श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “वर्क इज़ वर्शिप…“।)
अभी अभी # 709 ⇒ वर्क इज़ वर्शिप
श्री प्रदीप शर्मा
शीर्षक अंग्रेज़ी में और निबंध हिंदी में ! जी हाँ, कुछ ऐसा ही होता था हमारे ज़माने में। जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती थी, वह भी इस मुहावरे का बड़े आत्म-विश्वास के साथ प्रयोग करता देखा जा सकता था। वर्क इज वर्शिप एंड लव इज ब्लाइंड, यू नो।
यह अंग्रेजों का मुहावरा है, जिसका आज़ादी के बाद भारतीयकरण कर दिया गया। वर्क को हिंदी में कर्म कहते हैं। प्रेम की तरह ये दोनों ही ढाई आखर के हैं। इन दोनों हिंदी अंग्रेज़ी शब्दों की केमिस्ट्री देखिये, कितनी मिलती जुलती है। वर्क मने कर्म ! यही हिंदी अंग्रेज़ी प्रेम है, जिसके हम आज भी कायल हैं।।
अंग्रेज़ चले गए, नेहरू छोड़ गए, जिन्होंने वर्क इज़ वर्शिप को आराम हराम है, कर दिया। वे पूजा में नहीं, काम में विश्वास रखते थे। कर्म को ही काम भी कहते हैं। काम ही पूजा है। अगर विश्वास न हो तो खजुराहो का एक ट्रिप मार आएँ, जहाँ रजनीश के अनुसार सभी मूर्तियाँ समाधि अवस्था में हैं।
अंग्रेज़ भारत में पहले कर्म अर्थात् व्यापार करने आए। धंधा अच्छा चल निकला तो कर्म को पूजा से जोड़ दिया। खुद साहब बन बैठे और देश को गुलाम बना दिया। प्रसाद स्वरूप कुछ सिविल सर्वेंट भी बँटवारे के समय भारत में छोड़ गए। जो काम पूजा था, वह सेवा हो गया। आज़ादी के बाद सेवा ही पूजा हो गई।।
हम बड़े धार्मिक लोग हैं। जो सेवा करता है, उसके बदले दान दक्षिणा तो बनती ही है। एक शब्द और, टिप के रूप में, अंग्रेज़ हमें दे गए, बख्शीश ! हमारे आदर्श संस्कारों ने इसे बहुत ज़ल्द मान्यता भी दे दी। करोगे सेवा तो पाओगे मेवा। कर्म ही पूजा है, कर्म ही सेवा है। गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं, हम बिना गीता पढ़े कह सकते हैं, अनासक्त कर्म कर, फल की चिंता तू मत कर। तू मत कर। अरे भोले, अर्जुन सदाशिवराव मतकर !
एक कर्म की दूकान भी होती है, जहाँ कर्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे वर्कशॉप भी कहते हैं। केवल पाठशाला ही नहीं होती, कार्यशाला भी होती है। महिलाओं की शॉपिंग से बढ़कर कोई कर्म नहीं ! ख़ाली दिमाग़ को शैतान का प्रशिक्षण केंद्र अर्थात devil’s workshop भी कहा जाता है। कर्म में कुशलता ही workmanship कहलाती है। अंग्रेजी में वैसे हमारा हाथ बहुत तंग है। कभी हमारे लिए workmanship, एक जहाज में काम करने वाला कर्मचारी होता था।।
सेवा ही पूजा है ! हम कितने भी उन्नत और प्रगतिशील क्यों न हो जाएं, लता जी का गीत तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, ही हमारा आदर्श रहेगा। हम पूजा और सेवा को अलग नहीं कर सकते। कर्म को पूजा समझें, या सेवा को पूजा, बात एक ही है।
सच तो यह है कि खाली पेट न तो सेवा होती है, और न ही पूजा। समय, काल और परिस्थिति अनुसार कभी रोटी और प्याज़ तो कभी बर्गर-पिज़्ज़ा ! पेट पूजा काम दूजा।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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