श्री मनजीत सिंह
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है श्री सुनील सैनी सीना जी द्वारा लिखित पुस्तक “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” पर चर्चा।
☆ “मेरी परछाई (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री सुनील सैनी सीना ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – मेरी परछाई
कवि – सुनील सैनी सीना
समीक्षक- मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक उर्दू कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
प्रकाशन- वैदिक प्रकाशन हरिद्वार
कीमत- 250 रूपए
☆ समता के हित की सरोकार कविताएं – श्री मनजीत सिंह ☆
सुनील सैनी सीना की किताब मेरी परछाई भाग -2 की कविताएं हमारी सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक और सामाजिक चेतना की ऐसी प्रखर धारा हैं कि समय के प्रवाह ने उन पर कोई प्रभाव नहीं डाला है और हमारा अस्तित्व उनके बहुमूल्य लेखन से आलोकित और संरचित होता रहा है। उनकी वैज्ञानिक और साहित्यिक उपलब्धियाँ अब भी अध्ययन का विषय बन रहीं हैं और उनसे संबंधित कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रहतीं है। जिन्होंने बहुआयामी जीवन के हर रंग को स्वीकार किया और सामूहिक जीवन को प्रभावित करने वाले हर पहलू पर न केवल अपने विचार व्यक्त किए, बल्कि उसके संबंध में एक दूरगामी रणनीति भी तैयार की। जो पुस्तकें सामने आई हैं, उनके स्रोत मुख्यतः गौण है। सुनील सैनी सीना की कविता जो देश प्रेम से ओतप्रोत है कि पंक्ति
इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से हैं, जलाने का शौक़ अंगारों पर अपने बदन को है।
वो जज़्बा वो हौसला ना कभी परस्त होगा, खिलेगा गुल कोई ऐसा आस जिसकी सारे चमन को है। ।
वार करेंगे सीने पे वार रहेगा “सीना”, दान कर देंगें अपने जीवन को शिक्षा मिली हमको कर्ण से है।
इश्क़ हमको अपनी आजादी और वतन से है, क्रांति रूपी विरासत के अनमोल रत्न से है। ।
इनकी कविताओं में साहित्य, धर्म, इतिहास, नीतिशास्त्र, अध्यापन, संपादन, राजनीति, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, धर्मसुधार, दर्शन, पत्रकारिता, कृषि आदि पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव देखा जा सकता है। इन्होंने दुष्ट दहेज के नाम से जो कविता लिखी उम्दा है।
बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। इसे मारना है तो कसम खाओ, करेंगे हमेशा हम दहेज से परहेज। ।
दहेज के कारण उत्पन्न होते, मामले इतने सनसनीखेज। मारते-जलाते गृहलक्ष्मी को, दहेज के लोभी बन दुष्ट-चंगेज। । बन गया आज अभिशाप दहेज, दान से बना आज पाप दहेज। ।
इनकी कविताओं में देश प्रेम से ओतप्रोत सांस्कृतिक विरासत को बचाएं रखने वाली कविताएं हैं सलाम-ए-मंच की कविता की कुछ पंक्तियां
पहचान दी, नाम दिया। जीने का मुकाम दिया। डर नहीं किसी बात का, वो जोश भरा जाम दिया। ।
जिन्दगी जीना है खुलकर बुजदिलों से वास्ता नहीं।
खुले आसमान में
शामियाना तान दिया
इसको सलाम है।
इस मंच ने हमें निखार दिया इसको सलाम है। ।
इस दरी ने
इसको
आवाज अब बुलन्द होगी, भीषण यह जंग होगी।
और बढ़ेगा कारवां शंखनाद से, रफ्तार अब नहीं तक मंद होगी। ।
इनकी कविताओं में सृजनात्मक, सृजनशीलता की भूमिका है। कहीं जीवन का कड़वा सच उजागर हाता है कविता में प्रगतिशीलता और जनवादी के स्तर पर पहुंचाने की पूरी कोशिश की है। कविता के अंदर कविता की की आत्मा को देखा जा सकता है। कवि की कविता जीवन जीने और आगे बढ़ने की बात कहतीं हैं। बहुत से सामयिक विषयों को छुआ है कविता धोखा, मजबूर, इंसान, किसको ख़तरा, कहानी जिंदगी की, एक बदनसीब कहानी, जर्जर दिया, कल सबको पता चल जाएगा, ओ मां, गुरुदेव प्रणाम तुम्हे, रब जाने, मेरी पहचान, मुकाम जीने का, मजबूर इंसान, सोचो आदि कविताएं सहरानीये है। कहीं प्रकृति का अनुसरण सौन्दर्य, कहीं रिश्तों और सम्बन्धों का तालमेल दिखता है, तो कहीं देशप्रिय ओत-प्रोत रचनाएं, कहीं अन्तर्मन की आवाज़ सुनाई देती है, तो कहीं कल की उड़ान, कहीं उनकी रचनाएं समाज को शिक्षित करती हैं, कहीं कारे समाज को आईना दिखा जाती हैं, कहीं पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता। अभिव्यक्त करती हैं, तो कहीं भावों का समन्दर अन्तर्मन की गहराइयों को जाता है। सुन्दर आकर्षक और बेहद खूबसूरत रचनाओं का गुलदस्ता है मैंने परखा जिसको बेहद खूबसूरती से सजाया गया है। जिसके लिए वैदिक प्रकाशन को कोटि कोटि धन्यवाद।
चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






