आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – धनतेरस पर विशेष गीत – प्रभु धन दे…।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५२ ☆

☆ धनतेरस पर विशेष गीत – प्रभु धन दे… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

प्रभु धन दे निर्धन मत करना.

माटी को कंचन मत करना…..

*

निर्बल के बल रहो राम जी,

निर्धन के धन रहो राम जी.

मात्र न तन, मन रहो राम जी-

धूल न, चंदन रहो राम जी..

भूमि-सुता तज राजसूय में-

प्रतिमा रख वंदन मत करना…..

*

मृदुल कीर्ति प्रतिभा सुनाम जी.

देना सम सुख-दुःख अनाम जी.

हो अकाम-निष्काम काम जी-

आरक्षण बिन भू सुधाम जी..

वन, गिरि, ताल, नदी, पशु-पक्षी-

सिसक रहे क्रंदन मत करना…..

*

बिन रमेश क्यों रमा राम जी,

चोरों के आ रहीं काम जी?

श्री गणेश को लिये वाम जी.

पाती हैं जग के प्रणाम जी..

माटी मस्तक तिलक बने पर-

आँखों का अंजन मत करना…..

*

साध्य न केवल रहे चाम जी,

अधिक न मोहे टीम-टाम जी.

जब देना हो दो विराम जी-

लेकिन लेना तनिक थाम जी..

कुछ रच पाए कलम सार्थक-

निरुद्देश्य मंचन मत करना..

*

अब न सुनामी हो सुनाम जी,

शांति-राज दे, लो प्रणाम जी.

‘सलिल’ सभी के सदा काम जी-

आये, चल दे कर सलाम जी..

निठुर-काल के व्याल-जाल का

मोह-पाश व्यंजन मत करना…..

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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