श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – गंगा-सागर यात्रा – भाग-७ – कोलकाता ☆ श्री सुरेश पटवा ?

17 जून 2023 की रात कलकत्ता में गुज़ारी। किसी समय कलकत्ता भारत का सबसे बड़ा शहर था। अब दिल्ली और मुंबई के बाद तीसरे नंबर पर है। दुनिया का 16वाँ सबसे बड़ा महानगर है। अंग्रेजों की यह भारतीय राजधानी सबसे पहला मेट्रोपोलिस नगर था। अंग्रेजों के ज़माने से कोलकाता एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई है। कोलकाता के बसने की भी एक कहानी है। जॉब चारनाक नाम का एक बाईस वर्षीय अंग्रेज़ अपने साथियों के साथ पटना में गंगा के किनारे घूम रहा था। वह कुछ दिन पहले ही अंग्रेज़ों की क़ासिम बाज़ार कोठी  से तबादले पर पटना आया था। गठीले बदन में उमंग, उत्साह, ऊर्जा और तेज़ दिमाग़ में तैरते सपने लेकर इंग्लैंड से भारत पहुँचा था। अक्सर दोपहर का खाना खाने के बाद आराम करने के बजाय वह गंगा किनारे घूमने निकल जाता। उस रोज़ घूमते हुए गंगा घाट पर जहाँ सोन नदी गंगा से मिलती है उस तरफ़ चला गया।

 उसने देखा एक जगह बहुत तेज़ आग जल रही है, लोग आग को घेर कर खड़े हैं। वह कौतूहलवश वहाँ पहुँचा। आग में से चिढ़-चिढ़ की आवाज़ निकल रही है। अभ्रक के साथ घी मिश्रित चरबी जलने की गंध फैली हुई थी। हिंदू वहाँ दाह-संस्कार कर रहे हैं।  बाजु में एक और शव रखा हुआ है। यह पहला अवसर था जब वह आदमी के शव को जलता हुआ देख रहा था। वहीं एक लकड़ी पर बैठ गया। लकड़ियों के ढेर पर शव रखा गया। कुछ लोग कंडे और घास-पूस लकड़ियों के बीच में ख़ाली जगहों में फँसा रहे थे।

उसमें जब लगभग आग लगाई जाने लगी तब एक सोलह-सत्रह साल की दुल्हन सी सजी लड़की को चार लोग पकड़ कर चिता के सामने लाए। गोरी चिटटी लड़की नख-शिख ऋंगार में थी। सामने जलती चिता के प्रकाश से उसका गोरा सौन्दर्य रक्ताभ लालिमा से दमक रहा था। बंगाली रिवाज के मुताबिक़ उसकी माँग में ख़ूब गहरा लाल सिंदूर भरा था। ऐसी लग रही थी मानो वह अभी-अभी शादी के मंडप से उठकर आई है। कुछ लोग उसे उसके बूढ़े मृत पति के शव के साथ चिता में ज़िंदा जलाने की ज़िद पर अड़े थे परंतु वह  तैयार नहीं थी। वह दो साल से अपने धनाढ़्य बुज़ुर्ग लकवा ग्रस्त पति की सेवा करती रही थी लेकिन अंततः वह काल कवलित हो गया था। लोग उसे ज़बरदस्ती चिता की तरफ़ धकेल रहे थे। उसकी आँखों के आँसुओं में चिता की अग्नि के दहन का प्रतिबिम्बित दृश्य चमक रहा था। वह बेचारी पूरी ताक़त से अपने आप को पीछे खींचे हुए कमान सी बनी हुई थी। लोग उसके दोनो हाथ पकड़कर खींच रहे थे। वह ज़मीन पर बैठ गई तो लोग उसे चिता की तरफ़ घसीटने लगे। जॉब चार्नाक का हृदय दहल गया। उसका धैर्य का बाँध टूट गया। उससे रहा नहीं गया। उसने अपने साथियों की मदद से लड़की को ज़िंदा जलाए जाने से बचाया। लोग दाह संस्कार करके चले गए वह लड़की और जॉब वहीं खड़े रहे। उस लड़की का नाम था लीलावती।

जॉब लीलावती को अपने गोल झोंपड़े में ले गया। उसने बंगाली सौंदर्य की इतनी ख़ूबसूरत दुल्हन कभी इतने नज़दीक से नहीं देखी थी। वह उसे अपलक देखता रह गया। उसने लीलावती को खाना-पानी दिया। तब तक रात घिरने लगी थी। वे दोनों कमरे के दो कोने पकड़ कर सो गए। सुबह जॉब की नींद खुली तो उसने देखा अट्ठारह वर्षीय नवयौवना का चेहरा सुबह की लालिमा से चमक  रहा था। उसका साड़ी का पल्लू खसक कर नीचे आ गया था। जिससे उसके वक्षों का उभार साँसों के साथ उठता-बैठता नज़र आ रहा था। जॉब उसे लगातार देखे जा रहा था। उसकी साँसें भी उसके सीने में धौंकनी की तरह चलने लगीं। आग और इंधन साथ हो तो आग भड़कनी स्वाभाविक बात है। उससे रहा नहीं गया, वह उठकर लीलावती के पास गया। उसने अपने ओंठ लीलावती के माथे पर रखे ही थे कि वह चौंकी और उसने जॉब को अपनी बाहों में कस लिया। जब लीलावती नींद की ख़ुमारी से होश में आई, ध्यान से जॉब को देखा तो उसे परे ढकेल दिया लेकिन दो दिलों में प्रेम का अंकुर फूट चुका था। युवा अवस्था में यदि काम दंश मन को भेद जाए तो एक दूसरे के मिलन के बग़ैर जीना दूभर हो जाता है। जॉब बंगाली कामिनी की गुदाज देह से आती मत्स्यगंधा सुगंध के वशीभूत था और लीलावती जॉब की सुपुष्ट देहयष्टी पर मुग्ध हो चुकी थी।

उस समय भारतीय समाज में विधवा होना एक अभिशाप होता था। विधवा का भगवान भी सहारा नहीं होता था। हालाँकि उसके घर परिवार के अधेड़ लोग उसे सहारा देने के नाम पर उसके दैहिक शोषण हेतु खड़े हो जाते थे, कुछ हाज़िर में और कुछ प्रतीक्षा में, हिंदू मान्यताओं के अनुसार वह दूसरा विवाह भी नहीं कर सकती थी। विधवा यदि पति के साथ अग्नि में सती न हो तो उसको अभिशापित मान कर घर से निकाल दिया जाता था। ऐसी युवा विधवाएँ काशी के विभिन्न घाटों पर स्वयंभू स्वामियों की सेवा में दैहिक शोषण के लिए पहुँचा दी जातीं थीं। जॉब ने लीलावती से से शादी कर ली, उनकी तीन पुत्रियाँ हुईं। कलकत्ता के सेंट जॉन गिरजाघर के प्रांगण में जॉब और लीलावती की क़ब्र हैं, हो भी क्यों न, क्योंकि जॉब चारनाक वही व्यक्ति है जिसने कलकत्ता नगर की नींव रखी थी। बस, उसने हुगली किनारे बसा दिया एक नगर कोलीकाता जो कि 1775 से 1912 तक अंग्रेज़ों के भारतीय उपनिवेश की राजधानी रहा अर्थात् भारत को  ग़ुलाम बनाने की नीतियों, कूटनीतियों, षड्यंत्रों और चालों का चश्मदीद गवाह। बंगाली उसे बुलाते थे कोलिकाता, कोलि याने काली चूना और काता याने अंचल या इलाक़ा, इस प्रकार काले चूने का इलाक़ा हुआ कोलिकाता याने कलकत्ता। वहाँ चूने की आढत के ठिए और कारख़ाना थे, समंदर गहरा होने से जहाज़ों के लंगर के अनुकूल बंदरगाह की सम्भावना थी। कलकत्ता बसना शुरू ही गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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