श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “बहाने गढ़ने का ऑस्कर गोज़ टू दी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी…” ।)
☆ शेष कुशल # ६९ ☆
☆ व्यंग्य – “बहाने गढ़ने का ऑस्कर गोज़ टू दी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी…” – शांतिलाल जैन ☆
‘जब धन खोता है, तो कुछ नहीं खोता; जब स्वास्थ्य खोता है, तो कुछ खोता है; जब चरित्र…’
इन दिनों चरित्र का तो!!! जाने भी दो यारों……आज हम अपनी बात स्वास्थ्य तक ही सीमित रखते हैं. बीमार होते हैं आप, भर्ती होते हैं आप, तब तक इंश्योरेंस प्रीमियम का धन तो खो ही चुके होते हैं, अस्पताल के बिल में भी…. डबल लॉस. सैंक्शन का मेल! अब आएगा. अब आएगा. आँखें पथरा जाती हैं मेल नहीं आता. बार बार चेक करते हैं. क्वेरी आती है सेंक्शन नहीं आता. फेसलेस प्रोसेस है श्रीमान्. एजेंट फेस दिखा नहीं रहा, कंपनी का फेस दिख नहीं रहा, शर्म दिखे तो किसकी आँखों में दिखे!! दादू का ही केस लीजिए.
“कैशलेस हो जाएगा ?” – मैंने काउंटर पर पूछा.
“भर्ती के समय तो नहीं हो पाएगा लेकिन हम सुनिश्चित करेंगे कि डिस्चार्ज होते होते मरीज कैशलेस हो जाए.”
सत्तर की उम्र में हैं दादू. पंद्रह सालों में दस बारह लाख प्रीमियम तो भर ही चुके हैं. बीमार पड़े, भर्ती हुए तो पता लगा कि जो बीमारी उनको हुई है उसे छोड़कर दुनिया की सारी बीमारियाँ कवर्ड हैं. अमेज़न के जंगलों में नेटिव्स को होनेवाली बीमारियाँ भी कवर्ड हैं, नहीं हैं तो बस वही बीमारी कवर्ड नहीं है जो दादू को हुई है. बीमारियों के कवरेज का खेल वीडियो गेम के नामुमकिन लेवल्स को पार करने जैसा है. बीमारी कवर में निकल भी आए तो ‘वेटिंग पीरियड’ में निकल आती है. कवर हासिल करने के चक्कर में मरीज़ अनकवर होने लगता है.
दादू एक सभ्य नागरिक है. भारतवर्ष में जीवित रहने के तमाम टैक्स में से एक टैक्स बीमा कंपनियों को भी चुकाता है. सरकार हो या बीमा कंपनी, आप अपने भरे गए टैक्स का हिसाब मांग नहीं पाते. बरस-दर-बरस प्रीमियम डबल होती जाती है, दादू तब भी भरता हैं. बीमा कम्पनियाँ क्लेम रिजेक्ट करके अपना धरम निभाती हैं दादू प्रीमियम भरकर अपना धरम निभाता है. दादू झक्की भी है. ज़िद पाल बैठा है, कम से कम एक बार तो क्लेम ले कर रहेगा. फ़ानी दुनियाँ से फ़ना होने से पहले ‘पैसा वसूल’ की ज़िद में दादू ने निमोनिया जैसी बीमारी लगा ली. ‘प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज’ पर क्लेम रिजेक्ट हो गया. बहुत पहले उसे एक बार ज़ोर की छींक आई थी. बीमा कराते समय उसने बताया नहीं. ‘नॉन-डिस्क्लोजर ऑफ मटेरियल फैक्ट्स’. दादू फिर हार गया.
बहाने गढ़ने के ऑस्कर अवार्ड नहीं मिला करते श्रीमान् वरना क्लेम रिजेक्ट करने में भारत की बीमा कम्पनियों को किसी का बाप भी हरा नहीं सकता. दादू का एक क्लेम तो बस इसीलिए रिजेक्ट हो गया कि उसकी बीमारी उसकी उम्र से जुड़ी थी. जेरियाट्रिक डिसीज. उम्र सापेक्ष. इस उमर में आपको ये बीमारी तो होना ही थी – इसका क्लेम कैसा!!! इन दिनों अस्पताल एआई तकनीक से इलाज़ करते हैं, कंपनी सुपर एआई से रिजेक्शन का बहाना खोज लाती है. दादू डाल-डाल, बीमा कंपनी पात-पात. क्लेम का ऊँट किसी भी करवट बैठे, बैठता इंश्योरेंस कम्पनी के बाड़े में ही है. अस्पताल से डिस्चार्ज के समय आपको सब मिलता है – खीज़, चिढ़, फ्रस्टेशन, गुस्सा, खुद के कपड़े फाड़ लेने का मानस; नहीं मिलता तो बस बीमे का क्लेम नहीं मिलता.
बहरहाल, फिल्म इतनी निराशावादी भी नहीं है. क्लेम कभी-कभी मिलते भी हैं. मुझे मिला है एक बार. एक माइनर ऑपरेशन कराना पड़ा था. बिल बना एक लाख चौबीस हज़ार पाँच सौ तेइस रुपए का. सत्तर हज़ार डिडक्टिबल के कट गए, पचास हज़ार ‘को-पे’ के. चार हज़ार दौ सौ ‘नॉन-मेडिकल आईटम्स’ के. तीन सौ रुपए क्लेम के मिले. बीमा लोकपाल में मैंने कम्प्लेंट करके पूछा – ये तेइस रुपए और किस बात के कट गए? रिप्लाई आया – ‘बीमा कंपनी ने तेईस रुपए लोअर हंड्रेड्स में राउंड-ऑफ करने में काटे हैं. सब नियमानुसार हुआ है.’
खुश हुए अपन. रिप्लाई तो मिला. खाते से निकालकर सौ सौ के तीन नोट धरोहर की तरह संभालकर रखे हैं. जो कभी अपन की बीमार होकर आईसीयू में मरने की नौबत आई तो उत्तराधिकार में देने के लिए धन इतना ही बचेगा. बचाकर तो अपन ने चरित्र भी रखा है, पर उसका तो इस बार!!! जाने भी दो यारों……
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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