श्री तीरथ सिंह खरबंदा
(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री तीरथ सिंह खरबंदाजी का हार्दिक स्वागत। आपने विधि विषय में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में सतत सक्रिय, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन-प्रकाशन तथा हलफनामा, इक्कीसवीं सदी के अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं हमारे समय के धनुर्धारी व्यंग्यकार, साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2023 में पहला व्यंग्य संग्रह “सुना है आप बहुत उल्लू हैं” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2024 में दूसरा व्यंग्य संग्रह “झूठ टोपियाँ बदलता रहा” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2022 में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा स्पंदन साहित्य सम्मान। संप्रति : इंदौर में विधि एवं साहित्य के क्षेत्र में सतत सक्रिय। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – परीक्षा वाले दिन।)
☆ व्यंग्य ☆ परीक्षा वाले दिन ☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆
जाने कहाँ गए वो दिन जब परीक्षा होते ही बच्चे अपने मामा के घर लंबी छुट्टियाँ बिताने पहुँच जाया करते थे । अब जीवन की परीक्षा के प्रश्नों को हल करने में मामा खुद इस कदर उलझे पड़े हैं कि भांजे की सुध लेने की उन्हें फुर्सत ही भला कहाँ है और भांजे को छुट्टियों में भी कोचिंग के सवालों से फुर्सत नहीं है ।
तपती गर्मी और ऊपर से परीक्षा पास आते ही गर्मी इस कदर दोहरी हो जाती है कि नवतपे की गर्मी भी उसके सामने कहीं ठहरती नहीं है । परीक्षा के दिन नजदीक आते ही पढ़ाकू किस्म के परीक्षार्थियों पर परीक्षा का ताप तेजी से चढ़ने लगता है । भावुक किस्म के छात्र परीक्षा के बाद कॉलेज बंद होने की कल्पना मात्र से ही विरह वेदना के ताप में तपने लगते हैं ।
अब परीक्षा के दिनों में शहर के चौराहों-नुक्कड़ों पर छात्र जमाव तो नहीं होता किन्तु व्हाट्सएप ग्रुप्स पर दबाव अवश्य बढ़ जाता है । निष्क्रिय किस्म के छात्र और ग्रुप अचानक सक्रिय हो उठते हैं । कक्षा के होशियार छात्रों की पूछ परख में यकायक शेयर मार्केट सा उछाल आ जाता है ।
परीक्षा के निमित्त किताबों और भावनाओं का आदान प्रदान शुरू हो जाता है । मदद की नहरें ऊपर तक लबालब बहने लगती हैं । संभावित प्रश्नों की तलाश और महत्वपूर्ण प्रश्नों की छंटाई-बँटाई शुरू हो जाती है । पास होने की हर जुगाड़ पर गहन चिंतन-मनन होने लगता है ।
छात्र नेताओं को अपना नेतृत्व कौशल दिखाने का सुनहरा अवसर हाथ लगता है । सेवा की उत्कंठ भावना उनमें उमड़ने-घुमड़ने लगती है और परीक्षा नजदीक आते-आते वह अत्यंत वेगवान हो जाती है । ऐसे संस्कारी खुद पास होने से कहीं ज्यादा दूसरों को पास करवाकर खुश होते हैं ।
पढ़कर परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होना सचमुच एक बड़ी उपलब्धि होती है । अक्सर ऐसे छात्र नौकरीयों में ऊंचे पदों पर जा पहुँचते हैं । बगैर पढ़े पास हो जाना उससे भी कहीं ज्यादा बड़ी उपलब्धि है । इन्हीं छात्रों में से कई आगे चलकर एक दिन हमारा नेतृत्व करते हैं और उनमें से कुछ तो मंत्री पद की शोभा बढ़ाते हैं ।
ज्ञानी जी कहते हैं कि कई बार एक ही प्रश्न पूरी ज़िंदगी संवार देता है, इसीलिए जीवन में कभी किसी भी परीक्षा या प्रश्नपत्र के किसी भी प्रश्न को हल्के में नहीं लेना चाहिए । हरेक परीक्षा में उत्तर लिखने से पहले प्रश्न को समझना ज्यादा जरूरी होता है अन्यथा पूरक उत्तर पुस्तिकाएँ भरने वालों को भी कई बार पूरक आ जाती है ।
परीक्षा पास करने हेतु, सही उत्तर लिखने या जानने से कहीं ज्यादा जरूरी है पूछे गए प्रश्नों को ठीक से समझना तथा यह जानना कि प्रश्नपत्र का कौन सा प्रश्न हल करना अनिवार्य है तथा प्रश्नपत्र कितने समय में हल करना है अन्यथा जीवन की परीक्षा में कई महत्वपूर्ण प्रश्न छूट जाया करते हैं ।
कभी-कभी हम किसी एक ही प्रश्न में ऐसे उलझ कर रह जाते हैं कि निर्धारित समय सीमा समाप्त हो जाती है और हाथ आया समय हाथ से निकल जाता है । प्रश्न पत्र के शेष प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं । परीक्षा पास करना भी एक कला है जो कठिन अभ्यास से आती है । आजकल की परीक्षाओं ने बहुतेरों को कलाकार बना दिया है ।
सच तो यह है कि पूरी ज़िंदगी ही एक परीक्षा है, जिसमें अनेकों विषय हैं । पास फ़ेल होना हरेक की नियति है । हर दिन यहाँ एक नया प्रश्नपत्र होता है और हर सुबह कई नए प्रश्न हमारे सामने आ खड़े होते हैं । सारी ज़िंदगी प्रश्नपत्र हल करते-करते ही गुजर जाती है, कभी लिखकर तो कभी बोलकर, कभी रटकर तो कभी पढ़कर फिर भी कई प्रश्न पीछे शेष रह जाते हैं ।
अक्सर पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी प्रश्न के नाम से ही घबराने लगते हैं और प्रश्नपत्र सामने आते ही उनको पसीना छूटने लगता है । ज्यादा होनहार विद्यार्थी इस बात की चिंता नहीं करते कि क्या पूछा गया है उन्हें तो जो आता है बस वे वही लिख आते हैं और कमाल की बात है कि भाग्य के भरोसे वे पास भी हो जाते हैं ।
कुछ लोगों के लिए परीक्षा पास करना बाएँ हाथ का खेल है । वे इस रहस्य को समय रहते समझ लेते हैं कि इस युग में ज्ञान अर्जित करने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण परीक्षा पास करना है जो अंतिम एवं परम लक्ष्य है । ऐसे धनुर्धारी नीपूर्णता के साथ लक्ष्य भेदने में अक्सर सफल रहते हैं, किन्तु एकलव्य के अंगूठे पर संकट जस का तस बरकरार रहता है । इस दौर में परीक्षा कोई भी हो कमजोर दिल वाले साधनों की सुचिता की चिंता करते हैं जब कि हिम्मत वाले मुन्ना भाई नायक बनकर उभरते हैं और देखते ही देखते बहुतों के प्रेरणा स्त्रोत बन जाते हैं ।
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© श्री तीरथ सिंह खरबंदा
ई-मेल : tirath.kharbanda@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







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🎉🙏आत्मीय आभार सर
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सहज सरल और सटीक व्यंग्य रचना