श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के दोहे… वक्त । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २७६ ☆
☆ संतोष के दोहे… वक्त ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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चांदी सिर पर चमक कर, देती यह संदेश |
ध्यान रखें हम उम्र का, हो पावन परिवेश ||
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अश्व रुके कब उम्र का, चले निरंतर रोज |
चलें वक्त के साथ हम, रख कर मन में ओज ||
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वापिस कभी न आ सकें, यौवन अरु ये वक्त |
दर्पण करता हर समय, सच्चाई ही व्यक्त ||
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साथ समय के चल बसा, काया का मधुमास |
अब पतझड़ है सामने, मन क्यों करे उदास ||
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वर्तमान के मूल में, जीवन खुशी अगाध |
सहज प्राप्त संतोष तब, उन्नत होगा माथ ||
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





