श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चक्रवात…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३४ ☆

☆ # “चक्रवात…” # ☆

☆

चारों दिशाओं में

यह कैसा शोर है

हवाओं में आजकल

बहुत जोर है

दिखाई देता है

वह धुंधला है

असलियत में भावी होने वाला

कुछ और है

 

सब तरफ एक खामोशी है

होठों से गायब

हो चुकी खुशी है

अंदर ही अंदर

कई तूफान है

शायद फटने वाला

कोई ज्वालामुखी है

 

समुद्र में लहरें

ऊंची ऊंची उठ रही है

सदियों पुरानी मान्यताएं

धीरे-धीरे टूट रही है

धैर्य, संयम, सहनशीलता

पीछे छूट रही है

किनारे पर खड़े-खड़े

हमारी सांस घुट रही है

 

शायद यह किसी

अनहोनी का इशारा है

इससे जुड़ा भविष्य

हमारा और तुम्हारा है

झूठ के बुनियाद पर टिके

इस बाजार में

सत्य की टिमटिमाती

रोशनी का सहारा है

 

काश यह चक्रवात

धीमा होकर रुक जाए

तबाही का मंजर

अपने इरादे से चुक जाए

परिवर्तन के इस बयार के आगे

यह जालिम, खुदगर्ज जमाना

हमेशा के लिए झुक जाए /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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