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श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆पकौड़ा डॉट कॉम ☆

(प्रस्तुत है श्री विवेक  रंजन  श्रीवास्तव जी  का  सटीक एवं सार्थक व्यंग्य। श्री विवेक जी ने जीभ से लेकर पेट तक और राजनीतिक पकौड़ों से लेकर ऑन लाइन तक कुछ भी नहीं छोड़ा। विवेक जी को ही नहीं मुझे भी भरोसा है कि कोई न कोई तो पकौड़ा डॉट कॉम पर काम कर ही रहा होगा जिसकी फ्रेंचाईजी विदेशों से लेकर हमारे घर के आस पास खुलेगी।) 

पकौड़े विशुद्ध देसी  फास्ट फूड है. राजनीति ने पकौड़ो को  रोजगार से जोड़कर चर्चा में ला दिया है. मुझे भरोसा है जल्दी ही कोई स्टार्ट अप पकौड़ा डाट काम नाम से शुरू हो जायेगा. जो घर बैठे आनलाइन आर्डर पर पकौड़े उपलब्ध कराने की विशेषता लिये हुये होगा. वैसे दुनियां भर में खाने खिलाने का कारोबार सबसे सफल है. बच्चे का जन्म हो, तो दावत्, लोग इकट्ठे होते हैं, छक कर जीमतें हैं। बच्चे की वर्षगांठ हो, तो लोग इकट्ठे होते हैं- आशीष देते हैं-  खाते हैं, खुशी मनाते हैं. बच्चा परीक्षा में पास हो, तो मिठाई, खाई-खिलाई जाती है.  नौकरी लगे तो पार्टी-जश्न और डिनर. शादी हो तो भोजन, अब तो रिटायरमेंट पर भी सेलीब्रेशन की फिजा है और तो और मृत्यु तक पर भोज होता है। आजीवन सभी भोजन के भजन में लगे रहते हैं.

कहावत भी है- ’पीठ पर मार लो पर पेट पर मत मारो’. कुछ लोग जीने के लिये खाते हैं, पर ऐसा लगता है कि ज्यादा लोग खाने के लिये ही जीते हैं. सबके पेट के अपने अपने आकार हैं. नेता जी बड़े घोटाले गुटक जाते हैं, और डकार भी नहीं लेते. वे कई-कई पीढ़ियों के पेट का इंतजाम कर डालना चाहते हैं. महिलाओं के पेट में कुछ पचता नहीं है इधर कुछ पता चला, और उधर, उन्होंने नमक मिर्च लगाकर, संचार क्रांति का लाभ उठाते हुए, उस खबर को मोबाईल तरंगों पर, संचारित किया. सबके अपने-अपने स्वाद, अपनी-अपनी पसंद होती है. मथुरा के पंडित जी मीठे पेड़े खाने के लिए प्रसिद्ध है.  बगुला जिस एकाग्रता से मछली पकड़ने के लिये तन्मय होकर ध्यानस्थ रहता है, वह उसकी पेट पूजा, उसी पसंद की अभिव्यंजना ही तो है. भोजन के आधार पर शाकाहारी, मांसाहारी का वर्गीकरण किया गया है. सारे विश्व में अब विभिन्न देशों के व्यंजन सुलभ हो चले हैं.  टी वी पर रेसिपी शोज की टीआरपी बूम को देखते हुये फूड चैनल तक लांच हो चुके हैं.  लंदन में दिल्ली के छोले भटूरे और पराठे मिल जाते हैं. तो  घर-घर चाईनीज व्यंजन लोकप्रिय हो रहे हैं. रेसिपी की पुस्तकें छप रही है, और वैचारिक पुस्तकों से ज्यादा प्रसार के साथ, खरीदी-पढ़ी अजमाई जा रही हैं.

भोजन परोसने की शैली, भोजन की गुणवता के आधार पर दावत की सफलता के चर्चे बाद तक याद किये जाते हैं. नववधू को, पहली रसोई बनाने पर, उसे नेग- उपहार दिये जाने की संस्कृति है, हमारी. मॉ, बहन, पत्नी रोटी के साथ जो प्यार-जो स्नेह, जो मनुहार, परोसती हैं, वह किसी कीमत पर अच्छे होटल में दुर्लभ होता है. कहावत है ’पुरूष के दिल में उतरने का रास्ता उसकी जीभ से होकर जाता है’. जिस पर सदियों से नव विवाहितायें प्रयोग करती आ रही हैं, तरह-तरह के पकवान बना कर पति को अपना बना लेती है, और घर वालो को बेगाना.

एक बार बादशाह अकबर भोजन कर के उठे तो बीरबल ने उन्हें भूखा कह दिया, अकबर ने बीरबल से अपनी बात सिद्ध करने का कहा, अन्यथा मृत्युदण्ड के लिये तैयार रहने को. बीरबल ने 56 प्रकार की प्रसिद्ध मिठाईया बुलवाई, ना, ना करते हुय भी अकबर, मिठाई चखते हुये, एक-एक प्रकार की मिठाई, एक एक तोला खाते चले गये, और भरपेट भोजन के बाद भी एक सेर मिठाई खिलाकर बीरबल ने अकबर को भूखा सिद्ध कर दिया। पेट की भूख से जो निजात पा लेते हैं, उन्हें प्रसिद्धि, मान सम्मान की भूख, संग्रह की भूख, धन वैभव की भूख व्यस्त रखती है।  जब सब कुछ एकत्रित हो जाता है, तो इस सब को पाने की दौड़ में बेतहाशा दौड़ा शरीर इतना टूट जाता है कि मधुमेह के चलते मीठा नहीं खा सकते, ब्लड प्रेशर के चलते तला नहीं खा सकते.

कही पांच रुपये में थाली तो कही एक रुपये किलो खाद्यान्न की योजनाये सरकारे चलाती दिखती है, नेता जी की जेबें भर जाती हैं पर जनता का पेट नही भर पाता. अकाल पड़ा,  एक गरीब मृत पाया गया. नेता पक्ष प्रतिपक्ष में द्वंद छिड़ गया.  भूख से मौत पर, सरकार के विरूद्ध बयान बाजी हुई.  पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई- मौत का कारण भूख नहीं कुपोषण की बीमारी पाई गई.  गरीबी की इस बीमारी का निदान क्या है? भूख इस बीमारी का लक्षण है.  गोदामों में भरा अनाज इसे नहीं मिटा सकता.  ऐसी सामाजिक संरचना, जिसमे सबको काम के अवसर, शिक्षा के अवसर, विकास के अवसर मिलें, ही इसका निदान है. इस नाम पर चुनाव लड़े और जीते जाते हैं ,कभी चाय पाइंट पर तो कभी  पकोड़े डाट काम पर ढ़ोल मंजीरे की थाप के साथ भोजन भजन जारी रहता है.

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए-1, एमपीईबी कालोनी, शिलाकुंज, रामपुर, जबलपुर, मो ७०००३७५७९८

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