श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

? त्रिकाल ?

कालजयी होने की लिप्सा में,

बूँद भर अमृत के लिए,

वे लड़ते-मरते रहे,

उधर हलाहल पीकर,

महादेव, त्रिकाल भये! 

हलाहल की आशंका को पचाना, अमृत होने की संभावना को जगाना है। 

आप सभी मित्रों को महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई। महादेव की अनुकंपा आप सब पर बनी रहे। ? नम: शिवाय!

 – संजय भारद्वाज

 

प्रत्येक बुधवार और रविवार के सिवा प्रतिदिन श्री संजय भारद्वाज जी के विचारणीय आलेख एकात्मता के वैदिक अनुबंध : संदर्भ – उत्सव, मेला और तीर्थयात्रा   श्रृंखलाबद्ध देने का मानस है। कृपया आत्मसात कीजिये। 

? संजय दृष्टि – एकात्मता के वैदिक अनुबंध : संदर्भ- उत्सव, मेला और तीर्थयात्रा भाग – 24 ??

श्री हरिगंगा मेला अधिकांश छोटे-बड़े मंदिरों में वार्षिक मेले की प्रथा और परंपरा है। तीर्थ क्षेत्र शूकरक्षेत्र सोरों कासगंज में भगवान का वराह अवतार लिया हुआ था। यहीं श्री हरिगंगा कुंड है। इस कुंड में डाली गई अस्थियाँ तीन दिन में जल में पूर्णत: विलीन हो जाती हैं। इस विषय को लेकर कुछ वैज्ञानिक अनुसंधान भी हुए हैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सका है। वराह विग्रह ने अपनी काया भी यहीं तजी थी।

पुष्कर मेला- अजमेर से 11 किलोमीटर दूर स्थित पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को यह मेला लगता है। मेले में पुष्कर झील में स्नान किया जाता है। श्रीरंग जी और अन्य मंदिरों के दर्शन की परंपरा है। इस अवसर पर लगने वाला पशु मेला विश्व भर में प्रसिद्ध है। इन पशुओं में भी विशेषकर ऊँट मेला खास आकर्षण का केंद्र होता है। इसी क्रम में अन्य अनेक स्थानों पर पशु मेला लगता है। इसी संदर्भ में कार्तिक पूर्णिमा से लगनेवाले पशु मेला उल्लेखनीय है। चीनी यात्री फाहियान ने चौथी सदी में की अपनी भारत यात्रा के संस्मरणों में इसका उल्लेख किया है। इनके अलावा भी देशभर में अनेक पशु मेला लगते हैं।

सूरजकुंड मेला-  समयानुकूल परिवर्तन एवं   मेले का आधुनिक रूप है हरियाणा का ‘सूरजकुंड मेला।’ यहाँ  शिल्पियों की हस्तकला के लिए पंद्रह  दिन हस्तशिल्प मेला लगाया जाता है।  यह मेला पिछले लगभग चार दशक से चल रहा है। हस्तशिल्पी, हथकरघा कारीगरों के लिए यह मेला एक अवसर होता है। विविध अंचलों के हस्तशिल्प, वस्त्रपरंपरा,  लोककला में रुचि रखनेवाले इस मेले में बड़ी संख्या में जुटते हैं।

क्रमश: ….

©  संजय भारद्वाज

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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लतिका

तीर्थक्षेत्र पर ऐतिहासिक जानकारी?

अलका अग्रवाल

हरिगंगा मेले, पुष्कर मेले व सूरजकुंड मेले की अनुपम जानकारी।

Rita Singh

बहुत ही अच्छी जानकारीयुक्त लेख।पुष्कर झील आजबहुत गंदगी से भरी ऐ, उसमें डुबकी लगाने की आज की तारीख में कहाँ तक संभावनाएँ हैं ज्ञात नहीं।हमने उसकी जो स्थिति देखी थी ,दिल आहत हुआ था।

माया कटारा

श्री हरिगंगा मेला, पुष्कर मेला , सूरज कुंड मेले की सर्वांगीण जानकारी उपलब्धि हेतु हार्दिक धन्यता प्रकटीकरण ……