श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-५ ☆ श्री सुरेश पटवा
250 ईसा पूर्व तक दक्षिणी नेपाल के क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के प्रभाव में आ गए थे। ठकुरी राजाओं का शासन उत्तरी नेपाल तक सीमित हो गया। सम्राट अशोक ने लुंबिनी की तीर्थयात्रा की और बुद्ध के जन्मस्थान पर एक स्तंभ बनवाया, जिस पर अंकित शिलालेख नेपाल के ठीक से दर्ज इतिहास के लिए शुरुआती बिंदु हैं। अशोक ने काठमांडू घाटी का भी दौरा किया और वहां गौतम बुद्ध की यात्रा की स्मृति में स्मारकों का निर्माण कराया। चौथी शताब्दी ईस्वी तक, नेपाल का अधिकांश भाग गुप्त साम्राज्य के प्रभाव में था। चौथी से ग्यारहवीं सदी तक कई राजाओं द्वारा विखंडित रूप से शासित रहा।
हिमालय की तराई प्रदेशों में एक समय 500 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व तक जैन और बौद्ध धर्म का बोलबाला था। उसी समय सम्राट अशोक के शासन में धर्मचक्र प्रवर्तन से तिब्बत, सिक्किम, भूटान, चीन, जापान, श्रीलंका और ब्रह्मदेश अर्थात् बर्मा में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, परंतु क्या कारण था कि नेपाल में सनातन धर्म के साथ हिंदू राष्ट्र अस्तित्व में रहा आया जो अभी-अभी धर्म निरपेक्ष देश बना है। जबकि भारत में धर्म निरपेक्ष राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र से पुनर्स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं। इस प्रश्न का जवाब इतिहास के झोंके में छुपा है। जिस समय बौद्ध धर्म हिमालय पर स्थित देशों में फैल रहा था उस समय नेपाल देश ही नहीं बना था। ईसा से पूर्व दूसरी सदी में हिंदू धर्म का पुनः उद्भव हुआ। जो गुप्त काल (350-550 ईस्वी) में खूब फला फूला। मध्य युग में गंगा के मैदान में इस्लामिक प्रचार-प्रसार और प्रतारणा से त्रस्त होकर हिंदू क्षत्री प्रयागराज और काशी के पंडितों को लेकर तराई से होकर इन पहाड़ों में आए। काठमांडू, पाटन और भक्तपुर राज्य स्थापित किये। जिनके दरबार के अवशेष अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने शिव का पशुपतिनाथ स्वरुप और विष्णु का आरम्भिक स्वरूप पूजना आरम्भ किया। पूरा नेपाल मांसाहारी है। जबकि वैष्णव पंथ में मांसाहार प्रचलित नहीं है। नेपाल में पुष्टिमार्गी वैष्णव पंथ नहीं पहुँचा इसलिए शाकाहार की प्रवृत्ति भी नहीं आई।
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15 जून 2022 को सुबह छै बजे नई दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही बोगी में कुलियों की भीड़ चढ़ गई। उन्होंने दरवाज़ों की तरफ़ पहुँचने के रास्ते अवरुद्ध कर दिए। जवाहर जी थोड़ी देर नजारा देखते रहे। फिर उनका इम्पल्स-स्विच ऑन हुआ और उन्होंने कुलियों को झिड़का तो रास्ता क्षण भर में साफ़ हो गया। जवाहर जी का व्यवहार बहुत पारदर्शी है। वे मन में कुछ भी नहीं रखते। तुरंत निपटान उनकी विधि है। नई दिल्ली स्टेशन पर अहमदाबाद से उनके छोटे भाई हीरा लाल कर्णावत जी भी आ जुड़े। सोलह नम्बर प्लैट्फ़ॉर्म के बाहर निकलकर एक इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में दो घंटे के लिए ठहराव टिकट लेकर वह हुए, जिसे फ़्रेश होना कहते हैं। फिर नेपाल के नामकरण और प्राकृतिक स्थिति पर चर्चा करते रहे।
इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में तैयार होकर जन आहार केंटीन से डोसा खाया, जिसका स्वाद दिल्लीयाना था, दक्षिण का स्वाद यहाँ मिल भी नहीं सकता। नौ बजे के लगभग सामान खींचकर एयरपोर्ट मेट्रो की तरफ़ चल दिए। तक़रीबन आधा किलोमीटर चले। भीड़ को धकियाते और लोगों से धक्के खाते मेट्रो का टिकट लिया। पहले सिक्का मशीन को दिखाना पड़ता था। अब डिजिटल कार्ड स्कैन करके प्रवेश मिलने लगा है।
एयरपोर्ट लाइन में भूमिगत और एलिवेटेड मेट्रो स्टेशन दोनों का मिश्रण है। एयरपोर्ट मेट्रो में सवार हो गये। जो शिवाजी स्टेडीयम तक सुरंग में चली, फिर धौलाकुआँ से सतह पर आकर दिल्ली के नज़ारे दिखने लगे। इसके बाद अंतर्देशीय उड़ान अड्डा T-1 आता है। फिर मेट्रो इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँचती है। वहाँ T-2 और T-3 टर्मिनल हैं जहां से आप दुनिया के किसी भी देश की उड़ान भर सकते हैं। बस आपके पास टिकट और पासपोर्ट-वीज़ा होना चाहिए। हम बिना वीज़ा के ही पहुँच गये। उन्होंने भी नहीं पूछा क्योंकि नेपाल जाने के लिए भारतीयों को वीज़ा की छूट है। टर्मिनल से अंदर घुसने के बाद A,B,C……..H,I,J… काउंटर बने हैं। आपकी उड़ान जिस काउंटर से अनुमत है वहीं से जाना होता है। नियत समय से पूर्व पहुँच गये। ख़ाली समय में नेपाल के भूगोल को खंगाल निकाला।
नेपाल चारों तरफ़ से ज़मीनी देशों से घिरा देश है। जिसकी कोई भी सीमा समुद्र से नहीं लगती है। यह मुख्य रूप से हिमालय के बीच में स्थित है। इसके दक्षिण में गंगा के मैदान के कुछ हिस्से हैं। उत्तर में यारलुंग त्सांगपो, जिसे तिब्बती में यारलुंग ज़ंगबो भी कहा जाता है जो कि चीन में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा है। त्सांगपो नदी को हम तिब्बत की गंगा कह सकते हैं। वह हिमालय के उत्तरी ढलान से अनेकों नदियों का जल ग्रहण करती है। विश्व की सबसे ऊँची चोटियों पर पिघलते बर्फीले ग्लेशियर का कंचन पानी लेकर सिक्किम और भूटान के उत्तर से भारत उत्तर-पूर्व अंचल से गुवाहाटी में घुसकर बंगला देश से होकर बंगाल की खाड़ी में विश्राम करती है। यह तिब्बत की सबसे लंबी और चीन की पांचवीं सबसे लंबी नदी है। ऊपरी भाग को डांगके ज़ंगबू भी कहा जाता है जिसका अर्थ है “घोड़ा नदी।” नेपाल के उत्तर में ही चीन का तिब्बत है। दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में भारत की सीमा लगी है। जबकि यह बांग्लादेश से सिलीगुड़ी कॉरिडोर द्वारा संकीर्ण रूप से अलग है और भारतीय राज्य सिक्किम द्वारा भूटान से अलग है। नेपाल में उपजाऊ मैदान, पाइन वनाच्छादित पहाड़ियाँ और दुनिया के दस सबसे ऊँचे पहाड़ों में पृथ्वी का सबसे ऊँचा माउंट एवरेस्ट सहित कई शिखर शामिल हैं। नेपाल एक बहु-जातीय, बहुभाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक राज्य है, जिसमें नेपाली आधिकारिक भाषा है। काठमांडू देश की राजधानी और सबसे बड़ा शहर है। नेपाल का राष्ट्रीय वाक्य “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” है।
हम चेक-इन करके मायग्रेशन काउंटर पर पहुँचे। वहाँ बहुत लम्बी क़तार थी। दस काउंटर के स्थान पर मात्र तीन पर मायग्रेशन जाँच का कार्य चल रहा था। बहुत भीड़ होने से उकताहट का माहौल था। एक घंटा खड़े रहने के बाद सुरक्षा जाँच को पहुँचे। वहाँ भी भीड़ थी। अंत में सारी जाँच उपरांत स्टेट बैंक क्रेडिट कार्ड धारक होने के नाते मात्र दो रुपयों में तीन हज़ार के लंच हेतु स्पेशल लाउंज में प्रवेश मिल गया। आप सोच रहे होंगे कि यह तीन हज़ार का लंच क्या होता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे बाज़ार में एक शर्ट का कपड़ा तीन सौ रुपए में मिलता है, वहीं रेमंड की शॉप पर तीन हज़ार का शर्ट भी मिलता है। वहाँ चाय-कॉफ़ी से लेकर सभी प्रकार के ड्रिंक और भोजन की व्यवस्था उपलब्ध थी। हमने फ़्रूट के साथ दूध-ब्रेड उठाईं। थोड़ी देर में काउंटर समेटे जाने लगे। पता चला कि वह ब्रेकफ़ास्ट था, लंच तो अब परोसा जाने वाला है। हमने जूस का गिलास भरा। नज़दीक ही स्कॉच काउंटर पर भीड़ लगी थी। जितनी चाहो उतनी पी लो। तब हमें तीन हज़ार के लंच का रहस्य समझ में आया। कर्णावत बंधु शुद्ध शाकाहारी और मद्य व्यसन से दूर रहते हैं। उन्हें खाने की तल्लीनता में छोड़ हमने जूस में एक पैग डलवा लिया। दो घंटे समस्त प्रकार के आनंद के बाद विमान में चढ़ने गेट नम्बर 1-B पर पहुँच गये।
विमान में कुल 186 सीट थीं। हमें सबसे पीछे 184 नम्बर की 31-D सीट मिली। हम जाकर बैठ गये। हमारे बाद अंतिम दो सीट और थीं। उनके आने पर हमने उठकर उन्हें जाने देना पड़ा। वे दोनों सवारियाँ खाते पीते घर की लगेजनुमा थीं। वे किसी तरह कुर्सियों में समा गईं। उनके बेल्ट नहीं लग पा रहे थे। विमान परिचरिका की दुबली-पतली देह ने लम्बी दूरी तय करके उनके बेल्ट कसे। सभी विमान परिचारिकाएँ नवयौवना थीं। उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी में सुरक्षा निर्देश अभ्यास दुहराये। विमान कप्तान के कभी न समझ आने वाले कुछ शब्द बुदबुदाये। विमान ने दो बजकर तीस मिनट पर उड़ान भरी। विमान गुड़गाँव शहर के ऊपर उठकर मेरठ मुरादाबाद के ऊपर से होकर हिमालय की तराई की तरफ़ उड़ता रहा। विमान तलहटी की सबसे बाहरी सीमा जिसे शिवालिक हिल्स या चुरिया रेंज कहा जाता है, जो 2,300 से 3,280 फीट ऊँचाई पर स्थित है, को चूमता बढ़ता रहा। चौड़ी, निचली घाटियाँ जिन्हें इनर तराई घाटियाँ (भीतरी तराई उपत्यका) कहा जाता है, के ऊपर से विमान उड़ता रहा। दाहिनी तरफ़ गंगा का मैदान दिखने लगा। उसके बाद थोड़ी दूर ऊँची उड़ान भरकर हिमालय की चोटियों को पार करके नेपाल की वायुसीमा में प्रवेश कर गया। काठमांडू की घाटी दिखने लगी। विमान 1440 किलोमीटर की दूरी एक घंटा तीस मिनट में पूरी करके चार बजे काठमांडू उतरा। विमान से दिखती लुभावनी हरीतिमा ने मन मोह लिया।
काठमांडू में हमारा स्वागत बहुत आत्मीय तरीक़े से हुआ। जवाहर जी के पूर्व परिचित नेपाली मूल के श्री भरत शर्मा एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कार्यक्रम में जवाहर जी से उनकी ऑनलाइन मुलाक़ात तीन दिन पूर्व ही हुई थी। वे चीन में हिंदी पढ़ाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर में वहाँ के प्रधान भाट से उनके घरेलू रिश्ते हैं। प्रधान भाट कर्नाटक के भाट ब्राह्मण हैं। वे पशुपतिनाथ मंदिर प्रांगण की चार सदस्यीय व्यवस्थापक समिति के प्रधान हैं।
जवाहर जी ने नेपाल की स्थानीय सिम लेकर सबसे पहले भरत शर्मा जी को फ़ोन किया। वे दस मिनट में हवाई अड्डा पहुँच गये। उन्होंने हमें एक-एक रंगबिरंगा मफ़लर भेंट स्वरूप गले में पहना कर स्वागत किया। हमारे रुकने का प्रबंध कमल पोखरी चौक स्थित जैन मंदिर आवास गृह में किया गया था। उन्होंने नेपाली भाषा में एक टैक्सी तय करके उसे भारतीय मुद्रा में पाँच सौ रुपए जिनका नेपाली मूल्य आठ सौ रुपए था, भुगतान कर दिए। हम लोग चार बजे के लगभग कमरे में थे। दो कमरे तीन हज़ार भारतीय मुद्रा में मिल गये। आधा घंटा कमर सीधी करके एक टैक्सी पकड़ कर पशुपतिनाथ मंदिर पहुँचे। नेपाल में टैक्सी बहुत महँगी हैं। गाड़ियों की क़ीमत भारत से चार गुणा अधिक हैं। पेट्रोल दो सौ रुपए लीटर है। पहाड़ी रास्ते होने से ऑटो नहीं चलते।
भरत शर्मा जी वहाँ हमारी राह देख रहे थे। उन्होंने जिस तरह के दर्शन कराए वह शायद ही किसी को नसीब होते हों। वे पहले नागराज वासुकि के दर्शन कराने ले गए। पशुपतिनाथ जी के दर्शन पूर्व वासुकि की अनुमति की परम्परा है। इस बीच हम मोबाईल ऊपर की जेब से नीचे पैंट की जेब में रख रहे थे तो एक सेवादार ने आई-फ़ोन यह कहते हुए हमसे छीन लिया कि हम मंदिर प्रांगण की फ़ोटो निकाल रहे थे। थोड़ी देर के लिए हम घबरा गये। हमारा समस्त लेखन मोबाईल में ही है। उसका चला जाना याने हमारी सारी सम्पत्ति का लुट जाना। तुरंत की फ़ोटो चेक की गईं और हमारी गलती के लिए हमसे पशुपतिनाथ से माफ़ी माँगने को कहा गया। गलती हुई या नहीं, यह बेमानी था, हमने सिर झुकाकर माफ़ी माँगी। बहुत मिन्नतों और शर्मा जी की मशक़्क़त से मोबाईल वापस मिला।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, नेपाल का नाम एक प्राचीन हिंदू ऋषि से लिया गया है जिसे विभिन्न विद्वानों द्वारा मुनि नेमी कहा जाता है। हालांकि नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन इसकी आबादी मुख्य रूप से हिंदू है। पशुपतिनाथ को एक राष्ट्रीय देवता के रूप में पूजा जाता है। बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर को नेपाल के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। भगवान पशुपतिनाथ के रूप में भगवान शिव आराध्य देवता हैं। इसका मुख्य आकर्षण भगवान शिव के चार मुखों को प्रदर्शित करने वाला एक अनूठा शिव लिंग है।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




