हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६३ ☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है?” ।)

☆ शेष कुशल # ६३ ☆

☆ व्यंग्य – “जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? – शांतिलाल जैन 

आईपीएल खत्म हो गया है सो ठिया आबाद करके शाम का खालीपन भरने की कोशिश में यार-दोस्त यहाँ जुटने लगते हैं. ठिए का ओटला अपन की तशरीफ़ का रोज़ाना इंतज़ार करता है. मैं जाता हूँ. मगर इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान फील करता हूँ.  कल तक अपन की मेधा रनों के चेज़, विकेटों के पतन, ओरेंज, पर्पल केपों, टूटते-बनते रिकार्डों जैसी जानकारियों पर सक्रिय नज़र आती थी. घर की बैठक से लेकर यार-दोस्तों के ठियों तक क्रिकेट ही टाकिंग पॉइंट हुआ करे था. आज नीट एग्जाम के पेपर लीक का मुद्दा सोच को बार-बार अपनी ओर खींच रहा है. दो महीने से चौकों-छक्कों की आतिशबाजी और विकेटों के गिरने के रोमांच में डूबी शाम का मजा सीबीएसई स्टूडेंट्स के साथ घट रही त्रासदियों के कड़वे घूँट ने किरकिरा कर रखा है. दोस्त चाहते हैं मैं इन गैर जरूरी मुद्दों को झटककर फिर से क्रिकेट के कार्निवाल में रम जाऊँ मगर नहीं हो पा रहा. बार-बार अपने नातियों का मासूम उदास चेहरा अपन के जेहन में घूम जाता है.

मैं यारों के बीच इन पर बहस उकेरना चाहता था मगर उस रोज़ ठिए पर दादू के अलावा कोई आया ही नहीं. बोले – “तुम्हारी सोच नकारात्मक हो गई है, सांतिभिया. दुश्वारियाँ आईपीएल से पहले कम थीं क्या?”

“नहीं दादू, दुश्वारियाँ तो आईपीएल के दरम्यान भी रहीं मगर निज़ाम ने हर शाम मस्ती में बिताने का फुल बंदोबस्त कर रखा था. उसने सस्ता डाटा भी मुहैया करा रखा था. नहीं करा पाया निज़ाम तो बस! आटा सस्ता नहीं करा पाया.”

दादू बोला – “हर समय महंगे आटे का रोना लेकर बैठ जाते हो तुम, सांतिभिया. आईपीएल ख़त्म हुआ तो क्या! रील एन्जॉय कीजिए. हर समय रोते मत रहिए. सीबीएसई की परीक्षा के आगे जहाँ और भी हैं. क्या हो जाएगा एक पीढी पूरी अनपढ़ भी रह ली तो!! जो पढ़े लिखे हैं वे कौनसे नैतिक काम कर रहे हैं?  पढ़ा-लिखा बिका हुआ जज, बिका हुआ अफसर, बिका हुआ चुनाव अधिकारी, बिके हुए हाकिम, मुलाज़िम, उतने ही बिके बिके से सम्पादक और पत्रकार पढ़े लिखे नहीं हैं क्या?  बिके हुए पढ़े लिखे समाज से बेहतर है एक पूरी पीढ़ी का अनपढ़ अनबिका रह जाना. करियर और रोज़गार के गम मत पालिए सांतिभिया क्रिकेट का अफगानिस्तान दौरा एन्जॉय कीजिए. महंगे पेट्रोल के गम को वैभव सूर्यवंशी के छक्कों, जोफ्रा आर्चर की यॉर्करों में भूल जाईए.”

मैंने कहा – “ऐसे कैसे हो सकता है दादू ? नाती ट्वेल्थ में नाईंटी एट परसेंट पर कॉंफिडेंट था. उसके रोल नंबर पर किसी और की कॉपी स्कैन हो गई है. दूसरावाला दो साल से नीट की तैयारी कर रहा था. कोचिंग क्लास की फीस ने पहले ही बजट घाटे में ला दिया है. आईपीएल में रन रेट के ऊपर-नीचे होने से जिंदगी हलाकान नहीं होती, घर के बजट का रन रेट गिरने से होती है. अपन के बजट का विकेट तो महीने के पहले ओवर में ही गिर जा रहा है. न पॉवर बचा है न प्ले. दो महीने तक टीवी का रिमोट जिस तरह का ‘स्ट्राइक रेट’ दिखाता था, अब वह थम गया है. उसकी जगह डॉलर के रेट ने ले ली है. सिक्स के काउंटर पर इन्क्रिजिंग नंबर देखने की लत लग गई थी, अब पेट्रोल डिस्पेंसर के घटते काउंटर ने टेंशन बढ़ा दी है. एक बात बताओ दादू मुद्दों के ये ‘बक’ कभी तो कहीं तो ‘स्टॉप’ करते होंगे?”

“ये नया निज़ाम है सांतिभिया, वज़ीर-ए-तालीम से लेकर वज़ीर-ए-आज़म तक, स्टॉप करने तो दूर बक अब किसी की टेबुल के आस पास फटकने भी नहीं पाते.  झेड-प्लस सिक्युरिटी लगी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार पाता, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है? वैसे निज़ाम के कंसिडरेशन में है कि आईपीएल के टाईम स्लॉट में क्या नया लाए जाए कि जेन-जी जंतर मंतर पहुँचने की बनिस्बत स्टेडियम की दीर्घाओं में नज़र आए. वो चियर-लीडर्स के ठुमकों में गिरते सेंसेक्स को भूल जाए. अवाम को जीवन की आपाधापी से निजात दिलापाना शायद उसके वश में नहीं रहा तो क्यों न उसे रील के समंदर में स्कूबा डाइविंग का मज़ा लेने के लिए छोड़ दिया जाए. कोशिश में है निज़ाम कि साल में दो-चार आईपीएल आयोजित करवाए. जब तक स्क्रीन पर गेंद घूमती रहेगी, तब तक आप जैसे सिरफिरों का भेजा घूमेगा नहीं. वरना ये पेपर लीक, बेरोजगारी, महंगाई, स्कैम के बाउंसर आप को ज्यादा दिन सकारात्मक रहने नहीं देगे. जस्ट चिल माई डियर सांति, उबलने की जिम्मेदारी चाय पर छोड़ दीजिए. कड़क मीठी का कट एन्जॉय कीजिए और निकलिए.”

उस रोज़ ठिए पर बहस लम्बी नहीं चली.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०४ – व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न!)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०४ – व्यंग्य  – सीट नं. 71, वह भी आरएएसी, न बाबा न! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाड़ी छूटने में अभी पंद्रह मिनट बाकी थे और मैं प्लेटफार्म पर ऐसे टहल रहा था जैसे बकरे को ईद से पहले आखिरी बार टहलाया जाता है। जेब से टिकट निकालकर मैंने तीसरी बार देखा। नंबर वही, बोगी वही, और वह कुख्यात कोना भी वही था जहाँ पहुँचकर आदमी को अपने पूर्वजों के कर्मों पर शक होने लगता है। रेल विभाग ने शायद ब्रह्मांड के सारे बचे-खुचे पापों की ईएमआई वसूलने के लिए उस जगह सीट नं. 71 साइड लोअर का आविष्कार किया होगा।

मैं जब वहाँ पहुँचा तो लगा किसी ने इंसानों के लिए नहीं, कबाड़ की बोरियों के लिए सीट बनाई है। आधी जगह पर एक राजस्थानी भाई साहब पहले से पालथी मारे जमे थे। मूँछें ऐसी कड़क जैसे दो नेवले आपस में कुश्ती लड़ने की पोजीशन में हों। मुझे देखते ही कबीलाई अंदाज़ में बोले, “आओ सा, बैठ जाओ। यहाँ आदमी नहीं बैठता, आदमी की केवल उम्मीद बैठती है।” मैं अभी इस भारी-भरकम फिलॉसफी पर विचार ही कर रहा था कि एक तमिल युवक भी वहाँ आ टपका। उसने पहले सीट देखी, फिर हमें देखा, फिर सीधे ऊपर वाले को देखा और रोनी सूरत बनाकर बोला, “अय्यो, हम किधर बैठेगा।”

तभी पीछे का जादुई दरवाजा खुला।

एक झोंका आया।

फिर दूसरा आया।

फिर तीसरा आया।

तीनों झोंकों ने मिलकर मेरे जीवन की सारी पुरानी यादों का दूरदर्शन पर लाइव री-टेलीकास्ट शुरू कर दिया। मुझे पहली कक्षा की वो मारकुटानी मास्टरनी याद आ गई। गाँव का वो कीचड़ भरा पोखरा याद आ गया। बचपन में नाली में खोया हुआ लट्टू याद आ गया। इतनी तीव्र और भयानक अनुभूति तो ऋषियों को घोर तपस्या में भी न हुई होगी। राजस्थानी भाई ने तुरंत जेब से रूमाल निकाला, उसे डिटॉल की तरह नाक पर बाँधा और बोले, “म्हारे यहाँ ऊँट के तबेले में भी इतनी आत्मीयता और खुशबू नहीं मिलती सा!” तमिल युवक तड़पकर बोला, “हमारे गाँव में मछली बाजार है भाई, पर वहाँ भी हवा अपनी मर्यादा में रहती है।”

गाड़ी चली और हमारी रही-सही इज्जत का कचरा होना भी शुरू हुआ। पहला यात्री आया, उसने हमारी बदहाल हालत को देखा, एक कुटिल मुस्कान दी और आगे बढ़ गया। दूसरा आया, उसने हमें देखकर ऐसे सिर हिलाया जैसे किसी भयानक एक्सीडेंट स्पॉट का मुआयना कर रहा हो। तीसरा आया, उसने जेब से फॉग का डब्बा निकाला, फिर हमारी शक्लें देखकर न जाने क्या सोचा और चुपचाप जेब में रख लिया। शायद उसे लगा कि टीवी के विज्ञापन तो सब फेकमफाक होते हैं, यहाँ तो साक्षात यमराज की हवा चल रही है।

कुछ ही देर में हमारी वह सीट सार्वजनिक चौपाल और लावारिस बस स्टैंड में बदल गई। कोई हमारे कंधे पर कोहनी रखकर खड़ा था, कोई अपना भारी-भरकम पेट हमारे सिर पर टिकाकर रील सरका रहा था। कोई हमारे घुटनों को रेल मंत्रालय की लावारिस संपत्ति समझकर उन पर पैर रखकर सुस्ता रहा था।

तभी एक बच्चा अपनी मम्मी से बोला, “मम्मी, ये तीनों अंकल सो क्यों नहीं रहे?”

मम्मी ने बड़े गंभीर लहजे में कहा, “बेटा, ये लोग सो नहीं रहे, ये जीवन का कड़वा अनुभव ले रहे हैं।”

मैंने जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि साला दुख भी कभी-कभी टूरिस्ट स्पॉट बन जाता है, जहाँ लोग आते हैं, आपको तड़पता देखते हैं और अपनी किस्मत को दुआ देकर चले जाते हैं।

रात जैसे-जैसे गहरी हुई, हमारा वो कोना किसी इंटरनेशनल बॉर्डर की चौकी बन गया। जो भी उधर टॉयलेट की तरफ जाता, चेहरे पर वीर रस के भाव लेकर जाता। और जो उधर से लौटता, वो किसी हारी हुई जंग को जीतकर लौटे विजयी सेनापति की मुद्रा में मुस्कुराता। हर बार दरवाजा खुलता और हवा का एक नया बदबूदार अध्याय शुरू हो जाता। हमारी आँखें जल रही थीं, घुटने कराह रहे थे और कमर तो बाकायदा पंचायत बुलाने की जिद पर अड़ी थी।

रात के दस बजते-बजते हमारी सीट रेलवे की बोगी कम और देश का जीवंत लोकतंत्र ज़्यादा लगने लगी। जिस ऐरे-गैरे का मन होता, वह हमारे पास आता, अपना हक जताता और चला जाता। एक अजनबी चाचा जी आए और बिना किसी हाय-हेलो के हमारी सीट पर अपना बदबूदार गमछा फैला गए। पाँच मिनट बाद लौटे और रौब से बोले, “जरा ध्यान रखना भाई साहब, यह मेरा तकिया है।” मैं उन्हें फटी आँखों से देखता रह गया। आदमी पहली बार मिला था और जाते-जाते मुझे अपनी चल-संपत्ति का परमानेंट चौकीदार नियुक्त कर गया था।

उधर एक और नमूना युवक आया। उसने अपना मोबाइल चार्जिंग पर लगाया। प्लग बहुत दूर था, मोबाइल हमारे पास था। नतीजा यह हुआ कि चार्जर की वो पतली तार हम तीनों की गर्दनों के ठीक ऊपर से कपड़े सुखाने वाली रस्सी की तरह गुजर रही थी। हम तीनों गर्दन झुकाए ऐसे बैठे थे जैसे किसी मकड़ी ने ताज़ा-ताज़ा जाला बुना हो और हम उसमें फँसी हुई लाचार मक्खियाँ हों, जो हिलेंगी तो सीधे हलाल हो जाएँगी।

राजस्थानी भाई खिसियाकर बोले, “म्हारे खेत में जो बिजूका खड़ा रहता है, वो भी इससे ज्यादा सम्मान पाता है सा।”

तमिल युवक बिलबिलाकर बोला, “यह सीट नहीं है, यह हमारे पिछले सात जन्मों के पापों का कलेक्टिव रिजल्ट है।”

तभी एक और बुजुर्ग अवतार लिए। उन्होंने हमारे पैरों के ठीक बीच में पुराना अखबार बिछाया और सुल्तान की तरह उस पर बैठ गए। फिर जेब से मुरमुरे का लिफाफा निकाला और निशाना साधकर खाने लगे। हर तीसरा मुरमुरा मेरी शर्ट की जेब में गिर रहा था, हर चौथा तमिल भाई की गोदी में और पाँचवाँ बमुश्किल उनके खुद के मुँह में जा रहा था। पूरा डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बिगड़ा हुआ था।

आधी रात तक हमारी दशा ऐसी हो गई कि शरीर का कोई भी अंग अपने मूल मालिक के कंट्रोल में नहीं था। मेरा बायाँ घुटना राजस्थानी भाई के क्षेत्राधिकार में चला गया था। उनकी कोहनी तमिल युवक की सीमाओं में घुसपैठ कर चुकी थी। तमिल युवक का भारी बैग मेरे पेट पर वीटो पावर लगाकर बैठ गया था। हम तीनों मिलकर एक मजबूर संयुक्त परिवार बन चुके थे।

इसी बीच फिर वही खूनी दरवाजा खुला और बदबू की एक नई सुनामी लहर आई।

राजस्थानी भाई ने तुरंत रूमाल को और कस लिया।

तमिल युवक ने तंग आकर अपनी आँखें ही बंद कर लीं।

और मैंने हाथ-पैर ढीले छोड़कर जीवन के असली अर्थ पर गहराई से विचार करना शुरू कर दिया।

तभी एक सज्जन एक्सप्रेस की रफ्तार से तेज कदमों से आए, ट्रेन का थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा और वो महाशय सीधे मेरी गोद में आ गिरे। उठकर कपड़े झाड़ते हुए बोले, “माफ करना भाई, अचानक ब्रेक लग गया।”

मैंने चिढ़कर कहा, “भाई साहब, गाड़ी तो साठ की स्पीड पर सीधी चल रही है!”

वह बड़े ढीठ अंदाज़ में बोले, “अच्छा? तो फिर शायद मेरी किस्मत फिसल गई होगी।”

उस रात हमारी किस्मत इतनी बार फिसली कि गिनती भूल गई। किसी की कटी हुई चप्पल हमारे नीचे फँसी, किसी की पानी की आधी खुली बोतल हमारे पैरों में लुढ़ककर पानी-पानी कर गई। किसी का लावारिस टूथब्रश न जाने कैसे तमिल युवक के खुले बैग में सीधे लैंड कर गया।

हमारे ठीक सामने वाली बर्थों पर दो बंदे हमें बार-बार घूर रहे थे। फिर चादर ताने खर्राटे लेने लगे। उसकी नींद जितनी गहरी और कुंभकरणी थी, हमारी जिज्ञासा उतनी ही सातवें आसमान पर पहुँच रही थी। वे सोने के दौरान भी बार-बार मुस्कुरा क्यों रहे थे? उनके चेहरे पर ऐसा अजीब आत्मविश्वास क्यों था जैसे किसी डाकू ने पूरी बैंक की तिजोरी अकेले लूट ली हो और पुलिस उसका कुछ न बिगाड़ पाई हो?

सुबह हुई। जब टीटीई आया और उसने हमारी टिकटें चेक करके जो असली सच्चाई बताई,  कसम से हमारी हालत उस गरीब किसान जैसी हो गई जिसे अचानक पता चले कि जिस ज़मीन को वो बंजर और बकवास समझकर रात भर रो रहा था, उसके नीचे तो सोने की पूरी खदान दबी पड़ी थी!

वो सामने वाले चालाक युवक रात भर जिस पूरी की पूरी कंफर्टेबल बर्थ पर राजा और शहंशाह बनकर सोए थे, वो वास्तव में हमारी थी।

जी हाँ, हम तीनों सीट कंफर्म हो चुकी थी!

यह सुनते ही पूरी बोगी में पहले दो सेकंड का सन्नाटा छाया, और फिर ऐसा भयानक ठहाका गूँजा कि ऊपर वाली बर्थ पर सो रहा पैसेंजर भी भूकंप के डर से हड़बड़ाकर उठ बैठा।

राजस्थानी भाई ने तुरंत उन युवकों के सामने हाथ जोड़ लिए और बोले, “महाराज, आप लोगों की यह गहरी नींद अमर रहे।”

तमिल भाई तालियाँ बजाते हुए बोले, “भाई, तुम लोगों  ने जो सुख भोगा है, उस पर तो इतिहास में अलग से चैप्टर लिखा जाएगा।”

वे युवक पहले तो शर्म से लाल-पीले हुए, फिर खुद ही बेशर्मों की तरह हँसने लगे। फिर उसे देखकर पूरी बोगी पागलों की तरह हँसने लगी। मैं शर्ट पर पड़े मुरमुरे झाड़ते हुए खिड़की के बाहर देख रहा था और सोच रहा था कि इस देश की रेल यात्रा में सबसे महँगी चीज़ टिकट का किराया नहीं होती बॉस, सबसे महँगी चीज़ होती है सही ‘जानकारी’। जिस रात वो जानकारी हमारे पास नहीं थी, उसी एक रात में हमने बिना एक भी रुपया फीस दिए भारतीय रेल से ‘पीएचडी’ का पूरा कोर्स टॉप रैंक के साथ पूरा कर लिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९ – हास्य-व्यंग्य – “नायक नहीं खलनायक है तू” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  नायक नहीं खलनायक है तू

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २९

☆ हास्य-व्यंग्य ☆ “ट्रम्प, मेलोनी और ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

हाल ही में फ्रांस में संपन्न जी 7 शिखर सम्मेलन में इटली की लोकप्रिय, खूबसूरत प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर मुंह चलाने की बुरी आदत से लाचार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मेलोनी को दुखी और नाराज कर दिया। ट्रंप के बयान ने मेलोनी सहित दुनियाभर की महिलाओं के स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने का काम कर दिया कि “मेलोनी मेरे साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांग रही थी। मैं समझता था कि ट्रंप भले ही राजनीतिक रूप से परिपक्व न हो किंतु वे राजनीति से पहले लम्बे समय तक ग्लैमर की दुनिया से जुड़े रहे हैं अतः महिलाओं की मानसिकता और प्रशंसा पसंद प्रकृति से अच्छी तरह परिचित होंगे, किंतु मेरी धारणा गलत निकली, उनकी समझ भी भारत के एक युवा नेता के जैसी ही है।

यदि वे यह कहते कि मेलोनी के साथ फोटो खिंचवाकर उन्हें गर्व की अनुभूति हुई वे जितनी अच्छी राजनीतिज्ञ हैं उतनी ही सहृदय भी हैं, यदि वे कहते कि मेलोनी जी मैं आपकी फोटो देखकर तनाव मुक्त हो जाता हूं, तो शायद मेलोनी भी खुश होकर ट्रंप की प्रशंसक बन जातीं, लेकिन ट्रंप इस मामले में भी अनाड़ी साबित हुए।

भाइयों, मुझे तो ट्रंप के बयान से मेलोनी और भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मधुर संबंधों के प्रति जलन की बू आ रही है। वे शायद मोदी जी सहित सारी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि जिसको मोदी टॉफियां देकर खुश करते हैं और मुस्कुराते हुए क्लोजअप फोटो खिंचवाते हैं वह उनके साथ फोटो खिंचवाने की भीख मांगती है, लेकिन मोदी की बात निराली है। ट्रंप क्या दुनिया का कोई भी नेता किसी भी मामले में मोदी की बराबरी नहीं कर सकता। मोदी उस देश के हैं जहां मित्रों के लिए कहा जाता है “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे ” और महिला मित्रों की प्रशंसा में कहा जाता है “चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल, एक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल। ” ट्रंप और मोदी में भला क्या मुकाबला ? दुनिया जानती है कि “मोदी है तो मुमकिन है”। उधर अमेरिका के 80 वर्षीय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान को मेलोनी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और अप्रिय बयानबाजी का युद्ध छेड़ दिया है। लोग सच ही कहते हैं कि बढ़ती उम्र कई लोगों की बुद्धि भ्रष्ट कर देती है। ट्रंप मेलोनी की नजरों में भी खलनायक बन गये। “नायक नहीं खलनायक है तू, जुल्मी बड़ा दुखदायक है तू”।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३८ ☆ व्यंग्य – ग़मे-इश्क और ग़मे-रोज़गार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘ग़मे-इश्क और ग़मे-रोज़गार‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३८ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ग़मे-इश्क और ग़मे-रोज़गार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

अमूमन आदमी ज़िंदगी में ग़मों से अपना दामन बचाना चाहता है, लेकिन शायरों और गीतकारों के लिए ‘ग़म’, ‘दर्द’ या ‘रंज’ बहुत अज़ीज़ होते हैं। उनकी नज़्मों और गीतों से लगता है कि ज़िंदगी में ग़म न हों तो ज़िंदगी बेरंग और बेलज्जत हो जाए। शायरों और गीतकारों के लिए ग़म ख़ूबसूरत भी है और ज़रूरी भी। हमारे प्रिय गायक मेंहदी हसन का नग़मा है— ‘तुम नहीं, ग़म नहीं, शराब नहीं; ऐसी तनहाई का जवाब नहीं।’ और तलत महमूद का वह मीठा गीत— ‘शुक्रिया अय प्यार तेरा, दिल को कितना ख़ूबसूरत ग़म दिया।’

यह ग़म या दर्द शायरों को बेतरह परेशान करता रहा है। न इसका कारण समझ में आता है न उपचार। प्रमाण के तौर पर ‘ग़ालिब’ को देखें— ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?’

ज़ाहिर है कि यह ग़म या दर्द इश्क से पैदा होने वाला ग़म है, इसका ग़मे-रोज़गार से कोई ताल्लुक़ नहीं है। ग़मे-रोज़गार से उलट यह ग़म सुकून और चैन देने वाला होता है, इसीलिए शायर उससे निजात पाने की ख़्वाहिश नहीं रखता।

हालत यह होती है कि ग़म या दर्द ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन जाते हैं। एक फिल्मी गीत का मुलाहिज़ा करें— ‘मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है, कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है; यही ग़म है अब मेरी ज़िंदगी, इसे कैसे दिल से जुदा करूं?’ यानी महबूबा को प्रेमी का दिया हुआ ग़म भी इतना प्यारा है कि उसे दिल से जुदा करना मुश्किल हो जाता है।

एक और गीत है— ‘तुम्हीं ने ग़म की दौलत दी,बड़ा एहसान फ़रमाया, ज़माने भर के आगे हाथ फैलाने कहां जाते?’ यानी, ग़म न हों तो उन्हें हासिल करने के लिए ज़माने के आगे हाथ फैलाने की नौबत आ सकती है।

एक और नायिका ग़मों से मिली समृद्धि से गदगद है— ‘दिल को दिये जो दाग़, जिगर को दिये जो दर्द, इन दौलतों से हमने ख़ज़ाने बना लिये।’ यानी, दूसरों के लिए भले ही ग़म या दर्द तक़लीफदेह हों, नायिका के लिए वे ख़ज़ाने से कम नहीं हैं।

दर्द की स्वाभाविकता के बारे में ‘ग़ालिब’ ने लिखा—‘दिल ही तो है, न संगो-ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यों; रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताये क्यों?’ और, ‘दर्द मिन्नतकशे दवा न हुआ, मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।’

मतलब यह कि मेरे दर्द का अच्छा न होना बेहतर है क्योंकि मुझे दवा का मोहताज नहीं होना पड़ा।

प्रेमी के प्रति नायिका का लगाव इस मयार का है कि नायिका प्रेमी से इल्तिजा करती है कि वह अपने दुख उसे देकर हल्का हो जाए। ‘तुम अपने रंजो ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो।’ और, ‘अगर मुझसे मोहब्बत है, मुझे सब अपने ग़म दे दो।’ वैसे यह समझना मुश्किल है कि ग़मों का स्थानांतरण कैसे हो सकता है। ग़म अगर क़र्ज़-वर्ज़ का है तो बात अलहदा है।

हमारे शायरों ने ज़िंदगी में ग़म को बहुत तरजीह दी। ‘शकील’ साहब ने लिखा— ‘मेरी ज़िंदगी है ज़ालिम, तेरे ग़म से आशकारा। तेरा ग़म है दर हक़ीक़त, मुझे ज़िंदगी से प्यारा।’

एक दिलचस्प थियरी हमारे शायरों ने पेश की है जिस पर आज के औषधि-विशेषज्ञों को तवज्जो देना चाहिए। अनेक शायरों का मत है कि दर्द हद से गुज़र जाए तो ख़ुद ही दवा बन जाता है। ‘ग़ालिब’ ने लिखा—‘इशरते क़तरा है दरया में फ़ना हो जाना, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।’ दूसरी जगह वे लिखते हैं— ‘रंज से ख़ूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज, मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गयीं।’

शायर का मक़सद शायद यह है कि दर्द या ग़म के हद से गुजरने पर आदमी उसका आदी हो जाता है, जो बड़ी सीमा तक सच भी है। हरदिल अज़ीज़ गायक तलत महमूद के जिस गीत में ‘ख़ूबसूरत ग़म’ देने के लिए प्यार का शुक्रिया अदा किया गया है उसी में आगे गीतकार कहता है— ‘आंख को आंसू दिये जो मोतियों से कम नहीं, दिल को इतने ग़म दिये कि अब मुझे कोई ग़म नहीं।’

इसी तबियत के एक गीत की पंक्ति है— ‘ये दर्द दवा बन जाएगा, इक दिन जो पुराना हो जाए।’ लेकिन इस गीत के रचने वाले ने यह नहीं बताया कि दर्द से निजात देने वाला वह शुभ दिन कब आएगा।

शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं। उन्हें उनका दर्द मज़ा देने लगता है— ‘आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा, हंस हंस के आह आह किये जा रहा हूं मैं।’

एक दूसरी ग़ज़ल में, जिसे बेगम अख़्तर ने अपना ख़ूबसूरत स्वर दिया, ‘जिगर’ फ़रमाते हैं— ‘तबीयत इन दिनों बेगानए ग़म होती जाती है, मेरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है।’ यानी ज़िंदगी में ग़म के न रहने से खुशियां भी घटती जाती हैं। गरज़ यह कि ख़ुशियां ग़मों पर ही मुनहसिर हैं।

‘ग़ालिब’ ने लिखा— ‘इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पायी दर्द बे-दवा पाया।’ यानी इश्क से ज़िंदगी का मज़ा भी मिला और दर्द की दवा और लाइलाज दर्द भी।

प्रेमी के लिए दर्दे-इश्क इतना ज़रूरी है कि सोये दर्द को जगाया जाता है— ‘जाग दर्दे इश्क जाग। दिल को बेक़रार कर, छेड़ के आंसुओं का राग।’

कहने की ज़रूरत नहीं कि यह ग़म और दर्द इश्के-मजाज़ी से पैदा होते हैं, इनका ताल्लुक़ ग़मे-रोज़गार से क़तई नहीं है। ग़मे- रोज़गार से यह ख़ूबसूरत और मीठा-मीठा दर्द हासिल होना मुमकिन नहीं है। ‘ग़ालिब’ ने लिखा कि किसी न किसी ग़म में मुब्तिला होना इंसान की फ़ितरत है—‘ग़मे इश्क गर न होता, ग़मे रोज़गार होता।’

ग़म को पालने-पोसने वाला क्लासिक पात्र मशहूर अंग्रेज़ उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशंस’ में मिस हैविशाम के रूप में मिलता है। मिस हैविशाम का प्रेमी उन्हें धोखा देकर ठीक उस वक्त भाग जाता है जब वे शादी की पूरी तैयारियों के साथ उसका इंतज़ार कर रही थीं। उसके धोखे की ख़बर पाकर मिस हैविशाम ने समय को उसी क्षण पर रोक देने की कोशिश की। घर की घड़ियां उसी क्षण पर रोक दी गयीं, वे जीवन भर शादी की वही पोशाक पहने रहीं, शादी की केक पर मकड़जाले तन गये, एक जूता पैर में और एक मेज़ पर ही रहा। मिस हैविशाम चलता-फिरता म्यूज़ियम बन गयीं। लेकिन उनकी सारी कोशिशों के बावजूद वक्त उनकी बंद मुट्ठी से रिसता गया और धीरे-धीरे वे बूढ़ी हो गयीं।

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© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ गा कोकिल बरसा पावक कण… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ गा कोकिल बरसा पावक कण… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(21 जून विश्व संगीत दिवस पर कोयल को अर्पित व्यंग्य योग)

प्रिय कुहू

तुम 46 डिग्री टेम्प्रेचर में भी कूकीं। बदरीले मौसम,धुंआधार बारिश और हाड़ कँपाती ठंड में भी। मधुऋतु में कूकना तुम्हारा मौलिक अधिकार है।

तुम्हें कौन समझाए कि बेमौसम कूकना अच्छा नहीं होता। भले ही चीनी से ज्यादा मीठी कूक क्यों न हो। हमने कब कहा कि मुहूर्त निकलवाकर कूको ,पर जनरल नॉलेज नाम की कोई चीज होती है कि नहीं।

बेशक तुम पक्षी -जगत की नेत्री हो पर, हर बात पता हो जरूरी तो नहीं। वैसे भी अज्ञानी रहकर सब कुछ पाया जा सकता है तो ज्ञान की सिफारिश किसलिए।

कभी सुमित्रानंदन पंतजी ने तुम से गुजारिश की थी ! याद करने की कोशिश करो। मुझे पता है तुम भूली नहीं हो। भूलने का अभिनय कर रही हो। जिसमें तुम्हें महारत है।

हैरानी इस बात की है कि जहां तुम्हें याद रखना होता है वहां तुम भूल जाती हो। और जहां भूलना चाहिए वहां शिद्दत से याद रखती हो।

उन्होंने कहा था—- गा कोकिल बरसा पावक कण नष्ट भ्रष्ट हों जीर्ण पुरातन*—–वे जानते थे कि सुर सम्राज्ञी रसप्रिया वक्त पड़ने पर अग्नि भी बरसा सकती है। मृदूनि कुसुमादपि, वज्रादपि कठोर। तुम्हारे लिये यह पथ अपरिचित नहीं है। इसमें नया कुछ भी नहीं। भगवान कृष्ण ने होठों पर बाँसुरी रखी तो तर्जनी पर सुदर्शन चक्र।

शक्तिरूपा महामाया के हाथों में वीणा होती है पर असुर संहार हेतु धनुष ,त्रिशूल ,और अन्य आयुध भी होते हैं।

लोग कहते हैं तुम कौए के घोंसले में अपने अंडे छोड़ आती हो। तुम काली कलूटी हो । तो क्या। रंग देखकर कैसे फैसला किया जा सकता है। गोरा, मन से काला ढुस भी हो सकता है। रंग तो सियार भी बदल लेते हैं। बगुला ,मौनी बाबा बनकर मछली का शिकार करता है। चाहे जो हो तुम “तोतों “से तो लाख गुना अच्छी हो। तुम्हारा अपना राग है। सुर है। स्वयं की भाषा है। तुम्हें आज तक कोई तोता बनाने में कामयाब नहीं हो सका।

कभी सोचने की जहमत भी उठाओ। तुम्हें हम कादम्बरी, कोकिल, पिक, वसंतदूती, वनप्रियः चाहे जिस नाम से पुकारें कोयल ही रहोगी ना। नाम बदलने से फितरत नहीं बदलती ना पाखी। जन्मजात आदतें आखिर तक साथ रहती हैं।

अपनी ही सूरत पर नर्सिसस की तरह रीझनेवाला, जमाखोर मनुष्य तुम्हारे सुरदान का महत्व समझ ही नहीं सकता। क्योंकि उसकी सुरों की समझ खो गई है। वह निहायत बेसुरा और भौंडा हो गया है।

कुहू तुम सपने देखती हो। बेचती नहीं। तुम्हारे स्वप्न में एक हरा भरा मुल्क है। ताकि आनेवाली पीढ़ियों को जंगल सलामत मिले। बाग बगीचे वन उपवन अमराइयों में वे कूकती फिरें। मौसम में मिश्री घोलें।

तुम कूको कुहू। जी भरकर कूको। कभी तो इंसान के न सही, नदी जंगल पहाड़ के देवता के कानों पर जूँ रेंग जाये।

इंतजार लंबा हो रहा है। अब पंतजी की बात मान भी जाओ ना।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०३ – व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०३ – व्यंग्य  – सड़क पर बिखरा साहित्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)  

सड़कों पर दौड़ते वाहन केवल वाहन नहीं होते, बल्कि चलती-फिरती दर्शनशास्त्र की यूनिवर्सिटी होते हैं। जब कोई नौसिखिया ड्राइवर अपनी चमचमाती कार में बैठकर स्टियरिंग थामता है तो उसे लगता है कि वह सड़क का सिकंदर है लेकिन असली ज्ञान तो उस खटारा ट्रक के पीछे लिखा होता है जो धुएं का गुबार छोड़ते हुए कहता है “मालिक की ज़िंदगी, चेले की ऐश उड़ाओ कैश”। यह लाइन पढ़ते ही कार के गियर में हाथ लगाए बैठे मध्यमवर्गीय इंसान का सारा घमंड वैसे ही पिघल जाता है जैसे चिलचिलाती धूप में कुल्फी पिघलती है। हमारे देश की सड़कों पर ट्रैफिक रूल्स की कॉपियां भले ही धूल खा रही हों पर इन ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे जीवन के गहरे फलसफे हर आने-जाने वाले की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। आप किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर खड़े हो जाइए आपको यमराज की ड्यूटी और इंसानी मजबूरी का ऐसा लाइव कॉम्बिनेशन कहीं और देखने को नहीं मिलेगा जो इन गाड़ियों के बंपर पर मुफ्त में उपलब्ध रहता है। यह इस देश का सबसे सस्ता और टिकाऊ मनोरंजन है जिसे देखने के लिए किसी मल्टीप्लेक्स का टिकट नहीं कटाना पड़ता बस अपनी आंखें खुली रखनी पड़ती हैं।

सड़क पर निकलते ही पहला मुकाबला उस बिरादरी से होता है जो जीवन को एक रेस समझती है और जिनकी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “धीरे चलोगे तो बार-बार मिलोगे, तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलोगे”। इस एक लाइन में जीवन और मृत्यु का जो अद्भुत ककहरा सिखाया गया है उसे पढ़कर बड़े-बड़े संतों की समाधि भंग हो सकती है। लोग सुबह-सुबह ऑफिस जाने की जल्दी में अपनी बाइक को हवाई जहाज बनाने की कोशिश करते हैं तभी उनके सामने कोई ऐसा ही ऑटो आ जाता है जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा ब्रेक मत मार, एक्सीडेंट हो जाएगा”। इसे पढ़कर अच्छे-अच्छे रोमियो अपनी गाड़ी की स्पीड चालीस से नीचे कर लेते हैं क्योंकि मोहब्बत और हाईवे दोनों में ही जब ब्रेक फेल होता है तो नुकसान सीधा दिल और बंपर का ही होता है। भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग करना किसी युद्ध के मैदान में उतरने जैसा है जहाँ आपको हर मोड़ पर एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। यहाँ यमराज किसी कोने में बैठकर चाय की चुस्की ले रहे होते हैं और उनके प्रतिनिधि के रूप में हमारी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर”। यह सीधा सा संदेश उस पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो हर वक्त आगे निकलने की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी है।

सच्ची मोहब्बत की तलाश में भटके हुए आशिकों के लिए तो ये गाड़ियां किसी मंदिर के चबूतरे जैसी हैं जहाँ हर टूटे दिल की दास्तान पेंट से लिखी होती है। जब कोई आशिक अपनी महबूबा की शादी के गम में देवदास बनने की बजाय ट्रक का ड्राइवर बन जाता है तो वह अपनी गाड़ी पर लिखवाता है “दिल दिया था जिसको, वो चली गई विप्रो, अब ढूँढ रहा हूँ उसको मेट्रो-मेट्रो”। यह महज़ एक शायरी नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज़ है जहाँ भावनाएं सैलरी पैकेज के सामने घुटने टेक देती हैं। ऐसी ही एक गाड़ी के पीछे जब लिखा मिलता है “तूने ठुकराया मेरा प्यार, अब देख मेरी कार का गियर” तो समझ आता है कि इश्क में मिला धोखा ही इंसान को बड़ा बिज़नेसमैन या फिर भारी वाहन का मालिक बनाता है। सड़कों पर चलता हुआ यह दर्द जब गियर के साथ बदलता है तो रात के सन्नाटे में हेडलाइट की रोशनी में एक और लाइन चमकती है “महबूबा की याद में, गियर बदला रात में”। इस देश के सारे आशिक अपनी नाकामी का जश्न इन सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाकर मनाते हैं मानो उनका क्लच और ब्रेक ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा बचा हो। प्यार में जुदाई झेल रहे इन जाबाँजों की बातें सुनकर तो पत्थर का दिल भी पिघल जाए और वह भी अपनी गाड़ी की डिक्की पर कुछ ऐसा ही लिखवाने को मजबूर हो जाए।

आर्थिक मंदी और मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष की जो गाथा इन लोहे के शेरों पर लिखी होती है वह किसी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं मिल सकती। जब एक आम आदमी बैंक से लोन लेकर अपने सपनों की गाड़ी सड़क पर उतारता है तो उसकी पहली प्रार्थना यही होती है “मालिक की दया, बैंक का कर्जा”। यह लाइन उस अंतहीन चक्रव्यूह को बयां करती है जिसमें फंसा इंसान हर महीने की तारीख आने से पहले ही कांपने लगता है। इसके ठीक बगल में कोई पुरानी खटारा गाड़ी अपनी जर्जर हालत पर हंसती हुई कहती है “ये मत देख कि कितनी पुरानी है, ये देख कि कितनी तूफानी है”। यह आत्मविश्वास ही इस देश की असली ताकत है जो संसाधनों की कमी के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखता है। किश्तों के बोझ तले दबे हुए ड्राइवर्स का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब उनकी गाड़ी के पीछे लिखा होता है “किश्तों पर ज़िंदा हूँ, मालिक का परिंदा हूँ”। यह पंक्तियां किसी बड़े कवि की कविता से कम नहीं हैं जो सीधे समाज के उस हिस्से पर रोशनी डालती हैं जो दिन-रात पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है। लोन पर ली गई गाड़ियों के मालिक जब दुनिया की बुरी नज़रों से परेशान होते हैं तो साफ लिख देते हैं “लोन पर ली है भाई, घूर कर नज़र मत लगा” जिससे बुरी नज़र वाले का मुंह खुद ही काला हो जाता है।

इन वाहनों के पीछे छिपा शुद्ध देसी हास्य रस ऐसा होता है जो डिप्रेशन के मरीजों के लिए रामबाण इलाज की तरह काम करता है। किसी सिग्नल पर खड़े होकर जब अचानक नज़र पड़ती है “हॉर्न पो पो दीदी गो गो” तो चेहरे पर हंसी की ऐसी लहर दौड़ जाती है जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। यह लाइन हमारे समाज के उस स्टीरियोटाइप पर एक मीठा सा कटाक्ष है जो महिलाओं की ड्राइविंग को लेकर अक्सर चुटकुले बनाता रहता है। वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक सुख और सामाजिक ताने-बाने को एक साथ समेटे हुए एक लंबा सा ट्रक कहता है “छोटा परिवार, सुखी परिवार और ये लंबा ट्रक, सबका यार”। सड़कों पर चलने वाले इन मुसाफिरों का अपनी गाड़ियों से ऐसा रिश्ता होता है कि वे उन्हें महज़ मशीन नहीं बल्कि अपने जिगर का टुकड़ा समझते हैं। जब कोई मनचला अपनी गाड़ी को हवा में उड़ाने की कोशिश करता है तो उसे रोकने के लिए पीछे लिखा होता है “धीरे चलो, घर पर कोई इंतज़ार कर रहा है शायद बेलन लेकर”। यह बेलन का डर ही है जो इस देश के शादीशुदा पुरुषों को सुरक्षित घर पहुँचाने में पुलिस प्रशासन से ज़्यादा मददगार साबित होता है और सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकता है।

जीवन के परम ज्ञान और सस्पेंस की जो बातें इन गाड़ियों के पिछले हिस्से में छिपी होती हैं उन्हें समझने के लिए थोड़ी दार्शनिक दृष्टि की जरूरत होती है। जब आप अपनी गाड़ी को बहुत संभाल कर चला रहे होते हैं तभी सामने वाले ट्रक पर लिखा होता है “नज़र हटी, दुर्घटना घटी सब्जी पूरी बंटी”। यह लाइन मौत के बाद होने वाले भोज की तरफ इतना सटीक इशारा करती है कि पढ़ने वाला तुरंत अपनी सीट बेल्ट और हेलमेट को ठीक करने लगता है। जीवन की नश्वरता को इससे बेहतर तरीके से कोई और नहीं समझा सकता जहाँ एक पल की लापरवाही आपको सीधे परलोक का टिकट दिला सकती है। समय के चक्र और इंसान की औकात को याद दिलाते हुए एक और सूक्ति वाक्य मिलता है “समय बलवान है, इंसान तो बस मेहमान है”। इन पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि जैसे कोई सूफी संत अपनी कुटिया छोड़कर हाईवे पर ट्रक चलाने आ गया हो और लोगों को मोक्ष का रास्ता दिखा रहा हो। इसी सस्पेंस और चेतावनी के बीच जब लिखा मिलता है “आज नकद, कल उधार गाड़ी पर लिखना मना है यार” तो समझ आता है कि इस आध्यात्मिक दुनिया के पीछे भी व्यापार का असली नियम पूरी कड़ाई से लागू होता है।

छोटे वाहनों और दोपहिया गाड़ियों के पीछे का टशन तो बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के ठाट-बाठ को भी फीका कर देने का माद्दा रखता है। एक छोटा सा ऑटो रिक्शा जब संकरी गलियों से सांप की तरह बलखाते हुए निकलता है तो उसके पीछे लिखा होता है “ऑटो है छोटा, पर दिल है बड़ा”। यह लाइन उस ड्राइवर के स्वाभिमान को दर्शाती है जो भले ही रोज़ का चंद रुपया कमाता हो पर किसी अमीर की अमीरी के आगे झुकना नहीं जानता। वहीं कॉलेज जाने वाले किसी लड़के की बाइक पर जब लिखा होता है “नो गर्लफ्रेंड, नो टेंशन” तो साफ़ समझ आता है कि यह दिल टूटने के बाद का वैराग्य है जो बाइक की रफ्तार में तब्दील हो चुका है। चालान के डर से कांपते हुए इस दौर के युवाओं का दर्द भी गाड़ियों पर बखूबी उभर कर सामने आता है जब वे लिखवाते हैं “चालान से डर नहीं लगता साहब, खाली जेब से लगता है”। कानून के लंबे हाथों और ट्रैफिक पुलिस के कैमरों के बीच ये छोटी गाड़ियां अपनी आज़ादी का परचम लहराते हुए कहती हैं कि हवा से बातें करना और सड़कों से नाता जोड़ना ही इनका असली मक़सद है।

सड़क का यह पूरा सफरनामा अजीबोगरीब घटना से होती है। हाईवे पर एक बहुत ही शानदार, महंगी और विदेशी स्पोर्ट्स कार फर्राटा भर रही होती है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो वह सड़क पर नहीं बल्कि हवा में उड़ रही हो। उस कार का मालिक चश्मा चढ़ाए, स्टीयरिंग पर उंगलियां थिरकाते हुए खुद को दुनिया का शहंशाह समझ रहा होता है। तभी उसके आगे एक बहुत ही पुराना, जंग लगा हुआ और भयंकर काला धुआं छोड़ता हुआ कबाड़ ट्रक आ जाता है, जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “जो हमसे टकराएगा, वो सीधा गैरेज जाएगा”। स्पोर्ट्स कार का घमंडी मालिक उस खटारे को देखकर खीझ जाता है और उसे ओवरटेक करने के लिए लगातार हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगता है। वह खिड़की से हाथ बाहर निकालकर चिल्लाता है “ए भाई! साइड हटा अपनी इस बैलगाड़ी को!”

तभी वह खटारा ट्रक अचानक बीच सड़क पर रुक जाता है और उसके रुकते ही स्पोर्ट्स कार वाले को भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते हैं, जिससे उसकी कार के टायर चीख उठते हैं। कार का मालिक गुस्से में लाल-पीला होकर नीचे उतरता है और उस ट्रक के केबिन का दरवाज़ा खटखटाते हुए चिल्लाता है “बाहर निकल! गाड़ी चलानी नहीं आती तो रोड पर क्यों आ जाते हो?” जैसे ही ट्रक का खटखटाता हुआ दरवाज़ा चरमराकर खुलता है, अंदर से कोई साधारण ड्राइवर नहीं बल्कि खुद यमराज नीचे उतरते हैं। यमराज ने पैरों में हवाई चप्पल पहन रखी होती है, गले में गेंदे की सूखी माला होती है और हाथ में भैंसे की रस्सी की जगह एक चमचमाती डिजिटल चालान मशीन होती है। कार का मालिक उन्हें देखकर हक्का-बक्का रह जाता है और उसकी घिग्घी बंध जाती है।

यमराज बड़े प्यार से मुस्कुराते हैं, उस अमीर लड़के के कंधे पर हाथ रखते हैं और ठेठ बनारसी अंदाज़ में कहते हैं “काहे इतना भौकाल टाइट कर रहे हो बाबू? बहुत देर से तुम हमारी गाड़ी के पीछे लिखी लाइनें पढ़ रहे थे न? अब जरा इस मशीन पर अपनी उंगली का अंगूठा लगाओ।” लड़का कांपते हुए पूछता है “प्रभु, आप यहाँ ट्रक चला रहे हैं?” यमराज हंसते हुए जवाब देते हैं “अरे भाई! धरती पर इतना ट्रैफिक और प्रदूषण हो गया है कि भैंसे को सांस लेने में दिक्कत होती है, इसलिए हमने भी लोन पर यह सेकंड हैंड ट्रक उठा लिया है। वैसे तुम्हारी कार का बीमा और तुम्हारी सांसों का परमिट दोनों ही आज इसी वक्त समाप्त हो चुके हैं, चलो अब चुपचाप पीछे वाले केबिन में बैठो, वहाँ पहले से ही तीन ओवरस्पीडिंग वाले आशिक बैठे ‘महबूबा की याद में’ गियर बदल रहे हैं!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२५ ⇒ व्यंग्य – लॉ और इन-लॉ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “लॉ और इन-लॉ।)

?अभी अभी # १०२५ ⇒ व्यंग्य – लॉ और इन-लॉ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इंसान प्रेम को रिश्तों में बांधता है, उसे नाम देता है, समाज उसे स्वीकृति देता है। रिश्ते लौकिक भी होते हैं और अलौकिक भी ! जिन प्रथा और परंपराओं को समाज मान्यता देता है, कालांतर में वे ही कानून का रूप ले लेती हैं। अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेने पर विवाह संपन्न हो जाता है। शादी होते ही नए रिश्ते जन्म लेने लगते हैं, सास ससुर, साला साली, दामाद और समधी, समधन। एक और संसार, जिसे ससुराल कहते हैं, जीवन में प्रवेश कर जाता है।

कानून को अंग्रेजी में लॉ कहते हैं और ससुराल पक्ष को इन -लॉ। दुनिया का कोई कानून आपको अपने ससुर को कानूनी रूप से पिता मानने को बाध्य नहीं कर सकता। हम यहां उनकी बात नहीं कर रहे, जो अपने बाप को ही बाप नहीं मानते। लेकिन ससुर को फादर -इन -लॉ, यानी कानून के अनुसार पिता तो नहीं माना जा सकता न। साला यह कौन सा लॉ है जो साले को जबरदस्ती ब्रदर – इन – लॉ, यानी कानूनी रूप से आपका भाई बना बैठता है। यह तो अंधा कानून हुआ। भाषा के नाम पर रिश्तों का यह अत्याचार हम कब तक सहते रहेंगे। सास, सास ही रहेगी, वह मदर – इन – लॉ, यानी कानूनी तरीके से हमारी मां नहीं बन सकेगी। बहू, बहू ही रहेगी, सारी खुदाई एक तरफ रहेगी, लेकिन जोरू का भाई, जोरू का भाई ही रहेगा, कानूनी रूप से हमारा भाई यानी ब्रदर – इन – लॉ कभी नहीं बनेगा। हमने पहले भी अंग्रेजी का विरोध किया है, और कानूनन, रिश्तों की आड़ में ससुराल को हम पर हावी करने की इस साजिश का हम पुरजोर विरोध करते हैं।।

हम शायद इस बात को इतना तूल भी नहीं देते, अगर हमारी साली बीच में नहीं आती ! हमने शादी ही यह सोचकर करी थी कि साली, आधी घर वाली लेकिन जब अंग्रेजी किताब उठाई तो पाया वह तो सिस्टर – इन – लॉ है, यानी वह तो आधी बहन बनने पर तुल गई। आग लगे ऐसी अंग्रेजी किताबों को। कितना प्यारा शब्द है दूल्हा – दुल्हन !

और अंग्रेजी में ब्राइड और ब्राइड ग्रूम। हमें तो इस इंग्लिश शब्द में जोरू और जोरू के गुलाम वाली बू आती है। हसबैंड वाइफ फिर भी थोड़ा ठीक है, वाइफ ही अपना बैंड बजा रही है, फादर – इन – लॉ तो नहीं।

हम कानून का भी सम्मान करते हैं और रिश्तों का भी। कुछ रिश्ते कानून से भी ऊपर होते हैं, और संसारी रिश्तों से भी ! उन्हें हम अलौकिक रिश्ते कहते हैं। शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण और सीता – राम की तरह ही एक अलौकिक रिश्ता और भी है राधा कृष्ण का, जहां कोई सामाजिक बंधन, मर्यादा नहीं। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई। एक ऐसा आदर्श जो मुक्त है, उन्मुक्त है, लेकिन आचरण में नहीं उतारा जा सकता। भक्त होना बड़ा कठिन है। अपने पति के होते हुए जब चित्तौड़ की महारानी, मीराबाई गलियों में इकतारा ले, गाती फिरती है, मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, तो सारे आदर्श, प्रथा, परंपराएं, सामाजिक बंधन, कानूनी बेड़ियां कमजोर पड़ जाती हैं। मीरा जीत जाती है, जगत हार जाता है।।

चलिए वापस लौटते हैं लव इन और इन लाँ के रिश्ते से लिव इन रिलेशन पर ! जी हां, वही मुक्त और उन्मुक्त प्रेम जिसे सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है। गुजरात का छुट्टा छेड़ा, कब का गुजरात छोड़, एक व्यापक रूप अख्तयार कर चुका है। विवाह का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, लिव इन का नहीं, क्योंकि विवाह एक बंधन है और लिव इन एक आपसी करार, जिससे आप जब चाहें करें इन्कार।

रिश्तों में प्रेम हो, मर्यादा हो, एक ऐसा मनोवैज्ञानिक बंधन हो जिसमें मुक्ति का भी अहसास हो। समाज और कानून के बंधन में कब बंध पाए प्रेम के रिश्ते। अगर रिश्तों में प्रेम होता तो इतने तलाक नहीं होते। घर घर में पारिवारिक क्लेश और मनमुटाव नहीं होता। एक ही रास्ता रिश्तों को पटरी पर लाने का। लव इन, लॉ आउट। लव नॉट आउट।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०२ – व्यंग्य – मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०२ – व्यंग्य  – मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

साहित्यिक आयोजनों की सबसे बड़ी और कड़वी खूबी यह होती है कि वहाँ मुख्य अतिथि का चयन ज्ञान के तराजू पर तौलकर नहीं, बल्कि आयोजकों द्वारा अपने स्वार्थ की मलाई चाटने के उपक्रम से तय किया जाता है। मंच पर बैठे उस तथाकथित मसीहा को बुलाने के पीछे एक पूरा व्यापारिक गणित छिपा होता है। मसलन यदि वह सरकारी गलियारों में तगड़ी पैठ रखता है, तो आयोजक मंडल उसके तलवे इस उम्मीद में चाटता है कि भविष्य में उनके कई रुके हुए सरकारी टेंडर, जमीन के कागजात और अवैध निर्माण के काम मक्खन की तरह पूरे हो जाएँगे। यदि वह मुख्य अतिथि किसी बड़ी धनराशि वाले साहित्यिक सम्मान की मानद समिति में बैठा है, तो आयोजक उसे पान-इलायची खिलाकर मन ही मन उस मलाईदार पुरस्कार और उसकी मोटी रकम को हथियाने का चक्रव्यूह रच रहे होते हैं। अगर मुख्य अतिथि महोदय किसी नामचीन अखबार या पत्रिका के बड़े संपादक निकल गए, तो मंच पर उनकी आरती इस लालच में उतारी जाती है कि अगले रविवार के अंक में आयोजकों की दो कौड़ी की घिसी-पिटी रचनाएँ पहले पन्ने पर सज जाएँगी। और यदि वह व्यक्ति ज्ञान से पूरी तरह पैदल लेकिन नोटों से लबालब भरा कोई धनाढ्य सेठ हुआ, तो उसे मंच पर केवल इसलिए बिठाया जाता है ताकि कार्यक्रम के तंबू, कुर्सियों, समोसों और मुख्य अतिथि के खुद के बुके का खर्च ‘स्पॉन्सर’ के रूप में उसी की जेब से हँसते-हँसते झटक लिया जाए। आज की शाम भी कुछ ऐसी ही स्वार्थ-गंगा में गोता लगाने वाली थी, जहाँ हिंदी जगत के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की स्मृतियों में एक विराट गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जहाँ मुख्य अतिथि को निराला के ‘छंद’ से ज्यादा अपनी ‘साख’ और आयोजकों के ‘धंधे’ से सरोकार था। लब्बोलुआब यही है कि मुख्य अतिथि का चयन उसके रुतबे के वजन को देखकर किया जाता है। मंच के केंद्र में विराजमान मुख्य अतिथि महोदय की शारीरिक मुद्रा किसी मध्ययुगीन सम्राट से कम नहीं लग रही थी। उन्होंने एक पैर पर दूसरा पैर इस तरह से चढ़ा रखा था मानो पूरी दुनिया का भूगोल उनके एक घुटने के नीचे दबा हो। उनके चेहरे पर छाई गंभीर रहस्यमयी मुस्कान को देखकर नीचे बैठे श्रोता भ्रम में थे कि वे कविता की गहराई समझ रहे हैं या फिर मन ही मन रात के भोजन के मेनू का हिसाब लगा रहे हैं। वे बार-बार अपने कुर्ते की आस्तीन को ऊपर चढ़ाते और सामने खड़े कैमरामैन को तिरछी नजरों से देखकर एक ऐसी फोटोजेनिक मुद्रा धारण कर लेते जिसे देखकर अच्छे-अच्छे अभिनेता भी पानी भरने लगें। उनकी आँखों में एक ऐसा आत्मसंतोष तैर रहा था जो केवल उसी व्यक्ति के चेहरे पर आ सकता है जिसने जीवन में कभी किसी पुस्तक के दो पन्ने लगातार पलटने का कष्ट न उठाया हो। जब भी कोई वक्ता मंच पर निराला जी के छंदों की विवेचना करता तो मुख्य अतिथि महोदय इस तरह से अपना सिर हिलाते मानो निराला जी रोज़ सुबह उनके घर आकर अपनी कविता का पहला ड्राफ्ट उन्हें सुनाते थे और उनसे हरी झंडी मिलने के बाद ही उसे छपने के लिए भेजते थे। सच्चाई यह थी कि उन्हें निराला जी के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितनी एक साधारण बिल्ली को अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांतों के बारे में होती है मगर अपनी इस अज्ञानता को वे अपनी राजसी मुखमुद्राओं के पीछे इस तरह छिपा रहे थे कि सारा सभागार उनके इस मौन पानाडित्य के सामने नतमस्तक दिखाई दे रहा था।

 

जब मुख्य अतिथि महोदय को भाषण के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सबसे पहले अपने चश्मे को उतारकर जेब से निकाले रेशमी रूमाल से अत्यंत धीमेपन के साथ साफ करना शुरू किया क्योंकि मंच पर आने के बाद सीधे बोलना शुरू कर देना नौसिखियों की निशानी माना जाता है। उन्होंने पोडियम पर दोनों हाथ टिकाए और पूरे सभागार को इस तरह से निहारा जैसे कोई शेर अपनी शिकारगाह में हिरणों के झुंड को देखता है। उन्होंने अपने कंठ को दो-तीन बार साफ किया और एक गंभीर भारी आवाज में बोले “साथियों जैसा कि आप जानते हैं निराला जी कवि थे, कवि ही नहीं बल्कि बड़े कवि थे, जैसा कि मेरे पूर्व वक्ताओं ने कहा भी है, वे बहुत अच्छी कविताएँ लिखते थे इसलिए उनकी कविताएँ पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाई जाती हैं।” इस ऐतिहासिक उद्घाटन वाक्य को सुनते ही अग्रिम पंक्ति में बैठे कुछ चाटुकारों ने इस तरह से तालियाँ बजाईं मानो उन्हें ब्रह्मांड का कोई परम सत्य मिल गया हो। मुख्य अतिथि महोदय ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्रोताओं को सम्बोधित किया “अब जो कविताएँ विद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाई जाती हों, वो अच्छे तो होंगी ही और जब कवितायें अच्छी होंगी तो इन्हें लिखने वाला कैसा होगा, आप सब लोग एक साथ बताइये।” इस पर पूरी भीड़ ने अपनी बची-कुची चेतना को समेटते हुए एक स्वर में चिल्लाकर उत्तर दिया “अच्छा”। मुख्य अतिथि ने मंच पर पानी का गिलास उठाया और एक घूंट पीकर ऐसे देखा मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो और इस सीधी साधी बात को निराला साहित्य का सबसे बड़ा शोध पत्र बनाकर पेश कर दिया हो।

 

इसके बाद मुख्य अतिथि महोदय ने अपने भाषण के उस तरकश से तीर निकालना शुरू किया जिसके दम पर वे जीवन भर बिना एक भी पन्ना पढ़े हर बड़े मंच के मसीहा बने फिरते थे। उन्होंने बिना पढ़े मंच लूटने का पहला अचूक नियम लागू किया जिसे साहित्य की भाषा में विषयांतर की कला कहा जाता है। उन्होंने कहा “मित्रों, असली कवि वह नहीं होता जो केवल महलों की बात करे बल्कि असली कवि वह होता है जो धरती से जुड़ा हो और निराला जी तो इतने जमीनी थे कि उन्होंने कुकुरमुत्ते पर भी कविताएँ लिखी हैं, उन्हें कुकुरमुत्तों से बहुत प्रेम था, जहाँ भी उन्हें कुकुरमुत्ता दिखता वे वहीं कविताएँ लिखने बैठ जाते थे।” इस अद्भुत और अलौकिक रहस्योद्घाटन को सुनकर सभागार के अंतिम छोर पर बैठे एक बुजुर्ग साहित्यकार के हाथ से उनकी डायरी छूटकर नीचे गिर गई मगर मुख्य अतिथि महोदय अपनी ही रौ में बहते जा रहे थे। उन्होंने बिना ज्ञान के मंच पर दहाड़ने के उस शाश्वत नियम का प्रदर्शन किया जिसके तहत वक्ता अपनी अज्ञानता को समय की कमी का बहाना बनाकर एक गरिमापूर्ण विदाई में बदल देता है। उन्होंने अपनी कलाई घड़ी की तरफ बेहद नाटकीय अंदाज में देखा और चेहरे पर एक गहरी चिंता की लकीरें खींचते हुए बोले “मित्रो मैं निराला पर और भी बहुत कुछ बोलता मगर समय बहुत हो चुका है और आप सब भी ऊब गए होंगे इसलिये आज बस इतना ही, आगे फिर कभी आप मौका देंगे तो उनके बारे में ऐसी ऐसी बातें बताऊँगा जो स्वयं निराला जी को भी पता नहीं रही होंगी। जय हिन्द, जय भारत।”

 

मुख्य अतिथि महोदय का यह भाषण दरअसल उन तमाम अकादमिक सूत्रों का एक जीवंत संकलन था जो बिना किसी तैयारी के किसी भी गोष्ठी को पूरी तरह से वश में करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जब किसी वक्ता को विषय की हवा भी न लग रही हो तो उसका सबसे पहला अचूक फॉर्मूला यही होता है कि वह अपने पूर्ववर्ती वक्ताओं के नामों की एक लंबी सूची तैयार करे और उन सभी की बातों का अंधाधुंध समर्थन करना शुरू कर दे। दूसरा नियम यह कहता है कि जब आपके पास कहने को कुछ न हो तो आप जनता से सीधे सवाल पूछना शुरू कर दें जिससे श्रोताओं को लगता है कि वे किसी व्याख्यान में नहीं बल्कि किसी सामूहिक विमर्श का हिस्सा हैं और वे उत्साह में आकर तालियाँ पीटने लगते हैं। तीसरा सूत्र यह है कि विषय से जुड़े किसी भी एक अजीबो-गरीब शब्द को पकड़कर उसे पूरे भाषण का केंद्र बिंदु बना दिया जाए जैसा कि महोदय ने कुकुरमुत्ते के साथ किया जिससे गंभीर चर्चा भी एक झटके में बेहद लोक-लुभावन और मनोरंजक बन जाती है। चौथे नियम के अनुसार वक्ता को अपनी शारीरिक भाषा को इतना आक्रामक और आत्मविश्वास से भरपूर रखना चाहिए कि सुनने वाले को अपने ही ज्ञान पर शक होने लगे कि कहीं उसने ही निराला जी को गलत तो नहीं पढ़ लिया है। पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि भाषण के अंत में एक ऐसा रहस्यमयी सस्पेंस छोड़ दिया जाए जिससे लोगों के भीतर यह उत्सुकता बनी रहे कि इस व्यक्ति के पास ज्ञान का कोई ऐसा गुप्त खजाना है जो आज समय की कमी के कारण बाहर नहीं आ पाया और इस तरह एक अज्ञानी व्यक्ति भी मंच से परम ज्ञानी बनकर विदा होता है।

 

इस पूरे तमाशे के दौरान मंच के ठीक नीचे बैठी जनता की हालत देखने लायक थी जो इस अद्भुत बौद्धिक जुगाली को पचाने की कोशिश में लगातार अपनी आँखें मटका रही थी। सामने की पंक्ति में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय अपनी गर्दन को इस तरह से हिला रहे थे मानो वे मुख्य अतिथि के हर एक खोखले वाक्य की गहराई में डूबकर सीधे पाताल लोक पहुँच चुके हों। कुछ नौजवान छात्र जो केवल समोसों और चाय के लालच में इस गोष्ठी की शोभा बढ़ाने आए थे वे इस कुकुरमुत्ता पुराण को सुनकर अपनी हँसी को रोकने के लिए अपने मुँह पर रूमाल दबाए बैठे थे। मुख्य अतिथि महोदय का आत्मविश्वास इस स्तर पर पहुँच चुका था कि वे अपनी हर एक मूर्खतापूर्ण पंक्ति के बाद जनता की तरफ इस तरह देखते थे मानो वे उनसे अपनी इस अभूर्व वैचारिक खोज के लिए किसी राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद कर रहे हों। उन्होंने अपने भाषण के दौरान अपने दोनों हाथों को हवा में इस तरह से लहराया जैसे वे निराला जी की कविताओं के सारे छंदों को हवा में ही पकड़कर सीधे जनता की झोली में डाल रहे हों। पूरी सभा में तालियों की गड़गड़ाहट इस बात का प्रमाण नहीं थी कि लोगों को उनका भाषण पसंद आया था बल्कि वह इस बात का सामूहिक उत्सव था कि आखिरकार यह महाभाषण समाप्त हुआ और अब मंच से मुक्ति मिलने का समय आ गया है।

 

साहित्यिक मंचों पर अपनी धाक जमाने का एक और अचूक नुस्खा यह भी होता है कि आप विषय के मूल तत्व को छुए बिना उसके चारों तरफ शब्दों की ऐसी जलेबी बनाना शुरू कर दें कि सुनने वाला खुद ही रास्ता भटक जाए। मुख्य अतिथि महोदय ने इस कला में भी महारत हासिल कर रखी थी क्योंकि उन्होंने निराला जी के दर्शन या उनकी प्रगतिशीलता पर एक शब्द भी बोले बिना केवल उनकी पाठ्यपुस्तकीय उपस्थिति को आधार बनाकर अपना पूरा महल खड़ा कर दिया था। जब वे बोल रहे थे तो उनकी आँखें कभी छत की कड़ियों को निहारतीं तो कभी अचानक सामने बैठे किसी सीधे-साधे श्रोता पर टिक जातीं जिससे वह बेचारा डर के मारे अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठ जाता कि कहीं मुख्य अतिथि जी अगला सवाल सीधे उसी से न पूछ लें। इस प्रकार का भाषण दरअसल उन लोगों के लिए एक वरदान की तरह होता है जो बिना किसी अध्ययन के समाज के हर क्षेत्र में अपनी चौधराहट कायम रखना चाहते हैं और अपनी अज्ञानता को एक आभूषण की तरह पहनकर घूमते हैं। मंच पर बैठे अन्य विशिष्ट अतिथि भी इस कला से भली-भाँति परिचित थे इसलिए वे भी मुख्य अतिथि की हर एक हास्यास्पद बात पर अपनी आँखें बंद करके इस तरह से मुस्कुरा रहे थे मानो वे किसी महान सूफी संत के प्रवचन का आनंद ले रहे हों।

 

इस अभूतपूर्व भाषण के समापन के बाद जब मुख्य अतिथि महोदय वापस अपनी सोफ़ानुमा कुर्सी पर आकर बैठे तो उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल किसी बड़े साम्राज्य को जीतने के बाद किसी राजा के चेहरे पर आ सकती है। उन्होंने तुरंत जेब से अपना चमचमाता हुआ मोबाइल निकाला और सामने खड़े फोटोग्राफर को इशारा किया कि वह उनके इस विजयी मुद्रा की कुछ तस्वीरें विभिन्न कोणों से खींच ले ताकि वे इसे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा कर सकें। उन्होंने मंच पर रखे पानी के पूरे गिलास को एक ही सांस में खाली कर दिया मानो कुकुरमुत्ते पर दिए गए इस ऐतिहासिक भाषण ने उनके भीतर के सारे ज्ञान के सोतों को पूरी तरह से सुखा दिया हो। नीचे बैठे श्रोता अभी भी इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने निराला जी के बारे में क्या सुना और क्या समझा मगर मुख्य अतिथि को इसकी कोई परवाह नहीं थी क्योंकि उनका काम मंच लूटना था जो वे बेहद शालीनता और धूर्तता के साथ बखूबी अंजाम दे चुके थे। पूरा वातावरण इस समय एक ऐसे अजीबोगरीब सन्नाटे और दबी हुई हँसी के बीच झूल रहा था जिसकी कल्पना शायद स्वयं निराला जी ने भी अपनी सबसे क्लिष्ट कविताओं को लिखते समय कभी नहीं की होगी।

 

कार्यक्रम के ठीक बाद वीआईपी लाउंज में मुख्य अतिथि महोदय के लिए विशेष जलपान की व्यवस्था की गई थी। वहाँ पहुँचते ही शहर के एक अति-उत्साही पत्रकार ने हाथ में माइक लेकर मुख्य अतिथि को घेरा और बड़े ही भोलेपन के साथ पूछा “सर आज का आपका व्याख्यान तो निराला साहित्य की नई दिशा तय करने वाला था लेकिन क्या आप हमारे दर्शकों को बताएँगे कि निराला जी का वह कौन सा कुकुरमुत्ता था जिससे वे सबसे ज्यादा प्रभावित थे और क्या आज के दौर में भी वह कुकुरमुत्ता प्रासंगिक है?” मुख्य अतिथि महोदय ने अपने कुर्ते को झटका, अपनी मूंछों पर ताव दिया और अत्यंत आत्मविश्वास के साथ पत्रकार के कंधे पर हाथ रखकर बोले “देखिए भाईसाहब, निराला जी मूल रूप से वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े डॉक्टर थे और उन्होंने जिस कुकुरमुत्ते की खोज की थी उसे आजकल के लोग अंग्रेजी में मशरूम कहते हैं, इसीलिए मैं रोज़ सुबह उठकर मशरूम का सूप पीता हूँ ताकि मेरे भीतर भी निराला जैसी काव्य ऊर्जा बनी रहे और रही बात प्रासंगिकता की तो आज बाज़ार में मशरूम दो सौ रुपये किलो बिक रहा है, इससे बड़ी प्रासंगिकता भला और क्या हो सकती है।” यह सुनते ही पास खड़ा वेटर समोसे की प्लेट समेटकर वहीं जमीन पर बैठ गया और पत्रकार महोदय अपना माइक छोड़कर लाउंज के कोने में जाकर दीवार पर सिर पीटने लगे जबकि मुख्य अतिथि महोदय बड़े चाव से काजू कतली चबाते हुए अगले किसी गोष्ठी में कबीरदास पर बोलने के लिए इंटरनेट पर उनके पिता का नाम खोजने में व्यस्त हो चुके थे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २८ – हास्य-व्यंग्य – “पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २८

☆ व्यंग्य ☆ “पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं रात्रि का भोजन करने के बाद पान खाने के मूड में टहलता हुआ झब्बूलाल की दुकान की ओर बढ़ रहा था। कुछ आगे बढ़ा तो झब्बू की दुकान का रेडियो साफ सुनाई देने लगा, “झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में। ” मैंने सोचा कि आखिर बरेली की धरती में ऐसा क्या है कि वहां महिलाओं के सिर्फ झूमके ही गिरते हैं बेंदा, हार, करधन, पायल आदि गिरने की जानकारी कभी नहीं आई ! मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्कार किया और मेरा पान तैयार करते हुए बोला – भाई साहब आपसे बहुत जरूरी काम है। मैंने कहा भाई जी अचानक क्या काम आ गया ? झब्बू बोला, आप मुझे और मेरे लगाए पान की क्वालिटी जानते ही हैं, मैंने कभी भी पान की गुणवत्ता और स्वाद से समझौता नहीं किया, सदा अपने ग्राहकों का हित सोचा, सबके साथ हमेशा मधुर व्यवहार किया। झब्बू जैसे ही सांस लेने रुका, मैंने बिना विलंब कहा, भाई मैं वर्षों से तुम्हें जानता हूं तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो? मेरी बात को अनसुना करते हुए झब्बू ने बात आगे बढ़ाई बोला – भाई साहब आप वरिष्ठ पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, अनेक संस्थाओं से जुड़े हैं, बड़े – बड़े नेताओं से आपकी जान – पहचान है। मैंने कहा बस भाई बस। आखिर तुम्हें मुझसे ऐसा कौन सा काम आ गया है जिससे तुम मेरी इतनी तारीफ कर रहे हो !

 झब्बू लाल का दिया पान मैं अपने मुंह के हवाले करने ही वाला था कि उसकी बात सुनकर मेरा मुंह खुला रह गया। झब्बू ने कहा, भाई साहब मेरी इच्छा है कि जब भी अपने प्रधानमंत्री मोदी जी का जबलपुर आगमन हो तो वे मेरी दुकान पर आकर पान खाएं। इसके लिए मुझे आपकी मदद चाहिए। मेरे खुले मुंह के सामने हाथ में पान देखकर झब्बू बोला भैया क्या हुआ, मुंह खोले हो पान को तो अंदर भेजो। मैंने झटके से पान को मुंह में एक ओर खोंसते हुआ कहा, भाई कैसी असंभव सी बात कह रहे हो ! झब्बू ने तर्क रखा – जब मोदी जी कोलकाता में दुकान से खरीद कर झालमुड़ी खा सकते हैं तो मेरा पान क्यों नहीं खा सकते। मैंने कहा, प्यारे भाई जब उन्होंने झालमुड़ी खाई तब वहां चुनाव थे। यहां क्या है जो मोदी जी आकर तुम्हारा पान खायेंगे ? इससे उनको क्या फायदा ? झब्बू हंस कर बोला – भाई साहब पूरी दुनिया जानती है कि मोदी जी अपने फायदे के लिए कभी कुछ नहीं करते वो सिर्फ देश का फायदा सोचते हैं। मैंने कहा चलो ठीक है – अब यह बताओ कि यदि मोदी जी तुम्हारी दुकान पर आकर पान खा लें तो देश को क्या फायदा होगा ? झब्बू बोला भैया पान के शौकीन बढ़ेंगे तो पान का व्यापार बढ़ेगा, पान विक्रेता सम्पन्न होंगे। पान से जुड़ी सामग्री का उत्पादन बढ़ेगा, इससे जुड़ा रोजगार बढ़ेगा। मैं इस पर कोई टिप्पणी करता इससे पहले ही झब्बू बोला, भाई साहब मेरी समझ से तो यदि मोदी जी ने इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट की जगह औषधीय गुणों से भरपूर मुख को शुद्ध और होंठों को लाल करने वाला अपने देश का पान खिलाया होता तो बात ही कुछ और होती। वो गाना है न “खई के पान बनारस वाला खुल जाए बंद अकाल का ताला”। मैं मेलोनी जी की अकल या बुद्धिमानी पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा लेकिन बुद्धि तो जितनी बढ़े उतना ही अच्छा। मैं झब्बू की बात पर हँसा उसने फौरन बात सम्हाली और बोला, भाई साहब मेलोनी को पान खिलाना व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अपने देश के लिए अधिक लाभ दायक होता। जरा सोचें कि यदि पूरी दुनिया पान खाने लगे तो पान और उससे संबंधित सामग्री का हमें कितना निर्यात और उत्पादन करना पड़ेगा। मैंने कहा झब्बू वह सब ठीक है लेकिन देखते नहीं कि हमारे देश के ऑफिसों – अस्पतालों सहित कितनी महत्वपूर्ण इमारतों के कोने, सीढ़ियां, सड़कें, बगीचे पान की पीक से गंदे और बदबूदार हो गए हैं। क्या तुम चाहते हो कि सारी दुनिया की हालत ऐसी हो जाए ? मेरी बात सुनकर झब्बू बेशर्मी से हंसते हुए बोला भैया जब पूरी दुनिया ही पान की पीक से भर जाएगी तब हमारे पीकों वाले देश पर कौन उंगली उठाएगा ? झब्बू से बच कर निकलने का एक ही उपाय था उसकी हां में हां मिलना। मैंने कहा प्यारे भाई मैं प्रयास करूंगा कि मोदी जी आपकी दुकान पर पान खाने आयें और अबकी बार इटली जाने के पहले पानों की कुछ पुड़ियां मेलोनी जी के लिए भी ले जाएं। मैं आगे बढ़ने लगा तो झब्बू ने रिश्वत रूपी एक मीठा पान मुझे भेंट करते हुए कहा कि ये मेरी भाभी जी को खिलाइए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९९ – व्यंग्य – पीठ पर सड़क ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – पीठ पर सड़क।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९९ – व्यंग्य  – पीठ पर सड़क ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

तेज दुपहरी में धूल उड़ाती पगडंडी पर चार जोड़ी पैर थरथरा रहे थे। बांस की उस चरचराती खटोली पर एक भारी चुप्पी पसरी थी। गोपी ने कंधे का अंगोछा बदलते हुए कहा, “अरे भाई सुकना, ज़रा संभल के। आगे पत्थरों की भरमार है। कहीं मैया का जी और न डोले।”

सुकना ने माथे का पसीना पोंछा, “हां रे भाई, छाता ज़रा ठीक से तान। सूरज आज आग उगल रहा है, मानो हमारी किस्मत को ही भून डालेगा।”

खटोली पर लेटी देह बेजान थी, आंखें मूंदे, जैसे इस दुनिया की सारी हलचल से नाता तोड़ चुकी हो। चिढ़ौती नामक गांव के इस रास्ते पर हर कंकड़ एक नुकीला सवाल था। सदियों से इस माटी ने छाती चीरकर कोयला और पत्थर बांटे, पर बदले में उसे मिली सिर्फ पैरों को लहूलुहान करती यह पगडंडी।

छोटा मंगरा आगे-आगे रास्ता दिखा रहा था। वह बड़बड़ाया, “शहर वाले कहते हैं, देश बहुत आगे निकल गया है। चमचमाती गाड़ियां हवा से बातें करती हैं।”

गोपी कड़वाहट से हंसा, “हां रे! हमारे पहाड़ों को खाकर जो आलीशान कोठियां बनी हैं, वहीं वो गाड़ियां खड़ी होती हैं। हमारे हिस्से तो बस यह डगमगाती लकड़ी आई है। सरकारी बाबू कल ही तो कह रहे थे कि कागज़ पर सड़क बन चुकी है, बस ज़मीन पर उतरना बाकी है। शायद हमारी पीठ ही उनकी सड़क है।”

तभी सुकना का पैर फिसला, खटोली डगमगाई। “राम-राम! ज़रा धीरे।” गोपी चिल्लाया। खटोली पर कोई हलचल नहीं हुई।

दूर, विकास के बड़े-बड़े होर्डिंग चमक रहे थे, जिन पर मुस्कुराते चेहरे ‘मुफ़्त इलाज और खुशहाली’ का ढिंढोरा पीट रहे थे। उन चमकीले विज्ञापनों के ठीक नीचे से यह चार कंधों का जनाज़ा गुज़र रहा था।

अस्पताल की ढलान आते ही गोपी ने राहत की सांस ली, “चलो, पहुंच गए। मैया! आंखें खोलो, अब डॉक्टर बाबू सुई लगा देंगे, सब दर्द मिट जाएगा।”

जैसे ही खटोली नीचे रखी गई, गोपी ने मैया का कंबल हटाया। अंदर कोई बीमार इंसान नहीं था। वहां तो गांव के स्कूल की वह टूटी हुई ‘दीवार घड़ी’ और कुछ ‘सरकारी कागज़ात’ बंधे थे, जिन पर महीनों पहले अस्पताल की मंजूरी की मुहर लगनी थी।

सुकना रो पड़ा, “मैया तो कल रात ही बिना दवा के दम तोड़ चुकी थी गोपी! हम तो इस मरे हुए सिस्टम की लाश को कंधे पर उठाकर साहब को दिखाने लाए हैं, ताकि वो अपनी चमचमाती सड़क पर इस कागज़ी भूत का इलाज कर सकें।”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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