैतृक गांव में इनका घर और कृषि भूमि थी । इनके घर को परिवारजन राष्ट्र को अर्पित कर चुके हैं और गांव में मुख्य सड़क पर ही एक स्मारक बनाया गया है । बहुत बड़ी प्रतिमा भी स्मारक के सामने है । पहले हैट वाली प्रतिमा थी , बाद में पगड़ी वाली प्रतिमा लगाई गयी ।  इसलिए इस गांव का विशेष महत्त्व है । हुसैनीवाला वह जगह है जहां इनके पार्थिव शवों को लाहौर जेल से रात के समय लोगों के रोष को देखते हुए चोरी चुपके लाया गया फांसी के बाद और मिट्टी का तेल छिड़क आग लगा दी जैसे कोई अनजान लोग हों -भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव । दूसरे दिन भगत सिंह की माता विद्यावती अपनी बेटी अमर कौर के साथ रोती हुई पहुंची और उस दिन के द ट्रिब्यून अखबार के पन्नों में राख समेट कर वे ले आई तीनों की जो आज भी शहीद स्मारक में ज्यों की त्यों रखी है । यही नहीं स्मारक भगत सिंह जो डायरी लिखते थे और कलम दवात भी रखी हैं।  मानो अभी कहीं से भगत सिंह आयेंगे और अपनी ज़िंदगी की कहानी फिर से और वहीं से लिखनी शुरू कर देंगे , जहां वे छोड़ कर गये थे । इनकी सबसे बड़ी बात कि इन्होंने अपने से पहले शहीद हुए सभी शहीदों की वो गलतियां डायरी में लिखीं जिनके चलते वे पकड़े गये थे । जाहिर है कि वे इतने चौकन्ने थे कि उन गलतियों को दोहराना नहीं चाहते थे ।  वैसे यह कितनी बड़ी सीख है हमारे लिए कि हम भी अपनी ज़िंदगी में बार बार वही गलतियां न दोहरायें ।

अब बात आती है कि आखिर कैसे और क्यों भगत सिंह क्रांतिकारी बने या क्रांति के पथ पर चले ? शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने किसान आंदोलन पगड़ी संभाल ओए जट्टा में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जिसके चलते उन पर अंग्रेज सरकार की टेढ़ी नज़र थी । उन्हें जेल में ठूंसा गया दबाने के लिए । इनके पिता किशन सिंह भी जेल मे थे । जब इनका जन्म हुआ तब पिता और चाचा जेल से छूटे तो दादी ने इन्हें भागां वाला कहा यानी बहुत किस्मत वाला बच्चा । जिसके आने से ही पिता और चाचा जेल से बाहर आ गये । इस तरह इसी भागां वाले बच्चे का नाम आगे चल कर भगत सिंह हुआ ।

फिर इनके बचपन का यह किस्सा भी बहुत मशहूर है कि पिता किशन सिंह खेत में हल चलाते हुए बिजाई कर रहे थे और पीछे पीछे चल रहे थे भगत सिंह । उन्होंने अपने पिता से पूछा कि बीज डालने से क्या होगा ?

-फसल।  यानी ज्यादा दाने ।

-फिर तो यहां बंदूकें बीज देते हैं जिससे ज्यादा बंदूकें हो जायें और हम अंग्रेजों को भगा सकें ।

यह सोच कैसे बनी और क्यों बनी ? इसके पीछे बाल मनोविज्ञान है ।

इनके चाचा अजीत सिंह ज्यादा समय जेल में रहते और चाची हरनाम कौर रोती बिसूरती रहती या उदास रहतीं । बालमन पर इसका असर पड़ा और चाची से गले लग कर वादा करता रहा कि एक दिन इन अंग्रेजों को सबक जरूर सिखाऊंगा । इनके चाचा अजीत सिंह उस दिन डल्हौजी में थे जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ और उसी दिन वहीं उनका खुशी में हृदय रोग से निधन हो गया । डल्हौजी में उनका स्मारक भी बनाया गया है जिसे देखने का सौभाग्य वहां जाने पर मिला था ।

परिवार आर्य समाजी था और इनके दादा अर्जुन सिंह भी पत्र तक हिंदी में लिखते थे जो अनेक पुस्तकों में संकलित हैं । भगत सिंह के परिवार के बच्चों के यज्ञोपवीत भी हुए । इस तरह पहले से ही यह परिवार नयी रोशनी और नये विचारों से जीने में विश्वास करता था जिसका असर भगत सिंह पर भी पड़ना स्वाभाविक था और ऐसा ही हुआ भी ।

इस तरह क्रांति के विचार बालमन में ही आने लगे । फिर जब जलियांवाला कांड हुआ तो दूसरे दिन बालक भगत अपनी बहन बीबी अमरकौर को बता कर अकेले रेलगाड़ी में बैठकर  अमृतसर निकल गया और शाम को वापस आया तो वहां की मिट्टी लेकर और फिर वह विचार प्रभावी हुआ कि इन अंग्रेजों को यहां से भगाना है । उस समय भगत सिंह मात्र तेरह साल के थे । बीबी अमर कौर उनकी सबसे अच्छी दोस्त जैसी थी । वह मिट्टी एक मर्तबान में रख कर अपनी मेज पर सजा ली ताकि रोज़ याद करें इस कांड को । इस तरह कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गयीं । भगत सिंह करतार सिंह सराभा को अपना गुरु मानते थे और उनकी फोटो हर समय जेब मे रखते थे । उन्हें ये पंक्तियां बहुत पसंद थीं

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर

हमको भी मां बाप ने पाला था दुख सह सह कर ,,,

दूसरी पंक्तियां जो भगत सिंह को प्रिय थीं और गुनगुनाया करते थे :

सेवा देश दी करनी जिंदड़िये बड़ी औखी

गल्लां करनियां ढेर सुखलियां ने

जिहना देश सेवा विच पैर पाया

उहनां लख मुसीबतां झल्लियां ने,,, स्कूल की पढ़ाई के बाद जिस काॅलेज में दाखिला लिया वह था नेशनल काॅलेज , लाहौर जहां देशभक्ति घुट्टी में पिलाई जा रही थी । यह काॅलेज क्रांतिकारी विचारकों ने ही खोला था जिनमें संभवतः लाला लाजपतराय भी एक थे । उस घुट्टी ने बहुत जल्द असर किया । वैसे भगत सिंह थियेटर में भी दिलचस्पी रखते थे और लेखन में भी । इसी काॅलेज में वे अन्य क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आए और जब लाला लाजपतराय को साइमन कमीशन के विरोध करने व  प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल किया गया तब ये युवा पूरे रोष में आ गये । स्मरण रहे इन जख्मों को पंजाब केसरी लाला लाजपत राय सह नहीं पाये और वे इस दुनिया से विदा हो गये । लाला लाजपतराय की ऐसी अनहोनी और क्रूर मौत का बदला लेने की इन युवाओं ने ठानी । सांडर्स पर गोलियां बरसा कर जब भगत सिंह लाहौर से निकले तो थियेटर का अनुभव बड़ा काम आया और वे दुर्गा भाभी के साथ हैट लगाकर साहब जैसे लुक में बच निकले । दुर्गा भाभी की गोद में उनका छोटा सा बच्चा भी था । इस तरह किसी को कोई शक न हुआ। भगत सिंह का यही हैट वाला फोटो सबसे ज्यादा प्रकाशित होता है ।

इसके बाद यह भी चर्चा है कि घरवालों ने इनकी शादी करने की सोची ताकि आम राय की तरह शायद गृहस्थी इन्हें सीधे या आम ज़िंदगी के रास्ते पर ला सके लेकिन ये ऐसी भनक लगते ही भाग निकले । क्या यह कथा सच है ? ऐसा सवाल मैंने आपकी माता विद्यावती से पूछा था तब उन्होंने बताया थे कि सिर्फ बात चली थी । कोई सगाई या कुड़माई नहीं हुई न कोई रस्म क्योंकि जैसे ही भगत सिंह को भनक लगी उसने भाग जाना ही उचित समझा ।  तो  क्या फ़िल्मों में जो गीत आते हैं वे झूठे हैं ?

जैसे : हाय रे जोगी हम तो लुट गये तेरे प्यार में ,,,इस पर माता ने कहा कि फिल्म चलाने के लिए कुछ भी बना लेते हैं । वैसे सारी फिल्मों में से मनोज कुमार वाली फिल्म ही सही थी और मनोज कुमार मेरे से आशीर्वाद लेने भी आया था ।

खैर भगत सिंह घर से भाग निकले और कानपुर जाकर गणेश शंकर विद्यार्थी के पास बलवंत नाम से पत्रकार बन गये । उस समय पर इनका लिखा लेख -होली के दिन रक्त के छींटे बहुचर्चित है । और भी लेख लिखे । मै हमेशा कहता हूं कि यदि भगत सिंह देश पर क़ुर्बान न होते तो वे एक बड़े लेखक या पत्रकार होते । इतनी तेज़ कलम थी इनकी ।

इसके बाद इनका नाम आया बम कांड में । क्यों चुना गया भगत सिंह को इसके लिए ? क्योंकि ये बहुत अच्छे वक्ता थे और इसीलिए योजना बनाई गयी कि बम फेंककर भागना नहीं बल्कि गिरफ्तारी देनी है । भगत सिंह ने अदालत में लगातार जो विचार रखे वे अनेक पुस्तकों में सहेजे गये है और यह भी स्पष्ट किया कि हम चाहते तो भाग सकते थे लेकिन हम तो अंग्रेजी सरकार को जगाने आये थे । दूसरे यह गोली या बम से परिवर्तन नहीं आता लेकिन बहरी सरकार को जगाने के लिए इसे उपयोग किया गया ।  इस तरह यह सिद्ध करने की कोशिश की गयी कि हम आतंकवादी नहीं बल्कि क्रांतिकारी हैं । भगत सिंह की एक पुस्तिका है-मैं नास्तिक क्यों हूं ? यह खूब खूब बिकती है और पढ़ी जाती है । भगत सिंह हरफनमौला और खुशमिजाज युवक थे । इनके साथी राजगुरु और सुखदेव भी फांसी के हुक्म से जरा विचलित नहीं हुए और किसी प्रलोभन में नहीं आए । अनेक प्रलोभन दिए गये । आखिरी दिन तक प्रलोभन दिये जाते रहे लेकिन भारत माता के ये सपूत अपनी राह से बिल्कुल भी पीछे न हटे । डटे रहे ।

भगत सिंह पुस्तकें पढ़ने के बहुत शौकीन थे और अंत तक जेल में अपने वकील या मिलने आने वालों से पुस्तकें मंगवाते रहे । आखिर जब फांसी लगने का समय आया तब भी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब बुलावा आया कि चलो । तब बोले कि ठहरो, अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है । अपने छोटे भाई कुलतार को भी एक खत में लिखा था कि पढ़ो , पढ़ो, पढ़ो क्योकि विचारों की सान इसी से तेज़ होती है ।

बहुत छोटी उम्र मे  23 मार्च, 1931 में फांसी का फंदा हंसते हंसते चूम लिया । क्या उम्र होती है मात्र तेईस साल के आसपास । वे दिन जवानी की मदहोशी के दिन होते हैं लेकिन भगत सिंह को जवानी चढ़ी तो चढ़ी आज़ादी पाने की ।

फिर भी रहेंगी कहानियां ,,

तुम न रहोगे , हम न रहेंगे

फिर भी रहेंगी कहानियां,,

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ “तुम गये…सब गया!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

 

☆ जीवन यात्रा ☆ “तुम गये…सब गया!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके

सपनों की उडान भरना कोई गुनाह तो नहीं! भला आसमां को हमारी उडान से क्या दिक्कत थी? हम सिर्फ आसमां छूना चाहते थे! हमारा आशियाना तो हम जमींपर बनाने वाले थे…या किसी पेड पर! आसमां अच्छी तरह जानता है…यह सफर अकेले तय नहीं किया जा सकता!

उसके साथ हाथों में लिये हाथ…अग्नि के फेरे लगाने के ख्वाब मन में लिये मैं प्रतीक्षा कर रही थी. खबर मिली की वो आ रहा है…! यह किसी ने नहीं बताया… कि कैसे?

अग्नि तो प्रदीप्त हुई… और वह आगे भी बढा…लेकिन मैं उसके साथ फेरे नहीं ले सकती थी. पहले चिता से धुआं उठा…और मैंने देखा.. .मेरे अरमां जल रहे थे! उसको गले लगा भी लेती तो कैसे? अब तो वह अग्नि की बाहों में था…शांत, क्लांत! उसकी बंद आंखों के पीछे उसने क्या कुछ संजो कर रखा होगा…शायद परिवार की यादे…और मेरी याद भी! उसका देखना अब खत्म…और मेरा देखते रहना आरंभ हो चुका था… लेकिन यह मोहलत कुछ पलों में थम जानी थी… आग की लपटे… न जाने उन्हें किस बात की जल्दी थी… कि उसे राख बनाने में जरा भी देर उन्हें मंजूर न थी!

वह मेरा भी था… लेकिन दुनिया की व्यवस्था की दृष्टि से उस पर मेरी मुहर लगी नहीं थी… इसलिये उसकी चिता से दूरी बनाकर खडी रही मैं… जो तस्वीर दिल में थी… उसका भौतिक रूप मेरे हाथों में धर चुपचाप खडी रही! लेकिन आंसू बतिया रहे थे… बयां कर रहे थे… जो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती थी.

बदन पर हमने ऐसा कुछ पहन रखा होता है… जो हमें खुलकर रोने की इजाजत नहीं देता. और उसे भी तो रोना रुलाना पसंद नहीं था… उसकी हंसी हवा का वो झोंका होती था… जो दिल को पल में आसमां छूने ले जाता था… अब उसके दामन से हवा भी नहीं आ रही… जिसे मैं सलाम पेश करूं!

उसकी राख मांग में भरने का इंतजार करवायेगी यह चिता… अगली सुबह तक. बीच में एक लंबी रात तो होगी… जो शायद कभी खत्म ही नहीं होगी अब!

हिसाब लगाने बैठ जाऊं तो पता है… हाथों में कुछ न बचेगा… तुम गये… सब गया… यही अब सच है!

जी तो करता है कि मैं भी तुम्हारे साथ हो लूं… लेकिन मेरा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता… कर्तव्य का धर्म!

हम वर्दी वाले जानते है… ऐसा भी हो सकता है… कि जिंदगी का दामन हाथों से छूट जाये! या फिर कोई साथी बिछड जाये… हम उडान रोक नहीं सकते!

अग्नि शांत होगी… मैं माथे पर मांग में उसकी राख रच लूंगी और दुसरे ही क्षण एक लंबी, उंची उडान भरूंगी… वो आसमां में तारा जो बन गया है… उसे नजदीक से देखना जो है!   

(कुछ दिन पूर्व देश ने दो वीर वैमानिक खो दिये. Flight Lieutenant पूर्वेश दुरगकर और Squadron Leader अनुज वशिष्ट. इन में से अनुज जी का विवाह एक पायलट युवती से निश्चित हुआ था, पर दुर्भाग्य से उनका यह सपना अधुरा रह गया. खैर, जिंदगी तो चलती रहेगी… निर्णय लिये जायेंगे. लेकिन देश सेवा में रत सैनिक और उनके परिजन जो त्याग करते है… उसकी किसी से भी तुलना नहीं हो सकती. मां-बाप, भाई-बहन का दुख तो बडा हैं ही… पर जिस युवती ने अपने सुखी जीवन के सपने संजोये होते है… उस पे क्या बीतती है… यह वही जान सकता है. इस लेख में उसकी मनोदशा चित्रित करने की कोशिश की गयी है… सिर्फ यह कहने के लिये… कि हमारे देश की रक्षा करने वाले अपने निजी जीवन में क्या क्या खोते हैं? हमें उनके प्रति सदैव आभारी रहना चाहिये. इन दोनों सपूतों को भावभीनी श्रद्धांजली. उनके परिवार के प्रति संवेदना और उस युवती के उज्ज्वल भविष्य के लिये शुभकामनाएं! 💐)

जय हिंद. जय हिंद की सेना!

 साभार – चित्र इन्टरनेट से

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ व्यक्तित्व-पाठकों को समर्पित व्यंग्यकार – विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ श्री सुनील जैन राही ☆

श्री सुनील जैन राही

 

☆ जीवन यात्रा ☆ व्यक्तित्व-पाठकों को समर्पित व्यंग्यकार – विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ श्री सुनील जैन राही ☆

व्यंग्य का संक्रमण काल है या स्वर्ण काल? तय है कि व्यंग्य की चर्चा और व्यंग्य जितना लिखा जा रहा उससे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। थोथा भ्रम है कि व्यंग्य पढ़ा नहीं जा रहा है, यदि ऐसा होता तो व्यंग्यकार कुछ भी लिखकर इतिश्री कर देते। जरा सी चूक व्यंग्यकार को थाना दर्शन करवा सकती है। जरूरी नहीं कि कबीर की तरह प्रहार किया जाए, प्रहार आप वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव की तरह भी कर सकते हैं। सांप भी मर जाए और व्यंग्यकार भी बच जाए। व्यंग्य अगर पढ़ा नहीं जा रहा होता तो व्यंग्य का कालम अखबार की मजबूरी न बन जाता? अखबार 16 पेज का हो या चार पेज का उसमें व्यंग्य की मौजूदगी तय करती है कि उसकी आवश्यकता सम्पादकीय से कम नहीं है। पाठक अखबार पढ़ते समय पाठक हत्या, बलात्कार, राजनीति, युद्ध और प्रेम के अलावा कुछ ऐसा पढ़ना चाहता है जिससे, वह क्षणिक आनंद या भावविभोर हो सके।

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र”

विशेष बात आज व्यंग्यकाल में एक ऐसे व्यंग्यकार भी जो व्यंग्य को पढ़ने-पढ़ाने के लिए समर्पित है। विवेक रंजन श्रीवास्तव स्वांत सुखाय के साथ-साथ पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे कितने साहित्यकार हैं जो अपनी लाइब्रेरी आम आदमी के लिए खोलकर बैठे हैं? यह कोई नहीं जानना चाहता कि किताब को कितना पढ़ा, कितने फोन आए, कितने मेसेज आए? किसी संस्था को पुस्तकें भेंट कर देना अलग बात है, लेकिन पुस्तक पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना उससे भी श्रेष्ठ कार्य है।

जबलपुर की भूमि आधुनिक व्यंग्य की कर्मभूमि कही जा सकती है। वैसे तो मध्य प्रदेश व्यंग्य की भूमि है, जहां व्यंग्यकारों की उपज बिना खाद-पानी के होती है। इलाका कोई सा भी हो। छोटे से छोटे गांव में दमदार व्यंग्यकार दिखाई दे जाएंगे। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हर व्यंग्यकार को जमीन नहीं मिलती, मंच नहीं मिलता, माइक नहीं मिलता, लेकिन वह पूरी तन्मयता से व्यंग्य उगाने में लगा रहता है। विवेक रंजन श्री वास्तव को जमीन, माइक और मंच भी मिला। लेखन में निस्वार्थ भाव से लगे रहे हैं। खासियत है-व्यंग्य पढ़ना और उसके बारे में अखबारों में सटीक समीक्षा के माध्यम से उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना, व्यंग्य समारोह में शिरकत करना अपनी बात रखना और व्यंग्य के क्षेत्र में पदार्पण कर रहे व्यंग्यकारों को मुफीद जमीन दिखाना, वे कर्तव्य मान सक्रिय अवदान के लिए सदैव तत्पर रहते आए हैं।

विवेक रंजन केवल व्यंग्य के लिए काम करते हैं? व्यंग्य के पाठकों के लिए काम करते हैं, इसके लिए उन्होंने अपने घर पर डिब्बा लाइब्रेरी का संयोजन कर रखा है। पुस्तक उठाओ, घर ले जाओ, पढ़ो और फिर उसी बाॅक्स में रख दो। कोई इंट्री नहीं, कोई खतोकिताबत नहीं बस केवल समर्पण ही समर्पण। समीक्षा के लिए यह जरूरी नहीं कि उन्हें दो प्रतियां दी जाएं? उसके बाद ही उस कृति पर कलम दौड़ायेंगे। स्वयं किताबें खरीदकर गुणवत्ता और लेखक के कर्म को विस्तार से रुचिकर बनाते हुए प्रस्तुत करने की कला में माहिर है। यही कारण है कि उनके पाठक दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं यानी उनके माध्यम से व्यंग्य के पाठकों की वृद्धि दिन पर दिन हो रही है। इस महती कार्य के लिए व्यंग्य जगत निश्चित रूप से उनका ऋणी हैं। एक चैनल से ज्यादा वे व्यंग्य पाठक तैयार कर रहे हैं, व्यंग्य के पाठक।

वर्तमान परिवेश में अपनी पुस्तक तो हर कोई पढ़वाना चाहता है, लेकिन स्वयं दूसरे की पुस्तक पढ़कर दो शब्द लिखने की जहमत उठाना पसंद नहीं करता। पुस्तक पसंद आती तो संदर्भ के लिए लाइब्रेरी में सहेज कर रख लेता है। सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करने में कोताही बरतता है। वहीं विवेक जी इस कार्य में दक्षता के साथ सारे जहां में उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं।

विवेक जी केवल व्यंग्य पुस्तकों की बात नहीं करते, वे व्यंग्य आलोचना पर भी सिद्धहस्त हकदार माने जाते हैं। इस पुस्तक मेले (2026) व्यंग्य आलोचना पर श्री राहुल देव की पुस्तक आना थी, आई, डाॅ0 अतुल चतुर्वेदी की पुस्तक आना थी, लेकिन नहीं आ पाई। आ0 श्री सुभाष चन्दर की आलोचना पर पुस्तक आना थी, वह भी नहीं आई। डाॅ0 संजीव कुमार की व्यंग्य आलोचना पर कई पुस्तकें आईं, जिसमें व्यंग्य का इतिहास भी शामिल है-यह पुस्तक तो पढ़ने के बाद ही बता पाएगी कि श्री सुभाष चन्दर के लिखे व्यंग्य साहित्य से इतिहास कितना आगे या फिर…..?

बात विवेक रंजन श्रीवास्तव की- आलोचना पर आई पुस्तक ‘‘व्यंग्यः कल, आज और कल।’’ व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य के अलावा व्यंग्य के अन्य पहलुओं पर चर्चा प्रस्तुत करती है। व्यंग्य को वर्तमान की धरोहर मानने वालों को चुनौती पेश करती है कि व्यंग्य कल भी था आज भी और कल भी रहेगा। बिना उदाहरण के पुस्तक पर बात करना समझदारी नहीं है।

लखन कहा सुनु भृगकुल भूषण।

भट भटेश भय बिभूषण।।

कोटिन कोटि कपि केसरी नंदन।

समर भांति करिहहिं समंदन।।’’

– बालकाण्ड

तीखा व्यंग्य जो लक्ष्मण द्वारा कहा गया। महाभारत काल की बात अक्सर व्यंग्यकार करते पाए जाते हैं, लेकिन इस प्रकार का उदाहरण कदाचित ही प्राप्त होता है। विवेक जी कबीर काल की बात करते हैं, नरेन्द्र कोहली की बात करते हैं। भला परसाई और जोशी के बिना हिन्दी व्यंग्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। एक बात अवश्य विचारणीय है कि यह पुस्तक व्यंग्य पाठकों के लिए किसी हीरे से कम नहीं है। व्यंग्यकार, व्यंग्यकारों की बात करते हैं, लेकिन विवेक जी ने नागार्जुन के कवित्त में जो व्यंग्य बसा हुआ है उस पर चर्चा करके अचंम्भित कर दिया है। कविता में व्यंग्य की चर्चा कम ही पाई जाती है।

कुत्ता बैठा कार में, मानव मांगे भीख।

मिस्टर दुर्जन दे रहे, सज्जनमल को सीख।।

विवेक जी व्यंग्य साहित्य में महिला हस्तक्षेप को विस्तार से देखते हैं। आज जिस प्रकार महिलाओं का व्यंग्य क्षेत्र में जबरदस्त पदार्पण देखा जा रहा है, वह व्यंग्य के लिए सुखद पहलु है। नारी दृष्टि की अवलोकन क्षमता मात्र पुरूष पर न हो कर आसपास की विसंगतियों की सूक्ष्म पड़ताल तक जा पहंचती है।

यह तो तय है हिन्दी नाटक में व्यंग्य की वह प्रखर अनुभूति नहीं मिलती जो मराठी नाट्य संसार में देखने को आसानी से मिल जाती है। यह दीगर बात है कि मराठी नाटकों में अधिकांशतः फार्स के माध्यम से बात कही जाती है। बहरहाल हिन्दी नाटकों में व्याप्त व्यंग्य के कुछ चर्चित नामों का भी उल्लेख है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ व्यंग्यकार होने के साथ-साथ व्यंग्य पाठको को समर्पित करने वाले एक मात्र व्यक्ति हैं। जो व्यंग्य लिखने से लेकर पाठकों तक पहुंचाने तक का श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-            

श्री सुनील जैन राही

पालम गांव

मो -9810 960 285

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/ सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन-यात्रा ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – मेरी स्मृतियों में – पुण्य स्मरण ☆ श्री प्रेम नारायण शुक्ला ☆

श्री प्रेम नारायण शुक्ला

☆ जीवन-यात्रा – डॉ. सुमित्र विशेष – पुण्य स्मरण ☆ श्री प्रेम नारायण शुक्ला

मेरे पितृतुल्य ससुर जी से मुझे अपार स्नेह और दुलार मिला। मेरे अपने पिता का अवसान बहुत जल्दी हो गया था, इसलिए उनका सान्निध्य अधिक समय तक नहीं मिल सका। ऐसे में जब जीवन ने मुझे पिता समान ससुर जी का साथ दिया, तो लगा जैसे ईश्वर ने उस रिक्तता को भर दिया हो। उन्हें पाकर मेरा जीवन सचमुच धन्य हो गया।

उनके पास बैठना, उनसे बातें करना, साहित्य के विषय में उन्हें सुनना मेरे लिए अत्यंत आनंददायक होता था। यद्यपि मुझमें साहित्यिक संस्कार नहीं हैं, फिर भी उनकी कविताएँ सुनना, उनके विचारों को जानना मन को समृद्ध कर देता था। जब भी जबलपुर जाना होता, ऐसा लगता मानो पिता का स्नेह फिर से प्राप्त हो रहा हो।

मम्मी के जाने के बाद पापा ने ही माँ और पिता-दोनों का दुलार दिया। जबलपुर के साहित्यिक आयोजनों में उनके साथ जाना, बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिलना, उनके साथ कार्यक्रमों में उपस्थित होना-ये सभी अनुभव मेरे लिए गर्व और सौभाग्य के क्षण थे।

आज पापा नहीं हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जीवन का एक बड़ा सहारा चला गया हो। उनकी कमी हर पल महसूस होती है। अब उनके स्मरण और उनकी यादों को सहेजकर रखना ही हमारे लिए आत्मिक श्रद्धांजलि है। 🙏

© श्री प्रेम नारायण शुक्ला 

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन-यात्रा ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – मेरे पिता मेरा गौरव…☆ डॉ हर्ष कुमार तिवारी ☆

डॉ हर्ष तिवारी 

? जीवन-यात्रा ?

☆ मेरे पिता मेरा गौरव…☆ डॉ हर्ष कुमार तिवारी ☆ 

मेरे पिता मेरे लिए सम्मान और गौरव का स्रोत हैं। उनके व्यक्तित्व में साहित्य केवल रुचि नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार था हां मैंने  जो सहज रूप से मुझ तक आया। शब्दों के प्रति आदर, विचारों की शुचिता और अभिव्यक्ति की मर्यादा मैंने पिता से ही पाई।

संस्कारधानी जबलपुर की साहित्यिक परंपरा में आज भी पिता का नाम आदर के साथ लिया जाता है। उनकी लेखनी, उनका वैचारिक अनुशासन और साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा एक ऐसी धरोहर है, जिसे सहेजना मेरा दायित्व है।

मैं स्वयं को उनका पुत्र कहने में गौरव अनुभव करता हूँ। पिता ने जो साहित्यिक संस्कार और धरोहर दी, उसे आगे बढ़ाना ही मेरी साधना है और यही मेरी सच्ची श्रद्धांजलि। 

© डॉ. हर्ष कुमार तिवारी

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ जन्मदिवस विशेष – “कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़  अवश्य ही होंगे…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ जीवन यात्रा – कहीं न कहीं हरे-भरे पेड़  अवश्य ही होंगे☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(कथा बिम्ब में छः वर्ष पूर्व प्रकाशित मेरी आत्मकथा)

बहुत वर्ष पहले ‘कथा बिम्ब’ के भाई अरविंद  ने आत्मकथ्य लिखने का प्रेमपूर्वक आग्रह किया था । तब लिख नहीं पाया । पत्रकारिता ने बहुत कुछ पीछे ठेल रखा था । अब पूरी तरह सेवानिवृत्त और स्वतंत्र पत्रकारिता व लेखन का समय मिला तो अपने बारे में लिखने का अवसर भी मिल गया ।

मैं मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा जिले से हूं । इसमें शहीद भगतसिंह का पैतृक गांव खटकड  कलां भी शामिल होने के कारण पंजाब सरकार ने अब इस जिले का नाम शहीद भगतसिंह नगर कर दिया है । मुझे बहुत गर्व है कि शहीद भगतसिंह की स्मृति में पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा खोले गये गवर्नमेंट आदर्श सीनियर सेकेंडरी स्कूल में सन् 1979 में मुझे हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला । सन् 1985 में मुझे कार्यवाहक प्रिंसिपल बना दिया गया । इस तरह शहीद के परिवार सदस्यों से मुलाकातें भी होती रहीं । मेरा लेख ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ : शहीद भगतसिंह के पुरखों का गांव ।

खैर । पढाई से बात शुरू करता हूं । जो लडका बड़ा होकर स्कूल प्रिंसिपल बना और स्कूल को सर्वश्रेष्ठ स्कूल का पुरस्कार दिलाया , वही लड़का कभी पांचवीं कक्षा तक स्कूल का भगौड़ा लड़का था । पिता जी छोड़ कर जाते और कुछ समय बाद बेटे को देखने आते तो पता चलता कि बरखुरदार फट्टी बस्ता रख कर भाग चुके हैं । पिताजी का माथा ठनकता और उनकी छठी इंद्री बताती कि हो न हो , यह लड़का छोटी जाति के नौकर के घर जा छिपा है । वे वहां पहुंचते और थप्पडों से मुंह लाल कर घर ले आते । फिर ठिकाना बदलता और फिर खोजते । फिर वहीं थप्पडों से बेहाल । पिता जी , दादी और घर के लोग यह मानते कि यह बच्चा नहीं पढ़ेगा । दादा जी कहते कोई बात नहीं । गांव में तीन तीन भैंसे हैं । बस । कोई गम नहीं । खेतों में चराने चले जाना । मैं मन ही मन इस काम से भी कांप जाता । भैंस चराने का गुण आया ही नहीं।

थोड़ा बड़ा हुआ तो दादी को हमारे चचा के लडके शाम ने बताया कि दादी, एक बह्मीबूटी आती है । इसे रोज सुबह पिला दो । उसने पंसारी की दुकान से ला दी । दादी ने खूब घोट कर पिलाई । साथ में वृहस्पतिवार के व्रत ताकि देवता की कृपा हो जाए । पता नहीं , देवता खुश हुए या बूटी असर कर गयी कि मैं मिडल क्लास में सेकेंड डिवीजन में पास हो गया । दादी ने परात में लड्डू रखे और खुशी में मोहल्ले भर में बांटे ।

यह है मेरी पढ़ाई का हाल । ग्यारहवीं तक मेरे पिता,  दादा और दादी का निधन हो चुका था जो मुझे पढाई में सफल देखना चाहते थे । मैं इतना सफल हुआ कि तीनों वर्ष कॉलेज में प्रथम रहा । पर अफसोस अब कोई परात भर कर लडडू बांटने वाला नहीं था । मैं कमरा बंद कर खूब रोता अपनी ऐसी सफलता पर जिसे कोई देखने वाला नहीं था । महाविद्यालय की पत्रिका का छात्र संपादक भी रहा । यहीं से संपादन में रूचि बढ़ी । फिर बीएड में भी छात्र संपादक । इसी प्रकार गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की प्रभाकर परीक्षा में स्वर्ण पदक पाया । हिंदी एम ए की हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में ।

बात साहित्य की करें । मेरे परिवार का साहित्य से दूर दूर तक नाता नहीं था लेकिन ‘हिंदी मिलाप’ अखबार प्रतिदिन घर में आता था , जिसे मैं जरूर पढता था । उसमें फिक्र तौंसवीं का व्यंग्य काॅलम ‘प्याज के छिलके’  बहुत पसंद आता । ‘वीर प्रताप’ अखबार ने मुझे नवांशहर का बालोद्यान का संयोजक बना रखा था । यह अखबार इस नाते फ्री घर में डाला जाता था । इस तरह दो अखबार पढने को मिलते । रेडियो खूब सुनता । बाल कहानियों को जरूर सुनता । दादी भी सर्दियों में अंगीठी के आसपास बिठा कर कहानियां सुनाती । वही राजकुमार,  राजकुमारियों के किस्से । पर हर राजकुमार किसी न किसी राजकुमारी को राक्षस की चंगुल से छुडाकर लाता । बस  । ‘दरवाजा कौन खोलेगा’ कथा संग्रह में मैंने भूमिका में यही लिखा कि हर जगह राक्षस है । राजकुमारी कैद है । राजकुमार का संघर्ष है । यही जीवन है ।

मेरी पहली रचना ‘नयी कमीज’ जनप्रदीप समाचार-पत्र में प्रकाशित हुई । पिता जी मेरी पुरानी कमीज नौकर के बेटे के लिए ले गये थे । वह गांव भर में नाचता फिरा और मन ही मन शर्मिंदा होकर सोचता रहा कि हमारी उतरन भी नौकर के बेटे की खुशी का कारण बन सकती है ? समाजसेवा का भाव जगा । मैं सन् 1979 से लेकर 1990 तक खटकड कलां में प्रिंसिपल रहा । साथ में चंडीगढ से प्रकाशित ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का आंशिक संवाददाता भी । मेरी रूचि साहित्य के साथ साथ पत्रकारिता में जुनून की हद तक बढती चली गयी । मेरे पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर लिखी : एक संवाददाता की डायरी कहानी को सारिका में तो नीले घोडे वाले सवारों के नाम’, कहानी को धर्मयुग ने जुलाई,  1982 के अंकों में प्रकाशित किया । पहली बार पता चला कि लेखक की फैन मेल क्या होती है । प्रतिदिन औसतन दो तीन पत्र इन कहानियों पर मिलते । तब मैंने सोचा कि कम लिखो और कोशिश कर अच्छा लिखो । इसी प्रकार ‘कथा बिम्ब’ में प्रकाशित कहानी : सूनी मांग का गीत पर भी अनेक पत्र मिले । कमलेश्वर, धर्मवीर भारती,   अज्ञेय व श्रीपत राय के संपादन में कहानियां प्रकाशित होने का सुख मिला । श्रीपत राय ने तो एक वर्ष में मेरी आठ कहानियां प्रकाशित कीं । मुलाकात के दौरान उलाहना दिया कि बारह कहानियां क्यों नहीं लिखीं ? इस प्रोत्साहन से ज्यादा क्या चाहिए ? ज्यादा लेखन का कोई तुक नहीं । मेरे कथा संग्रह बडे़ रचनाकारों के सुझावों पर प्रकाशित हुए । बिना कुछ रकम दिए ।

सन् 1975 में मैं केंद्रीय हिंदी निदेशालय की ओर से अहिंदी भाषी लेखकों के अहमदाबाद में एक सप्ताह के लिए लगने वाले लेखक शिविर के लिए चुना गया । तब राजी सेठ वहीं रहती थीं और उन्होने भी इस शिविर में भाग लिया और उनकी पहली कहानी ‘क्योंकर’ कहानी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । राजन सेठ के नाम के नाम से । लड़कों जैसा नाम होने के कारण उन्होंने अपना नाम राजी सेठ कर लिया । विष्णु प्रभाकर  हमारी कहानी की क्लास लेते थे । इन दोनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय तब से चला आ रहा है । विष्णु जी के बाद उनके परिवार से जुड़ा हुआ हूं । विष्णु जी के अनेक इंटरव्यूज प्रकाशित किए । तीन बार आमंत्रित भी किया क्योंकि संयोगवश हिसार पोस्टिंग हो जाने पर पता चला कि हिसार में अपने मामा के पास विष्णु जी ने पढ़ाई की । नौकरी की और साहित्यिक यात्रा शुरू की । बीस वर्ष यहीं गुजारे पर सीआईडी के पीछे लग जाने से दिल्ली चले गये और फिर नहीं लौटे । हां , हिसार के प्रति लगाव बहुत अधिक । आमंत्रण पर नंगे पाँव दौड़े आते । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के कथा समारोह में आए । जब उन्हें मान सम्मान की राशि का लिफाफा सौंपा तो स्नेह से भावुक होकर बोले -तेरे जैसा शिष्य भी सौभाग्य से मिलता है ।

मेरे जीवन में कहानी लेखन में रमेश बतरा का बहुत बडा योगदान है । चंडीगढ हम लोग इकट्ठे होते और रमेश का कहना था कि यदि एक माह में एक कहानी नहीं लिखी तो मुंह मत दिखाना । लगातार नयी कहानी। फिर वह ‘सारिका’ में उपसंपादक बन कर चला गया । जहां भी संपादन किया मेरी रचनाएं आमंत्रित कीं ।  ‘कायर’ लघुकथा उसके दिल के बहुत करीब थी । वह कहता था कि यदि मैं विशव की श्रेषठ लघुकथाओं को भी चुनने लगूं तो भी इसे रखूंगा । वरिष्ठ कथाकार राकेश वत्स की चुनौती भी बडी काम आई । वे एक ही बार नवांशहर आए और  देर रात शराब के हल्के हल्के सरूर में जब चहलकदमी के लिए निकले तब वत्स ने मुझे और मुकेश सेठी को  कहा कि मैं आपको कहानीकार कैसे मान लूं ? आपकी कहानियां न सारिका में , न धर्मयुग और हिंदुस्तान में आई हैं । फिर रमेश को बताया । उसने भी कहा कि वत्स की इस बात को और  चुनौती को स्वीकार करो । फिर क्या था ? सारिका, नया प्रतीक,  कहानी में स्थान मिला । अनेक अन्य भाषाओं में कहानियां अनुवादित हुईं  । रमेश असमय चला गया । अब कोई दबाव नहीं । कोई चुनौती भी नहीं । कहानी भी नहीं । पहला कथा संग्रह ‘महक से ऊपर’ राजी सेठ के स्नेह से डाॅ महीप सिंह ने प्रकाशित किया : अभिव्यंजना प्रकाशन से । ‘महक से ऊपर’ । रॉयल्टी भी मिली और पंजाब भाषा विभाग से सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार भी । पहली कृति पर पुरस्कार और रॉयल्टी । नये कथाकार को और क्या चाहिए ?

सन् 1990 में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के संपादक राधेश्याम शर्मा और समाचार संपादक सत्यानंद शाकिर दैनिक ट्रिब्यून में मुझे पूर्णकालिक चाहते थे । मार्च माह की पहली तारीख को प्रिंसिपल,  शिक्षण व अध्यापन को अलविदा कहने के बाद पत्रकारिता में आ गया । ‘दैनिक ट्रिब्यून’ का कथा कहानी पन्ना संपादित करने का अवसर मिला । कश्मीर से दिल्ली तक के कथाकारों से काफी जानने और मिलने का मौका मिला । कथा व लघुकथा को विशेष स्थान दिया । इस बीच मेरे लघुकथा संग्रह मस्तराम जिंदाबाद,  इस बार तो कथा संग्रह मां और मिट्टी,  जादूगरनी , शो विंडो की गुडिया आदि प्रकाशित हुए । मजेदार बात है कि साहित्य में मुझे लघुकथाकार ही समझा जा रहा है जबकि मेरे छह कथा संग्रह हैं । जहां तक कि ग्रंथ अकादमी के लिए कथा संकलन संपादित करने वाले ज्ञान प्रकाश विवेक मेरा कथा संग्रह दरवाजा कौन खोलेगा पढ कर हैरान रह गये और फोन पर कहा कि यार , मुझे बहुत हैरानी हुई कि लोग आपको लघुथाकार ही क्यों मानते हैं ?

मुझे हिसार में ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के स्टाफ रिपोर्टर के रूप में अवसर मिला एक नये प्रदेश और संस्कृति को जानने का । इस दौरान डाॅ नरेंद्र कोहली के सुझाव पर मेरा कथा संग्रह ‘एक संवाददाता की डायरी’ तो डाॅ वीरेंद्र मेंहदीरता के सुझाव पर जादूगरनी , ‘शो विंडो की गुडिया’ कथा संग्रह चंडीगढ के अभिषेक प्रकाशन से आए । ऐसे थे तुम , इतनी सी बात , मां और मिट्टी,  दरवाजा कौन खोलेगा जैसे संकलन भी पाठकों तक पहुंचे ।

इस तरह अब तक मेरे सात कथा संग्रह और पांच लघुकथा संग्रह हैं । ‘एक संवाददाता की डायरी’ को अहिंदी भाषी लेखन पुरस्कार योजना में प्रथम पुरस्कार मिला और सबसे सुखद क्षण जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों यह पुरस्कार मिला । किसी रचनाकार के हाथों पुरस्कार मिलना आज भी पुलक से भर देता है । अटल जी ने वह संग्रह पढ़ने के लिए मंगवाया भी ।

काॅलेज छात्र के रूप में खुद की पत्रिकाएं प्रयास,  पूर्वा और प्रस्तुत प्रकाशित कीं । दैनिक ट्रिब्यून से त्यागपत्र दिलवा कर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुझे नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष बना कर ले गये । नयी अकादमी की कथा पत्रिका ‘कथा समय’ का संपादन किया । नये रचनाकारों को स्थान देना सदैव मुझे अच्छा लगता है । वरिष्ठ रचनाकारों की कहानियां भी दीं । नेहा शरद,  शेखर जोशी , अमरकांत,  नरेंद्र कोहली, राजी सेठ, वीरेंद्र मेंहदीरता,  निर्मल वर्मा, रविंद्र कालिया, ममता कालिया की चुनी हुई कहानियां दीं ।

अब अकादमी के पद से मुक्त हूं । हिसार के एक प्रतिष्ठित सांध्य दैनिक नभछोर में प्रतिदिन संपादकीय आलेख और साहित्य हिसार का देखता हूं । अनेक यात्राएं करता हूं । साहित्यिक संस्थाओं के आमंत्रण पर अलग अलग मित्र बनते हैं । सीखने की कोशिश करता हूं । पुरस्कारों की सूची से कोई लाभ नहीं होगा । जो मुझे पढ़ते हैं , वही मेरा पुरस्कार हैंं । मेरे लघुकथा संग्रह ‘इतनी सी बात’ का फगवाड़ा के कमला नेहरू काॅलेज की प्रिंसिपल डाॅ किरण वालिया ने ‘ऐनी कु गल्ल’ के रूप में पंजाबी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित करवाया ।  इसी प्रकार मेरा कथा संग्रह ‘मां और मिट्टी’ नेपाली में अनुवाद हुआ । यह सुखद अनुभूति किसी पुरस्कार से कम नहीं । मैं एक बात महसूस करता हूं और कहता भी हूं कि मैंने कम लिखा क्योंकि सन् 1982 में मंत्र मिल गया लेकिन मुझे उससे ज्यादा सम्मान मिला ।  मेरी इंटरवयूज की पुस्तक : यादों की धरोहर जालंधर के आस्था प्रकाशन से आने के बिल तीन तीन संस्करण आ चुके हैं । इसमें एक पत्रकार के रूप में अच्छे , नामवर साहितयकारों , रंगकर्मियों , पत्रकारों व संस्कृति कर्मियों के इंटरव्यूज शामिल हैं जो समय समय पर ‘दैनिक ट्रिब्यून’ के लिए किए गए थे । शीघ्र ही इंडियानेटबुक्स से महक से ऊपर का दूसरा संस्करण आयेगा । पत्रकारिता में भी ग्रामीण पत्रकारिता पर हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से तो साहित्यिक पत्रकारिता पर हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिले । रामदरश मिश्र की ये पंक्तियां बहुत प्रिय हैं :

मिला क्या न मुझको ऐ दुनिया तुम्हारी

मोहब्बत मिली है मगर धीरे-धीरे

जहां आप पहुंचे छलांगें लगाकर

वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे, ,,

इसी प्रकार अज्ञेय जी की ये पंक्तियां भी बहुत हौंसला देती हैं :

कहीं न कहीं

हरे-भरे पेड़ अवश्य ही होंगे

नहीं तो थका हारा बटोही

अपनी यात्रा जारी क्यों रखता ,,,,,

सच साहित्य ने क्या नहीं दिया ? जब मेरी बडी बेटी रश्मि रोहतक के पीजीआई में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी तब पुस्तक मेले से पुस्तकें लाकर उसके पास बैठ कर पढ़ता था । जब छोटी बेटी प्राची चंडीगढ़ के पीजीआई में तेइस दिन ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही थी तब मैने तीन कहानियां लिखी थीं । यह साहित्य ही है जो दुख के समय मेरे काम आता रहा है । जब पिता , दादा और दादी नहीं रहे थे तब एक चौदह वर्ष के बालक को साहित्य ने सहारा दिया ।

सच अज्ञेय जी सही लिखते हैं : दुख सबको मांझता है । अमोघ शक्ति है साहित्य । साहित्यकार का सपना होता है कि कुछ लिखकर समाज को संदेश दे ।

मुंशी प्रेमचंद का मंत्र है कि साहित्यकार सुलाने के लिए नहीं , समाज को जगाने के लिए है ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क : 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – परिचर्चा ☆ जन्मदिवस विशेष – आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान  कह सकते हैं: श्री कमलेश भारतीय ☆ श्री अजीत सिंह

श्री अजीत सिंह 

(श्री अजीत सिंह जी,  पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन द्वारा वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से की गई परिचर्चा को ई -अभिव्यक्ति के पाठकों के साथ हमने 31 अक्टूबर 2020 को साझा किया था। आज श्री कमलेश भारतीय जी के जन्म दिवस पर पुनर्पाठ में आपसे पुनः साझा करना प्रासंगिक है।)

☆ परिचर्चा ☆ आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान कह सकते हैं: श्री कमलेश भारतीय ☆ श्री अजीत सिंह ☆

🙏 आज श्री कमलेश भारतीय जी को उनके जन्मदिवस पर ‘ई-अभिव्यक्ति’ एवं ‘पाठक मंच’ परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

जाने माने कथाकार व हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष श्री कमलेश भारतीय का कहना है कि साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों व कहानियों में जिस तरह ग्रामीण जीवन व दलित वर्ग की पीड़ा का वर्णन किया गया है,  वह मुझे हूबहू अपने गांव का वर्णन लगता था ।

” इसी वर्णन ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है और मेरी कहानियों व लघुकथाएं में भी प्रेमचंद के चरित्रों से मिलते जुलते दलित व वंचित लोगों का ज़िक्र बहुतायत से मिलता है”।

कमलेश भारतीय ने यह बात वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब की वेब विचार गोष्ठी में “साहित्य और पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए कही।

“मेरे कमरे में मुंशी प्रेमचंद की फोटो देखकर कुछ लोग मुझसे पूछते थे, क्या यह आपके पिताजी की तस्वीर है?  मैं गर्वित हो कहता था आप मुझे प्रेमचंद की साहित्यिक सन्तान मान सकते हैं”।

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

एक रोचक किस्सा सुनाते हुए भारतीय ने कहा कि पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था।

“मैं स्कूल से अक्सर भाग जाता था । अध्यापकों व पिताजी से पिटाई होती थी। दादा जी कहते थे, पढ़ेगा नहीं तो भैंसें चराएगा।

आठवीं में हुआ तो दादी कहीं से ब्रह्मीबूटी लाई। सुबह सवेरे रोज़ पिलाती थी। बृहस्पतिवार को व्रत रखवाती थी। अब पता नहीं यह ब्रह्मीबूटी का कमाल था या बृहस्पतिवार के व्रत का या दादी की तपस्या और मन्नत का, कि मैं आठवीं में सेकंड डिविजन में पास हो गया। दादी ने लड्डू बांटे। मुझे भी कुछ हौसला सा मिला और मेरी पढ़ाई में रुचि बन गई। उसके बाद मैंने सभी परीक्षाएं फर्स्ट डिवीजन में पास की। अपने काॅलेज में तीनों वर्ष फर्स्ट और प्रभाकर परीक्षा में गोल्ड मेडल ।  यहीं से साहित्य में भी रुचि बनी।

कमलेश भारतीय पिछले 45 वर्षों से लिखते आ रहे हैं। उनके दस कथा संग्रह छप चुके हैं जिनमें चार लघु कथा संग्रह हैं। प्रमुख साहित्यकारों से उनके इंटरव्यू बड़े मकबूल हुए हैं। इन्हीं पर आधारित उनकी पुस्तक “यादों की धरोहर” पिछले साल अाई थी और अब उसका दूसरा संस्करण आकर भी समाप्त ।  इसी महीने उनकी नई पुस्तक “आम रास्ता नहीं है” अाई है ।

भारतीय ने चार भाषाओं इंग्लिश, हिंदी, पंजाबी व संस्कृत के साथ बी ए की और बी एड कर पंजाब के नवां शहर के  स्कूलों में 17 वर्ष अध्यापन किया। साथ में लेखन भी करते रहे और उनके लेख जालंधर के अखबारों में छपते रहे। सन् 1990 से उन्होंने स्कूल प्रिंसिपल की नौकरी छोड़ दैनिक ट्रिब्यून में पहले उपसंपादक और फिर हिसार में प्रिंसिपल संवाददाता के रूप में पत्रकारिता और साहित्य लेखन साथ साथ ही किया। उन्हे साहित्य लेखन के लिए अनेक पुरस्कार भी मिले जिनमें हरियाणा साहित्य अकादमी का देशबंधु गुप्त साहित्यिक पत्रकारिता का एक लाख रुपए का पुरस्कार तथा गैर – हिंदी राज्यों के हिंदी लेखकों के लिए केंद्र सरकार का 50 हज़ार रुपए का पुरस्कार उनकी पुस्तक “एक संवाददाता की डायरी” पर मिलना भी शामिल है।

वे तीन साल तक हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष के पद पर रहते हुए लालबत्ती की गाड़ी में भी चले।

एक प्रश्न के उत्तर में भारतीय ने कहा कि बेशक घटिया संवादों के लिए सोशल मीडिया बदनाम है, पर इसमें साहित्य को लोकप्रिय बनाने की भी भरपूर संभावनाएं हैं। हर भाषा का पूरा साहित्य इंटरनेट पर मौजूद है। लेखकों, खास तौर पर बड़े लेखकों, को अपने साथ युवाओं को जोड़ कर उनमें साहित्यिक रुचि विकसित करनी चाहिए। अध्यापक और माता पिता भी बच्चों को स्कूल और कॉलेज के दौरान  अच्छे साहित्य से परिचित करा सकते हैं।

” सोशल मीडिया पर डाले गए मेरे लेख को कई हज़ार लाइक और फॉरवर्ड मिल जाते हैं। जितनी संख्या में पुस्तक बिकती है उससे कई गुणा पाठक नेट पर मिल जाते हैं। लगभग हर लेखक का साहित्य नेट पर फ्री उपलब्ध है। सोशल मीडिया का उपयोग साहित्य प्रसार के लिए अच्छी तरह हो रहा है तथा इसके विस्तार की और बड़ी संभावनाएं हैं”।

रोचक साहित्य का ज़िक्र करते हुए कमलेश भारतीय ने कहा कि वे भी शुरू में स्कूल टाइम में जासूसी नॉवेल पढ़ते थे।

“मेरे स्कूल टीचर सरदार प्रीतमसिंह ने मुझे मुंशी प्रेमचंद की ओर मोड़ दिया। कॉलेज में अंग्रेज़ी के टीचर एच एल जोशी ने “ओल्ड मैन एंड द सी” नॉवेल के साथ अंग्रेज़ी साहित्य से रूबरू कराया और बस साहित्य की लगन लग गई, पढ़ने से शुरू हुई और लेखन तक पहुंच गई”।

इंटरव्यू की विधा का ज़िक्र करते हुए भारतीय ने कहा कि

वैसे तो हर पत्रकार इंटरव्यूअर होता है, पर साहित्यकार के इंटरव्यू के लिए उसके साहित्य का ज्ञान भी होना चाहिए और लेखन की साहित्यिक शैली भी आनी चाहिए,  तभी बात में गहराई आएगी। अच्छे लेखन के लिए अच्छा साहित्य पढ़ना बहुत ज़रूरी है।

पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप से भारतीय बड़े निराश हैं, खास तौर पर टेलीविजन पत्रकारिता से। सिर्फ सनसनी और चिल्लाना पत्रकारिता नहीं है। ऐसा व्यावसायिक और राजनैतिक दबावों के चलते हो रहा है। प्रिंट मीडिया कुछ बचा हुआ है पर वहां भी साहित्य के परिशिष्ट समाप्त प्राय हैं। कादम्बिनी और नंदन जैसी पत्रिकाएं हाल ही में बंद हो गयीं । पाठक, श्रोता व दर्शक को विवेक से काम लेते हुए मीडिया का उपयोग करना चाहिए”।

एक तरह से यह गोष्ठी एक इंटरव्यूअर का इंटरव्यू भी रही।

🙏💐आज श्री कमलेश भारतीय जी को उनके जन्मदिवस पर ‘ई-अभिव्यक्ति’ एवं ‘पाठक मंच’ परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏

© श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।मो : 9466647037

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – एक  चंदन चरित्र डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ – श्रद्धा स्मरण ☆ डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर ☆

डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर

संक्षिप्त परिचय 

शिक्षा- एम. ए., एम.फिल., पी-एचडी, बी.एड., डी-लिट. हेतु अध्ययनरत.

  • पी-एचडी.का शोध विषय डॉ.शिवप्रसाद सिंह के उपन्यासों में जीवन मूल्यों का चित्रण – एक समीक्षात्मक अध्ययन. (शोध प्रबंध), नीला चांद उपन्यास में जीवन-मूल्य, (लघु शोध प्रबंध.), रामेश्वर शुक्ल अंचल के खंडकाव्य अपराधिता का अध्ययन, (लघु शोध प्रबंध.)
  • शैक्षणिक अनुभव 1990 से 97 तक हवाबाग महिला महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्य.
  • चार साल दैनिक समाचार पत्र नवभारत, जबलपुर के संपादकीय विभाग में कार्य., जबलपुर के ऐतिहासिक संदर्भ में 20 से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन.
  • वर्तमान में वरिष्ठ व्याख्याता पद पर क्राईस्ट चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जबलपुर में अध्यापनरत.
  • दो शोध छात्राओं को पीएचडी हेतु शोध सहयोग
  • 5 से अधिक पत्रिकाओं का संपादन.
  • मानव संसाधन विभाग नई दिल्ली द्वारा श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार 2018.
  • जबलपुर की शैक्षणिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।
  • नई पीढ़ी को जबलपुर की साहित्य धारा से परिचित कराने हेतु आईसीएससी एवं सीबीएससी हिंदी परियोजना के अंतर्गत 500 से अधिक क्षेत्रीय साहित्यकारों पर लघु शोध पत्र छात्रों द्वारा तैयार करवाए हैं।
  • जबलपुर पुरातत्व पर्यटन एवं संस्कृति परिषद द्वारा आयोजित पर्यटन क्विज़ प्रतियोगिता हेतु क्राईस्ट चर्च स्कूल के छात्रों का मार्गदर्शन। फलस्वरूप छात्रों द्वारा 2016 से लगातार जबलपुर जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

☆  जीवन यात्रा ☆  एक  चंदन चरित्र डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ – श्रद्धा स्मरण 

डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

आज जबलपुर की साहित्यिक पत्रकारिता लोकधर्मी प्रतिष्ठा की जिस अधित्यका पर जा पहुंची है, उसकी चढ़ाई का सूत्रपात करने में डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र का यशस्वी योगदान है।

उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध ,नाटक, उपन्यास ,आलोचना, समालोचना आदि के विभिन्न क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य  प्रयास भी किया था।

जबलपुर की हिंदी पत्रकारिता, पाथेय प्रकाशन उनके व्यक्तिगत प्रयत्न एवं प्रोत्साहन की हमेशा ऋणी रहेगी ।

आज देवलोक से, वार्धक्य की विस्मित रेखाओं से जब वह जबलपुर का हिंदी समाज देखते होगें तब उन्हें आत्मिक संतोष अवश्य होता होगा कि उन्होंने सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया।

इक चंदन चरित्र डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र जी से मेरा परिचय 1990 के पूर्व हुआ जब मैं छायावादोत्तर काल के महाकवि श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के खंडकाव्य अपराधिता पर लघु शोध प्रबंध लिख रहा था और शोध की प्रक्रिया और प्रविधि को ठीक तरह से जानने हेतु मुझे अंचल जी ने सुमित्र जी के पास भेजा।

95,96 से यह परिचय आत्मीयता में बदल गया  क्योंकि मैं नवभारत के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा और वहां डॉ.सुमित्र जी का आना अक्सर होता था, वहीं डॉ. तिवारी के हिन्दी की अभिवृद्धि को संजीवित और प्रसृत करने के वाक्य मेरे कर्ण पटल पर आशीर्वाद स्वरुप सुनाई देते थे। कुछ ही दिनों में उनकी पुत्रियों डॉ.भावना जी एवं डॉ.कामना जी बेटे डॉ.हर्ष तिवारी जी के व्यक्तित्व व्यवहार से भी परिचित होता गया।

मुझे स्मरण आ रहा उनका सानिध्य जानकीरमण कॉलेज की एक संगोष्ठी से लौटते समय आदरणीय डॉ.गायत्री तिवारी जी एवं सुमित्र जी ने मुझे सेवा का अवसर दिया और वह मेरी कार में बैठकर कोतवाली तक आए। ममतामयी कथाकार श्रीमती तिवारी का वह आंचलिक वार्तालाप और संवाद आज भी मुझे याद आता है। गायत्री जी की कहानियाँ  हर्षित प्रेम की दृष्टि से घरेलु जीवन के मधुरतम क्षणों ,राष्ट्रीय कामना और भावना से उत्प्रेरित थी।

1996-97 में क्राईस्ट-चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हिंदी व्याख्याता नियुक्त होने पर हमारी सीनियर श्रीमती निर्मला तिवारी जी ने राजू भैया के प्रशंसनीय कार्यों को महत्त्व देते पुनः उनके साथ साहित्यिक  परिचय कराया ।

 मुझे कोतवाली के उस बाडे में बैठाकर कुछ सत्संग-सानिध्य का समय देकर साहित्यिक प्रेरणा के महापात्र बने थे डॉ.तिवारी ! उनके गद्यात्मक काव्य और कविता मय गद्य को सुना था।

मेरे स्कूली छात्रों ने जब जबलपुर के पत्रकारों-साहित्यकारों पर शोध आलेख लिखना शुरू किया तब डॉ. सुमित्र ने मेरे लघु प्रयासों की प्रशंसा और हिन्दी सेवा को महत्व देते हुए जबलपुर के अनेक साहित्यकारों से परिचय कराया, मार्गदर्शन दिया और मेरा मनोबल बढ़ाया ।

आज उनकी जिजीविषा सपृक्त लेखन शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली दो पुस्तकें, शब्द अब नहीं रहे शब्द और आदमी तोता नहीं के काव्यादर्श मेरे आदर्श बन गये हैं, मेरी हृदय से कामना थी कि डॉ. सुमित्र पर साहित्यकार हमेशा लिखते रहें याद करते रहें क्योंकि, लेखन ही उनके जीवन का धर्म-कर्म और अध्यात्म था। वही उन्हें जिंदा रखने वाली, प्राणवायु थी ।

डॉ.सुमित्र कोरे कवि ,पत्रकार  मौजी जीव नहीं बल्कि समाज सेवा के व्यावहारिक पहलुओं को संस्थापित, शिक्षित करने वाले ऐसे लेखक थे जिनकी कीर्तिवर्धनी लेखनी समाज को हमेशा उत्प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहेगी।

 मैं जानता हूँ कि उनकी भस्मीभूत देह का पुनरागमन कहाँ, उनकी आत्मा अनंत की विपुलता में है आत्मानुभव के आत्म प्रकाश में है।

सादर 🙏

© डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर

 व्याख्याता, हिंदी

क्राईस्ट चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जबलपुर

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ 30 वर्ष का हुआ हिंदी आंदोलन परिवार ☆ श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे ☆

 ☆ जीवन यात्रा – 30 वर्ष का हुआ हिंदी आंदोलन परिवार – श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे ☆

(भारतीय भाषाओं को रोटी से जोड़ने के लिए आंदोलन)

30 सितम्बर 2025,  हिंदी आंदोलन परिवार का 31वाँ स्थापना दिवस। सच कहूँ तो हिंआप केवल शब्द या संस्था भर नहीं है। हमारी संतान है हिंआप।

विवाह के लगभग ढाई वर्ष बाद हिंआप का जन्म हुआ। बच्चे के जीवन में गिरने-पड़ने-संभलने, उठने-चलने-दौड़ने के जो चरण और प्रक्रियाएँ होती हैं, वे सभी हिंआप के जीवन में हुईं। हमारी संतान अब नयनाभिराम युवा हो चुकी।

(श्रीमती सुधा संजय भारद्वाज)

स्मृतिचक्र घूम रहा है और लेखनी चल रही है। ईश्वर की अनुकम्पा, माता-पिता के आशीष और आत्मीय जनो की शुभकामनाओं के चलते सार्वजनिक जीवन में छोटी-सी ही सही, स्थापना मिली। इसके चलते प्रायः विभिन्न आयोजनों में जाना होता है। स्वागत/ सम्मानस्वरूप मिला पुष्पगुच्छ घर लाकर रख देता हूँ। ऊपर से बेहद सुंदर दिखते पुष्प तीन से चार दिन में पूरी तरह सूख जाते हैं। जड़ों से कटने पर यही स्थिति होती है।

हिंआप ने अपनी स्थापना के समय से ही काटने या तोड़ने के मुकाबले खिलने और जोड़ने की प्रक्रिया को अपनाया। हमने बुके के स्थान पर पौधे देने की परंपरा का अनुसरण किया,  विनम्रता से कहूँ तो कुछ अर्थों में सूत्रपात भी किया। पौधे मिट्टी से जुड़े होते हैं। इनमें वृक्ष बनने की संभावना अंतर्निहित होती है।

(साक्षात्कार लेतीं सुश्री वीनू जमुआर )

(प्रसिद्ध साहित्यिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे द्वारा अपने सफल  27वें वर्ष में प्रवेश करते समय पुनर्पाठ  के अंतर्गत  30 सितम्बर 2019 (रजत जयंती वर्ष ) को संस्था के संस्थापक अध्यक्ष  श्री संजय भारद्वाज जी से  सुश्री वीनु जमुआर जी की बातचीत आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं )

👉 ☆ जीवन यात्रा – श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे ☆

इसी संभावना को हिंआप में संगठन के स्तर पर लागू करने का प्रयास भी किया। सभी साथियों की प्रतिभा को यथासंभव समझकर उन्हें स्वयं को मांजने- तराशने के समुचित अवसर देते गए। इसमें वाचन,लेखन, प्रस्तुति से लेकर  व्यवस्थापन कुशलता, समूह में काम करने की वृत्ति, नेतृत्व, सहयोग, समयबद्धता, संचालन जैसे अनेक आयाम समाविष्ट हैं। मिट्टी से जुड़े रहने का लाभ यह हुआ कि कुछ वृक्ष बन चुके, कुछ पौधे हैं, कुछ अंकुर फूट रहे हैं, कुछ बीज बोये जा चुके। अत्यंत नम्रता से कहना चाहता हूँ कि इस प्रक्रिया के  चलते आज हिंआप के पास भविष्य की टीम भी तैयार है।

संस्था के सामूहिक प्रयासों ने ‘आंदोलन’ शब्द जिस अर्थ में ढल चुका था, उससे बाहर निकाल कर उसे ‘अभियान’ का अर्थ देने में सफलता पाई।

धारा के विरुद्ध काम करते समय प्राय: उपजने वाली निराशा और थकान का हिंआप सौभाग्य से अपवाद रहा। हर बीज से नया वृक्ष खड़ा करने की जिजीविषा इस उपवन को निरंतर विस्तृत करती रही।

(गांधी जी की सहयोगी रहीं डॉ. शोभना रानाडे और भारत को परम कंप्यूटर देने वाले डॉ विजय भटकर, साहित्यकार डॉ दामोदर खडसे द्वारा हिंदी आंदोलन परिवार के वार्षिक अंक ‘हम लोग’ का विमोचन. इस पत्रिका में प्रतिवर्ष १०० से अधिक रचनाकारों को स्थान दिया जाता है.)

हिंआप आशंका में संभावना बोने का मिशन है। नित विस्तृत होती परिधि में बीज से वृक्ष होने की संभावना को व्यक्त करती हिंआप के जन्म के आसपास के समय की अपनी एक रचना स्मरण हो आई।

 *

जलती सूखी ज़मीन,

ठूँठ-से खड़े पेड़,

अंतिम संस्कार की

प्रतीक्षा करती पीली घास,

लू के गर्म शरारे,

दरकती माटी की दरारें,

इन दरारों के बीच पड़ा

वो बीज…,

मैं निराश नहीं हूँ,

यह बीज मेरी आशा का केन्द्र है,

यह,

जो अपने भीतर समाये है

असीम संभावनाएँ-

वृक्ष होने की,

छाया देने की,

बरसात देने की,

फल देने की,

और हाँ;

फिर एक नया बीज देने की,

मैं निराश नहीं हूँ,

यह बीज

मेरी आशा का केन्द्र है।

* 

आशा बनी रही, भाषा टिकी रहे, हमारी संस्था, इस क्षेत्र में कार्यरत हर संस्था चलती रहे उस दिन तक, जिस दिन भारतीय भाषाएँ शासन- प्रशासन, शिक्षा-दीक्षा, न्याय-अनुसंधान, हर क्षेत्र में  वांछित स्थान पूरी तरह बना लें।

तथास्तु!

 

संजय भारद्वाज

अध्यक्ष – हिंदी आंदोलन परिवार

(भारतीय भाषाओं को रोटी से जोड़ने के लिए आंदोलन) 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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