श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 83 ☆ अंगद का पाँव ☆

प्रातः भ्रमण के बाद कुछ समय के लिये उद्यान में बैठा। दृष्टि उठाकर देखा तो स्वयं को डेकोरेटिव प्रजाति के दो-चार पेड़ों से घिरा पाया। चिकनी-चुपड़ी छाल, आसमान छूने की जल्दबाज लोलुपता, किसी के काम न आनेवाली ऊँची टहनियाँ, धरती के भीतर जाकर अधिकाधिक जल अवशोषित करने को आतुर जड़ें, अपनी ही सूखी डाल को खटाक से नीचे फेंक देनेवाला पेड़। देखा कि इस पेड़ से निर्वासित सूखी डालियाँ भी दूसरे पेड़ों की डालियों पर आसन जमाये बैठी हैं।

विचार उठा कि साहित्य हो या राजनीति, ब्यूरोक्रेसी या कोई अन्य सार्वजनिक क्षेत्र, मनुष्य के भीतर भी एक डेकोरेटिव प्रजाति है जो निरंतर फलती-फूलती जा रहा है। साम, दाम, दंड या भेद से येन केन प्रकारेण सारा कुछ अवशोषित करने की स्वार्थलोलुप प्रवृत्ति वाली प्रजाति। दुर्भाग्य यह कि आजकल इसी प्रजाति एवं प्रवृत्ति का रोपण तथा विकास किया जाता है। मन खिन्न हो गया।

खिन्न विचारों की सुस्त धारा में एकाएक उमंग की कुछ लहरें उठने लगीं। एक बुजुर्ग महिला आती दिखीं। कुछ दूर खड़े पीपल की जड़ों में उन्होंने एक लोटा जल अर्पित किया। फिर दीया चासा। प्रज्ज्वलित दीपक से उठती लौ ने मानो नयी दृष्टि दी। दृष्टि आगे बढ़ी तो मन्नत के धागों से लिपटा किसी ऋषि-सा वटवृक्ष खड़ा था।…और विस्तार किया तो पाया कि उद्यान की सीमा पर विशालकाय नीम पहरा दे रहे हैं। सघन पेड़ों में अपने घरौंदे बनाये बैठे पंछियों के स्वर अब कानों में अमृत घोल रहे हैं।

सीमित आयु वाले निरुपयोगी डेकोरेटिव या सैकड़ों वर्ष की आयु वाले पीपल, बरगद, नीम! मनुष्य के पास विकल्प है- अस्थायी दिखावटी चमक से इतराने या चराचर के लिए घनी छाया देकर प्रकृति की स्मृति में अंगद के पाँव-सा डटने का।…सदा की तरह अंतिम बात, अपने विकल्प का चयन स्वयं करो।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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अलका अग्रवाल
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सच कहा, डेकोरेटिव वृक्ष बनना है या अंगद के पांव जमाये वट या नीम के वृक्ष।

Rita Singh
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कितनी बड़ी सच्चाई है कि अपने विकल्प का चयन स्वयं करना है।