श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७० ☆ आरावली: हरियाली भरा सौंदर्य… ☆
आरावली
जिसका अर्थ है पंक्तिबद्ध पहाड़ों की श्रृंखला। यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है। यह केवल पहाड़ों की कतार नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जीवन का सुरक्षा कवच है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह पर्वतमाला जलवायु संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता की अमूल्य धरोहर है।
आरावली वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बनाए रखती है। यही कारण है कि इसके आसपास के क्षेत्रों में कभी हरियाली, वन्यजीव और नदियों की धाराएँ जीवित रहीं। यह थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भी रही है।
अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और हाल की आग की घटनाओं ने इसकी आत्मा को छलनी कर दिया है। जो पहाड़ हजारों वर्षों से धरती की रक्षा करते आए, आज वही मानव लालच के शिकार हो रहे हैं।
आरावली का नष्ट होना केवल पर्यावरण की हानि नहीं है,नयी समस्या की शुरुआत भी है ।
जब हरियाली से भरे पहाड़ मिटते हैं
तो सिर्फ जंगल नहीं जलते, भविष्य जलता है। हम भूल जाते हैं कि…
आरावली नहीं बचेगी तो पानी नहीं बचेगा, हवा नहीं बचेगी,और अंत में हम भी नहीं बचेंगे। अतः प्रकृति के साथ स्नेहिल जुड़ाव रखें ।
**
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





