श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना विस्तार है गगन में। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 217 ☆ रंग रंगीला रमते रमते

प्रकृति में जितना डूबते जायेंगे उतना की कर्म का महत्व स्पष्ट होता जायेगा। सभी को एक समान अवसर मिलता है अपनी जिंदगी में रंग भरने का, रंगों का चुनाव आप पर निर्भर है कोई काला रंग भर कर उदासी की चादर ओढ़ सबके कार्यों में कमीं निकालता है तो कोई सफेद से शीतलता व सौम्यता का संदेश देता है तो वहीं कोई हरे से हरियाली और खुशहाली की जीवन गाथा को गा उठता है।

इसी तरह नीले, पीले, केसरिया, लाल, गुलाबी, सतरंगी, धानी सभी उत्साहित हो जीवन की परम्पराओं का स्वागत करना सिखाते हैं।

भारतीय संस्कृति में तो रंगों को दिनों और देवों से जोड़कर सबका एक सा महत्व प्रतिपादित किया है।

हल्दी का पीला जहाँ शुभता का प्रतीक है वहीं सिंदूर, मेहंदी व आलता की लाली सुहाग का प्रतीक।

जीवन की आपाधापी में जब भी वक्त मिले कुछ पल जरूर स्वयं के लिए निकालना चाहिए, त्योहारों का उद्देश्य ही यही होता है कि आप खुद को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में सोचें, आप के चेहरे की मुस्कुराहट न केवल आपको प्रसन्न चित्त करती है वरन जितने लोग संपर्क में आते हैं वे भी तरोताजा महसूस करते हैं क्योंकि सौंदर्य की खुशबू से सारा जगत महकता ही है तो आइए संकल्प लें उत्सवों को भारतीय संस्कारों के साथ मनायें व सुखद परिवार की कल्पना को साकार करते हुए नारी शक्ति का न सिर्फ सम्मान करें बल्कि कन्या पूजन को विधि विधान से पूरा कर माता की कृपा के हकदार बनें।

माँ की आराधना का एक रूप डांडिया के साथ भी है जिसे भक्त पूरी श्रद्धा से नवरातों में खेलते हैं, ढोल की थाप संग डांडिया का स्वर, पायलों की छनक, चूड़ियों की खनक, माथे की बिंदिया की चमक, करधन का आकर्षण, धानी चुनर का सिर पर होना ही मानो सारी सज्जा को बयां कर देता है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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