श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भविष्य को समृद्ध करते: पेड़ पौधे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २६९ ☆ भविष्य को समृद्ध करते: पेड़ पौधे

जब हम सफलता की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी कल्पना में ऊँची इमारतें, तेज़ रफ्तार जीवन और भौतिक उपलब्धियाँ उभरती हैं। परंतु यदि गहराई से देखा जाए, तो सच्ची और टिकाऊ सफलता की जड़ें हरियाली में ही छुपी हैं। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया गया विकास ही वह मार्ग है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों को दीर्घकालिक समृद्धि की ओर ले जाता है।

हरियाली केवल आँखों को सुकून देने वाला दृश्य नहीं है, बल्कि यह जीवन-दृष्टि है। एक पौधा लगाना दरअसल भविष्य में विश्वास बोना है। जैसे बीज मिट्टी में दबकर, धैर्य और देखभाल से वृक्ष बनता है, वैसे ही निरंतर प्रयास, अनुशासन और सही दिशा से सफलता का वृक्ष तैयार होता है।

प्लांटेशन एक सामूहिक जिम्मेदारी है—यह नेतृत्व का भी प्रतीक है। जो व्यक्ति या संस्था आज पेड़ लगाती है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए छाया, ऑक्सीजन और स्थिरता का उपहार देती है। यही सोच जब कार्यस्थलों, उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों में अपनाई जाती है, तो वहां ग्रीन लीडरशिप जन्म लेती है—जहाँ लाभ के साथ-साथ प्रकृति का सम्मान भी होता है।

आज की दुनिया में हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुकी है।

वृक्षारोपण, जैव-विविधता संरक्षण और टिकाऊ कृषि से-

  • संसाधनों का संरक्षण होता है,
  • स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है,
  • रोजगार के नए अवसर बनते हैं,
  • और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।

जो समाज हरियाली में निवेश करता है, वही भविष्य की अनिश्चितताओं से सुरक्षित रहता है। पौधा हमें अनुशासन सिखाता है—समय पर पानी, सही धूप, और निरंतर देखभाल। यही गुण सफलता की रीढ़ हैं। जो व्यक्ति पौधे की भाषा समझ लेता है, वह जीवन की भी भाषा समझने लगता है। धैर्य रख, प्रक्रिया पर भरोसा करने से, परिणाम समय पर स्वयं आयेंगे।

विद्यालयों और समुदायों में प्लांटेशन को संस्कृति का हिस्सा बनाना चाहिए। जब बच्चे अपने हाथों से पौधा लगाते हैं, तो वे जिम्मेदारी, करुणा और भविष्य-चिंतन सीखते हैं। यह संस्कार उन्हें केवल अच्छे नागरिक ही नहीं, बल्कि संवेदनशील और सफल मानव बनाते हैं।

आज सफलता की नई परिभाषा यह है कि हमने विकास के साथ कितना संरक्षण किया। कितने पेड़ लगाए, कितनी ज़मीन को जीवन दिया, और कितनी पीढ़ियों के लिए बेहतर कल छोड़ा।

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हर उपलब्धि के साथ एक पौधा अवश्य लगाएँ। क्योंकि जब जड़ें मज़बूत होती हैं, तभी ऊँचाइयाँ स्थायी बनती हैं।

हरियाली ही सफलता है, और सफलता की सच्ची पहचान हरियाली से ही होती है। यही वह पूँजी है जो हम अगली पीढ़ी को स्थानांतरित कर उनके उज्ज्वल भविष्य को निर्मित कर सकते हैं।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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