आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२४ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २४ ☆ आचार्य भगवत दुबे
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तेरे दीवानों में तो शामिल हुआ,
प्यार मेरा किन्तु नाकाबिल हुआ,
हम वफा की राह पर जब भी बढ़े
सिर्फ नफरत का जहर हासिल हुआ।
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जब अनुभव की आग तपाती है,
पीड़ा से सहकार कराती है,
अहंकार के सारे दोष जला देती,
कुंदन सा हमको दमकाती है।
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तू सच्चा किरदार निभा,
बिना स्वार्थ व्यवहार निभा,
लाभ-हानि पर ध्यान न दे
अगर किया है प्यार निभा।
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श्रम करने में कैसी लाज,
श्रम देगा उन्नति के ताज,
कवच बनाना तुम पौरुष का
झपटेंगे दुर्दिन के बाज।
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तेरी तृष्णा न खा जाये ईमान को,
भेड़िया यह बनाती है इन्सान को,
संग लाती है दौलत, सभी व्याधियाँ
चाटना पड़ती है धूल धनवान को।
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© आचार्य भगवत दुबे
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






बेहतरीन अभिव्यक्ति