स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५७ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ७
(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)
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बरनन तुमरे रूप की, छैंयां सौ बढ़ जात ।
कहने खों अँखियन रहत, रहत हत बहुजात ||
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जोबन बढ़ बढ़ लेते है, मेंगाई से होड़ ।
जिनके छोटे हाँत हो, उनखे उठे मरोड़ ||
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मन परबत बुड़ी रहत, तुमरे प्रेम समुन्द ।
नेंनन में छाई रहे, सदा रूप की धुन्द ||
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मुख छब बरनत ना बनें, की से समता होय ।
बाँचों जाँचो चन्द्रमा, हॉतन रहल सँजोय ||
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जात हमाई पूँछ लो, पूँछो हमरो नाँव ।
जौरें हमरे आव तौ, हम पीपर की छाँव ||
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पेसी पे आये सबई, नाँव लेत दरबान ।
को जाने की खों मिले, कैंसो का फरमान ||
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पिंगल की कविताड़ अब, है दिल्ली की कील ।
कविता की दुरगत भयी, बन गय कुकवि वकील ||
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जन्ता खों राजा कहें, राजा भये मजूर ।
सेवक राजा हो गये, सब कुइ कहें हजूर ।।
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नीत राज से अलग भइ, छितर गये, मन-भेद ।
कट्टर पन ने कर दओ, धरम-नाव में छेद ॥
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मन मोरो औगुन भरो, कैसे करौं पवित्र ।
सूझ गई तरकीब जा, राखो नाम सुमित्र ||
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© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





