स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५६ – बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया…
(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)
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चाँदनिया ऐसी लगै, ऊजर उन्ना होय।
जैसे कर असमान तुम, ओखों रहीं सुखोय।।
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दूबर पातर छरछरी, अरी भरी रस रूप।
बानबूट से दिनन में, मिली मुठी भर धूप।।
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देखत ही गड़ जाय जो, ऐसी पाई दीठ |
तार तार बस्तर करै, निकरै नई मजीठ।।
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दसन हँसन दूनी करै, करै दाँती काम |
अचरज मानों अधर में, अकसर करै मुकाम।।
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गोरे मों पे फबत है, बेंदी रंग बिरंग।
ड्योड़ी पे का तिल खड़ो, देख दिवैया दंग।।
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अधर असरफी हो गये, नैना भये गुलेल।
अब बिनकी का पूँछ नें, बिन के हाथ नकेल।।
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सुन्दरि जल बिच फँस गई, कसी-कमल की नाल।
भृंगन दल बादल भये, कमल-कली बेहाल।।
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धन निरधन कौ का कहौं, ऐंसे ऊ के भाग |
निधन धनी को होत है, निरधन पीबै आग।।
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दै गई न्यौता चंदनिया, आन करौ असनान।
गोरी सें गोरी भयी, जानत सकल जहान।।
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बेसुध सोई बाँह में, छाँह घनेरी जान।
पल में बीतत रैन जा, पल में होत भियान।।
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आंगन अँकुरा उठ रये, भये भील के बान |
धुपछैयां सी पैर कें,तानै रैत कमान ॥
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स्यामल सारी पैर कें,अँगना में मँडराय।
बिजुरी सी बिदकत फिरै, बादर सी बर्राया।।
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© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






