श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक अतिसुन्दर  आलेख   “आज  की नारी ”। 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 24 ☆

☆ लेख – आज  की नारी ☆

कविवर जयशंकर प्रसाद की रचना है –

” नारी तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास रजत नग पग तल में,

पीयूष स्रोत सी बहा करो

जीवन के सुंदर समतल में।”

यूं तो सबके जीवन में कोई ना कोई कहानी अवश्य ही होती है। किसी की लंबी, किसी की छोटी  कोई रोचक, भाव प्रद, तो कोई हृदयस्पर्शी। कोई बहुत ही आक्रमक, तो कोई आकर्षण से परिपूर्ण। कोई ममता से सरोकार तो कोई हृदय विहीन। परंतु यह सब भावनाएं, कहानियाँ जिसके आसपास होती हैं वो है नारी।

परमात्मा ने हमको इस मानवीय काया के रूप में जो अनुपम उपहार दिया है। उसकी तुलना किसी भी अन्य अनुदान से कर पाना संभव नहीं है। वो जीवन जिसे प्राप्त करने के लिए देवी-देवता भी लालायित रहते हैं वह है मनुष्य जीवन। मनुष्य जीवन के रूप में मिले अवसर को यदि सौभाग्य का नाम दिया जाए तो उसे ही नारी कहा जाता है।

*यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता*

अर्थात जहां नारी (सृष्टि) की पूजा होती है। वहां देवता अपने आप निवास करते हैं। और नारी की गरिमा को आज सहज ही स्वीकारा जाता है। धरती माता से लेकर भारत माता, मां गंगा से लेकर मां गायत्री देवी तक नारी शक्ति का ही चित्रण और पूजन होता है। यदि कोई जीवन चाहता है और इस पृथ्वी पर उसे आना है तो बिना मां (नारी) के कृपा पात्र के बिना यह संभव नहीं हो सकता है।

नारी भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ है। अपने प्राणों कि न्योछावर कर उन्होंने संपूर्ण सृष्टि में अपना स्थान देवी के रूप में स्थापित कर लिया है। तभी शास्त्रों में पूजनीय है। इतिहास साक्षी है जब-जब घोर संकट का सामना करना पड़ा है, नारी शक्ति ही सामने आकर उनका संहार करती है।जब-जब उनकी परीक्षा लेनी चाही तब-तब उन्होंने पुरुष बल को ही अपना हथियार बना लिया। याद करिए माता अनुसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने स्वयं ब्रह्मा  विष्णु और शिव जी आए। मां अनुसूया ने अपने पतिव्रत धर्म और अपने पति की ताकत का वास्ता देकर तीनों भगवान को बाल रूप में कर लिया था। और अपने धर्म का पालन किया था। नारी शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड को हिला सकती है। आज भारतीय समाज को ऐसे ही संकल्प की धनी नारी की आवश्यकता है। जिसके संकल्प बल से त्रिमूर्ति को झुकना पड़े।

नारी सृष्टि निर्माता की आदित्य रचना है। नारी के अभाव में सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह एक ऐसा छायादार वृक्ष है जिसकी छाया के अभाव में मनुष्य अपनी आशा- आकांक्षाओं के विषय में उदासीन ही रहेगा। प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि उनके यहां संतान उत्पन्न हो। संतान के अभाव में परिवार अपूर्ण रहता है। जिस घर के आंगन में बच्चों की किलकारियां नहीं गूंजती, वह घर बिना सुगंधी के पुष्प के समान दिखाई देता है। यह संतान रूपी धन दो रूपों में प्राप्त होता है:-पुत्र  अथवा पुत्री। पहले हमेशा से देखा जाता रहा कि माता-पिता पुत्र की कामना करते थे। पर अब समय बदल गया है बेटा हो या बेटी माता पिता अपने बच्चे के लिए सुंदर स्वस्थ और स्वावलंबी जीवन की कामना करते हैं। पुराने समय से कुछ तो अंतर आ गया है। अब समाज में यह कहा जाने लगा कि “मेरी बेटी मेरा अभिमान” मेरा गर्व और क्यों ना हो वर्तमान स्वरूप में आज हम देख रहे हैं कि राजनीति के क्षेत्र में, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में, समाज सेवा के क्षेत्र में, हवाई सेवा से लेकर रेल सेवा और अन्य उद्योग धंधों के विकास में भी नारी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। किसी ने सच ही कहा है :-

 “एक कदम जो मेरा बढाओगे

दस कदम स्वयं आगे बढ़ा लूंगी मैं,

प्रोत्साहन व सहयोग जो दोगे

अंतरिक्ष कर दिखा दूंगी मैं”

अक्सर हमें ज्ञान मिलता है कि दो रूपों को जाना जाता है। (1)आकृति (2)प्रकृति। आकृति को समझना बड़ा ही आसान है कि बाहरी वातावरण, एक रूप, रंग, बनावट जिस की संरचना हो, इसी को आकृति कहते हैं। और जब प्रकृति कहा जाता है तब इसकी आंतरिक रचना जिसमें सारा सृष्टि समाया हुआ है और इसी सृष्टि का नाम ही *नारी* है, जिसके लिए स्वयं ब्रह्मदेव ने भी कहे हैं:-

 “देख जिसकी शक्ति को।

भयभीत होता दुष्ट दल हो।।

नारी तुम ही कल।

आज और कल हो।।

संगठन की शक्ति।

विचारों का मंथन हो।।

नारी तुम ही इस सृष्टि में।

नव पल्लव हो।।”

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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