हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३० -सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर।)  

☆  चुभते तीर # १३० – व्यंग्य  – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

ग्रीन पार्क सोसायटी में नया जिम खुलना किसी साधारण घटना की तरह नहीं था। यह उस मोहल्ले के मध्यवर्गीय सपनों के पंख लगने जैसा था, जहाँ लोग शक्कर की बोरी उठाने में कमर पकड़ लेते थे, लेकिन मुफ़्त के ट्रॉयल के नाम पर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते थे। जिम के उद्घाटन के दिन सोसायटी के सबसे बुजुर्ग और भारी-भरकम सदस्य मिश्रा जी भी टी-शर्ट पहनकर पहुँचे। उनका मुख्य उद्देश्य सेहत बनाना नहीं, बल्कि गुप्ता जी को यह दिखाना था कि साठ की उम्र में भी उनके डोले किसी से कम नहीं हैं।

जिम के ट्रेनर रोहन ने सबको कसरत के नियम समझाने शुरू किए। मिश्रा जी ने ट्रेडमिल पर नज़र दौड़ाई और बोले, “रोहन बेटा, यह मशीन तो मेरे घर के पंखे से भी धीमी चलती है। इसे ज़रा पूरी रफ्तार पर चलाओ।”

रोहन ने मना किया, लेकिन मिश्रा जी की ज़िद्द के आगे किसकी चली है। उन्होंने मशीन पर पैर रखा और रफ्तार बढ़ते ही उनकी टांगें इस तरह भागने लगीं जैसे दफ़्तर में छुट्टी का सायरन बजते ही कर्मचारी घर की तरफ भागते हैं। दो मिनट में मिश्रा जी के माथे से पसीने की धारा ऐसे बही जैसे पहली बारिश में छज्जे से पानी टपकता है।

अचानक ट्रेडमिल से एक कड़क की आवाज़ आई। मिश्रा जी ने पेट पकड़ लिया और ज़मीन पर बैठ गए। पूरा जिम सन्नाटे में डूब गया। लोग भागे-भागे आए। गुप्ता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कहा था मिश्रा जी, उम्र के हिसाब से चला करो, अब बैठो दो महीने बिस्तर पर।”

मिश्रा जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस अपनी जेब की तरफ इशारा कर रहे थे। सबको लगा कि मिश्रा जी को दिल का दौरा पड़ा है या कमर की हड्डी खिसक गई है। तुरंत एम्बुलेंस को फोन घुमाया गया। पूरी सोसायटी जमा हो गई। गुप्ता जी मन ही मन अपनी जीत का जश्न मनाने लगे कि अब कम से कम छह महीने मिश्रा जी पार्क में टहलने नहीं आएंगे।

तभी मिश्रा जी ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से अपना हाथ निकाला। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ और बीस रुपये का नोट था। उन्होंने हांफते हुए ट्रेनर रोहन को कागज़ थमाया। रोहन ने कागज़ खोलकर पढ़ा, उसमें लिखा था, “ट्रेडमिल के नीचे मेरा तीन साल पुराना छुपाया हुआ बीस का नोट गिर गया था, वही उठाने के चक्कर में पैर फिसल गया। एम्बुलेंस रद्द करो, मुझे सिर्फ एक कड़क चाय पिलाओ।”

सारे लोग हैरान होकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। गुप्ता जी का मुंह खुला का खुला रह गया। मिश्रा जी तुरंत खड़े हुए, अपनी टी-शर्ट सीधी की और मुस्कुराकर बोले, “सेहत तो बनती रहेगी, लेकिन अपने खून-पसीने की कमाई का बीस रुपया गंवाना हमारी डिक्शनरी में नहीं लिखा।”

पूरे जिम में ठहाके गूंज उठे और सबने मिश्रा जी की इस बेमिसाल फुर्ती और कंजूसी के मेल पर ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८० ⇒ वचन, एकवचन बहुवचन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “वचन, एकवचन बहुवचन।)

?अभी अभी # १०८० ⇒ व्यंग्य – वचन, एकवचन बहुवचन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वचन तो वचन होता है, जब किसी को दिया तब वह वचन होता है, किसी महापुरुष ने दिया हुआ वचन भी वचन ही होता है लेकिन यही वचन जब किसी महात्मा के मुख से प्रकट होता है, तो यह प्रवचन हो जाता है। हिंदी व्याकरण में यही एकवचन, बहुवचन भी हो जाता है।

जिस घर में सास और अकेली बहू होती हैं, वहां भी अक्सर प्रवचन तो सास का ही होता है और बहू वचनबद्ध होती है लेकिन जब बहुओं का बहुमत हो जाता है और सास अकेली पड़ जाती है तब बहुओं के वचन सास के प्रवचन पर भारी पड़ जाते हैं।।

हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण में काल और वचन को लेकर बड़ी समानता है। हमारी तरह उनके भी तीन ही काल होते हैं। हमारा भूत, उनका past है और हमारा वर्तमान उनका present. जो हमारा भविष्य है, वही उनका future है। वे भी हमारी तरह ही एकवचन यानी singular number और बहुवचन यानी plural number में विश्वास करते हैं। जब कि हमारी देव भाषा संस्कृत का व्याकरण थोड़ा अलग और उन्नत है।

संस्कृत में दो नहीं तीन वचन होते हैं। रामायण के महाराज दशरथ के तीन वचन अलग हैं। यहां संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्वि वचन भी है। राम: रामौ रामा: प्रथमा।।

जीवन व्याकरण नहीं। व्याकरण दोष भाषा की विकृति है और व्यक्ति दोष चरित्र की विकृति। जब आज का इंसान अपने वचन के प्रति ही सजग और ईमानदार नहीं तो एकवचन और बहुवचन के प्रति कैसे रह सकता है।

हम अपनी आजकल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। कैसे कैसे एकवचन, बहुवचन हो जाते हैं, हमें कुछ भान ही नहीं रहता। लगता है, सरलीकरण से हम सिम्प्लीकरण के रास्ते पर चल निकले हैं। लेबरों की समस्या कोई नई नहीं। रेलवे स्टेशनों की भीड़ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं। कारों, ट्रकों और टू व्हीलरों ने ट्रैफिक को जाम कर रखा है।।

मोबाइलों और कंप्यूटरों की दुनिया ने इंसान से उसकी असली जिंदगी छीन ली है। टाकीजों की फिल्में लोग आजकल टेलीविजनों में देखने लगे हैं। लेडिसों और जेंट्सों का पहनावा भी एक जैसा ही होने लगा है। लव मैरिजों की तो जैसे बाढ़ ही लगी हुई है।

वचन तो वचन, कैसे कैसे बहुवचन ! जब से डिजिटलीकरण हुआ है, बैंकों के कस्टमरों में कमी हुई है, पैसों का लेनदेन एटीएमों और पेटीएमों से ही होने लग गया है। महंगाई की मार के कारण लोग मल्टीस्टोरियों में टू BHK और वन BHK के फ्लैटों में रहने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के होते हुए महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। जॉब्स का पता नहीं, कॉलेजों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बस एक वचन अच्छे दिनों का, सभी टेंशनों को दूर कर देता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६६ ☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ।)

☆ शेष कुशल # ६६ ☆

☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर – शांतिलाल जैन 

आईए श्रीमान्, ये जो आप देख रहे हैं, आज़ाद भारत में इसे प्रदर्शन करने की सबसे मुफ़ीद जगह माना जाता हैं. प्रदर्शनकारियों का मक्का : दिल्ली का जंतर-मंतर. समझ लें कि ये चित्रकार के सपनों की ‘जहाँगीर आर्ट गैलेरी’ है जहाँ वह जीवन में कम से कम एकबार अवश्य नुमाइश लगाना चाहता है. किए होंगे आपने जिंदगीभर प्रदर्शन हर जगह, मगर जंतर-मंतर पर नहीं किया तो आपकी प्रोटेस्टर-लाइफ फ़िज़ूल है. जंतर-मंतर देश में पाँच जगह पर हैं, बट डेल्ही इज डिफरेंट. बाकी जगह जंतर-मंतर हैं मगर प्रोटेस्टर्स नहीं हैं. जहाँ प्रोटेस्टर्स हैं वहाँ जंतर-मंतर नहीं हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर भी हैं, प्रोटेस्टर्स भी हैं, कवर करनेवाला मेनस्ट्रीम मीडिया भी है और दोगला निज़ाम भी. वह दिन के उजाले में प्रदर्शन की अनुमति देता है, रात के अँधेरे में तम्बू उखाड़ फैंकता है. दिन में लोकतंत्र मज़बूत होता है. लोकतंत्र मज़बूत करने का काम देश में अगले दिन भी बचा रहे इसलिए रात में इसे फिर से कमज़ोर कर देता है.

लोकतंत्र में प्रोटेस्ट्स का होना जितना जरूरी है उसे कुचला जाना उससे भी ज्यादा जरूरी है. प्रोटेस्ट करने से डेमोक्रेसी ऑक्सीजन पाती हैं, कुचल दिए जाने से मज़बूत होती है. इसलिए हर सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है कि वो लोकतंत्र को पहले कुछ प्राणवायु पा लेने दे फिर उसे कीलें ठुकी हुई लाठियों से मज़बूत बनाने के लिए दौड़ पड़े. प्रहरी ड्रेस पहन पाए तो ठीक, नहीं पहन पाए तो सादी वर्दीवाले साथ में ले जाकर भी डेमोक्रेसी को ताकत दी सकती है. लोकतंत्र सभ्यता के चरम पर तब पहुँचता है जब कोई ‘ही’ पुलिसवाला किसी ‘शी’ प्रोटेस्टर के निजी अंगों में करंट छोड़नेवाली बेटन पुश करता है. पत्थर कभी पुलिसवालों को लगता है कभी प्रदर्शनकारियों को. और कोई घायल हो न हो लोकतंत्र लहूलुहान अवश्य होता है.

जंतर-मंतर निज़ाम के लिए भी मुफीद जगह है. जब वह लोकतांत्रिक दिखना चाहता है, तब प्रदर्शन की अनुमति देता है. जब अधिक लोकतांत्रिक  दिखना चाहता है तब उसी प्रदर्शन को कुचल देता है. प्रदर्शनकारियों को निज़ाम से डर नहीं लगता, उसके अधिक लोकतांत्रिक हो उठने से लगता है. जंतर-मंतर पर एक सूर्यघड़ी है जो परछाई के झुकाव से बता देती है कि किस प्रोटेस्टर को कब लाठी खिलाना है, कब जूस पिलाना है. इंटेलिजेंस के खगोलशास्त्री सूर्यघड़ी की परछाई देखकर सरकार को बता देते हैं – कौन कब खतरनाक हो सकता है उसे किस दिन, कितने बजकर कितने मिनट्स, कितने सेकंड्स पर जेल में डालने के योग बन रहे हैं.

एक जंतर-मंतर मेरे शहर उज्जैन में भी है. आलसी और सुस्त. मैंने वहाँ लोकतंत्र मज़बूत होते हुए शायद ही कभी देखा हो. इसीलिए हमारे शहर के पुलिसवाले जब जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत होता हुआ देखते हैं तो मज़बूती के यज्ञ में आहुति देने को मचल मचल उठते हैं. हरबार उनकी मचलन निराशा में बदल जाती है. उनके पास लाठी है मगर चार्ज करने के पॉइंट्स नहीं हैं, पैलेट्स हैं, गन हैं, मगर सब्जेक्ट नहीं है. उनकी अपनी आँख का पानी भले सूख गया हो मगर दूसरों की आँखों से आँसू निकल आए, दागने को गैस के गोले हैं. वाटर केनन है मगर चलाने के मौके नहीं है. किस्मतवाली है दिल्ली की पुलिस, लोकतंत्र मज़बूत करने में योगदान दे पा रही है. उसके पास जंतर-मंतर भी है, प्रोटेस्टर्स भी, झूठ बोल जाने की बेशर्मी  भी है. और लाठी, गन, गोले तो हैं ही. इसी बरस रिटायर होने जा रहे एक पुलिस अंकल ने कहा – ‘लगता है आँसू गैस का गोला छोड़ पाने की हसरत मन में लिए लिए ही रिटायर होना पड़ेगा.’

मैंने कहा – “अन्याय तो शेष मुल्क में भी कम नहीं हैं पुलिस अंकल, मगर क्या है कि आमजन ने अन्याय के साथ जीना सीख लिया है. समझदार लोग विरोध, निजता और मानवाधिकार जैसी बातों पर लेक्चर सुनने ज़रूर जाते हैं, चच्च-चच्च करते हैं, फिर आत्मतुष्ट होकर बैठ जाते हैं. टीवी पर मंजर देखकर उबलते तो हैं लेकिन शहर के जंतर-मंतर पर पहुँचकर लोकतंत्र बचाने उपायों में शरीक नहीं हो पाते.”

बहरहाल, धैर्य रखे जयपुर, बनारस, उज्जैन की पुलिस और लाठी को तेल नियमित रूप से पिलाती रहे, कौन जाने कब उन्हें उनके जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत करने के असाइनमेंट में लगा दिया जाए.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२६ ☆ व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२६ ☆

?  व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहावत पुरानी है, मगर शिक्षा की आवश्यकता की तरह सदा प्रासंगिक है, गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया।

पहले गुरु के चरण छूकर ज्ञान मिलता था। अब गुरु के पास पहुंचने से पहले विद्यार्थी उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल छानता है। गुरु की योग्यता क्या है, यह बाद की बात है, फॉलोअर कितने हैं,रेटिंग क्या है यह पहले देखा जाता है।

कभी शिक्षक ज्ञान का स्रोत था। आज ज्ञान हर जेब में है,गूगल , ए आई और मोबाइल के रूप में।

आज का परिष्कृत मंत्र है,गूगल , मोबाइल दोनों खड़े काके लागूं पाँव, बलिहारी मोबाइल आपकी जिन गूगल दियो बताये ।

शिक्षक कहता है, “बच्चों, ध्यान से सुनो।” बच्चा मोबाइल खोलकर कहता है, “सर, यह तो गूगल पर कुछ और लिखा है।”इसी से परेशान एक

डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बाहर बोर्ड लगवा रखा है, गूगल का ज्ञान और जूते बाहर ही रखें।

गुरु समझाने लगता है, चेला स्क्रीन पर अंगुली घुमाकर समझा देता है।

गुरु ने जीवन भर पढ़कर ज्ञान पाया, चेले ने पाँच मिनट में ज्ञान डाउनलोड कर लिया है।

शिक्षक दिवस पर अचानक गुरु का महत्व बढ़ जाता है। स्कूल में फूल आते हैं, कार्ड आते हैं, भाषण होते हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “सर, आप हमारे जीवन के आदर्श हैं।”गुरु भावुक हो जाता है।

अगले ही दिन वही आदर्श , ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर बच्चों के शोषण के रूप में दर्ज किया जाता है।

5 सितम्बर को गुरु भगवान होता है, 6 सितम्बर को ‘फीडबैक’ का विषय बन जाता है।

यूं यदि शिक्षक दिवस की परम्परा नई सरकार के समय शुरू होती तो डा सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की जगह उसके संदर्भ गुरु वशिष्ठ या गुरु सानदीपनि के समय से जोड़ निकाले जाते ।

हमारे जमाने में सोंटी वाले मास्साब होते थे , अद्धा , पौना का पहाड़ा होता था, अब तो बच्चों की शिक्षा को आसान बनाने के लिए इतने नियम बना दिए गए हैं, कि  शिक्षक को शाला जाने से पहले नियम पढ़ने पड़ते हैं।

कभी शिक्षक पूछता था, “होमवर्क क्यों नहीं किया?”

विद्यार्थी बहाना बनाता था।

आज विद्यार्थी कहता है, “सर, होमवर्क तो एआई ने किया है, बस कोई यह मत पूछिए कि मैंने समझा भी है या नहीं।”

अब कक्षा में गुरु और एआई आमने-सामने हैं। गुरु के पास अनुभव है, एआई के पास उत्तर।

गुरु कहता है, “मैंने तीस साल पढ़ाया है।”

एआई कहता है, “मैंने तीस करोड़ दस्तावेज पढ़े हैं।”

गुरु चुप है।

अनुभव का मुकाबला आँकड़ों से हो जाए तो गुरु भी अपडेट माँगता है।

पहले विद्यार्थी गुरु से पूछता था, “सर, यह कैसे होगा?”

अब गुरु विद्यार्थी से पूछता है, “बेटा, यह ऐप कैसे चलेगा?”

चेला मुस्कुराता है।

गुरु ने शिष्य को ज्ञान दिया था, शिष्य गुरु को पासवर्ड दे रहा  है।

शिक्षा का बाजार भी बदल गया है। कभी स्कूल में फीस देकर पढ़ाई होती थी। अब फीस देखकर लगता है कि बच्चा पढ़ने नहीं, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में निवेश करने जा रहा है। विदेशों में हालत ये देखने मिल रही है कि कई माता पिता बच्चे को घर में पढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरा बच्चा इसलिए नहीं करते कि पढ़ाई का खर्च कैसे करेंगे।

स्कूल की इमारत चमक रही है, वेबसाइट चमक रही है, यूनिफॉर्म चमक रही है, विज्ञापन चमक रहा है।बस  शिक्षा गुमशुदा  है। परीक्षा , पेपर लीक चर्चा में हैं, वास्तविक ज्ञान , नैतिकता और व्यक्तित्व का विकास , लापता है।

शिक्षा मिशन नहीं व्यवसाय बन गई है। भव्य स्कूल बिल्डिंग , एसी क्लास रूम, सीसी टीवी , लक्जरी बस ने शिक्षा को ऊँचा किया है, इतना कि वह आम लोगों की पहुंच से ऊपर जा रही दिखती है। व्यवस्था ने स्कूल को धंधा बना कर रसीद धारी पूंजीपति को मोटा किया है।

और शिक्षक?

वह आज भी वही है। कक्षा में खड़ा है। हाथ में चॉक हो या स्मार्ट बोर्ड की पेन, चिंता वही है।

बच्चा पढ़ेगा या नहीं?

माता-पिता संतुष्ट होंगे या नहीं?

परिणाम अच्छा आएगा या नहीं?

और सबसे बड़ी चिंता, कहीं किसी ने उसकी कक्षा का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर तो नहीं डाल दिया?

शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं है। उसे काउंसलर होना है, प्रशासक होना है, तकनीकी विशेषज्ञ होना है, मोटिवेशनल स्पीकर होना है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उसे विद्यार्थी के माता-पिता की अपेक्षाओं का भी होमवर्क करना है।

 5 सितम्बर को मंच पर कहा जाएगा, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।”

शिक्षक मुस्कुराएगा।

राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी उसी की है।

इसलिए उसे जनगणना भी करना है, चुनाव भी करवाना है।

शिक्षक दिवस पर फूल दीजिए, भाषण दीजिए, सम्मान दीजिए, स्मृति-चिह्न दीजिए।

मगर सिर्फ एक दिन के लिए नहीं। वर्तमान स्थिति में गुरु गुड़ रह गया है, चेला शक्कर हो गया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२९ – अध्यक्ष पद का समोसा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा)  

☆  चुभते तीर # १२९ – व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शांति नगर वेलफेयर एसोसिएशन का चुनाव किसी राष्ट्रीय चुनाव से कम रोमांचक नहीं होता था। इस बार मुकाबला दो दिग्गजों के बीच था, पुराने अध्यक्ष कूपर साहब और मोहल्ले के नए-नवेले बिल्डर भल्ला जी। कूपर साहब का दांव अपनी पुरानी साख और ईमानदारी पर था, जबकि भल्ला जी का मुख्य हथियार था चुनाव की शाम को दी जाने वाली ‘शाही समोसा और जलेबी पार्टी’।

सोसायटी के ऑडिटोरियम में चुनावी बहस का आयोजन किया गया था। पूरा हॉल दो गुटों में बंटा हुआ था। एक तरफ वरिष्ठ नागरिकों की फ़ौज थी जो कूपर साहब के समर्थन में नारे लगा रही थी, तो दूसरी तरफ नौजवानों की टोली थी जो भल्ला जी के मुफ़्त वाई-फ़ाई और जिम के वादों पर फ़िदा थी।

बहस अपने चरम पर थी। भल्ला जी ने माइक हाथ में लिया और बुलंद आवाज़ में कहा, “भाइयों और बहनों, अगर मैं अध्यक्ष बना तो सोसायटी के पार्क में इटालियन मार्बल लगवाऊंगा और स्विमिंग पूल का पानी हर हफ्ते बदला जाएगा!”

भीड़ ने जमकर तालियां बजाईं। कूपर साहब की बारी आई। उन्होंने अपना पुराना चश्मा ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोले, “मार्बल और स्विमिंग पूल तो ठीक है, लेकिन पिछले छह महीने से हमारे मेन गेट का ताला टूटा हुआ है और सिक्योरिटी गार्ड को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। पहले बुनियादी समस्याएं तो सुलझें।”

माहौल अचानक गंभीर हो गया। तभी भल्ला जी के समर्थकों ने ऑडिटोरियम के पीछे समोसे के पैकेट बांटना शुरू कर दिए। गरमा-गरम समोसे की महक हवा में तैरने लगी और लोगों का ध्यान भाषण से हटकर खाने की प्लेटों पर चला गया। ऐसा लग रहा था कि कूपर साहब की ईमानदारी पर भल्ला जी का समोसा भारी पड़ने वाला था।

वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। हर व्यक्ति अपनी पर्ची बक्से में डाल रहा था। कूपर साहब शांति से एक कोने में बैठे चाय पी रहे थे। उन्हें अपनी हार तय लग रही थी। शाम सात बजे मतों की गिनती शुरू हुई।

जब अंतिम नतीजे की घोषणा की गई, तो मंच पर मौजूद मुख्य अतिथि की आंखें भी फटी रह गईं। कूपर साहब को कुल नब्बे प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भल्ला जी को मात्र दस वोट मिले। भल्ला जी हैरान होकर खड़े हो गए और चिल्लाए, “यह बेईमानी है! जब सबने मेरे समोसे खाए, तो वोट कूपर साहब को कैसे दे दिए?”

तभी सोसायटी के सबसे वयोवृद्ध निवासी गुप्ता जी मंच पर आए, उन्होंने माइक संभाला और बोले, “भल्ला जी, आपकी जलेबी और समोसा बहुत स्वादिष्ट था, धन्यवाद! लेकिन हमारे शांति नगर की परंपरा रही है कि हम खाना अमीर प्रत्याशियों का खाते हैं और वोट उस ईमानदार इंसान को देते हैं जो रात को दो बजे भी गेट का ताला ठीक कराने खड़ा हो सके।”

पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट और ठहाकों से गूंज उठा। भल्ला जी ने भी हार मानते हुए कूपर साहब को गले लगा लिया और कहा, “अध्यक्ष महोदय, अगली बार समोसे के साथ चटनी भी मेरी तरफ से मुफ़्त रहेगी!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाफ लाइनर)

आखिर पीटा भी तो किसे, निरीह जीव कवि को और वो भी कहाँ डबरा में।

खबर पढ़ते ही लतीफा याद आ गया। मकान मालिक ने किराएदार को इसलिए निकाल दिया कि जब वो रात में लिखता है तो उसकी पेन किर्र किर्र करती है। इसलिए मालिक की नींद में खलल पड़ता है।

 लेखक / कवि होना जैसे गुनाह हो गया। माँ बाप की नज़र में नकारा और लोग— लोगों का काम है कहना— जो कुछ नहीं बन सकता वह नेता या तो कवि बन जाता है।

प्रमाण बिखरे पड़े हैं। पुरातत्वविदों को तलब करने की जरूरत नहीं है।

अब कोई दीदे होकर भी न दिखने का ढोंग करे उसका तो परमात्मा भी कुछ नहीं कर सकता।

 एक कविता ही तो सुनाई बेचारे ने। इतनी सी बात पर उसके कपड़े फाड़ डाले। दयनीय दशा में पहुँचाया यहां तक तो ठीक है फिर फोटो भी खींच ली(उसने कब कहा था– खींच्च मेरी फोटो—)

फोटो खींची यहां तक भी ठीक है फिर उसे अखबार में छपवा भी दिया। घोर बेइज्जती।

अखबार की बात समझ में आती है, सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। इतना जघन्य अपमान। कवि को चाहिए वह एक करोड़ की मानहानि का दावा करे। इससे कम का तो कतई नहीं। समूची कवि बिरादरी की इज्जत का सवाल है।

या फिर सारे कवि मिलकर इस घनघोर अपमान के विरोध में मीम बनाएं, स्लोगन लिखें, जेन जी की तरह विरोधात्मक नृत्य करें या पैरोडी गाएं।

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। अत्याचार सहने की भी सीमा होती है।

मारनेवाले जितना मार खानेवाला भी अपराधी है।

काश कवियों को इतनी सी बात समझ में आ जाती।

हर घटना के दो पहलू होते हैं। दूसरा पहलू न पूछिए— जो भी पढ़ रहा है, मंद मंद मुस्कुरा रहा है। इतना आनंद तो शायद ही कभी नसीब हो। इतना बेचैन है देश पर इस दशा में भी गदगदायमान हो रहा है।

ऐसे तो कारण अकारण कई पीटते /पिटते/ पिटवाते हैं। किसी किसी के भाग्य में ही होता है स्वयं दुःख सहकर दूसरों को आनंद प्रदान करना। कवि के सामाजिक सरोकारों पर गौर फरमाने की जरूरत है।

उस कवि पर तरस खाने की बजाय उसके लिये पुरस्कार की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नेक काम के लिये चंदा आसानी से मिल जाएगा।

अगर आयोजक चंदा चुराएगा तो भी कितना।

दो सौ करोड़ तो नहीं ना।

ऐसे तो बेवजह बेसबब सत्कार के कारनामे नित्य होते हैं। यहां तो कवि की बेइज्जती का सवाल है। कोई गा के कविता पढ़ता है कोई दहाड़कर। कोई अभिनय के साथ। उसे तो याद भी रखना पड़ता है। इतने कमसिन जीव को कोई टेलीप्राॅम्प्टर तो देगा नहीं। न पुष्पवर्षा करेगा।

चिंघाड़ना कवि का संवैधानिक अधिकार है। इसे चुनौती देना ठीक नहीं।

परिसर में रहनेवालों को नींद नहीं आती। कवि की दहाड़ से नींद उड़ जाती है। हैरानी है जो गहरी नींद में सोये हैं उनपर किसी कवि के गरजने बरसने का असर होने से रहा। होता ही नहीं।

भविष्य में कवि जैसे हानिरहित प्राणी (प्राणधारक) को हानि न पहुँचाई जाए अन्यथा ——-सौ करोड़ याद रखना। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४५ ☆ व्यंग्य – पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘पेपर लीकेज का जिन्न‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

पेपर लीकेज के मसले ने सरकारों की नींद आराम कर दी है। पूरे देश में हंगामा बरपा है। सरकारों को लगता है ये आंदोलनकारी जेन-ज़ी नहीं, बोतल से निकले जिन्न जी हैं। अभी तक ये कहां छिपे बैठे थे? समझ में नहीं आता कि इन्हें वापस बोतल में कैसे बन्द किया जाए। ये चुपचाप पुलिस की लाठियां खाकर भागने वाले, किताबों में डूबे रहने वाले संस्कारी छात्र अचानक जिम्मेदार लोगों से आंख में आंख डालकर सवाल कैसे करने लगे? घोर कलियुग! उस पर तुर्रा यह कि इनके साथ जेन-अल्फ़ा भी कुसंस्कार सीख रहा है, यानी बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबहान अल्लाह।

देश के बहुत से सयाने लोग लड़कों के नारों और उनके द्वारा प्रदर्शित प्लेकार्डों से दुखी हैं। ‘हाय,हाय, ये नेताओं के लिए कितनी गन्दी भाषा लिख और बोल रहे हैं। इनके संस्कार कहां गये?क्या इनके मां-बाप ने इन्हें यही सिखाया था? न किसी की शर्म, न लिहाज। राम, राम।’

कुछ दूसरे सयाने जवाब देते हैं— ‘हमारी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को कौन से संस्कार सिखाये हैं? संसद में सांसद दूसरे दलों के सांसदों के लिए कैसी भाषा का उपयोग करते हैं? सभी बड़े मंदिरों में रोज़ चोरी की खबरें आती हैं, परीक्षाओं के पेपर लीकेज से छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है, पार्टियों को खुले आम तोड़कर सरकारें बनायी जाती हैं, बड़े-बड़े सन्त जेल की हवा खा रहे हैं, सिद्ध भ्रष्ट बड़ी कुर्सियों पर बैठे हैं, चतुर लोग बैंकों का हज़ारों करोड़ हज़म करके विदेश में मौज कर रहे हैं, हजारों करोड़ से बने पुल उद्घाटन से पहले गिर रहे हैं, नयी बनी एक्सप्रेस-वे चटक रही हैं, नये बने एयरपोर्ट पहली बरसात में चौधार आंसू टपका रहे हैं, महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की नयी बनी मूर्तियां हवा के झोंके से गिर रही हैं। यह सब नयी पीढ़ी देख रही है और समझ रही है, इसलिए उस पर हमारे नैतिकता के भाषणों से कोई असर नहीं होने वाला। ये कोई दूध-पीते बच्चे नहीं हैं। इस पीढ़ी के पास हमसे ज़्यादा समझ है। वह हमारी पीढ़ी के पाखंड को खूब समझ रही है।’

सुन कर संस्कारों की दुहाई देने वाले सयाने मौन साध लेते हैं।

सरकारों में भगदड़ मची है। इस लीकेज को कैसे बन्द किया जाए। कमेटियां बन रही हैं। कुछ पकड़-धकड़ भी हुई है। कमेटियों से सुझाव आता है कि  लीकेज के दोषियों के लिए सख़्त सज़ा का प्रावधान हो। दस साल की सज़ा और दस करोड़ जुर्माने पर सहमति बनती है।

एक मसखरा सवाल करता है, ‘अपराधी के पास दस करोड़ की संपत्ति नहीं हुई तो वसूली कैसे होगी?’

छात्र इन सुझावों पर आपत्ति करते हैं, कहते हैं, ‘ये सब लीकेज के बाद के उपाय हैं। इनसे छात्रों का नुकसान कैसे पूरा होगा? अंग्रेज़ी की कहावत के अनुसार घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल का दरवाज़ा बन्द किया जाएगा। सरकार यह बताये कि लीकेज रोकने के लिए क्या किया गया है।’

सरकारें फिर परेशान हैं। फिर कमेटियां बैठती हैं। फिर मगजमारी होती है। लीकेज रोकने के सुझाव मांगे जाते हैं। छात्रों की तरफ से सुझाव आता है कि परीक्षाओं का पूरा काम सौ प्रतिशत ईमानदार और कठोर निर्णय लेने वाले अधिकारियों को सौंपा जाए। अब सौ प्रतिशत ईमानदार अधिकारियों की खोज में दौड़भाग शुरू होती है। तुरन्त ‘ऑनेस्टी टेस्टिंग मीटर’ तैयार करवाए जाते हैं और सौ से ज़्यादा अधिकारी इन मीटरों से लैस होकर देश के कोने-कोने में निकल पड़ते हैं। उच्च अधिकारी सारे वक्त उनसे रिपोर्ट लेते हैं।

ज़्यादातर मामलों मैं रिपोर्ट मिलती है कि  ईमानदार तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन अब तक सौ प्रतिशत वाला बन्दा नहीं मिला है। उच्च अधिकारी माथे का पसीना पोंछते हैं, कहते हैं, ‘कोई बात नहीं। लगे रहो। कामयाबी ज़रूर मिलेगी।’

तो भाइयो, सौ प्रतिशत ईमानदार खोजने की कोशिश अभी ज़ारी है। हम भी दुआ करते हैं कि अधिकारियों को इस काम में जल्दी सफलता मिले। वैसे यह गांधी और बुद्ध का देश है। यहां सौ प्रतिशत ईमानदार आदमी नहीं मिला तो बड़ी नककटई हो जाएगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२७ – निमंत्रण पत्र का वज़न – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – निमंत्रण पत्र का वज़न।)  

☆  चुभते तीर # १२७ – व्यंग्य  – निमंत्रण पत्र का वज़न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

दुबे जी का मानना था कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो शादी में खाना खाने जाते हैं, और दूसरे वो जो खाना खाने के बाद पनीर के टुकड़ों का नाप लेकर शादी का बजट तय करते हैं। दुबे जी दूसरी श्रेणी के सिरमौर थे। उनके लिए मोहल्ले में आने वाला हर शादी का कार्ड सिर्फ एक निमंत्रण नहीं, बल्कि एक वित्तीय चुनौती होता था।

इस बार उनके हाथ में लाल और सुनहरे रंग का एक बहुत ही भारी लिफ़ाफ़ा आया था। यह कार्ड मोहल्ले के सबसे अमीर व्यापारी सेठ धनीराम के बेटे की शादी का था। लिफ़ाफ़ा इतना भारी था कि दुबे जी ने उसे हाथ में तौलते हुए अपनी पत्नी से कहा, “सुनती हो, कार्ड का वज़न कम से कम आधा किलो है। इसमें ज़रूर कोई काजू की बर्फी या सूखे मेवे का डिब्बा छिपा होगा।”

पत्नी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “ज्यादा उम्मीद मत लगाइए, आजकल लोग बाहर से बहुत चमक-धमक दिखाते हैं और अंदर सिर्फ एक पन्ना निकलता है।”

लेकिन दुबे जी का दिल मानने को तैयार नहीं था। उन्होंने लिफ़ाफ़े पर लगी सुनहरी सील को ऐसे खोलना शुरू किया जैसे कोई पुरातत्वविद किसी प्राचीन खजाने का ताला खोल रहा हो। लिफ़ाफ़ा खुला, तो अंदर से रेशमी कपड़े में लिपटा एक बहुत ही सुंदर डिब्बा निकला। दुबे जी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने डिब्बे का ढक्कन हटाया। अंदर एक बड़ा सा पत्थर का टुकड़ा रखा हुआ था, जिस पर सोने के अक्षरों में शादी की तारीख और न्यौते का संदेश तराशा गया था।

दुबे जी का मुंह खुला का खुला रह गया। “पत्थर? कार्ड की जगह पत्थर?” वे लगभग चिल्लाए।

अगले तीन दिनों तक पूरे मोहल्ले में इस पत्थर वाले कार्ड की ही चर्चा थी। कोई इसे सेठ जी की रईसी कह रहा था, तो कोई इसे पैसों की बर्बादी। दुबे जी की ईगो को चोट पहुंची थी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पत्थर के बदले शादी में शगुन का लिफ़ाफ़ा कितने का दिया जाए। अगर पचास रुपये दो, तो पत्थर का अपमान था, और अगर पाँच सौ दो, तो दुबे जी के बजट का कत्ल था।

शादी की रात दुबे जी सज-धजकर पहुंचे। वे सीधे गिफ्ट काउंटर पर गए जहाँ सेठ जी खुद खड़े होकर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। दुबे जी ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में अपना शगुन का लिफ़ाफ़ा निकाला और सेठ जी को थमा दिया।

सेठ जी ने लिफ़ाफ़ा पकड़ा, लेकिन उसकी ढीली बनावट देखकर मुस्कुराए और चुटकी लेते हुए बोले, “दुबे जी, हमारा कार्ड तो बहुत भारी था, पर आपका लिफ़ाफ़ा हवा में उड़ता हुआ महसूस हो रहा है!”

दुबे जी ने एक पल का विराम लिया, अपनी मूंछों पर ताव दिया और बोले, “सेठ जी, आपने जो पत्थर भेजा था, वो कार्ड नहीं बल्कि हमारे जैसे पड़ोसियों के लिए एक सबक था। आपने उस पर तारीख लिखकर हमें याद दिलाया कि रिश्ते पत्थर की लकीर होते हैं। इसलिए लिफ़ाफ़े में पैसे नहीं, बल्कि आपके नाम हमारी उस पुश्तैनी ज़मीन का अनापत्ति पत्र (NOC) है जिसका केस हमारे बीच तीन साल से कोर्ट में चल रहा था। आज से वो ज़मीन आपकी!”

सेठ जी की आंखें छलक आईं। उन्होंने दुबे जी को गले लगा लिया। वहां मौजूद सभी मेहमान और रिश्तेदार इस अनोखे उपहार पर ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगे। दुबे जी ने मुस्कुराकर प्लेट उठाई और सबसे महंगे काउंटर की तरफ बढ़ गए, मन ही मन सोचते हुए कि कोर्ट की फीस से तो यह सौदा कहीं सस्ता पड़ा!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२५ – लिफाफे का राज – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – लिफाफे का राज)  

☆  चुभते तीर # १२५ – व्यंग्य – लिफाफे का राज ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शर्मा जी के लिए अपने पड़ोसी वर्मा जी की बेटी की शादी में जाना किसी युद्ध क्षेत्र में जाने जैसा था। वजह दुश्मनी नहीं, बल्कि लिफाफा थी। समाज का एक अनलिखा नियम है कि शादी का खाना कितना भी स्वादिष्‍ट हो, लिफाफे के अंदर रखा नोट तय करता है कि आपकी इज्जत प्लेट में कितनी परोसी जाएगी। शर्मा जी ने बहुत सोच-समझकर एक लाल रंग के लिफाफे में पाँच सौ रुपये का नया नोट डाला और जेब में रख लिया।

शादी के मंडप में रोशनी ऐसी चमक रही थी जैसे आसमान के सारे तारे ज़मीन पर मुफ़्त का खाना खाने उतर आए हों। शर्मा जी सीधे स्टेज की तरफ बढ़े। वर-वधू को आशीर्वाद दिया और जेब से लिफाफा निकालने लगे। तभी उनके हाथ में एक नहीं, बल्कि दो बिल्कुल एक जैसे लाल लिफाफे आ गए। शर्मा जी के माथे पर अचानक ठंडी हवा में भी पसीने की बूंदें तैरने लगीं।

बात यह थी कि घर से निकलते वक्त शर्मा जी की पत्नी ने उन्हें एक दूसरा लाल लिफाफा भी दिया था, जिसमें दर्जी को देने के लिए तीन सौ रुपये का पुराना घिसा हुआ नोट और एक मुड़ा हुआ राशन का परचा था। दोनों लिफाफों का रंग, रूप और वज़न बिल्कुल एक जैसा था। अब शर्मा जी के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट यह था कि दुल्हन के हाथ में कौन सा लिफाफा थमाया जाए। अगर गलती से दर्जी वाला लिफाफा चला गया, तो अगले दिन पूरे मोहल्ले में उनकी इज्जत का हलवा बन जाएगा।

स्टेज पर कैमरामैन चीख रहा था, “अंकल जी, थोड़ा मुस्कुराइए! फोटो खींचनी है।” शर्मा जी की मुस्कान ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने जबरदस्ती करेले का जूस पिला दिया हो। दुल्हन की नज़रें शर्मा जी के हाथ पर टिकी थीं। लिफाफा तो देना ही था। समय हाथ से फिसलता जा रहा था। शर्मा जी ने अपनी किस्मत का सिक्का हवा में उछाला और एक लिफाफा दुल्हन के हाथ में थमा दिया।

स्टेज से नीचे उतरते ही उनके पैर कांप रहे थे। दिल की धड़कन किसी पुराने ढोल की तरह बज रही थी। उन्होंने डरते-डरते अपनी जेब में हाथ डाला और बचा हुआ लिफाफा निकाला। लिफाफा खोला तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। जेब में दर्जी वाला लिफाफा बचा हुआ था। यानी दुल्हन को सही लिफाफा ही मिला था।

शर्मा जी ने चैन की सांस ली और राहत का एक लंबा सांस खींचा। वे प्लेट उठाकर शाही पनीर की तरफ बढ़े ही थे कि पीछे से लाउडस्पीकर पर आवाज़ गूंजी, “शर्मा जी, कृपया स्टेज पर आएं। आपका लिफाफा खाली निकला है, उसमें सिर्फ एक राशन की पर्ची है।”

पूरा पंडाल सन्नाटे में डूब गया। शर्मा जी ने चौंककर जेब वाला लिफाफा फिर से देखा। वो असल में तीन सौ रुपये का नोट ही था, परची तो दुल्हन वाले लिफाफे में जा चुकी थी। शर्मा जी ने माइक्रोफोन हाथ में लिया, गहरा सांस लिया और बोले, “यह पर्ची मेरी तरफ से कन्यादान है। इस पर लिखे राशन का पूरा खर्च अगले एक साल तक मेरे घर से जाएगा।”

पूरे शादी के मंडप में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। लोग शर्मा जी की दरियादिली के कायल हो गए, जबकि शर्मा जी मन ही मन सोच रहे थे कि दर्जी के तीन सौ रुपये बचाने के चक्कर में एक साल का राशन दांव पर लग गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२४ – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल)  

☆  चुभते तीर # १२४ – व्यंग्य  – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के दफ़्तर की मेज़ पर एक फाइल पिछले तीन महीनों से इस तरह सोई हुई थी, जैसे इतवार की सुबह कोई अलार्म बजने के बाद तकिया ओढ़कर सोता है। उस फाइल का नाम था ‘जनहित याचिका 402’। गुप्ता जी चाय के बड़े शौकीन थे। उनके लिए चाय सिर्फ़ एक पेय पदार्थ नहीं थी, बल्कि काम टालने का सबसे पवित्र औजार थी। जब भी कोई फाइल उनके सामने आती, वे चाय का कुल्हड़ उठाते, एक लंबी सांस खींचते और कहते, “मामला गंभीर है, थोड़ा पकाने की जरूरत है।”

दफ़्तर के सभी लोगों को लगता था कि गुप्ता जी बड़े ईमानदार और फुर्तीले अफ़सर हैं, जो हर कागज़ की बारीकी में उतरते हैं। लेकिन सच्चाई यह थी कि गुप्ता जी को उस फाइल का ताला खोलने की चाबी, यानी फाइल के अंदर छिपा मुख्य पन्ना कभी मिला ही नहीं था। वह पन्ना गायब था। अगर यह बात बाहर आ जाती, तो गुप्ता जी की नौकरी की मलाई में मक्खी गिर जाती। इसलिए वे हर रोज़ फाइल पर एक नया नोट लिखकर उसे अलमारी के सबसे गहरे कोने में सरका देते थे।

एक दिन अचानक बड़े साहब का बुलावा आया। बड़े साहब का गुस्सा ऐसा था जैसे बिना अदरक वाली उबली हुई चाय, जो गले से नीचे उतरते ही मूड खराब कर दे। साहब ने मेज़ पर मुक्का मारा और कहा, “गुप्ता, जनहित याचिका 402 का फैसला आज शाम चार बजे तक मेरी मेज़ पर होना चाहिए। मंत्री जी खुद इस पर नज़र बनाए हुए हैं।”

गुप्ता जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके माथे पर पसीने की बूंदें ऐसे चमकने लगीं जैसे बारिश के बाद पत्तों पर ओस। फाइल खोली गई, लेकिन गायब पन्ना अब भी गायब था। दोपहर के तीन बज चुके थे। दफ़्तर की घड़ी की सुइयां गुप्ता जी की धड़कनों से शर्त लगा रही थीं। उन्होंने तुरंत अपने चपरासी रामदीन को आवाज़ लगाई, “रामदीन, एक कड़क चाय बनाओ। आज ज़िंदगी और मौत का सवाल है।”

रामदीन चाय का कुल्हड़ लेकर आया। गुप्ता जी ने कांपते हाथों से कुल्हड़ उठाया। जैसे ही उन्होंने पहला घूंट लिया, उन्हें चाय के नीचे कागज़ का एक छोटा सा टुकड़ा चिपका हुआ दिखाई दिया। वह टुकड़ा वही गायब पन्ना था, जिसे रामदीन ने महीनों पहले चाय के कुल्हड़ को मेज़ पर टिकाने के लिए फाइल के बीच से निकालकर ‘कोस्टर’ की तरह इस्तेमाल कर लिया था।

गुप्ता जी ने राहत की सांस ली और फाइल पूरी करके साहब की मेज़ पर रख दी। साहब ने फाइल देखी, मुस्कुराए और बोले, “मान गए गुप्ता जी, आपकी पारखी नज़र से कोई सच छिप नहीं सकता।”

पूरा दफ़्तर ताली बजाने लगा। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर चाय का आखिरी घूंट पिया और मन ही मन कहा कि इस देश में फाइलें काम से नहीं, सही समय पर मिली चाय की पत्ती से आगे बढ़ती हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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