डॉ सत्येंद्र सिंह
(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा – “तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६८ ☆
पुस्तक समीक्षा – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)… कवि – महेन्द्र वर्मा ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
पुस्तक का नाम – तुम, न आए लौटकर (काव्य-संग्रह)
कवि – महेन्द्र वर्मा
प्रकाशक – आस्था प्रकाशन गृह, जालंधर-नई दिल्ली-कनाडा
संस्करण – 2026
मूल्य – 325 रु.
सार्त्र ने कहा था – “सब कुछ गुजर जाता है। आंधी, तूफान, सुनामी, सब आते हैं, रुकते नहीं, थमते नहीं, पतझड़ में रंग-बिरंगे पत्ते, अपनी शाख से, आज़ादी पा, मंडराते हैं, खिलखिलाते हैं और फिर बिखर जाते हैं ज़मीं पर”… किसी काव्य-संग्रह में सार्त्र का नाम होना ही कवि की उच्चता दर्शाता है, क्योकि ज्याँ पॉल सार्त्र बीसवीं सदी के सुविख्यात फ्रांसीसी अस्तित्ववादी दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता को बनाए रखते हुए नोबेल पुरस्कार भी लेने से इंकार कर दिया था।
विदेश में विदेशी भाषा के माध्यम से हिंदी पढ़ाने वाले महेन्द्र वर्मा जी जैसा व्यक्तित्व जब कविता रचेगा तो उसमें अपने उत्स और विदेश की धरती पर अपनों परायों के बीच जीवन जीना कितना अनुभूत, कितना परानुभूत होगा, यह उनकी कविताओं से थोड़ा सा परिलक्षित होता है, थोड़ा सा इसलिए कि अपनी भाषा की सुगंध को विदेशी भाषा की सुगंध में अवगुंठित करना और अपनी मांटी की सौंध से सात समुंदर पार की धरती तक के वितान पर अनुभवों की रेखा खींच पाना एक काव्य-संग्रह में संभव नहीं है, परंतु सात समुंदर पार भी अपनी मांटी की सौंध को अपने में बसाये रखने वाले महेन्द्र वर्मा जैसे व्यक्तित्व की एक ही कविता ऐसी हो सकती है कि पाठक उसे पढ़कर बरसों प्रभावित रह सकता है।
महेन्द्र वर्मा की अपनी पहली कविता, “क्या खोया, क्या पाया”, में ही बयान कर देते हैं-
अक्तूबर का दिन था
खुशनुमा दिन
जब आया था न्योता
सात समंदर पार
यू.के. से
एक नहीं
दो-दो
यॉर्क और मेनचेस्टर से।
करना है
मजबूत-प्रवास में
हिंदी की नींव को
यॉर्क ने,
दूर से दी थी आवाज।“
इस कविता में ही उन्होंने अपनी यात्रा का ऐसा वर्णन कर दिया है कि पाठक पढ़कर सोचता रह जाता है। आगे पढने के लिए उसे हिम्मत जुटानी पड़ती है। आगे वर्मा जी सोचें लेकिन उनकी यात्रा हिंदी से ही पूरी होती है, जो उनका बहुत बड़ा संबल भी बनती है। इसी कव्ता में आगेलिखते हैं-
“प्रवासी को
हाथ बढ़ा कर
दे दिया
हिंदी ने
इतना कुछ,
विधि में
मिलता नहीं
सदा
सब कुछ।
कुछ खोया, कुछ पाया।“
लेकिन विरासत उन्हें कुछ भूलने नहीं देती। दूसरी कविता “विरासत” में वे कह उठते हैं-
“है संबंध अनूठा
मानवता औ विरासत का,
है एक विशाल कोश
वेदों औ पुराणों में
विरासत का
करता है प्रदान जो
मानवता को अंतर्दृष्टि।
……
मिला दर्शन
वसुधैव कुटुंबकम्
सर्वे भवंतु सुखिना
औ’
ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत
का भी।”
विदेश में रहते वे रामायण, गीता, मानस, तमिल कंब रामायण, मलयालम अध्यातम रामायणम्, नानक, गौतम और महावीर के साथ-साथ शंकर और चार्वाक किसी को नहीं भूलते।
महेन्द्र वर्मा जी का काव्य कौशल उस समय ऊंचाइयों की पराकाष्ठा पर होता है जब वे “पतझड़” को एक नया सकारात्मक स्वरूप प्रदान करते हैं, जो किसी कवि ने नहीं दिया। वे लिखते हैं-
“पतझड़ है यह तो
ज़मीं पर बिखरी पत्तियाँ
सूरज की
सुनहली रोशनी में
चमकती-दमकती
इठला रही हैं,
मुक्ति मिली है
आज”
अंग्रेजी कवि कीट्स की कविता को उन्होंने आगे बढ़ाया है। इसी कविता में आगे लिखते हैं—
“और मिला है
वह अंतिम सुख
जब बटोर- बटोर कर
माली ने
किया
उनका अंतिम संस्कार।”
प्रकृति का अवलोकन ही नहीं अवीक्षण भी उनका अभूतपूर्व है। “कली बोली” कविता उऩकी दृष्टि देखिए—
“कली बोली-
मैं अधखिली रह गयी,
था मेरे
यौवन का क्षण, वह
तुषारापात कर दिया
अचानक
जब तुमने।”
और वे “गुलमोहर” से पूछ बैठते हैं—
“गुलमोहर से पूछो
खुल कर, खिलखिला कर बोलेगा,
पतझड़ आया तो क्या
चला गया
हर वर्ष
जाड़ा भी आकर।”
ऐसा कोई कवि नहीं हुआ, जिसने येन-केन-प्रकारेण सृष्टि पर कुछ न लिखा हो। प्रकृति और सृष्टि कवियों के चहेते विषय हैं, तो वर्मा जी पीछे कैसे रहते, “सृष्टि” कविता में लिखते हैं—
“सृष्टि का भी तो
अजीबो-ग़रीब
रंगो-रिवाज़ है।
सुनामी आती तो है
पर
दस्तक देकर ,
चली भी जाती।”
उनकी कल्पना शक्ति “सुगंध” नामक कविता में तो देखते ही बनती है। अमूर्त को मूर्त कैसे बनाया जाता है उसकी बानगी इस कविता में है—
“निःशब्द हो
तुम सुगंध,
पर निष्प्राण नहीं।
धार्मिक अनुष्ठानों में
मंदिर हो या मस्जिद
कहाँ नहीं मिलती हो तुम
….
सुगंध, तेरी है विचित्र कहानी
पवन का दामन छोड़
पहुँच जाती हो
जब अंतरिक्ष में
फैलादेती हो ऐसा
अपना सुवास, अपना सौरभ
बतला नहीं पाती,
रह जाती है
नाकाम
अंतरिक्ष निर्वात में
नाक हमारी।”
सड़कों के किनारे वृक्ष लगाए जाते हैं और वे ऊंचे होकर सड़क को ढंकते हुए मिल जाते हैं। ऐसा मैंने देखा है। आपने भी देखा होगा। और महेन्द्र वर्मा ने भी देखा, लेकिन कैसे, उनकी कविता “आमने-सामने” में देखिए—
“रख दिया तुमने मुझे
अपनों से दूर
जमा दिया सड़क के
इस पार- उस पार
आमने-सामने
,………
प्यार का नशा हो जाए
तो लगती हैं खिसकने
दूरियाँ।
उम्र बढ़ती गयी
और हम पास आते गए
आलिंगन होने लगा
फुनगियाँ, फुनगियों से मिलती रहीं
हमारी दूरियाँ फिसलती गयीं।”
सृष्टि, प्रकृति पर ही उनकी निगाह नहीं गई, अपितु विज्ञान पर गहरी नजर गई और वैज्ञानिकों को सुनाया भी। उनकी “विज्ञान और वैज्ञानिक” कविता में है—
“विज्ञान नहीं, वैज्ञानिकों,
कर डाला तुमने
क्या
विज्ञान का।
……
पैदा कर दी है
वैमनस्यता कैसी
भेद डाल
मित्रता में
विज्ञान औ प्रकृति की।
….
रख दिया ताक पर
सृष्टि के मूल्यों को
मत दो विध्वंस का नुस्खा,
दे दो संजीवनी की औषधि।”
इंतज़ार पर उन्होंने तीन कविताएँ लिखी हैं। तीनों हृदयस्पर्शी हैं। लेकिन एक “इंतजार-2” मेरे दिल को भेद गई, आंसू ढल आए। आप भी देखिए—
“व्यग्रता से था
माँ को इंतज़ार
बेटा आएगा
लौट कर युद्ध से।
आया तो अवश्य
पर, अंतिम संस्कार के लिए।”
इंतज़ार 1 और 3 भी बहुत गंभीर रचनाएँ हैं। वर्मा जी लिखते हैं तो कविता लेकिन दर्शन उनकी हर बात में रहता है। वास्तव में वे एक भाषावैज्ञानिक कवि ही नहीं अपितु दार्शनिक कवि हैं। उनकी प्रतीक्षा नामक कविता में ऐसे दिखता है—
“करूँ प्रतीक्षा किस की
कब तक
..
उस मौसम की
जो कभी न आया।
प्रतीक्षा में नींद आने की
रात को थाम लेता हूँ,
रात आती तो है
पर फटकने देती नहीं,
नींद को पास
और हो जाती है सुबह।”
ऐसे ही प्रतीक्षा की घड़ी कविता में लिखते हैं—
“खिसकती जा रही है
प्रतीक्षा की घड़ी
सूइयाँ फिर भी
थकती नहीं
अनवरत चलती जा रही हैं,
घूम-घूम कर
मोक्ष का दामन पकड़े
मुक्ति की आशा
रख रही है-
ज़िंदा उन्हें।”
उन्होंने खूब लिखा है। पर माँ को नहीं भूलते—
“माँ बैठी है, चुपचाप
आँखें हो गयी हैं
पथरायी-सी
बाट जोहते-जोहते
उसकी
जो कभी न लौटा,
लौटा भी तो तब
जब बंद हो चुकीं थीं
माँ की आँखें।”
मुक्ति कविता में वर्मा जी लिखते हैं—
“ईश्वर ने
मानव से पूछा-
मुक्ति मेरी
कब आएगी
उत्तर आया-
जब मेरी होगी।”
आगे पाठक स्वयं पढ कर देखेंगे कि और क्या उत्तर आता है। “ऐसे ही लोगे कब तक परीक्षा,” “कब तक रहोगा उदास”, “जी करता है” उऩकी बहुत मर्मस्पर्शी कविताएँ हैं। उनका प्रवासी मन मसोस उठता है।
“जी करता है
कुछ बोलूँ,
क्या बोलूँ
किस से बोलूँ
कैसे बोलूँ
बतियाऊँ भी तो
किस भाषा में”
अकेलापन तो वे बड़े नज़दीक से महसूस करते हैं। लिखते हैं—
“खड़ा हूँ
अब अकेला अंतिम पड़ाव पर।
दिखते बहुत हैं लोग
मुड़कर देखता कोई नहीं।
कैसा है अकेलापन यह।”
वर्मा जी विदेश में रहते हैं, पर संस्कारों का पूरा ध्यान रखते हैं और संस्कार पर कविता लिखना नहीं भूलते, लिखते हैं-
“तुम्हारे संस्कार, औ’ मेरे संस्कार
क्या दोनों का सामंजस्य
नहीं हो सकता .
जीवन का अर्थ क्या है.
जीने का मतलब क्या है.
जीवन एक जैसा नहीं रहता हमेशा,
नहीं रहते संदर्भ और मूल्य एक जैसे।”
मानव मन के अध्येता के रूप में वर्मा जी तब उभर कर आते हैं जब घृणा पर कविता लिखते हैं। घृणा पर शायद ही किसी ने ऐसी कविता लिखी हो, विदेश में नस्ल भेद और घृणा को उन्होंने स्वयं भोगा है शायद। दृष्टव्य है—
“घृणा करना कितना
घिनौना होता है
इंसान जब इंसानियत
भूल बैठता है
नस्ल के नशे में
……
नस्ल, धर्म, जाति, पंथ, रंग
के नाम पर
घिनौनी हरकतें
जब कभी भी
दूसरों का रंग
उसे लगता है बदरंग। ”
वे व्यक्ति को सचेत भी करते हैं कि—
“दीप
दीप तो
कभी न कभी
सारे बुझेंगे ।
सोच कर यह
हो जाना
अकर्मण्य
विपरीत है
धर्म के।”
वे शब्दों के चितेरे हैं, तभी तो शब्द पर तीन कविताएं लिखी हैं। शब्दों की शक्ति में लिखते हैं—
“शब्दों में समाहित है
संगीत की शक्ति,
होती है शब्दों में
कोलाहल को भेदने की शक्ति,
शब्दों में शक्ति होती है
ममता औ’ मनुहार करने की,
लड़ने औ लड़ मरने की भी।”
महेन्द्र वर्मा जी एक दार्शनिक कवि हैं। उनकी हर कविता में दर्शन झलकता है। जैसे “नाम” शीर्षक वाली कविता में लिखते हैं—
“सोचता हूँ कभी-कभी
क्या धरा है मात्र नाम में.
सोचता हूँ फिर,
हुआ होगा
सृष्टि में
कभी क्या
बिना नाम के संबोधित
कोई कभी.”
ऐसे ही उत्सव की परिभाषा में –
“होता है, मुक्ति का उत्सव
त्यागने पर अपना शरीर।
उत्सव, उत्सव हो सकता है
सारा जीवन ही उत्सव।”
“बेसलन, रूस” कविता में वे आतंकवादियों को ललकारते हैं—
“कितने बच्चे थे
मासूम
नन्हें-नन्हें
नए जीवन की
करने शुरुआत,
……
जब किया प्रहार
निर्दयी आतंकवादी
तुमने।“
फिर “मौत” कविता में जज़्बाती भी हो जाते हैं—
“जब भी आती है
मौत
कभी दस्तक
देती नहीं।“
अपने देश से दूसरे देश में बसने वाले या प्रवास करने वाले प्रवासियों की पीड़ा को वर्मा जी से अच्छा कौन
बता सकता है, “प्रवासी की पीड़ा” में देखिए—
“समझ गया मैं।
देसी कभी
नहीं समझोगे मुझको.
रंग भेद है
जाति भेद है
नस्ल भेद है
…..
करा दिया
स्वीकार तुम्हीं ने,
अंश नहीं
बन सकता
तेरी धरती का मैं।
वर्मा जी भाषाविज्ञानी तो हीं ही, विदेश में पढाया भी है। लेकिन भाषा और मातृभाषा को काव्य में भी नहीं भूलते, जैसे, “आप्रवासी की मातृभाषा” में देखिए—
“पहचानो, समझो मुझको।
अंग्रेजी नहीं जानतीं
पर, नहीं हूँ बिन भाषा के मैं ।
मेरी माँ की भाषा
भी सशक्त थी जब,
शिक्षा द्वार पहुँचते ही
दुत्कारा मेरी भाषा को
तुमने।”
भाषा के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों और स्वार्थलिप्सा में बंधे विद्वानों को भी नहीं छोड़ते, “भाषा हितैषी” कविता में लिखते हैं—
“और तुम
बहुत व्यस्त रहे तुम,
भाषाकर्मी बन
शोध जगत में।
….
बहुत कर लिए
शोध तुम ने।
शोधक भी हो गए
और संशोधक भी।
…..
दिखता नहीं तुम्हें क्या
होती जा रही है लुप्त
मेरी अपनी भाषा।
बनी रहेगा पीड़ा उसकी
पीढ़ी-दर-पीढ़ी तक।
…..
मेरी पीड़ा है साक्षी
उस भाषाई भेदभाव की।
डिगा दिया है जिसने
संस्कृति की वह नींव हमारी।”
“मम्मी-डैडी” कविता में हिंदी-अंग्रेजी ध्वनियों की बात करते हैं तो “पनप न पाएगी” कविता में कहते हैं—
“कर लो कितनी भी कोशिश
पनप न पाएगी
इस धरती पर,
तेरी, उनकी भाषाएँ।”
इसके भी आगे “मेरी भाषा-तेरी भाषा” कविता में लिखते हैं—
“तेरी भाषा
मेरी भाषा
भाषा तो भाषा ही है
जैसी तेरी
वैसी मेरी।”
महेन्द्र वर्मा प्रवासी तो रहे पर जहाँ रहे वहाँ प्रकृति के बनके रहे, जैसे “ट्यूलिप के फूल” कविता में—
“आता है वसंत
औ’ निकल पड़ते तुम
गर्भ से ज़मीं के,
सुर्ख लाल,पीले
रंग-बिरंगे।
…
चंद दिनों का तुम्हारा जीवन
मुर्झाने लगता है,
मानकर
नियति के नियम को
हो जाते हो
धीरे-धीरे लुप्त
स्वीकार कर
आने-जाने के दर्शन को।”
“यूस्टन स्टेशन” का दर्शन वे कुछ इस तरह कराते हैं—
“भाग रहे हैं
भाग रहे हैं
सब के सब
बस दौड़ रहे हैं,
यह जाना पहचाना
यूस्टन का स्टेशन।”
“तुम, न आए लौट कर” कविता में उनका गहन सोच, दर्शन बहुत सुंदर ढंगे से प्रस्फुटित होता है—
“तुम न आए लैट कर
सृष्टिकर्ता,
रच तो दिया
इस अद्भुत सृष्टि को,
पर न आए लौट कर।”
“तुम, न आए लौटकर” काव्य संग्रह में कुल अस्सी कविताएँ हैं। हर कविता एक से बढकर एक, चयन करना मुश्किल, क्योंकि महेन्द्र वर्मा जी का शब्दों और अर्थों पर पूरा अधिकार है। काव्य संग्रह पढ़कर ही सुधी पाठक उसका आनंद उठा पाएंगे।
☆
© डॉ सत्येंद्र सिंह
एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)
दिनांक 28 मार्च, 2026
सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






