हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – यादों की अर्थी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९३ – व्यंग्य  – यादों की अर्थी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार थे। सामने डैशबोर्ड पर रखा मोबाइल फोन किसी देवता की तरह चमक रहा था, जिसमें एक निर्जीव स्त्री की आवाज़ हमें स्वर्ग का रास्ता दिखा रही थी। “अगले सौ मीटर पर बाएं मुड़ें,” उस आवाज़ में वह भरोसा था जो अक्सर धोखेबाज वकीलों की बातों में होता है। मैंने स्टीयरिंग घुमाया, पर सामने सड़क नहीं, एक गहरा नाला था जो शहर की सारी गंदगी समेटे इतिहास की तरह बह रहा था। सुजाता ने ठंडी आह भरी, “मैंने कहा था न, वह दाहिने कह रही है, तुम हमेशा औरतों को गलत समझते हो।” मैंने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ देखा, वह नीली रेखा अब किसी घायल सांप की तरह छटपटा रही थी। मुझे लगा जैसे वह नक्शा नहीं, मेरा चरित्र प्रमाण पत्र है, जिसे एक उपग्रह अंतरिक्ष से बैठकर लिख रहा है।

“री-रूटिंग…” फोन से आवाज़ आई। यह शब्द सुनते ही सुजाता का चेहरा ऐसा हो गया जैसे मैंने उसकी शादी का गहना गिरवी रख दिया हो। “देखो, यह मशीन भी मान रही है कि तुम भटक गए हो। इसे दोष मत दो, यह तो विज्ञान है। तुम्हारी बुद्धि ही पत्थर की हो गई है।” गाड़ी अब एक ऐसी संकरी गली में थी जहाँ धूप भी घुसने से पहले दो बार सोचती होगी। बगल की दुकान पर बैठे एक बूढ़े ने हमें ऐसे देखा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से आए शरणार्थी हों। मैंने चीखकर कहा, “यह बाएं बोल रही है, पर यहाँ तो दीवार है!” सुजाता ने मोबाइल छीन लिया और उसे अपनी छाती से ऐसे लगा लिया जैसे वह उसका सर्वस्व हो। “बेचारी को डराओ मत, वह सही कह रही है, तुमने ही इसे ठीक से पकड़ा नहीं होगा। देखो, वह रो रही है!” वास्तव में, स्क्रीन पर पसीने की एक बूंद गिरी थी, जो सुजाता के विलाप का हिस्सा लग रही थी।

कार अब एक सुनसान श्मशान घाट के गेट पर खड़ी थी। जीपीएस की वह स्त्री अब फुसफुसा रही थी, “आप गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” चारों तरफ खामोशी थी, सिवाय इंजन की गड़गड़ाहट और सुजाता की सिसकियों के। “देखा? पहुँच गए न? अब खुश हो? अपनी ज़िद के चक्कर में तुमने इसे भी पागल कर दिया।” उसने फोन को डैशबोर्ड पर पटक दिया। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। हम यहाँ क्यों आए? हमें तो अपनी बेटी की शादी के रिसेप्शन में जाना था, जो शहर के सबसे बड़े होटल में था। मैंने खिड़की से बाहर देखा, वहाँ कोई लाइट नहीं थी, कोई संगीत नहीं था। बस कुछ टूटी हुई कब्रें थीं और उन पर जमी धूल। सुजाता ने ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया, “तुमने इस बेचारी मशीन को इतना प्रताड़ित किया कि इसने हार मान ली। तुमने इसे गलत साबित करने के लिए पूरा रास्ता ही बदल दिया!”

मैंने कांपते हाथों से फोन उठाया। स्क्रीन धुंधली थी। तभी मेरी नज़र पीछे वाली सीट पर पड़ी। वहाँ एक सफेद लिफाफा रखा था। वह शादी का कार्ड नहीं था। वह मेमोरी लॉस और अल्जाइमर की मेडिकल रिपोर्ट थी, जिस पर मेरा नाम बड़े अक्षरों में लिखा था। मैं हक्का-बक्का था। होटल? शादी? वह तो पिछले साल हो चुकी थी। तभी मेरी नज़र बगल वाली सीट पर पड़ी—वह खाली थी। वहाँ न सुजाता थी, न उसकी सिसकियाँ, बस उसकी एक पुरानी बनारसी साड़ी की गंध हवा में तैर रही थी। अचानक बिजली की तरह दिमाग में एक कौंध गई और दिल की धड़कनें किसी ढहती इमारत की तरह बैठ गईं। सुजाता को मरे हुए तो तीन साल बीत चुके थे; इसी श्मशान की आग ने उसे राख में बदला था। अल्जाइमर के अंधेरे गलियारों में भटकता मेरा दिमाग हर बार जीपीएस की उस नीली रेखा को सुजाता की आवाज़ समझ बैठता था। मैं हर शाम अपनी यादों के मलबे में दबी उसकी चिता तक खिंचा चला आता था। वह मशीन गलत नहीं थी, मेरा अस्तित्व ही ‘री-रूटिंग’ के जाल में फंसा था। उस निर्जन कब्रिस्तान में फोन फिर बोल उठा—”गंतव्य पर पहुँच चुके हैं।” सामने सुजाता की चिता जल रही थी। मैं अपनी ही याददाश्त की अर्थी उठाए खड़ा था। फोन पर वही नीली रेखा अब स्थिर हो चुकी थी। फोन से अब कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने खुद से पूछा, “बाएं मुड़ना था या दाएं?” तभी जीपीएस की आवाज़ फिर गूंजी, “वापस मुड़ें, आप फिर से अपनी यादों के गलत मोड़ पर आ गए हैं।” उस सन्नाटे में मुझे अहसास हुआ कि मैं जीपीएस को गलत नहीं ठहरा रहा था, मैं तो उस हकीकत से लड़ रहा था जो मेरी सुध-बुध के साथ ही दफन हो चुकी थी। कार वहीं खड़ी थी, और मैं मैप की उस आखिरी बिंदु पर था, जहाँ से आगे कोई सड़क नहीं थी, सिर्फ एक गहरा अंधेरा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य  – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

हवा में घुटन थी, जैसे किसी पुरानी हवेली के तहखाने में सदियों से बंद सन्नाटा। अलख निरंजन जी अपनी मेज पर वैसे ही विराजमान थे, जैसे कोई क्रूर तानाशाह अंतिम डिक्री जारी करने वाला हो। उनके सामने बैठी सुधा के हाथ कांप रहे थे, मानो वह रसोई से कोई पकवान नहीं, बल्कि अपनी किस्मत का फैसला लेकर आई हो। अलख जी की नजरें पहली थाली पर गिरी। उन्होंने नाक सिकोड़ी, जैसे किसी ने उनके सामने कोई सड़ा हुआ तर्क रख दिया हो। “भिंडी? यह लेडी फिंगर नहीं, किसी बूढ़ी सभ्यता की सड़ी हुई उंगलियां हैं, दांतों में फंसकर मेरी हालत खराब कर देंगी।” सुधा ने चुपचाप थाली बदली। दूसरी आई तो उन्होंने उसे अपराधी की तरह घूरा। “बैंगन? यह तो बे-गुन है, शरीर में वायु का ऐसा तांडव मचाएगा कि घर भूकंप की चपेट में आ जाएगा।” उनके चेहरे पर छाई वह कुटिल गंभीरता किसी कसाई की मुस्कान जैसी थी, जो छुरी चलाने से पहले मंत्र पढ़ता है।

सिलसिला थमा नहीं, वह तो एक लंबी शवयात्रा की तरह आगे बढ़ता गया। गोभी को उन्होंने “फूलों का कब्रिस्तान” कहकर ठुकरा दिया और मटर को “हरे रंग की गोलियां” बताया जो पेट में धमाका कर सकती हैं। लौकी को देखकर वे ऐसे बिदके जैसे सामने नागिन फन फैलाए खड़ी हो—”यह तो पानी का छल है, इसमें आत्मा कहाँ है?” करेले पर तो उन्होंने अपनी पूरी दार्शनिक क्षमता झोंक दी, बोले, “इतनी कड़वाहट तो समाज में भी नहीं, जितनी इस अधम फल में है।” आलू को उन्होंने “अहंकार का प्रतीक” माना और पनीर को “धोखेबाज रईस।” कटहल उन्हें मांस का स्वांग लगा, तो टमाटर रक्त के धब्बों जैसा। अरबी को उन्होंने फिसलन भरी राजनीति का नाम दिया और मूली को सामाजिक मर्यादा का दुश्मन। सुधा की आँखों से आंसू नहीं, मानो पिघला हुआ धैर्य बह रहा था। वह बीसवीं बार रसोई की ओर गई, एक ऐसी सब्जी लेकर जिसे ठुकराने का मतलब था अस्तित्व का अंत।

सुधा ने अगली सब्जी सामने रखी—तोरई। अलख जी ने उसे छुआ और पीछे हट गए जैसे करंट लग गया हो। “यह? यह तो किसी बीमार की अंतिम वसीयत जैसी पीली और मरी हुई है। इसे खाकर तो यमराज भी रास्ता भूल जाए।”  पत्नी की सहनशीलता अब अपने चरम पर थी। कमरे का तापमान गिर रहा था। अलख जी ने मेज को धक्का दिया और चीख पड़े, “सुधा, इस घर में इतनी सारी सब्जी हैं, पर एक भी ऐसी नहीं जो मेरी अंतरात्मा को तृप्त कर सके। क्या तुम चाहती हो कि मैं भूखा मर जाऊं?” दुखी होते हुए बोले। सुधा स्थिर खड़ी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और अलख जी के बहुत करीब जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में इतना गुस्सा था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। अलख जी डरकर कुर्सी से चिपक गए।

अचानक सुधा ने अलख जी के सामने एक खाली प्लेट रखी। बिल्कुल कोरी, चांदी जैसी चमकती हुई। अलख जी ने हकलाते हुए पूछा, “इसमें… इसमें क्या है?” सुधा ने एक अदृश्य निवाला तोड़ा और अलख जी के मुँह के पास ले गई। “खाओ,” उसने आदेश दिया। अलख जी ने मुँह खोला, कुछ महसूस नहीं हुआ। “स्वाद कैसा है?” सुधा ने पूछा। अलख जी की आँखें फटी की फटी रह गईं, “अरे! यह तो अद्भुत है! ऐसा स्वाद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा! क्या है यह?” सुधा धीरे से मुस्कुराई। उसने कहा, “यह आपका अपना ‘अहंकार’ है। पिछले चालीस मिनट से आप वही तो उगल रहे थे। मैंने बस उसे ही फ्राई करके परोस दिया है। इतनी सारी सब्जियां तो केवल बहाना थीं, असली व्यंजन तो आपका वह कुतर्क था जिसे दुनिया ‘नखरा’ कहती है।” अलख जी ने प्लेट देखी, वह अभी भी खाली थी, पर उनके पेट से डकार आई। वे हतप्रभ थे कि उन्होंने बिना कुछ खाए अपना पूरा अस्तित्व ही डकार लिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ – हास्य-व्यंग्य – “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य – व्यंग्य “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ ☆

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

बहुत सुबह डोरवेल बजी, मैं समझ गया कि अवश्य ही किसी समस्या के साथ वर्मा जी आए होंगे। दरवाजा खोला, मेरा अनुमान सही था। वर्मा जी अंदर आकर चुपचाप पालथी मारकर सोफे पर बैठ गए। मैं अखबार पढ़ने लगा।

वर्मा जी का मौन टूट ही नहीं रहा था। कुछ देर बाद मैंने पूछा – क्या बात है वर्मा जी ? वे बोले – बहुत बुरा हुआ भाई साहब और फिर मौन हो गए ! इतने में मेरी पत्नी चाय लेकर आ गई। वर्मा जी की मुद्रा देख कर उसने भी प्रश्न किया – क्या बात है वर्मा जी आज इतनी उदासी के साथ मौन ? वे चाय की चुस्की लेते हुए बोले – भाभी जी बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा – भाई जी, बुरा कहां हुआ ? कल आपके घर गैस का सिलेंडर आ गया है, डीजल, पेट्रोल भी मिल रहा है। ट्रंप का दिमाग दुरुस्त चलते ईरान – अमेरिका युद्ध भी समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है और आप कह रहे हैं कि बहुत बुरा हुआ ? वे बोले – भाई साहब आज गैस, पेट्रोल, ईरान – अमेरिका की बात नहीं, मैं तो संसद में महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने के संदर्भ में कह रहा हूं कि बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा भाई जी इस बिल के पीछे सरकार और विपक्ष का जो भी नजरिया या राजनीति हो वह अलग बात है, लेकिन यहां मुझे फिल्म “बाजीगर” का एक डायलॉग याद आ रहा है जिसे शाहरुख खान ने हीरोइन के पिता से जानबूझ कर कार रेस हारने के बाद बोला था – “जीतने के लिए हारने वाले को बाजीगर कहते हैं”। सब जानते हैं कि मोदी जी “बाजीगर” हैं, उनकी हार के पीछे कोई राज हो सकता है ! वैसे महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने से देश के स्वार्थी पुरुष अवश्य ही खुश हो रहे होंगे। मेरी बात सुनकर वर्मा जी का दर्द छलक पड़ा, आँखें डबडबाई आईं। वे बोले – भाई साहब, मेरे सपने तो चकनाचूर हो गए। सोचा था अपनी पत्नी को लोकसभा का चुनाव लड़ाउंगा और सरपंच पति, पार्षद पति, विधायक पति की तरह सांसद पति कहलाऊंगा, पर हाय री किस्मत। मैंने कहा – वर्मा जी, दुखी न हों 29 में न सही 34 के चुनाव तक तो महिला आरक्षण लागू हो ही जाएगा। 34 के चुनाव के लिए अभी पर्याप्त समय है आप भाभी जी के नाम से समाज सेवा और चुनाव प्रचार तो चालू कर ही दें ताकि जीत पक्की हो जाए। जब भाभी जी समाज सेविका और लोकसभा की भावी प्रत्याशी कहलाएंगी तब भी आपकी ही इज्जत बढ़ेगी। वे राहत की सांस लेते हुए बोले – भाई साहब आपने सही कहा, लेकिन 34 के चुनाव के लिए अभी लगभग 9 साल हैं इतना लंबा समय कटेगा कैसे ? मैंने कहा- भाई जी आप तो भाभी जी की समाज सेवी और भावी लोकसभा प्रत्याशी की छवि बनाने में जुट जाइए समय तो चुटकियों में बीत जाएगा, बल्कि कहीं ऐसा न हो कि समय कम पड़ जाए और आपको पछताना पड़े।

मेरी बात सुनकर वर्मा जी उठ खड़े हुए। मैंने पूछा क्या हुआ, कहां जा रहे हैं ? वे बोले – भाई साहब, देर नहीं करना चाहता, पत्नी की छवि बनाने का कार्य शुरू कर ही दूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३२ ☆ व्यंग्य – विष्णु भगवान को रिमाइंडर ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘विष्णु भगवान को रिमाइंडर‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ विष्णु भगवान को रिमाइंडर डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

 

प्रभु,

कई साल पहले मैंने आपको एक पत्र के द्वारा निवेदन किया था कि चूंकि अब मेरी उम्र आपके प्रत्यक्ष दर्शन के लायक हो गयी है, अतः मेरे सपने में किसी प्रतिनिधि को भेज कर जानकारी मुहैया करायें कि स्वर्ग और नरक में इंतज़ामात कैसे हैं। अभी कथावाचकों से जो जानकारी मिलती है उससे बहुत समाधान नहीं होता। अफसोस है कि मेरे निवेदन का आज तक कोई उत्तर नहीं मिला। लगता है आपके दफ़्तरों में कामकाज ठीक नहीं है।

मुझे यह निवेदन इसलिए करना पड़ा क्योंकि यहां मृत्युलोक में हमारी लाइफ़-स्टाइल में बहुत तरक्की हो गयी है। हम बहुत आराम-पसन्द हो गये हैं। हमारे बाप-दादा ने टेबिल-फ़ैन भी नहीं देखा था, लेकिन हम ए.सी. की हवा ले रहे हैं, भले ही बार-बार ज़ुकाम से पीड़ित हो रहे हों। हमारे बहुत से काम अब ‘रोबो’ और ‘रिमोट’ कर रहे हैं। आदमी को हिलने-डुलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन सीधा बिस्तर से ट्रांसफर होकर अर्थी पर चढ़ जाएगा।

प्रभु, यह ध्यान रहे कि अब हम रथ की सवारी के लायक नहीं रहे। हम में से ज़्यादातर ‘ऑस्टियोपोरोसिस’ और ‘आर्थ्राइटिस’ के मरीज़ हैं। ‘जंक फ़ूड’ खाते-खाते हमारी हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं। रथ पर बैठेंगे तो निश्चय ही दो-चार हड्डियां टूटेंगीं। यहां तो साधु-सन्यासी भी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इसलिए निवेदन है कि हमारी हालत के मद्देनज़र आरामदेह ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम हो। डायबिटीज़ और ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए वहां क्या इंतज़ाम है, यह भी शंका बनी हुई है।

एक विशेष बात जिसके लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं यह है कि आपके चित्रों में आप अपनी ससुराल यानी समुद्र में शेषशैया पर लेटे हैं और आपकी पत्नी लक्ष्मी आपके चरण चांप रही हैं। देख कर कुछ अजीब लगता है। एक तो आपका इतने दिन तक ससुराल में रहना ठीक नहीं है। हमारे यहां कहावत है ‘ससुरार सुख की सार, रहै दिना दो चार।’ यानी ससुराल में सुख मिलता है, बशर्ते कि दो-चार दिन ही रहा जाए। इसलिए समझना मुश्किल है कि आप वहां कैसे हज़ारों साल से डेरा जमाये हैं। ससुर साहब आपके लिहाज में कुछ न बोलते होंगे, लेकिन आपका वहां इतने लंबे समय तक घरजमाई की तरह टिकना उचित नहीं लगता।

लक्ष्मी जी का लगातार आपके चरण चांपना आपके बहुत से भक्तों को अटपटा लग रहा है। यह नारी-अस्मिता और स्त्री-स्वातंत्र्य का ज़माना है। करवा चौथ और तीजा को छोड़ दें तो आज की नारियां पति के चरण छूते हुए फोटो खिंचाने से हिचकती हैं। एक पुरानी फिल्म में पत्नी को पति-भक्ति में गाते हुए सुना था— ‘कौन जाए मथुरा, कौन जाए काशी, इन तीर्थों से मुझे क्या काम है; मेरे घर में ही हैं भगवान मेरे, उनके चरनों में मेरे चारों धाम हैं।’ ऐसे गीत अब सुनायी नहीं पड़ते। पतिदेव का मर्तबा भी पहले जैसा नहीं रहा। इस बीच नारी-अस्मिता के बड़े-बड़े आंदोलन हो गये, जिनके मार्फत स्त्री को समझा दिया गया कि पति नाम का प्राणी ‘परमेश्वर’ नहीं, महज़ हाड़-मांस का मामूली पुतला है। परिणामत: कई घरों में पति की इज़्ज़त दो कौड़ी की हो गयी है।

एक और बात यह कि आप अपने चार हाथों में से एक में पद्म यानी कमल धारण किये हैं और आपका एक हाथ अभय मुद्रा में उठा है। मुश्किल यह है कि कमल और हाथ हमारे यहां पार्टियों के चुनाव-चिन्ह हैं, इसलिए यहां दो पार्टियों के बीच सिरफुटव्वल हो रही है। दोनों आपके चित्रों की दुहाई देकर कहती हैं कि आपका आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हो रहा है। इस संबंध में आपकी तरफ से कुछ स्पष्टीकरण मिल सके तो यह खींचतान बंद हो। गनीमत है कि आपके शंख और चक्र किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह नहीं हैं, अन्यथा और बवाल मचता।

अन्त में मेरा आपसे पुनः निवेदन है कि  ‘वहां’ के इंतज़ामात के बारे में मेरे द्वारा चाही गयी जानकारी मुहैया करायें ताकि मेरे जैसे लोग निश्चिंत होकर स्वर्ग या नरक में प्रवेश कर सकें। दूसरे, आप जल्दी लक्ष्मी जी के साथ ससुराल छोड़कर अपने घर लौटें ताकि भक्तों का असमंजस दूर हो सके।

मेरी बातों को अन्यथा न लें। कृपा बनाये रखें।

आपका परम भक्त

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ – व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगाकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४६ 

☆ व्यंग्य- बस, कुछ जुगाड़ कीजिए ‘वह’ मिल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मन नहीं मान रहा था। स्वयं के लिए स्वयं प्रयास करें। मगर, पुरस्कार की राशि व पुरस्कार का नाम बड़ा था। सो, मन मसोस कर दूसरे साहित्यकार से संपर्क किया। बीस अनुशंसाएं कार्रवाई। जब इक्कीसवे से संपर्क किया तो उसने स्पष्ट मना कर दिया।

“भाई साहब! इस बार आपका नंबर नहीं आएगा।” उन्होंने फोन पर स्पष्ट मना कर दिया, “आपकी उम्र 60 साल से कम है। यह पुरस्कार इससे ज्यादा उम्र वालों को मिलता है।”

हमें तो विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी होता है। तब उधर से जवाब आया, “भाई साहब, वरिष्ठता भी तो कोई चीज होती है। इसलिए आप ‘उनकी’ अनुशंसा कर दीजिए। अगली बार जब आप ‘सठिया’ जाएंगे तो आपको गारंटीड पुरस्कार मिल जाएगा।”

बस! हमें गारंटी मिल गई थी। अंधे को क्या चाहिए? लाठी का सहारा। वह हमें मिल गया था, इसलिए हमने उनकी अनुशंसा कर दी। तब हमने देखा कि कमाल हो गया। वे सठियाए ‘पट्ठे’ पुरस्कार पा गए। तब हमें मालूम हुआ कि पुरस्कार पाने के लिए बहुत कुछ करना होता है।

हमारे मित्र ने इसका ‘गुरु मंत्र’ भी हमें बता दिया। उन्होंने कहा, “आपने कभी विदेश यात्रा की है?” चूंकि हम कभी विदेश क्या, नेपाल तक नहीं गए थे इसलिए स्पष्ट मना कर दिया। तब वे बोले, “मान लीजिए। यह ‘विदेश’ यात्रा यानी आपका पुरस्कार है।”

“जी।” हमने न चाहते हुए हांमी भर दी। “वह आपको प्राप्त करना है।” उनके यह कहते ही हमने ‘जी-जी’ कहना शुरू कर दिया। वे हमें पुरस्कार प्राप्त करने की तरकीबें यानी मशक्कत बताते रहे।

सबसे पहले आपको ‘पासपोर्ट’ बनवाना पड़ेगा। यानी आपकी कोई पहचान हो। यह पहचान योग्यता से नहीं होती है। इसके लिए जुगाड़ की जरूरत पड़ती है। आप किस तरह इधर-उधर से अपने लिए सभी सबूत जुटा सकते हैं। वह कागजी सबूत जिन्हें पासपोर्ट बनवाने के लिए सबसे पहले पेश करना होता है।

सबसे पहले एक काम कीजिए। यह पता कीजिए कि पुरस्कार के इस ‘विदेश’ से कौन-कौन जुड़ा है? कहां-कहां से क्या-क्या जुगाड़ लगाना लगाया जा सकता है? उनसे संपर्क कीजिए। चाहे गुप्त मंत्रणा, कॉफी शॉप की बैठक, समीक्षाएं, सोशल मीडिया पर अपने ढोल की पोल, तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वोट दूंगा, तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊंगा, जैसी सभी रणनीति से काम कीजिए। ताकि आपको एक ‘पासपोर्ट’ मिल जाए। आप कुछ हैं, कुछ लिखते हैं। जिनकी चर्चा होती है। यही आपकी सबसे बड़ी पहचान है। यानी यही आपका ‘पासपोर्ट’ होगा।

अब दूसरा काम कीजिए। इस पुरस्कार यानी विदेश जाने के लिए अर्थात पुरस्कार पाने के लिए वीजा का बंदोबस्त कीजिए। यानी उस अनुशंसा को कबाडिये जो आपको विदेश जाने के लिए वीजा दिला सकें। यानी आपने जो पासपोर्ट से अपनी पहचान बनाई है उसकी सभी चीजें वीजा देने वाले को पहुंचा दीजिए। उससे स्पष्ट तौर पर कह दीजिए। आपको विदेश जाना है। वीजा चाहिए। इसके लिए हर जोड़-तोड़ व खर्चा बता दे। उसे क्या-क्या करना है? उसे समझा दे।

सच मानिए, यह मध्यस्थ है ना, वे वीजा दिलवाने में माहिर होते हैं। वे आपको वीजा प्राप्त करने का तरीका, उसका खर्चा, विदेश जाने के गुण, सब कुछ बता देंगे। बस आपको वीजा प्राप्त करने के लिए कुछ दाम खर्च करने पड़ेंगे। हो सकता है निर्णयको से मिलना पड़े। उनके अनुसार कागज पूर्ति, अनुशंसा या कुछ ऐसा वैसा छपवाना पड़ सकता है जो आपने कभी सोचा व समझ ना हो। मगर इसकी चिंता ना करें। वे इसका भी रास्ता बता देंगे।

बस, आपको उनके कहने अनुसार दो-चार महीने कड़ी मेहनत व मशक्कत करनी पड़ेगी। हो सकता है फोन कॉल, ईमेल, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि पर इच्छित- अनिच्छित व अनुचित चीज पोस्ट करनी पड़े। इसके लिए दिन-रात लगे रहना पड़ सकता है। कारण, आपका लक्ष्य व इच्छा बहुत बड़ी है। इसलिए त्याग भी बड़ा करना पड़ेगा।

इतना सब कुछ हो जाने के बाद, जब आपको विदेश जाने का रास्ता साफ हो जाए और वीजा मिल जाए तब आपको यात्रा-व्यय तैयार रखना पड़ेगा। तभी आप विदेश जा पाएंगे।

उनकी यह बात सुनकर लगा कि वाकई विदेश जाना यानी पुरस्कार पाना किसी पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने से कम नहीं है। यदि इसके बावजूद विदेश यात्रा का व्यय पास में न हो तो विदेश नहीं जा पाएंगे। यह सुनकर हम मित्र की सलाह पर नतमस्तक हो गए। वाकई विदेश जाना किसी योग्यता से काम नहीं है। इसलिए हमने सोचा कि शायद हम इस योग्यता को भविष्य में प्राप्त कर पाएंगे? यही सोचकर अपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने लगे हैं।

————

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

29-01- 2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – व्यंग्य – “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ व्यंग्य ☆ “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

“गेहूँ के साथ घुन पिसता है” आपने अक्सर सुना होगा। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी घमासान युद्ध में विश्व भर में यह कथन सार्थक हुआ। नष्ट हुए तेल ठिकानों, अवरुद्ध आपूर्ति मार्गों ने न सिर्फ तेल और गैस के दाम विश्व भर के देशों में बढ़ा दिए हैं वरन चिंताजनक कमी पैदा कर दी। यद्यपि फिलहाल युद्ध विराम हो गया है पर युद्ध के बादल अभी छंटे नहीं हैं। युद्ध में बुरे फंसे ट्रंप को अपमानित कराकर आखिर “कम्बल ने उन्हें छोड़ दिया” फिर भी अगले पल वे क्या करेंगे, उन्हें खुद भी नहीं पता, कह नहीं सकते कि कब वे फिर से “कम्बल पकड़ लें”। युद्ध के परिणाम कहीं साइकिल और चूल्हा युग के दर्शनों से वंचित, पैदल चलने से परहेज करने वाली नई पीढ़ी को इसका अनुभव न करा दें। आरोप – प्रत्यारोप के साथ – साथ “तू तू – मैं मैं” की पक्ष – विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजियों, हुल्लड़, प्रदर्शनों से तो सभी परिचित हैं। विपक्ष तो सदा ही सरकार को कमजोर, अदूरदर्शी, नाकाम साबित करने के लिए मुद्दों और अवसरों की तलाश में लगा रहता है। यद्यपि हमारे देश की सरकार काफी समय से चीख – चीख कर कह रही थी कि अभी हमारे सामने पेट्रोल, डीजल का संकट नहीं है और अब तो युद्ध विराम भी हो गया है, गैस की थोड़ी समस्या है किंतु इसके समाधान के प्रयत्न भी जारी हैं। पर जो सरकार की बात सुन और समझ कर जनता को भी समझाए क्या आप उसे विपक्ष कहेंगे ? विपक्ष सरकार को नकारा साबित करने निरंतर अपने कदम कठोर करता जा रहा है, सरकार ने इस समस्या से निपटने पहले कदम, फिर कठोर कदम और अति कठोर कदम उठाना शुरू कर दिए हैं।

गैस सिलेंडर प्राप्त करने के लिए गृहणियां अपने – अपने पतियों – पुत्रों से गैस एजेंसियों की ओर कदम उठाने और वहां पहुंचकर जब तक गैस न मिले अंगद की तरह पैर जमाए रखने की हिदायत दे रही हैं। लोगों का सूर्योदय – सूर्यास्त गैस एजेंसियों के समक्ष लगी लाइन में हो रहा है। कुछ अच्छी पत्नियां तो गैस की लाइन में लगे अपने पति को टिफिन पहुंचाते हुए भी देखी गईं। सरकार तेल और गैस के लिए लगी लाइनें देख कर चिंतित होती रही है और विपक्ष खुशियां मनाता रहा, विपक्ष चाह रहा था कि लाइन बढ़ती जाएं, लोगों में टकराव शुरू हो। डीजल – पेट्रोल पंपों में भी उपभोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा तेल लेने प्रयासरत देखा गया। जो इसमें सफल हो जाता उसकी खुशी देखते ही बनती। विपक्ष गैस, डीजल – पेट्रोल की किल्लत का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहा है। उसका कहना है कि सरकार के मुखिया ट्रंप के चमचे हैं वे ईंधन की आपूर्ति के लिए प्रयास करने की जगह घुइयां छील रहे हैं।

टीवी चैनलों में डिवेट जारी है। सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधि एक दूसरे का चीर हरण कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह परिस्थितियों से निपट रही है, उसके पास 2 माह का पर्याप्त स्टॉक है और कच्चे तेल के जहाज आ रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार का झूठ बताता रहा। उसका कहना है कि ऐसा है तो गैस, पेट्रोल के लिए लंबी कतारें क्यों लगी ? इसके विपरीत सरकार का कहना है कि पेट्रोल, डीजल, गैस की कमी की अफवाह फैलाकर लोगों की लाइन लगवाने का काम विपक्ष ने किया। जनता उलझन में है कि किसकी बात को सही माने ! कुछ लोगों का कहना है कि सरकार 5 राज्यों के होने वाले चुनावों तक रुकी है फिर देश में तेल और गैस की मारा मारी भी होगी और दाम भी बढ़ेंगे। सरकार तो सरकार है क्या नहीं कर सकती। कुछ लोग कह रहे हैं कि यदि हम थाली, घंटा बजाकर, दिया और टॉर्च जलाकर कोरोना को भगा सकते हैं तो हमें अमेरिका, इजरायल, ईरान का युद्ध परमानेंट रुकवाने के लिए भी इसी तरह के कुछ प्रयोग करना चाहिए। आश्चर्य है, जिन लोगों को दीवाली के पटाखों से प्रदूषण का खतरा नजर आता था, पृथ्वी की ओज़ोन परत फटती नजर आती थी, जो पटाखों की मनाही के लिए देश – विदेश में हाहाकार मचाने लगते थे वे सब ईरान, इजरायल, अमेरिका के आतिशी युद्ध पर मौन रहे। एक बात और बता दूं मेरे पड़ोसी वर्मा जी जब – तब मेरे पास आकर मुझसे युद्ध रुकवाने का आग्रह करते रहे, कहते थे आप पत्रकार हैं, सक्षम हैं, आपको इस सिलसिले में मोदी जी से बात करना चाहिए। अच्छा हुआ युद्ध विराम हो गया, ट्रंप कम्बल से छूटे, हमारी सरकार को राहत मिली, विपक्ष नए मुद्दे की तलाश में लग गया और वर्मा जी ने भी मेरा पीछा छोड़ा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९० – व्यंग्य – डिजिटल उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डिजिटल उपवास )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९० – व्यंग्य  – डिजिटल उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना दिखाया—’डिजिटल नरक’। फरेब सिंह का चुनावी घोषणापत्र किसी धार्मिक ग्रंथ और सॉफ्टवेयर मैनुअल का मिला-जुला खिचड़ी था। उन्होंने तर्क दिया कि गांव की बदहाली का कारण सड़कें नहीं, बल्कि मोबाइल के भीतर बैठा वह ‘अदृश्य राक्षस’ है जो सबका डेटा और पुण्य एक साथ चबा रहा है। उन्होंने वादा किया कि जीतते ही वे पूरे गांव में ‘डेटा-जामर’ लगवाएंगे और हर ग्रामीण को एक ‘एनालॉग शांति कार्ड’ देंगे। उनका दावा था कि जो उन्हें वोट देगा, उसके स्मार्टफोन से निकलने वाली ‘नेगेटिव ऊर्जा’ को वे एक विशेष सरकारी फिल्टर के जरिए बिजली में बदल देंगे, जिससे गांव के मंदिर की लाइटें मुफ्त में जलेंगी। गांव के लोग, जो रील बनाने और देखने के चक्कर में अपनी फसल और अक्ल दोनों गंवा रहे थे, अचानक ‘डिजिटल वैराग्य’ के इस क्रांतिकारी विचार पर लट्टू हो गए।

प्रचार के अंतिम सप्ताह में फरेब सिंह ने गांव के तालाब के पास एक ‘सोशल मीडिया विसर्जन कुंड’ बनवाया। यह वास्तव में एक गहरा गड्ढा था जिसके चारों ओर टूटे हुए कंप्यूटर के कीबोर्ड और माउस लटकाए गए थे। उन्होंने घोषणा की कि जो भी ग्रामीण अपनी ‘फेसबुक की बुराइयां’ और ‘व्हाट्सएप के झूठ’ इस कुंड में मानसिक रूप से विसर्जित कर फरेब सिंह को वोट देने का संकल्प लेगा, उसका अगला सात जन्म तक किसी भी ‘स्कैम कॉल’ या ‘लोन मैसेज’ से पाला नहीं पड़ेगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘गपोड़ी लाल’ चिल्लाते रहे कि गांव को मुफ्त इंटरनेट चाहिए, लेकिन फरेब सिंह ने उन्हें ‘असुर’ घोषित कर दिया जो जनता की निजता को खतरे में डालना चाहता है। गांव के बुजुर्गों को लगा कि फरेब सिंह साक्षात कलियुग के यमराज से उनका स्मार्टफोन बचाने आए हैं। लोग अपनी फटी धोतियों के कोने में चिपके पुराने हैंडसेटों की पूजा करने लगे ताकि फरेब सिंह की ‘सुरक्षा ढाल’ उन्हें मिल सके।

मतदान के अगले दिन जब फरेब सिंह की भारी मतों से जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘डेटा-मुक्ति प्रमाण पत्र’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। फरेब सिंह ने बड़े इत्मीनान से अपनी नई चमचमाती गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक डाक टिकट जैसा कागज थमा दिया, जिस पर लिखा था— “डेटा ही माया है।” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, यह क्या है? हमारा नेटवर्क तो अब भी गायब है और मोबाइल में कुछ नहीं चल रहा!” फरेब सिंह ने अपनी नई आईफोन की स्क्रीन चमकाते हुए गंभीर स्वर में कहा— “मूर्खों! नेटवर्क गायब नहीं हुआ, मैंने गांव के टावर का किराया डकार कर उसे अपने नाम आवंटित करवा लिया है। अब तुम सब ‘डिजिटल उपवास’ करो ताकि मेरा निजी बिजनेस बिना किसी रुकावट के तेज चल सके। तुमने डेटा छोड़ा, मैंने उसे पकड़ लिया; यही तो असली समाजवाद है!” जनता सन्न खड़ी अपने पत्थर जैसे मोबाइल देख रही थी और फरेब सिंह अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाकर ‘हाई-स्पीड’ घोटाले की नई फाइल जमा करने शहर की ओर कूच कर गए।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३१ ☆ व्यंग्य – कलियुग के त्रिदेव ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘कलियुग के त्रिदेव’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३१ ☆

☆ व्यंग्य ☆ कलियुग के त्रिदेव

‘दैनिक खबरची’ का पत्रकार खोजीलाल बहुत परेशान है। रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म हुआ नहीं और अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध के पटाखे फूटने लगे। गज़ा पर इज़रायली आक्रमण से 70000 से ज्यादा बेकसूर मरे। खाने की लाइन में लगे बच्चों पर गोलियां चलीं। अमेरिका की ईरान पर बमबारी से 160 मासूम स्कूली छात्राएं असमय काल-कवलित हुईं। श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत डुबाने से 80 से ज्यादा ईरानी सैनिक मरे। इस पर प्रेसिडेंट ट्रंप की टिप्पणी थी कि उनके सैनिकों को जहाज़ पर क़ब्ज़ा करने के बजाय उसे  डुबाने में ज़्यादा मज़ा आता है। इन लड़ाइयों में हज़ारों इमारतें ज़मींदोज हुईं, हजारों परिवार बेघर और बर्बाद हुए। लेकिन इस बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों के माथे पर शिकन नहीं पड़ी। वे हंसते, मज़ाक करते, नृत्य की मुद्राएं बनाते रहे, ‘शत्रु’ की बर्बादी पर बगलें बजाते रहे।

खोजीलाल धार्मिक आदमी है। उसने पढ़ा है कि सृष्टि के सृजन, पालन और विनाश की ज़िम्मेदारी ब्रह्मा, विष्णु और शिव यानी त्रिदेव के हाथों में है। इसीलिए जब वह ज़्यादा विचलित होता है तो आकाश की तरह मुंह उठाकर कहने लगता है— ‘यह क्या हो रहा है प्रभु? आदमी आदमी की जान का दुश्मन बना हुआ है। छोटे-छोटे बच्चे कीड़े मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। फिर उन्हें जन्म देने की क्या ज़रूरत थी? क्या यह सब आपकी सहमति से हो रहा है? पाप और अन्याय करने वालों को आप रोकते क्यों नहीं?’

खोजीलाल को युद्ध में कूदने वाले देशों का यह तर्क परेशान करता है कि  वे अपनी सुरक्षा के लिए आक्रमण कर रहे हैं। उसे लगता है कि यदि यह तर्क मान लिया  जाए तो हर देश को अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर आक्रमण करने का लाइसेंस मिल जाएगा। फिर कानून-कायदे किस लिए हैं?

इन्हीं तर्कों-वितर्कों में उलझा खोजीलाल एक दिन घर आकर सो गया। थोड़ी देर में देखा सामने साक्षात शिवजी खड़े हैं। वही बाघंबर, त्रिशूल, शरीर पर भस्म और कंठ में नाग। लेकिन चेहरे पर बड़ी गंभीरता। खोजीलाल दर्शन करके भावविभोर हुआ, हाथ जोड़कर बोला, ‘दर्शन पाकर कृतार्थ हुआ प्रभु, लेकिन संसार में यह क्या हो रहा है? सृष्टि के विनाशक तो आप हैं लेकिन आदमी आदमी के प्राण लेने पर क्यों तुला है? क्या यह सब आपकी मर्जी से हो रहा है?’

शिवजी कुछ और गंभीर हो गये, बोले, ‘भक्त, तुम्हारा दुख और तुम्हारी चिन्ता सही है, लेकिन जो हो रहा है उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए आदमी ही जिम्मेदार है। ब्रह्मा जी आदमी की रचना ऐसी करते हैं कि मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट न हो तो उसका शरीर आराम से सत्तर अस्सी साल तक चलेगा। तुम लोग जो कृत्रिम अंग बनाते हो वे दस पंद्रह साल भी नहीं चलते। तुमने नाना प्रकार के वाहन सड़कों और आकाश में चला कर आदमी की उम्र को अनिश्चित और छोटा किया है। भ्रष्टाचारी लोग भवनों और पुलों में मिलावट करके दूसरों के प्राण लेते रहते हैं। तानाशाह हजारों वर्षों से अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए युद्ध का खेल खेलते रहे हैं क्योंकि उसमें जान  सैनिकों और नागरिकों की जाती है। वे खुद सुरक्षित रहते हैं।

‘दूसरे, आदमी ने अपनी तरक्की दिखाने के चक्कर में युद्ध को ज्यादा नुकसानदेह बना दिया है। पहले युद्ध मैदान में सवेरे शुरू होते थे और शाम को बंद हो जाते थे। सैनिकों के घर और परिवार तक तब के अस्त्रों की पहुंच नहीं हो पाती थी। अब शत्रु के नगरों, इमारतों और परिवारों पर हमला होता है जिसमें हजारों निर्दोष मारे जाते हैं। बड़े पैमाने पर बर्बादी होती है, लेकिन इसी को तुम लोग तरक्की बताकर फूले फिरते हो। तुम्हारी करतूतों के लिए हम कहां दोषी हैं? दरअसल अब आदमी ही सृष्टि का पालक और विनाशक बना बैठा है। हमें अप्रासंगिक, आउटडेटेड बताया जाता है।’

सुनकर खोजीलाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हैं प्रभु, लेकिन अब इस संसार का क्या होगा?’

शिवजी ने जवाब दिया, ‘मैंने विष्णु जी से बात की है। उन्होंने कभी भस्मासुर का अंत किया था। वे ही कलियुग के भस्मासुरों से निपटने का उपाय बताएंगे।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद…

☆ ॥ व्यंग्य॥ फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

वनराज- ‘गजराज! सुना है कि मार्जारी के राज्य में चुनाव हो रहे हैं।’

गजराज- ‘महाराज! आपने बिल्कुल सही सुना है। आजकल दुनिया के अधिकांश देशों में प्रजातंत्र का बोलबाला है। हमारे समुदाय के वन्य प्राणियों में भी जो नगरीय क्षेत्रों में रहते हैं वहाँ पर भी हर पाँच साल में चुनाव होने लगे हैं। जिसे विरोधी जंगलराज की संज्ञा से अभिहित करते हैं।’

वनराज- ‘ये तो बहुत अच्छी बात है। इस प्रणाली में कम से कम उनको भी अपने मन के मुताबिक़ अपने मुखिया का चयन करने और सरकार बनाने का मौक़ा मिलता है। अब जरा यह भी बतलाओ कि मार्जारी के पक्ष में कौन हैं और उसके विरोध में कौन हैं…?’

गजराज- ‘महाराज! मार्जारी बड़ी चतुरी और चालाक है। वह बहुत पहले से ही मूषकों, छिपकलियों, सरि-सृपों आदि को दूध-रोटी का प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करने का जुगाड़ कर चुकी है।’

वनराज- ‘और उसके विरोध में कौन हैं…?और उनकी तैयारी के बारे में जरा विस्तारपूर्वक प्रकाश डालें। मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।’

गजराज- ‘राजन्! मार्जारी के विरोध में मुख्य रूप से श्वान दल दावेदार है। बाक़ी सियारों और कौओं के दल को तो वह बहुत पहले ही वाट लगा चुकी है।’

वनराज- ‘गजराज! तुम हम सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान हो। जरा सोच-विचारकर बतलाओ कि इस बार के चुनाव में मार्जारी के राज्य में किसकी जीत होने जा रही है।’

गजराज- ‘स्वामी! वैसे, तो पिछली बार श्वानों के दल ने अपनी सीटों में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा कर लिया था। अगर वह पिछली बार की तुलना में अपनी सीटों को दोगुना कर लेता है, तो निश्चित रूप से जीत का सेहरा उसके सिर पर बँध सकता है और अपनी सरकार बना सकता है, पर राजन्! मार्जारी खेला करने में बड़ी माहिर है। ऊँट को किस करवट बैठाना है वह इस कला की मास्टर माइंड है।’

अतः महाराज! फ़िलहाल किसी भी निर्णय पर पहुँचना ज़रा जल्दबाज़ी होगी। दोनों खेमों की ओर से ब्लास्स्टिक मिसाइलें दागी जा रही हैं। किसका सर कलम होगा, किसके लहू से धरती रक्तरंजित होगी, आज की तारीख़ में कहना बड़े से बड़े ज्योतिषी द्वारा भविष्यवाणी मुश्किल है। हाँ! बुद्धिजीवियों द्वारा जरूर हवा में तीर-तुक्के छोड़े जा रहे हैं। मेरे देखे, तो जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे दिन-प्रतिदिन चुनावी जंग बड़ी रोचक और काँटे की हुई जा रही है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य  – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों को ठेंगा दिखा दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’पितृ-पेंशन और पुरखा-कनेक्ट योजना’। लल्लन बाबू का तर्क था कि नेता जीवितों की सेवा तो सब करते हैं, लेकिन जो पूर्वज स्वर्ग में बैठकर अपनी संतानों की दुर्दशा देख रहे हैं, उनके लिए कोई कुछ नहीं करता। उन्होंने घोषणा की कि यदि वे चुनाव जीते, तो गांव के श्मशान में ‘वाई-फाई युक्त प्रेत-कॉलिंग सेंटर’ बनवाएंगे, जहाँ से ग्रामीण सीधे अपने परलोकवासी दादा-परदादाओं से सलाह ले सकेंगे कि इस बार कौन सी भैंस खरीदनी है या किस लड़के की शादी कहाँ करनी है। गांव के भोले-भाले लोग, जो पितृ पक्ष में कौवों को रोटी खिलाकर थक चुके थे, अचानक ‘टेक्नो-अध्यात्म’ के इस जादुई जाल में ऐसे फंसे कि उन्हें अपनी वर्तमान गरीबी से ज्यादा पूर्वजों की ‘नेटवर्क कनेक्टिविटी’ की चिंता होने लगी।

प्रचार के अंतिम पड़ाव पर लल्लन बाबू ने गांव के पुराने कुएं के पास एक ‘आत्मा-स्कैनर’ मशीन स्थापित की, जो असल में एक कबाड़ हो चुका एक्सरे मशीन का ढांचा था जिस पर ढेर सारी चमकीली झिलमिलियां चिपकी थीं। उन्होंने दावा किया कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने की कसम खाकर इस मशीन के नीचे खड़ा होगा, उसे अपने अगले सात जन्मों का ‘आधार कार्ड’ और ‘प्रोफेशनल बायोडाटा’ तुरंत मिल जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘घसीटा राम’ बदहवास थे; वे स्कूल की मरम्मत और खाद की बात कर रहे थे, जबकि जनता को यह जानने की उत्सुकता थी कि अगले जन्म में वे राजा बनेंगे या पड़ोसी के घर के पालतू कुत्ते। लल्लन बाबू ने एक लाउडस्पीकर पर डरावनी और रहस्यमयी आवाज़ें रिकॉर्ड करके चला दीं, जिसे सुनकर ग्रामीणों को साक्षात ‘गरुड़ पुराण’ का लाइव टेलीकास्ट महसूस होने लगा। लोग अपनी मेहनत की कमाई चंदे के रूप में लल्लन बाबू के चरणों में अर्पित करने लगे ताकि उनका ‘अगला जन्म’ कम से कम सुरक्षित हो सके।

मतदान के अगले दिन जब लल्लन बाबू की प्रचंड जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘पुनर्जन्म का आधार कार्ड’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। लल्लन बाबू ने एक बड़ा सा बक्सा खोला और उसमें से छोटे-छोटे खाली शीशे के टुकड़े (आईने) सबको बांटना शुरू कर दिया। जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, इसमें तो कुछ लिखा ही नहीं है, बस हमारा अपना चेहरा दिख रहा है!” लल्लन बाबू ने एक लंबी डकार ली और गंभीर स्वर में बोले— “मूर्खों! पुनर्जन्म का आधार कार्ड यही आईना है। इसमें गौर से अपना चेहरा देखो; जिस इंसान ने एक कोरे वादे और कबाड़ की मशीन के चक्कर में अपना भविष्य और वर्तमान मुझे बेच दिया, वह अगले जन्म में ‘गदहा’ बनने की पूरी योग्यता अभी से हासिल कर चुका है! पूर्वज तो स्वर्ग में आराम कर रहे हैं, पर तुम लोगों ने मेरा अगला जन्म जरूर सुधार दिया।” जनता स्तब्ध खड़ी अपनी ही परछाईं को देख रही थी और लल्लन बाबू अपनी नई पजेरो में बैठकर ‘परलोक कल्याण विभाग’ का बजट डकारने शहर की ओर कूच कर गए।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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