श्री धर्मपाल महेंद्र जैन
संक्षिप्त परिचय
(सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री धर्मपाल जी का जन्म रानापुर, झाबुआ में हुआ। वे अब कैनेडियन नागरिक हैं। प्रकाशन : “गणतंत्र के तोते”, “चयनित व्यंग्य रचनाएँ”, “डॉलर का नोट”, “भीड़ और भेड़िए”, “इमोजी की मौज में” “दिमाग वालो सावधान” एवं “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (7 व्यंग्य संकलन) एवं Friday Evening, “अधलिखे पन्ने”, “कुछ सम कुछ विषम”, “इस समय तक” (4 कविता संकलन) प्रकाशित। तीस से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता। स्तंभ लेखन : चाणक्य वार्ता (पाक्षिक), सेतु (मासिक), विश्वगाथा व विश्वा में स्तंभ लेखन। नवनीत, वागर्थ, दोआबा, पाखी, पक्षधर, पहल, व्यंग्य यात्रा, लहक, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती आदि में रचनाएँ प्रकाशित। श्री धर्मपाल जी के ही शब्दों में “अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य फाइल इतनी दीजिए…।)
☆ व्यंग्य – फाइल इतनी दीजिए… ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆
आजकल दफ़्तरों में फाइल गुम हो जाना सामान्य बात हो गई है। ऐसा लगने लगा कि फाइलों के बाबुओं की तरह पर निकल आए हैं और वे भी इनकी तरह दफ़्तर से सफलतापूर्वक ग़ायब होने में कामयाब हो जाती हैं। इस सिलसिले में मुझे पिछले दशक की एक घटना याद आती है। यह घटना एक भारतीय विश्वविद्यालय की है जिसमें दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह हर छोटे-बड़े विषय के अलग-अलग ठेकेदार थे, दुकानें थीं, जिन्हें विभाग के नाम से जाना जाता था। शास्त्र सम्मत सामाजिक घटनाओं को घटाने का ठेका आज भी समाजशास्त्र विभाग का है। अतः इस महान घटना को समाज शास्त्र विभाग में ही घटित होना चाहिए था। सो यह घटना वहीं घटित हुई।
उन दिनों कैम्पस में एक साँड रहता था। साँड बुद्धिजीवी, मदमस्त, अल्हड़ और नौजवान कैम्पसियों जैसा था पर वह फाइलभक्षी था। एक दिन क्षुधा शांत करने के लिए वह समाजशास्त्र विभाग में जा घुसा और कुछ महत्वपूर्ण फाइलें खा कर चला गया। क्षुधा निरन्तर है, उसे फिर भूख लगी। वह पुनः आया तथा कुछ और फाइलें खा गया। यह क्रम चलता रहा। लोग तटस्थ होकर देखते रहे और साँड फाइलें खाता रहा। एक दिन सारी महत्वपूर्ण फाइलें ख़त्म हो गईं सिर्फ़ कचरा फाइलें बचीं तब साँड ने आना बंद कर दिया। महत्वपूर्ण फाइलों के गुम हो जाने की बात जब प्रशासन को मालूम हुई तो हल्ला मच गया। विभागीय जाँच हुई। इसका परिणाम वैसा ही गुड़-गोबर था जैसा तमाम विभागीय जाँचों का होता है। मुझे लगता है साँड फाइल कक्ष में घुसा होगा। उसके प्रवेश के साथ ही कक्ष में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए होंगे, साँड ने सिंह गर्जना की होगी। तब अलमारियाँ स्वतः खुली होंगी और महत्वपूर्ण फाइलों ने बाहर निकल प्रार्थनारत हो कहा होगा, “हे साँड देवता, हम महत्वपूर्ण फाइलें हैं हमारा भक्षण करो। हमारे भक्षण से इस विभाग का भला होगा।” विघ्न विनाशक साँड देवता ने उन सभी फाइलों को उदरस्थ कर लिया होगा। क्षुधा शांत हो गई होगी और वह चला गया होगा। चूँकि क्षुधा चिर है वह फिर भड़की होगी और ऐसा ही होते रहने में सब महत्वपूर्ण फाइलें ख़त्म हो गई होंगी। जाँच अधिकारी की थीसिस भी इससे ज़्यादा भिन्न नहीं थी। इसलिए विभाग पर आया संकट टल गया। तब से मैं फाइलों को रफा-दफा करने में भगवान का हाथ मानता हूँ।
फाइलें सर्वव्यापी सत्य हैं। वह अमेरिका में भी है और बरेली में भी। फाइल त्रिलोकी है, ज़मीन, अंतरिक्ष और सागर पर भी। फाइलें त्रिकालदर्शी तो हैं ही। भूतकाल की फाइलें इतिहास लिखने वालों के संदर्भ ग्रंथ हैं तो भविष्यकाल की फाइलें अफरा-तफरी करने की वृहत योजनाएँ हैं। वर्तमानकाल की फाइलें आयोगों का रोज़गार हैं। फाइलों की इस गति पर देश की प्रगति टिकी है। मैंने पाया है कि तानाशाही हो या प्रजातंत्र, दुर्गम पर्वत हो या सात समन्दर, फाइलें बेखटके प्रधानमंत्रीजी की तरह इधर से उधर दौड़ती हैं। फाइल रुकी, काम अटका। साम्यवाद, पूँजीवाद, समाजवाद व चमचावाद सभी व्यवस्थाएँ फाइलवाद के सामने नतमस्तक हैं। फाइल भले ही पुट्ठे का गत्ता है पर वह बाबू का भत्ता है, अफ़सर की सत्ता है और राज्य सरकार के तख्ते का हत्था है। फाइल का लालफ़ीता प्रशासन की जान है, इसीलिए लालफ़ीताशाही सरकार का नाम है।
फाइलें ख़ुद तो भोली-भाली होती हैं, पर बाबुओं की क़िस्मत हो तो फाइलें मंत्रियों के साथ हवाईजहाजों में घूमती हैं तथा भाग्यहीन हो तो गट्ठरों में बंधी पड़ी रहती हैं और धूल चाटती रहती है फिर भी सभी फाइलों में कुछ सर्वमान्य गुण हैं। इनसे लोग कतराते हैं, बाबू टरकाते हैं और अफ़सर धमकाते हैं। फाइलों का महायज्ञ करके कई सत्ताधारी महाविनाश से बचे हैं। सरकार बदलने पर कई पूर्व राजनेताओं ने सत्ता हस्तांतरण के समय फाइलों का हवन सामग्री की तरह उपयोग किया है।
प्रजातंत्र को अजर-अमर बनाए रखने के लिए फाइलों ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया है। पिछले वर्षों की एक घटना है। पवित्र भारत भूमि के एक राज्य में एक मुख्यमंत्री थे। वे बड़े घपला प्रिय थे। उन्होंने अपने घपलों को सार्वजनिक प्रशस्ति से बचाने के लिए ख़ुद ही एक जाँच आयोग बना डाला और अपनी महत्वपूर्ण फाइलें उसे दे दीं। फाइलें सरकार की दुखती नस होती हैं। कोई दबा दे तो सरकार कराह उठती है। फाइलें सौंप कर राज्य सरकार ने अपनी नस ख़ुद दबाना चाही। केन्द्र सरकार से ‘आ बैल मुझे मार’ वाला यह दर्द नहीं देखा गया, उसने दूसरा आयोग बना दिया, ताकि राज्य का दर्द कम हो सके। विचित्र स्थिति बन गई। फाइलें एक-एक थीं और आयोग दो। दूसरे आयोग ने फाइल माँगी। राज्य आयोग ने केन्द्र आयोग से कहा ‘जा, जा बड़ा आया फाइलें लेने।’ केन्द्र आयोग रुआँसा हो गया। उसने समझाया, छोटे भाई फाइल के बिना हमारा जन्म निरर्थक है। चलो फाइलों की फोटो कॉपी ही दे दो। उत्तर मिला ‘फोटोकॉपी बनने में पाँच साल लगेंगे।’ पाँच साल में खरबों रुपयों की पंचवर्षीय योजनाएँ बराबर हो जाती हैं तो फिर इन फाइलों की औकात ही क्या? फाइलों के झगड़े में राज्य सरकार दर्द मुक्त हो गई। न बाँस बचा न बाँसुरी बजी।
भारत जैसे विकासशील देश में फाइलों का स्थान महत्त्वपूर्ण मानना ही पड़ेगा। रोज़गार बढ़ाने वाली फाइलों को साहित्य में श्रीवृद्धि करने का तमगा प्राप्त है। भई, फाइल खिसकानी पड़ेगी, फाइल देखनी पड़ेगी, फाइल ढूँढनी पड़ेगी, फाइल बदलवानी पड़ेगी, फाइल पड़ी है, फाइल चल रही है आदि मुहावरे आम आदमी के पल्ले पड़े हैं। आप इन फाइली मुहावरों का अर्थ समझ जाएँ तो ठीक है, नहीं तो बाबू शुद्ध हिन्दी में आपको इनका अर्थ और अनर्थ समझा देगा।
बेचारा ऑफ़िसजीवी आदमी ‘फाइल से, फाइल द्वारा, फाइल के लिए’ हो गया है। मैं हर महीने की दूसरी तारीख़ से सोचता हूँ कि यदि फाइल का उद्भव न हुआ होता तो बाबुओं का दम निकल गया होता। इस महँगाई के ज़माने में क्या ओढ़ता, क्या बिछाता? तृतीय श्रेणी के ग्रेड में क्या ख़ुद खाता और परिवार को क्या खिलाता? उसने फाइल को अपना सर्वस्व माना तो बुरा नहीं किया। तारणहार हो गई हैं फाइलें। इसलिए प्रातः स्मरणीय प्रभु से तमाम बाबुओं की ओर से मेरी प्रार्थना है –
फाइल इतनी दीजिए जामे कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, बॉस न भूखा जाय।।
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© श्री धर्मपाल महेंद्र जैन
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