स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५४ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ५
(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)
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का करहों मैं रूठ के, आँग उपत हुनयारा ।
बड़े दिना में मिले सौ, टूटी लाज-उपास ||
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कंचन कैंसर एक रस, सब रस गाँसी देह ।
ऐसी सूरत देख के,देही भये बिंदेह ||
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अमिया घाँई उमर है,चम्पा जैसे पाँव ।
निबआ जैसी गमकतीं, जामुन जैसो नाँव ||
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लाली खाली कछु लगै, भरी फरी सी जान ।
संझा और दुर सब, मिलीं एक रसखान ||
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तीन दिना के आँतरे, रुच रुच धोये कैस ।
साधू के चित डिगातीं, धारे साधू भेस ||
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गोबर छापे हाँत सें,उँगराउत है सार ।
डा चारा मन भरो,ओहे जान गँमार ||
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गौरी कारी जलभयी,भरी देह में दाह ।
ग्रीसम की पत राखकें, पिय पत दई निबाह ||
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हाँतन की रसरी करी, बदन मथानी कीन ।
रसरी में रसरी रसी, ऐई सें कटि छीन ||
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नीम निबौली आ गई, बद्दल आ गय घूम ।
चिठिया लौं ना लिख सके, कारन नामालूम ॥
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नौरस सबरस एक रस, नैन करत उतपात ।
हँसें मनाबैं रूठबैं, नस नस में धँस जात ॥
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नाँव तुमाओ राधिका, गुँथो स्याम के संग ।
जैसे हरिहर पात में, भिदो रैत है रंग ॥
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नेकछु नेंकछु कैत गइ, बाँके नैन झुलैत ।
कछु को कछु हो जात है, कछु कछुआ सो रैत ।
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© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





