डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे  – रावण)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # २९६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रावण ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रावण के पुतले जले, नहीं बदलता भाव।

अंतर्मन के द्वेष से, जगता सदा तनाव।।

 *

जला रहे सारे हमीं, रावण को हर वर्ष।

नहीं बुराई छूटती, नित लालच में हर्ष।।

 *

अहंकार मद मोह ही, रावण के अवतार।

मन के भीतर झाँकिए, पा लोगे सब प्यार।।

 *

राम नहीं बाहर कहीं, ढूँढो अपने पास।

करो दहन रावण तभी, जब होगा विश्वास।।

 *

सदा परस्पर वैर का, फैल रहा है जाल।

असुर शक्तियाँ पनपती, घर-घर यही सवाल।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted